गुरूदेव की गीतांजलि

आज गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर का जन्मदिवस हैं।

9 मई 1861 को जन्मे गुरूदेव के जन्म को 150 वर्ष हो चुके हैं और गुरूदेव की कृति गीतांजलि को नोबुल पुरस्कार मिले 100 वर्ष हो चुके है.

विश्व स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिए जाने वाले प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है – नोबुल पुरस्कार. वर्ष 1901 से साहित्य जगत के लिए भी यह पुरस्कार दिया जाने लगा और बारह वर्ष के बाद 1913 में पहली बार एक भारतीय को इस पुरस्कार के लिए चुना गया।

गीतांजलि मूल रूप से बंगला भाषा में लिखी गई और इसके अंग्रेज़ी संस्करण को नोबुल पुरस्कार के लिए चुना गया.  अंग्रेज़ी,  जो पाश्चात्य देशों के साहित्य की भाषा है और उस समय भारत में अंग्रेज़ी शासन के विरूद्ध संधर्ष चल रहा था. ऐसे में इस पुरस्कार को राजनीतिक चाल भी माना गया पर भारतीय अपनी बात उन तक पहुँचाने के लिए उन्हीं की भाषा अंग्रेज़ी का प्रयोग भी करते थे.

गीतांजलि कविताओं का संग्रह है. कविताएं न तो बहुत बङी है और न ही बहुत छोटी लेकिन एक-एक कविता गागर में सागर है. प्रत्येक कविता एक संदेश देती है. इसका रचनाकाल एक ऐसा समय है जब विश्व स्तर पर शान्ति का आह्वान किया जा रहा था. विश्व युद्ध के बाद सभी देशों में भय व्याप्त था. भारत में तो स्वाधीनता का संघर्ष छिङ गया था. ऐसे में भारतीय साहित्यकार चाहते थे कि अपने स्वर्णिम अतीत को खंगाल कर ऐसे रत्न निकाले जिससे सद् भावना का आलोक फैले. इसी क्रम में साहित्य जगत में एक ओर तो पौराणिक चरित्रों और गौरवशाली इतिहास के पन्नों से सामग्री लेकर साहित्य रचा जा रहा था तो दूसरी ओर भारतीय संस्कृति और आध्यात्म से प्रेरणा लेकर शान्ति के प्रयास किए जा रहे थे और इसी श्रेणी में रची गई गीतांजलि. …. पहली ही कविता में अखण्ड विश्व के लिए कवि ने प्रभु से प्रार्थना की –

जहाँ विश्व न टूटे खण्डों में संकरी घरेलु दीवारों से

जहां मन में भय न हो तथा विचार और क्रिया में समन्वय रहे, प्रभु मेरा देश उस स्वर्ग में जागे. तात्पर्य कि अभी हमारा देश गहरी नींद में सोया है या कहे कि अभी हम जागृत नहीं है, सक्रिय नहीं है, बन्दी है. बन्दी शार्षक रचना में कवि ने कैदी से पूछा –

किसने तुम्हें कैद किया ?  उसने कहा, मेरे मालिक ने.

मालिक है शक्ति और ऐश्वर्य. इस तरह चारों ओर मनुष्य ने एक दीवार सी बना ली है जिससे प्रकाश भीतर आ ही नहीं पा रहा. इस कारागार में भी वह स्वतंत्र बैठा नहीं है अपितु बेङियों में जकङा है. बेङियाँ खुद मानव है. मानव जब अपने आप का अधिक ध्यान रखता जाता है तो इसका अर्थ होता है कि बेङियां उतनी ही दृढ़ होती जा रही है जिससे वह कारागार से मुक्त नहीं हो पाता और प्रकाश से भी उतना ही दूर हो जाता है. इससे अंधकार ही साथी बन गया है. जब वह द्वार खोलता है तो कुछ नहीं देख पाता है. वह हैरान है कि रास्ते कहाँ खो गए ?  रास्ते तलाशने के लिए कहाँ है प्रकाश ?  इसका उत्तर कवि ने प्रेम का दिया कविता में दिया कि दिया तो है पर जोत नहीं. दिये को इच्छा की जोत से जलाओ. परन्तु कभी – कभी इच्छा होने पर भी हम आगे नहीं बढ़ पाते है –

