स्मृति शेष – हरिशंकर परसाई

” कहीं से घूमते-घामते नारद मुनि यहाँ आ गए। धर्मराज को गुमसुम बैठे देख बोले – क्यों धर्मराज, कैसे चिंतित बैठे है  ? क्या नरक में निवास स्थान की समस्या अभी हल नहीं हुई ?

धर्मराज ने कहा – वह समस्या तो कब की हल हो गई। नरक में पिछले सालों में बङे गुणी कारीगर आ गए है कई ईमारतों के ठेकेदार है जिन्होने पूरे पैसे लेकर रद्दी ईमारतें बनाई। बङे-बङे इंजीनियर भी आ गए है जिन्होने ठेकेदारों से मिलकर पैसा खाया। ओवरसीयर है, जिन्होने उन मज़दूरों की हाज़िरी भर कर पैसा हङपा जो कभी काम पर गए ही नहीं। इन्होनें बहुत जल्दी नरक में कई ईमारतें तान दी। वह समस्या तो हल हो गई है पर एक बङी विकट उलझन आ गई है। ….. एक आदमी की पांच दिन पहले मृत्यु हुई। उसके जीव को यह दूत यहाँ ला रहा था कि जीव उसे रास्ते में चकमा देकर भाग गया। इस ने सारा ब्रह्माण्ड छान मारा वह कहीं नहीं मिला। ”

भोलाराम का जीव –  व्यग्य रचना का अंश है यह जिसके लेखक है हरिशंकर परसाई जिनका आज  जन्मदिन है।

परसाई जी अपनी रचनाओं में यह बात हँसी-हँसी में बहुत हल्के-फुल्के ढ़ंग से कहते है कि व्यवस्था का संचालन करने वाले अपने स्वार्थ के लिए गङबङियाँ करते है जिससे दूसरों के जीवन में कठिनाइयाँ होती है। इसके अलावा समाज की विभिन्न असंगतियों पर भी परसाई जी ने कलम चलाई है.

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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रूक्मिणी मंदिर

द्वारिका शहर की सीमा पर है – रूक्मिणी मंदिर

पुराना कलात्मक मंदिर है जिसमे रुक्मिणी जी की प्रतिमा है –

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पौराणिक कथा के अनुसार कृष्ण जी ने ऋषि दुर्वासा को अपनी बसाई नगरी द्वारिका आने के लिए आमंत्रित किया, ऋषि ने आमंत्रण स्वीकार किया और साथ ही यह शर्त रखी कि द्वारिका तक उनके रथ को स्वयं कृष्ण जी और रूक्मिणी खींचेंगे. दोनों रथ खींचने लगे कुछ समय बाद रूक्मिणी थक गई और उन्हें प्यास लगी. कृष्ण जी ढूंढते हुए बहुत दूर से उनके लिए पानी ले आए और दोनों ने पानी पिया इस पर ऋषि क्रोधित हुए, उन्हें पहले पानी न देकर ऋषि का अपमान किया गया और दुर्वासा ने श्राप दे दिया फिर कृष्ण के आग्रह करने पर ऋषि कुछ नरम हुए फिर भी कहते है श्राप से इस स्थान का पानी पीने योग्य नही है और श्राप के कारण ही रूक्मिणी और कृष्ण जी को अलग रहना पड़ा. इसीसे द्वारिकाधीश का मंदिर भीतर शहर ( गाँव ) में है और रूक्मिणी जी का मंदिर शहर ( गाँव ) की सीमा पर है और इसीसे रूक्मिणी मंदिर रथ की आकृति में बनाया गया है –

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इसी कथा के अनुसार यहां आज भी पानी के लिए श्रृद्धालु मंदिर में पैसे देते है यूं भी हिन्दू धर्म के अनुसार पूर्वजों को पानी दिया जाता है और यह पैसे उसी के माने जाते है.

वैसे पूरी द्वारिका और आस-पास के क्षेत्र में पीने योग्य पानी अब भी नही है और पानी मीलों दूर से मंगाया जाता है.

इसके बाद हमने देखा प्रमुख मंदिर – द्वारकाधीश का मंदिर जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

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इस्कॉन स्वामी नारायण मंदिर

राजकोट से द्वारिका मार्ग पर सौ कि.मी. की दूरी पर है इस्कॉन स्वामी नारायण मंदिर –

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अन्य एस्कॉन मंदिरों की तरह भव्य और कलात्मक इमारत है –

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गर्भगृह में कृष्ण जी की भव्य मूर्ति है साथ ही गणेश जी और शिव जी की भी मूर्तियां है.

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इसके बाद हमने देखा रुक्मिणी मंदिर जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

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स्वामी नारायण मंदिर – द्वारिका

द्वारिका के स्वामी नारायण मंदिर में विष्णु के सभी अवतारों की मूर्तियां है –

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भीतर से बहुत कलात्मक यह मंदिर –

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यहां दर्शन करने के बाद हम गए समुद्र तट और देखा गोमती नदी का समुद्र में विलय। सोमनाथ से जिस गोमती नदी को बहते देखा था जिसके किनारे श्राद्ध तर्पण किए जा रहे थे वही गोमती बहती हुई द्वारिका में आ कर समुद्र में मिलती है.

यह है बहती गोमती, पीछे किनारा देखा जा सकता है जो आगे बढ़ कर पतला होता जा रहा है, यहां पतला होकर किनारा समाप्त हो रहा है और समुद्र में नदी मिल रही है –

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इसके बाद हम गए इस्कॉन स्वामी नारायण मंदिर जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

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गायत्री शक्ति पीठ

गायत्री शक्ति पीठ भी समुद्र तट पर है –

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गर्भगृह में तीन मूर्तियां है – पंचमुखी सावित्री, बीच में मोर पर माँ गायत्री और दाहिनी ओर कुण्डलिनी
अन्य गर्भगृहों में पंचमुखी हनुमान और महादेव भी है.

बाहर तट पर सैर के लिए और कुछ देर बैठने के लिए अच्छी व्यवस्था है.

इसके बाद हम गए गोमती समुद्र संगम और स्वामीनारायण मंदिर जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

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भड़केश्वर महादेव मंदिर

द्वारिका में समुद्र तट पर है – भड़केश्वर महादेव मंदिर

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भीतर गर्भगृह में स्थित शिवलिंग की ही पूजा की जाती है लेकिन बाहरी भाग में भी एक शिवलिंग है जो खुले में समुद्र तट पर मंदिर के आकर्षण को बढ़ाता है –

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इसके बाद हम गए गायत्री शक्ति पीठ जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

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गीता मंदिर और सिद्धेश्वर महादेव मंदिर

द्वारका में गीता मंदिर में रथ में कृष्ण की अर्जुन को उपदेश देती छवि है.

इसके बाद हमने देखा सिद्धेश्वर महादेव मंदिर –

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जिसमे गोमुख शिवलिंग के दर्शन होते है.

इसके बाद हम गए भड़केश्वर महादेव मंदिर जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

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