अन्नपूर्णानन्द वर्मा – स्मृति शेष

” दाम लगाइए, जो अधिक दाम दे वह ले जाए

यही सही, आप उसका पचास रूपया दे रहे थे, मैं सौ देता हूँ

मैं डेढ़ सौ देता हूँ

मैँ दो सौ देता हूँ

अजी मैं ढ़ाई सौ देता हूँ, यह कह कर बिलवासी जी ने ढ़ाई सौ के नोट लाला झाऊलाल के आगे फेंक दिए

साहब को भी अब ताव आ गया, उसने कहा आप ढ़ाई सौ देते है तो मैं पांच सौ देता हूँ

लोटा आपका हुआ ले जाइए, मेरे पास ढ़ाई सौ से अधिक नहीं है

यह सुनना था कि साहब के चेहरे पर प्रसन्नता की कूंची फिर गई। उसने झपटकर लोटा उठा लिया और बोला, अब मैं हंसता हुआ अपने देश लौटूँगा। मेजर डगलस की डींग सुनते-सुनते मेरे कान पक गए थे।

मेजर डगलस कौन है

मेजर डगलस मेरे पङौसी है। पुरानी चीज़ों का संग्रह करने में मेरी उनकी होङ रहती है। गत वर्ष वे हिन्दुस्तान आए थे और यहाँ से जहाँगीरी अण्डा ले गए थे।

जहांगीरी अण्डा

जी हाँ, जहाँगीरी अण्डा, मेजर डगलस ने समझ रखा था कि हिन्दुस्तान से वे ही ऐसी चीज़े ला सकते है ”

 

अकबरी लोटा – हास्य-व्यंग्य कहानी का अंश है यह जिसके लेखक है अन्नपूर्णानन्द वर्मा जिनका आज जन्मदिवस है।

हिन्दी गद्य में हास्य-व्यंग्य के आरंभिक दौर के लेखक है वर्मा जी जिनकी यह एक ही रचना बहुत लोकप्रिय है और वर्मा जी की पहचान भी इसी रचना से है। यह रचना है ही खास।

इस रचना में अंग्रेज़ो के समय के सामाजिक जीवन का चित्र है। अंग्रेज़ हम भारतीयों का शोषण करते रहे लेकिन वे हम भारतीयों के रहन-सहन, खान-पान के प्रति आकर्षित रहे जिसे आधार बना कर भारतीय अपना गुस्सा भी अवसर पा कर अंग्रेज़ो पर निकालने लगे। ऐसी ही घटना है जहाँ सामान्य लोटा अकबर बादशाह और सामान्य अण्डा जहांगीर बादशाह के समय का बता कर ऊँची कीमत पर अंग्रेज़ो को बेच दिया गया।

अपनी इसी विशेषता के कारण यह रचना हाई स्कूल के पाठ्यक्रम में कई शिक्षण संस्थानों ने शामिल की। अन्य रचनाओं की अधिक जानकारी नहीं है। खेद है कि अन्नपूर्णानन्द वर्मा जी का साहित्य जगत में विशिष्ट स्थान नहीं बन पाया।

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

टिप्पणी करे

सांदीपनी आश्रम

पोरबंदर में नवनिर्मित है सांदीपनी आश्रम –

20160403_171115

भव्य कलात्मक इमारत है जिसमे शिवलिंग और विभिन्न देवी-देवताओं की भव्य मूर्तियां है – शिव-पार्वती, लक्ष्मी नारायण, जानकी वल्लभ, दुर्गा-गणेश. पीछे एक विज्ञान कक्ष है जिसमे ज्ञान विज्ञान संबंधी विभिन्न तस्वीरें है.

इस आश्रम के निकट है पोरबंदर समुद्र तट जो बहुत गन्दा है जहां खड़े रहने में भी कठिनाई होती है –

20160403_160626

पूरा पोरबंदर न अधिक साफ़-सुथरा है और न ही अधिक विकसित। गांधी जी की प्रतिमा केवल कीर्ति मंदिर –

20160403_154120

उनके पैतृक निवास स्थान पर ही नज़र आई और बापू के तीन बन्दर कही नज़र नही आए.

इसके बाद हम हैदराबाद लौट आए और सबसे पहले जी भर कर और पेट भर पानी पिया … गुजरात का पानी … उफ्फ्फ्फ़ ! कड़वा !! ठंडा हो या सामान्य या मिनरल … दो बूँद पीना कठिन रहा …. शायद इसीलिए वहां के भोजन में गुड का प्रयोग अधिक होता है …. खैर .. इस कड़वाहट के बावजूद भी हमारा ट्रिप अच्छा रहा.

टिप्पणी करे

सुदामा पुरी

पोरबंदर में भारत मंदिर देखने के बाद हम पहुंचे सुदामा पुरी –

20160403_154636

यह सुदामा का मंदिर है. गर्भगृह में बीच में सुदामा, एक ओर राधाकृष्ण और दूसरी ओर सुशीला जी की मूर्तियां है –

20160403_143157

सबसे आकर्षक है मंदिर के प्रांगण में 84 करोड़ परिक्रमा –

20160403_142830

इसमें चलना बहुत कठिन है, इसका पूरा रास्ता पार करना सचमुच 84 योनियों को पार करने जैसा ही कठिन है.

इसके बाद हम गए सांदीपनी आश्रम जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

टिप्पणी करे

भारत मंदिर और नेहरू तारामंडल

पोरबंदर में भारत मंदिर और नेहरू तारामंडल आमने-सामने है –

20160403_150617

20160403_145959

नेहरू तारामंडल कुछ ख़ास नही है, शो दिखाए जाते है पर उच्च आधुनिक तकनीक नही है.