मैं अकेला निकल आया अपने पथ पर आगे बढ़ने
पर यह कौन है जो सुनसान अँधेरे में मेरा पीछा कर रहा है
मैं किनारे हटा उसे अनदेखा करने पर उससे बच न पाया

वह धूल उङाता चलता है. मेरे कहे गए शब्दों को ज़ोर से दुहराता है. इस तरह मैं उसके साथ प्रभु के दरबार में नहीं जा पाऊँगा. यह पीछा करने वाला समाज है जो उसे मार्ग से विचलित कर रहा है और जिसके साथ वह प्रभु के पास भी नहीं जा सकता. घर तक यात्रा में गुरूदेव ने यही तो कहा है कि हम अपनी जीवन यात्रा में प्रभु से बहुत दूर निकल आए है. यात्री को हर द्वार पर दस्तक देनी होती है और अंत तक पहुँचने के लिए कई पङावों से गुज़रना होता है. मन बार – बार कहता है – कहाँ है प्रभु ?  और आश्वस्ति का स्वर सुनाई देता है – मैं हूँ !  हर समय प्रत्येक स्थान पर प्रभु होते है. खामोश क़दम कविता में यही तो पूछा गया –

क्या तुमने उसके खामोश क़दम नहीं सुने
वो आते, आते है, हमेशा आते है
हर पल और हर युग
हर दिन और हर रात
वो आते, आते है, हमेशा आते है

प्रभु की उपस्थिति को अंकित करने के लिए कवि ने प्रकृतिक प्रतिमानों का भी प्रयोग किया है. गुज़रती हवा कविता की पंक्तियाँ प्रस्तुत है –

पत्तियों पर नाचता सुनहरा प्रकाश
सुस्त पङे बादलों का आकाश में विचरना
यह गुज़रती हवा मेरे माथे पर ठंडक छोङती है
सुबह के प्रकाश ने भीगो दी मेरी आँखें – वही मेरे मन के लिए उसका संदेश है

कण – कण में व्याप्त है प्रभु –

वह वहाँ है जहाँ कठोर धरती खोदी जा रही है
वह वहाँ है जहाँ रास्ता बनाने वाले पत्थर तोङ रहे है
वह उनके साथ है जो धूप और बारिश में है

प्रभु का हाथ सदैव हम पर बना है इसीलिए अपने शरीर को हमेशा शुद्ध रखो. शुद्धता रचना में गुरूदेव ने माना है कि वह सत् की रोशनी को मन में बिखेरने की प्रभु की कला को जानते है इसीलिए असत् विचारों को मन से दूर रखो और फूलों को मन में बसाओ जिससे कुछ करने की इच्छा होती है और कार्यों द्वारा सुगन्ध फैलती है.  इस सत् कार्य के लिए कवि बार – बार जन्म लेना चाहता है. नन्ही बाँसुरी कविता में उसने प्रभु से प्रर्थना की है – प्रभु मुझे अंतहीन बना दो ताकि हर बार नए जीवन में छोटी सी बाँसुरी थामे मैं अमर गीतों की तान छेङ दूँ क्योंकि कोई तो चाहिए जो सबको प्रभु तक जाने का मार्ग बताए.  कवि ने अपने आपको आवारा बादल माना है –

निरूद्येश्य आकाश में घूम रहा हूँ, ओ मेरे सूरज !  सदा चमकने वाले
उसके स्पर्श से अभी मैं पिघला नहीं हूँ

