स्मृति शेष – जयशंकर प्रसाद

कृष्ण जन्म का विवरण व्यास जी ने महाभारत में विष्णु पर्व में रचा है। इसी को आधार बना कर जयशंकर प्रसाद ने भी एक कविता रची – श्री कृष्ण जयन्ति – जो ” कानन कुसुम ” में  संग्रहित है। …. कृष्ण के जन्म के समय चारों ओर अंधकार व्याप्त था। इस काल रात्रि की तुलना प्रसाद जी ने कंस के हृदय से की –
” कंस हृदय की दुश्चिन्ता सा जगत में अंधकार है व्याप्त ”
कृष्ण जन्म को लेकर उनके मामा कंस को अपनी जीवन रक्षा हेत् अधिक चिन्ता थी क्योंकि उनकी जीवन लीला का समापन वसुदेव-देवकी के पुत्र द्वारा ही निश्चित था। विष्णु पर्व में नारद जी कहते है कि कंस को देवकी के गर्भ से भय है-
” गर्भस्थानामपि गीतविज्ञिया चैव देहिनाम्।
नारदेन हि गर्भेभ्यो भयं नः सभुदाहतम् ।। ”
इसीलिए कंस ने देवकी प्रसूत सभी शिशुओं का वध करने का निश्चय किया। इस तरह प्रसाद जी ने केवल रात्रि के भयावह वातावरण को कंस हृदय की उपमा देकर संक्षिप्त में ही इस तथ्य का संकेत दिया। आगे की पंक्तियां देखिए –
” यमुने, अपना क्षीण प्रवाह बढ़ा रखो
और वेग से बहो कि चरण पवित्र से
संगम हो कर नीलकमल खिल जाएगा ”
यहां भी वसुदेव द्वारा कृष्ण को जन्म के बाद कारावास से मुक्त करा कर यमुना नदी के पार, कंस की नगरी से दूर ले जाने का संकेत है जो प्रकृति चित्रण के माध्यम से दिया है। यह प्रसंग विष्णुपर्व में इस तरह है –
” वसुदेवस्तु संग्रह्य दारकं क्षिप्रमेव च यशोदया गृहं रात्रों विवेश सुतवत्सलः ”
यानि जन्म के उपरान्त वसुदेव ने नवजात शिशु ( कृष्ण ) को रात्रि के अंधकार में कारावास से मुक्त करा यशोदा के घर ले गए एवं उसकी कन्या को देवकी के पास ले आए। ….. इस तरह इस कविता में केवल कृष्ण जन्म के समय के वातावरण का ही चित्रण है जो हर जन्माष्टमी पर अनुभव किया जा सकता है।
हिन्दी जगत के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !
आप सभी को जन्माष्टमी की शुभकामनाएं !

 

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गुत्ती क़िला – धर्मावरम

अनन्तपुर का गुत्ती क़िला शंख के आकार का है। सामने शासकों की समाधियां बनी है –

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दाहिनी ओर से ऊपर जाने के लिए पथरीला रास्ता है। ऊँचाई पर बने इस क़िले में पानी की समुचित व्यवस्था के लिए रिज़रवायर भी है।

इसके बाद  नरसिंहा स्वामी मन्दिर में दर्शन करने के बाद हम आलूर पहुँचे जो पहाङी भाग है और जलप्रपात है जो खास आकर्षक नही लगा।

यहां से निकल कर हम गए  धर्मावरम जो सिल्क की साङियों के लिए प्रसिद्ध है। धर्मावरम के पूरे क्षेत्र में गलियां है –

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इन गलियों में कई घर है और वहीं से साङियों का व्यापार होता है। साङियां वाकई बहुत अच्छी है।

इसके बाद हम हैदराबाद लौट आए।

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विश्व का सबसे बङा और पुराना बरगद

विश्व का सबसे बङा और सबसे पुराना, साढ़े छह सौ साल पुराना बरगद का पेङ अनन्तपुर में है। यह साढ़े पांच एकङ भूमि घेरे हुए है –

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यह है पेङ का आधार मुख्य तना –

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इसकी शाखाएं दोनों ओर फैली है। दोनं ओर जाली लगा दी गई है। शाखाएं प्रशाखाएं फैली है –