भारत मंदिर में हरा-भरा अहाता पर करने के बाद मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर चार-चार स्वतंत्रता सेनानियों की मूर्तियां लगी है –

20160403_145858

भीतर बड़े कक्ष में बीचों-बीच भारत का नक्शा है और पूरे कक्ष में स्तम्भों की चारों दीवारों पर विभिन्न हस्तियों की तस्वीरें है जिनमे आर्यभट्ट, नागार्जुन से लेकर शबरी, महारानी पद्मिनी, और राम आदि चरित्र भी है –

20160403_145357

दीवारों पर ताजमहल जैसे स्थानों के चित्र है –

20160403_145803

हर चित्र के स्थान पर एक सूक्ति लिखी है. कुल मिलाकर भारतीय संस्कृति की लगभग सभी हस्तियां और स्थान यहां देखे जा सकते है. जिन्हे देखना अच्छा लगा.

इसके बाद हम गए सुदामा पुरी जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

टिप्पणी करे

कीर्ति मंदिर

गांधी जी के निवास स्थान गुजरात, पोरबंदर में सबसे पहले हमने देखा – कीर्ति मंदिर … जो गांधी जी का पैतृक निवास है –

20160403_153939

तीन मंज़िला पुरानी इमारत को थोड़ा विस्तार दिया गया है जिससे पुरानी इमारत संभली हुई है. इसे संग्रहालय बना दिया गया है –

20160403_153834

बीच में है बापू बा की तस्वीरें –

20160403_152923

पूरे गलियारे और कक्षों में बापू द्वारा पढ़ी जाने वाली पुस्तकें, स्वाधीनता संग्राम के दौर की तस्वीरें रखी है –

20160403_153300

कीर्ति मंदिर के बाई ओर छोटा सा मैदान है जहां बापू की प्रतिमा है और यहीं एक्का-दुक्का पुराने घर है जो उस दौर की याद दिलाते है.

इसके बाद हम गए भारत मंदिर और नेहरू तारामंडल जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

टिप्पणी करे

द्वारकाधीश का मंदिर- पश्चिमाम्नाय शारदा पीठम

हम पहुंचे द्वारिका जहां देखा वहां का प्रमुख मंदिर – द्वारकाधीश का मंदिर … जिसका वास्तविक नाम है – पश्चिमाम्नाय शारदा पीठम

20160401_141452

परिसर में विष्णु के विभिन्न रूप और सत्यनारायण की विभिन्न कक्षों में मूर्तियां है. दर्शन के गलियारे में एक छोर पर देवकी माँ की मूर्ति है और गलियारे के दूसरे छोर पर गर्भगृह में कृष्ण जी की श्याम मूर्ति है.

पीछे बाई ओर पटरानियों का मंदिर है जिसमे विशाल कक्ष में क्रम से – जांबवंती, ललिता, सत्यभामा, रूक्मिणी आदि की मूर्तियां है.

दूसरी ओर कुछः ऊंचाई पर चंद्रमौलेश्वर का दरबार सजा है. बीच के कक्ष में असली रूद्राक्ष, चन्दन आदि की मालाएं और अन्य पूजा उपयोगी कीमती वस्तुएं बिक्री के लिए रखी है.

चार मंज़िला इमारत बहुत ही सुन्दर शिल्पकारी से बनी है. इसकी ऊपरी तीनों मंज़िले खाली है.

ऊपर धार्मिक झंडा लहराता है जो विशिष्ट शुभ दिन पर किसी भक्त समूह द्वारा बदला जाता है, जिस दिन हम गए उस समय भक्तों का एक समूह आया और भजन-कीर्तन के जोर-शोर के साथ झंडा बदल कर नया झंडा फहरा गया.

20160331_182044

इसके बाद हम गए गांधी जी की जन्म स्थली पोरबंदर जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

टिप्पणी करे

स्मृति शेष – हरिशंकर परसाई

” कहीं से घूमते-घामते नारद मुनि यहाँ आ गए। धर्मराज को गुमसुम बैठे देख बोले – क्यों धर्मराज, कैसे चिंतित बैठे है  ? क्या नरक में निवास स्थान की समस्या अभी हल नहीं हुई ?

धर्मराज ने कहा – वह समस्या तो कब की हल हो गई। नरक में पिछले सालों में बङे गुणी कारीगर आ गए है कई ईमारतों के ठेकेदार है जिन्होने पूरे पैसे लेकर रद्दी ईमारतें बनाई। बङे-बङे इंजीनियर भी आ गए है जिन्होने ठेकेदारों से मिलकर पैसा खाया। ओवरसीयर है, जिन्होने उन मज़दूरों की हाज़िरी भर कर पैसा हङपा जो कभी काम पर गए ही नहीं। इन्होनें बहुत जल्दी नरक में कई ईमारतें तान दी। वह समस्या तो हल हो गई है पर एक बङी विकट उलझन आ गई है। ….. एक आदमी की पांच दिन पहले मृत्यु हुई। उसके जीव को यह दूत यहाँ ला रहा था कि जीव उसे रास्ते में चकमा देकर भाग गया। इस ने सारा ब्रह्माण्ड छान मारा वह कहीं नहीं मिला। ”

भोलाराम का जीव –  व्यग्य रचना का अंश है यह जिसके लेखक है हरिशंकर परसाई जिनका आज  जन्मदिन है।

परसाई जी अपनी रचनाओं में यह बात हँसी-हँसी में बहुत हल्के-फुल्के ढ़ंग से कहते है कि व्यवस्था का संचालन करने वाले अपने स्वार्थ के लिए गङबङियाँ करते है जिससे दूसरों के जीवन में कठिनाइयाँ होती है। इसके अलावा समाज की विभिन्न असंगतियों पर भी परसाई जी ने कलम चलाई है.

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

टिप्पणी करे

Older Posts »