यानि अभी तो हमें जीवन के खेल में रमना है फिर प्रभु की इच्छा से –

एक दिन मैं पिघलूँगा और अंधकार में विलीन हो जाऊँगा

हम सभी को चाहिए कि हमेशा प्रभु को अपने पास अनुभव करें. कमल शीर्षक कविता में –

उस दिन जब कमल खिला, आह !  मेरा मन भटक गया था
और मैं अजान रहा मेरी टोकरी खाली रही

मैनें सुगन्ध अनुभव की पर पता नहीं कि यह मेरे इतने पास मेरे मन में ही है. यह रहस्यवादी भाव बरबस कबीर की इन पंक्तियों की याद दिलाते है – कस्तूरी कुण्डल बसे मृग ढ़ूंढ़े वन माही

तभी तो कवि कहता है कि प्रभु अनुकंपा की हर वस्तु समेट लो. इस छोटे से फूल को तुरन्त तोङ लो देर होने पर यह मिट्टी में बिखर जाएगें क्योंकि हम तो प्रभु के गले का हार नहीं बन पाएगें पर इन फूलों पर तो ईश्वर का स्पर्श है. समय रहते इसे तोङ कर प्रभु चरणों में अर्पित कर दो. हमारे पास जो भी है प्रभु की देन है इसीलिए तेरा तुझको अर्पण के भाव से जियो.

मूर्ख शीर्षक रचना में कहा कि अपनी कमज़ोरियों के साथ प्रभु के द्वार पर जाओ वही तुम्हारी कमज़ोरियाँ हर लेंगे. हम जीवन की नौका में बैठे हैं जबकि हमें इससे उतरना चाहिए. वसन्त आकर बीत जाता है. पत्ते पीले होकर झङने लगते है. हम नौका में बैठे रह जाते है और दूसरी ओर से आती आवाज़ सुन नहीं पाते. मौन गीत रचना में यही स्थिति बताई है कि जो गीत हम गाने आए है वो बिन गाए रह गए. समय वाद्यों के सुर मिलाने में चला जा रहा है, शब्द जम नहीं रहे, प्रभु मिलन की इच्छा में प्रतीक्षा करते समय बीत रहा है. फिर भी हमें धैर्य नहीं छोङना है.

धैर्य शीर्षक रचना में कहा कि रात बीतेगी और पक्षियों के कलरव में प्रभु की वाणी सुनाई देगी. इसीलिए अगर रात हो भी जाए तो प्रभु पर विश्वास कर चैन से सोना चाहिए जिससे अगली सुबह तरोताज़ा होकर जागे. तात्पर्य कठिनाई में भी प्रभु पर विश्वास बना रहे. जिस तरह दिन बीत जाता है उसी तरह कठिनाई का दौर भी समाप्त हो जाता है. कठिनाई के समय की उपमा कवि ने दिवस से दी है. जिस तरह दिन भर शोरगुल रहता है उसी तरह इस दौर में भी कोलाहल रहता है. जब दिन समाप्त होता है तब हवा थक जाती है, पक्षियों के कलरव बन्द हो जाते है. नींद की चादर सबको ढ़क लेती है तब पथिक का झोला भी खाली होने लगता है उसके धूल से सने कपङे फटने लगते है तब प्रभु की छाया में उसे एक फूल की तरह जीवनदान मिलता है. जीवन पाकर उसे सफल बनाने के लिए हमें शक्ति भी मांगनी चाहिए.

मुझे शक्ति दो कविता में शक्ति पाने की याचना है जिससे हम अपनी खुशी और दुःख दोनों झेल सकें. शक्तिहीन की सेवा कर सकें और अंत में उसी को समर्पित कर सकें जिससे शक्ति पाई हैं. ….

यह एक छोटा सा प्रयास था गीतांजलि के संदेश को आप तक पहुँचाने का ….

गुरूदेव को सादर नमन !