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दोनों ओर से ऊपर की ओर डालियाँ मिलती है। पत्ते हरे ताज़े है –

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सूखे पत्ते नीचे बिखरे है जो जाली के पीछे ही है और जो पेङ के लिए खाद का काम करते है।

एक पत्ता भी ले जाने की अनुमति नहीं है।  पेङ हरा-भरा स्वस्थ है। इस स्थान का नाम तिमम्मा के नाम पर तिमम्मा मारिमानू है, कहते है तिमम्मा ने अपनी भक्ति से यहां अपने पति की जान बचाई थी।

इसके बाद हमने देखा गुत्ती फोर्ट जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में ….

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ताङपत्री

अनन्तपुर में प्राचीन मन्दिर है – ताङपत्री

काले पत्थरों से बना है। प्रवेश द्वार पर रथ का आकार है –

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आगे कक्ष में विभिन्न स्तम्भ है। सभी पर शिल्पकारी है –

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दूसरी ओर गर्भगृह में विष्णु जी की मूर्ति है। द्वादशी और तृयोदशी के दिन सामने छत पर बने छिद्रों से सूरज की पहली किरणें विष्णु जी की मूर्ति के चरणों पर आकर गिरती है –

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इस तरह बहुत सुन्दर शिल्पकारी और स्थापत्य है। विभिन्न छोटे मन्दिर है जिनमें भी स्तम्भ बने है –

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इसके बाद हमने देखा विश्व प्रसिद्ध बरगद का पेङ जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में ….

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कुंभकरण पार्क

अनन्तपुर स्थित कुंभकरण पार्क शायद देश में ऐसा अकेला स्थान है।

यहां कुंभकरण की मूर्ति राम कथा के उस प्रसंग के अनुसार है जहां युद्ध में आवश्यकता के अनुसार सोए कुंभकरण को समय से पहले जबरन जगाया जा रहा है।  दुर से ही कुंभकरण की सोई हुई विशाल मूर्ति नज़र आती है –

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मूर्ति में देख सकते है कुंभकरण सीधे सोए हुए है और सभी उन्हें जगाने का प्रयास कर रहे है। सिर के पास मूषक उनकी चुटिया खींच रहा है, कान के पास नगाङा बजाया जा रहा है, पेट पर सीढ़ी लगा कर चढ़ा जा रहा है आदि –

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मूर्ति के भीतर जाने के दो रास्ते है। एक रास्ता  पैरों के बीच से है –

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और दूसरा पेट से –

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भीतर खुला कक्ष सा है –

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इस मूर्ति के अलावा प्रांगण में विभिन्न गोलाकार चबूतरे बने है जिस पर विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियां है –

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इसके बाद हमने देखा ताङपत्री जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में ….

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लेपाक्षी मन्दिर

आन्ध्र प्रदेश के ज़िले अनन्तपुर में सबसे पहले हमने देखा लेपाक्षी मन्दिर –

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लेपाक्षी तेलुगु शब्द है – ले का अर्थ है उठो और पाक्षी कहते है पक्षी को, इस तरह लेपाक्षी का अर्थ हुआ – उठो पक्षी …

इसका संबंध राम कथा के उस प्रसंग से है जिसमें जटायु रावण को सीता को हर ले जाते हुए देखते है। बचाने के प्रयास में घायल होते है और सीता को ढूँढ़ते हुए राम के वहां आने पर घायल अवस्था में यह सूचना देते है। राम उनसे उठने का आग्रह करते है लेकिन जटायु प्राण त्याग देते है।

यह मन्दिर विजयनगर शैली के शिल्प से बना है। गर्भगृह में शिव जी की वीरभद्र स्वामी के रूप में मूर्ति है  –

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गर्भगृह के सामने नाट्य कक्ष में सौ स्तम्भ है। सभी स्तम्भों पर नृत्य की मुद्रा में विभिनन देवी देवता उकेरे गए है। इन स्तम्भों के बीच में से गुज़रते हुए नृत्य किया जाता है –

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सभी स्तम्भ और मूर्ति काले पत्थरों से बने है। मन्दिर से कुछ दूर पहले विशाल नन्दी भी है। इसके बाद हमने देखा कुंभकरण पार्क जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में ….

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सिद्धार्थ – अनूप शर्मा

बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर आज हम चर्चा करते है अनूप शर्मा जी के महाकाव्य सिद्धार्थ पर

बुद्ध के संपूर्ण जीवन चरित्र पर महाकाव्य   ” सिद्धार्थ ”  की रचना की अनूप शर्मा जी ने। साहित्य जगत में कुछ ऐसे कवि भी हुए है जिनकी रचनाएं प्रकाश में नहीं आ पाई। छायावादी युग के एक ऐसे ही कवि है – अनूप शर्मा

पूरी कथा विभिन्न सर्गों में इस तरह है – सिद्धार्थ की जन्म स्थली कपिलवस्तु को पहले सर्ग शुभ स्वप्न में हिमालय के पास स्थित बताया –

” गिरि हिमालय के उपकूल में कपिलवस्तु पुरी अति रम्य थी। ”

यहीं राजा शुद्धोदन व माया के पुत्र सिद्धार्थ हुए जिनके जन्म का वर्णन भाग्योदय सर्ग में इस तरह से –

” धन्यामही में शक राजधानी माया स – शुद्धोदन धन्य धन्या ”

तीसरे सर्ग उन्मेष में बाल चरित्र वर्णन तथा यज्ञोपवीत उत्सव पश्चात गुरू गृह प्रवेश का चित्रण है। शस्त्र क्रिया का शिक्षण तथा सिद्धार्थ की निपुणता को दर्शाया है। इन तीन सर्गों की तरह अनुकम्पा सर्ग इतिहास सम्मत नहीं है। इस में बताया कि इस तरह आराम से जीवन व्यतीत करते हुए कुमार एक बार वन की ओर गए जहां घायल हंस को देखा –

” कुमार दौङे सुन हंस की व्यथा
उगा दया भाव दया निधान के
निकल निराच तुरन्त पक्ष से
लगा गले से पुचकारने लगे

यहीं से सिद्धार्थ के शान्त जीवन में चिन्ता रूपी लहरें हिलोरे लेने लगी। तभी उन्होने देखा –

” किसान प्रस्वेद प्रपूर्ण देह था ”

फिर तुरन्त ही –

” विहंग जो सम्मुख कीट खा रहा
कभी बनेगा वह भक्ष्य श्भेन का
रहस्य कैसा विधि का विचित्र है
द्वितीय का जीवन मृत्यु एक की ”

इतिहासकारों ने विवाह पूर्व सिद्धार्थ के जीवन को सुखी बताया है जबकि कवि अनूप शर्मा जी ने इस यात्रा को जीवन में मोङ देने वाली बताया। अगले सर्ग अवरोध में चिन्ता देख पिता शुद्धोदन ने वसन्तोत्सव की योजना की और यशोधरा पर कुमार की आसक्ति दर्शायी लेकिन ऐसा संकेत भी इतिहास में नहीं है। अगले सर्ग संयोग में शस्त्र स्पर्धा में सिद्धार्थ का विजयी होना तथा यशोधरा से विवाह इतिहास सम्मत है –

” योद्धाओं में अमर सुत या नागदत्तादिकों में
चापों में या निश्चित असिमें या ध्यारूढ़ता में
एकाकी है सुभट गण में श्रेष्ठ सिद्धार्थ योद्धा
ब्याहा जाना उचित इनका सुप्राबुद्धात्मजा से ”

विद्या के साथ सिद्धार्थ अन्य कलाओं में भी निपुण थे तथा पांच सौ शाक्यों को प्रतियोगिता में पराजित करने के बाद ही यशोधरा से परिणय सूत्र में बँध पाए थे। इसके बाद सर्ग राग में नव दम्पत्ति के ऐश्वर्यपूर्ण जीवन का चित्रण है –

” शक महीपति राजकुमार के
सदृश और न आज कुमार है
सुखद सब विवाहित मौलिपें
विलसति लसति सुकुमारता ”