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आन्ध्र प्रदेश का हिल स्टेशन – हॉर्सलि हिल्स

हॉर्सलि हिल्स दक्षिण का हिल स्टेशन हौ जो आन्ध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले में है।  ब्रिटिश शासन काल में यहाँ एक कलेक्टर थे – जॉर्ज  हॉर्सलि –

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जिन्होने इस स्थान की पहचान की और इसे हिल स्टेशन के रूप में विकसित किया। यहाँ दो व्यू प्वाइंट है जहाँ से खूबसूरत प्राकृतिक नज़ारा दिखता है –

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एक ओर है – गाली बंडा  …. हवा को तेलुगु में गाली कहते है और पत्थर को बंडा कहते है. बहुत बढ़िया स्थान है यह। खुले आसमान के नीचे दूर तक फैला हुआ पथरीला भाग है जहाँ सरसराती हवा का आनन्द लिया जाता है –

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आगे का विवरण अगली पोस्ट में जारी  ….

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स्मृति शेष – रामधारी सिंह दिनकर

आज ख्यात हिन्दी साहित्यकार रामधारी सिंह दिनकर की पुण्यतिथि है

बिहार के बेगुसराय में जन्मे दिनकर जी को वर्ष 1972 में भारत सरकार से साहित्य का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ, इसके दो वर्ष बाद 24 अप्रैल 1974 को उनका निधन हुआ। हिन्दी साहित्य में राष्ट्रीय भावनाओं की कविताओं के लिए दिनकर जी प्रसिद्ध हैं जिससे वो राष्ट्र कवि के नाम से लोकप्रिय हैं। साथ ही उनकी कविताओं में जीवन की कई छोटी-बड़ी बातों के साथ दार्शनिकता भी हैं। बच्चों के लिए भी उन्होंने कविताएँ लिखी हैं। दिनकर जी से मैं भी बचपन में ही परिचित हुई, जब मैं पांचवी कक्षा में पढ़ती थी तब पहली बार मैंने दिनकर जी की कविता पढी थी – पढ़क्कू की सूझ

एक पढ़क्कू बड़े तेज़ थे, तर्क शास्त्र पढ़ते थे, जहाँ न कोई बात, वहां भी नए  बात गढ़ते थे l
एक रोज़ वे पड़े फिक्र में समझ  नही कुछ पाए “बैल घूमता हैं कोल्हू में कैसे बिना चलाए ?”
कई दिनों तक रहे सोचते, मालिक बड़ा गज़ब हैं ? सिखा बैल को रक्खा इसने, निश्चय कोई ढब हैं l
आखिर एक रोज़ मालिक से पूछा उसने ऐसे “अजी, बिना देखे, लेते तुम जान भेद यह कैसे ?
कोल्हू का यह बैल तुम्हारा चलता या अड़ता हैं ? रहता हैं घूमता, खडा हो या पागुर करता हैं ?”
मालिक ने कहा, “अजी, इसमे क्या बात बड़ी हैं ? नहीं देखते क्या, गर्दन में घंटी एक पड़ी हैं ?
जब तक यह बजती रहती हैं, मैं न फिक्र करता हूँ, हाँ, जब बजती नही, दौड़कर तनिक पूंछ धरता हूँ”
कहा पढ़क्कू ने सुनकर “तुम रहे सदा के कोरे ! बेवकूफ !  मंतिख की बातें समझ सकोगे थोड़ी !
अगर किसी दिन बैल तुम्हारा सोच-समझ अड़ जाए, चले नहीं, बस, खडा-खडा गर्दन को खूब हिलाएl
घंटी टून – टून खूब बजेगी, तुम न पास आओगे मगर बूँद भर तेल सांझ तक भी क्या तुम पाओगे ?
मालिक थोड़ा हंसा और बोला पढ़क्कू जाओ, सीखा हैं यह ज्ञान जहाँ पर, वहीं इसे फैलाओ l
यहाँ सभी कुछ ठीक – ठाक हैं, यह केवल माया हैं, बैल हमारा नही अभी तक मंतिख पढ़ पाया हैं l

उस समय केवल इतना ही होता था कि हमें कविता याद करनी होती थी और उसमे से दो-तीन प्रश्नोत्तर भी याद करने होते थे। यह कविता हमारी कक्षा मे सबको इतनी अच्छी लगी कि बाद में भी कई दिनों तक हमें यह याद रही। मुझे हमेशा ही इसकी कुछ – कुछ पंक्तियाँ याद रही।