इसी वैभवपूर्ण जीवन में सिद्धार्थ को ग्राम विहार की इच्छा हुई जिसका उल्लेख अभिज्ञान सर्ग में है जिसके आगे चिन्तना सर्ग में कुमार के स्वागत में सुसज्जित ग्राम और यात्रा का वर्णन है। राह में वृद्ध को देखकर कुमार ने सारथी से पूछा –

” मनुज सी कर आकृति सारथे
विकट जीव खङा यह कौन है
विकृत दीन मलिन अधीन जो
समय दीर्ण विलास विशीर्ण है ”

कुछ समय पश्चात सिद्धार्थ ने पुनः ग्राम देखने की इच्छा व्यक्त की।  सर्ग भावी में राजा शुद्धोदन का स्वप्न है जो सिद्धार्थ के सन्यासी जीवन की ओर इंगित करता है जिसका स्पष्ट उल्लेख इतिहास में नहीं है।

सर्ग अभिनिवेदन में कुमार की पुनः ग्राम यात्रा है। वृद्ध, रोगी तथा मृतक को देख उन्होनें सारथी से मनुष्य के जन्म मरण की कथा सुनी और कुमार ने मन में निश्चय किया –

” आया हूँ मैं विपत्ति हरने विश्व का ताप खोने
देखूँ कैसे विफल बनती प्रार्थना प्रार्थियों की
शर्वाणी जो जगत सुखदा मंगलमोदिनी है
कल्याणी हे अमर जननि है न कैसे सुनेगी ”

महाभिनिष्क्रमण सर्ग में सिद्धार्थ के इस निश्चय को जब राजा ने सारथी से सुना तब उन्हें बन्दी रूप में रखना ही उचित समझा। तभी यशोधरा ने तीन स्वप्न देखे जिसका विवरण सिद्धार्थ को अपने निश्चय की ओर इंगित करता पाया और सिद्धार्थ ने निश्चय किया –

” तजूँगा मैं सोते अति सुखद गर्भस्थ शिशु को ”

और निद्रा में लीन यशोधरा को गर्भावस्था में ही छोङ कर सिद्धार्थ सत्य की खोज में निकल पङे। जबकि इतिहास कहता है कि जिस समय गौतम घर छोङने का निश्चय कर चुके थे उसी समय उन्हें पुत्र जन्म की सूचना मिली और गौतम के मुख से निकला राहुल ( बंधन ) जो बालक का नाम पङ गया। संभव है महाकाव्यकार ने यशोधरा की विरहावस्था को प्रदीप्त करने के लिए कल्पना प्रसून खिलाया। आगे व्यथा सर्ग में कुमार के गृहत्याग से यशोधरा, राजा, प्रजा की दुःखावस्था का वर्णन है। आगे यशोधरा सर्ग छोङ कर अन्य सर्गों में वर्णन ठीक वैसे ही है जैसे इतिहास में बताया गया है। संबोध सर्ग में भिक्षु रूप में यात्रा जिसके बाद घोर तपस्या फिर बोधि द्रुम की ओर प्रयाण,  संदेश सर्ग में काशी की ओर प्रयाण कर धर्म प्रचार करना तथा राजा बिम्बिसार को उपदेश देना,  यशोधरा सर्ग में यशोधरा की विरह अवस्था का चित्रण है। यह महाकाव्य की परम्परा के अनुसार अपेक्षित है। यहाँ कवि की कल्पना है। दर्शन सर्ग में जन्मस्थली कपिलवस्तु में बुद्ध का आवागमन चित्रित किया है। अंतिम सर्ग निर्वाण में कपिलवस्तु में उपदेश देने के उपरान्त विदा लेकर पैंतीस वर्षों का पर्यटन तथा कुशिग्राम में प्रवेश कर अंतिम उपदेश के बाद महानिर्वाण दर्याशा गया है। अतएव इतिहास पर आधारित यह महाकाव्य अपने उपवन में कुछ कल्पना प्रसून भी समेटे हुए है जो निःसंदेह एक महाकाव्य के लिए आवश्यक है।

अनूप शर्मा जी की केवल इस एक ही रचना से मैं परिचित हूँ …. कौई और रचना मिलने पर यहाँ प्रस्तुत करूँगी ….

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