पहले तो कविता पढ कर मज़ा आता था और केवल शाब्दिक अर्थ ही समझते थे लेकिन जैसे -जैसे बडे होते गए इस रचना के अन्य अर्थ भी समझ में आने लगे। सबसे पहले समझ में आया मंतिख शब्द का अर्थ जो वही है जिसे कवि ने पहली पंक्ति में लिखा – तर्क शास्र

वैसे बचपन में न शब्द का अर्थ पता था न पता करने की आवश्यकता थी केवल तोते की तरह रट लिया था।

फिर एक और बात समझ में आई कि समाज में कुछ लोग दूसरो से मेहनत करवा कर खुद आराम से रहना चाहते हैं इसीलिए समाज में जानबूझ कर एक वर्ग के लोगों को अशिक्षित और अज्ञानी बना कर रखा हैं ताकि वे केवल मेहनत करते रहे। यदि सभी शिक्षित हो जाएगे तो तर्क – वितर्क करने लगेगे, बाते समझने लगेगे। तभी तो कोल्हू के बैल का मालिक पढ़क्कू से कहता है कि तुम अपना ज्ञान यहाँ मत फैलाओ, यहाँ सब ठीक है क्योंकि हमारे बैल ने अभी तक तर्क शास्त्र नहीं पढा हैं।

यहाँ एक और बात कवि ने कही है – यह केवल माया है

यानि मायाजाल में लोग उलझे हैं और जीवन जैसा हैं उसी तरह गुज़ार रहे हैं उन्हें ज्ञान का प्रकाश न दो।

आज आश्चर्य होता है कि इतनी बड़ी बात कहती रचना को बाल साहित्य में क्यों रखा गया ?

खैर … दिनकर जी की कुछ और रचनाओं पर चर्चा फिर कभी …..

हिंदी के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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स्मृति शेष – महादेवी वर्मा

आज ख्यात हिन्दी साहित्यकार महादेवी वर्मा का जन्मदिवस है।

महादेवी वर्मा से मेरा परिचय बचपन में ही हुआ। पांचवी कक्षा में पाठ्यक्रम में एक पाठ पढा था – घीसा। उस उम्र में हम उसे पाठ ही कहते थे और पाठ ही कह कर पढाया जाता था। घीसा की शिक्षा के प्रति लगन और उसकी गुरू भक्ति की ओर ध्यान केन्द्रित करते हुए यह पाठ पढा-पढाया गया। अच्छा लगता था यह पढना कि घीसा सवेरे ही पढने के स्थान को लीप-पोत कर साफ़ करता और आँखों पर हथेली का साया बनाए नदी किनारे खड़े होकर दूर तक देखा करता कि कब गुरूजी की नैय्या आए। अपने झुब्बा नुमा मैले कुर्ते को किसी तरह धो कर साफ़ सुथरा पहनने की कोशिश करता क्योंकि गुरूजी ने साफ़ कपडे पहनने के लिए कहा है। और जब गुरू जी ने बताया कि अब वह नही आएगी तब घीसा बडा सा तरबूज लेकर उन्हें विदा करने आया, तरबूज को थोडा सा काट कर यह भी निश्चित कर लिया कि तरबूज ठीक है – वाह !  क्या गुरू दक्षिणा दी। उस समय इसका भावनात्मक मूल्य समझने की हमारी उम्र भी नही थी।

आठवीं कक्षा में मैंने उनकी रचना पढी – बिन्दा …. जिसे कहानी की तरह पढा। सौतेली माँ के कटु व्यवहार को झेलने वाली बिन्दा से हम जुड से गए। उसकी तकलीफ को महसूस करने लगे, विशेषकर यह प्रसंग बहुत बुरा लगा जहां बिन्दा के बाल काट दिए जाते है और सिर पर काली लकीरे खींच दी जाती है। अंत में बिन्दा का चेचक में गुज़र जाना और अंतिम पंक्तियाँ कि बिन्दा और उसकी सौतेली माँ की कहानी समाप्त नही हुई, हर युग में है .. उस उम्र में ऎसी कहानी ! हम सबकी आँखे नम हो आई थी।

उसके बाद कालेज में महादेवी जी की कुछ काव्य रचनाएं पढी थी लेकिन कुछ ख़ास असर नहीं रहा। फिर जब यूनिवर्सिटी में आए एम ए में, तब जाना महादेवी जी के रहस्यवाद को, उनके अज्ञात प्रियतम को, उनके वास्तविक जीवन को और लगाव हुआ उनकी काव्य रचना – मैं नीर भारी दुःख की बदली से

और पाठ्यक्रम में पढा – अतीत के चलचित्र … तब जाना कि न घीसा पाठ है और न ही बिन्दा कहानी की लडकी बल्कि सभी हमारे समाज के जीते जागते चरित्र है जो महादेवी जी के जीवन में आए। कुछ और चरित्र पढे पर सबसे अधिक भाया – रामा … महादेवी जी का बूढा नौकर। बचपन में महादेवी जी और उनके दोनों भाइयो की देखभाल करता रामा, उनकी शरारते झेलता। तीनो राजा भैय्या बने रहना चाहते थे, उन्हें लगता की इस पदवी से बहुत बडे हो जाएगे, तभी उन्हें दूसरे को राजा भैय्या कहा जाना बुरा लगता, इसीसे रामा तीनो के कान में अलग-अलग यह कह देता कि असली राजा भैय्या तुम्ही हो, और तीनो अपने आप में खुश। लेकिन यही रामा उस दिन बहुत परेशान हो गया जब मेले में बहुत सावधानी के साथ ऊंगली पकड कर तीनो को घुमाते-घुमाते अचानक महादेवी जी हाथ छुड़ा कर अलग हो गई और अकेली घूमते-घामते एक दूकान पर पहुंची और आराम से जलेबियाँ खाने लगी। जब हडबडाता हुआ रामा आया तो उसे देख बडे आराम से कहा – तुम इत्ते बडे हो कर भी खो जाते हो।

ये बचपन, फिर स्वाधीनता की लडाई का माहौल और सुभद्रा कुमारी चौहान जैसी उनकी सखियाँ, उन्हें आगे जीवन में एक अलग दिशा में ले गई, प्रयाग में महिला पीठ में काम, जीवन का इस दिशा में समर्पण और साहित्य साधना

बहुत प्रभावशाली व्यक्तित्व और रचना संसार है महादेवी जी का। आज बस इतना ही … कुछ और … फिर कभी …

हिन्दी जगत की गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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स्मृति शेष – आचार्य चतुरसेन शास्त्री

आज ख्यात साहित्यकार आचार्य चतुरसेन शास्त्री की पुण्यतिथि है।

हम चर्चा कर रहे है शास्त्री जी की श्रेष्ठ कृति की – वैशाली की नगर वधू 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रचा गया है यह उपन्यास जो मगध साम्राज्य के समय को दर्शाता है। बिम्बसार का राज्य और अजातशत्रु की शौर्य गाथा भी है इसमे लेकिन प्रमुख चरित्र है – आम्रपाली या अम्बपाली। आम के उद्यान में निःसन्तान सेवक दम्पति को शिशु रूप में मिली इस लड़की का नाम आम्रपाली ही रखा गया। माँ के निधन के बाद पिता ने अधिक दुलार से पाला। नृत्य की शिक्षा भी दी … परिणाम मात्र ग्यारह वर्ष की आयु में ज़बरन वैश्य घोषित कर दी गई और वैशाली राज्य की नगरवधू बन गई। 

राजनर्तकी बनी आम्रपाली के प्रशंसक भी बहुत रहे और प्रेमी भी, अजातशत्रु भी उसका प्रेमी रहा। लेकिन उसके जीवन की दिशा बदली बुद्ध के वैशाली आगमन के बाद। बुद्ध वहां अपने दस हज़ार शिष्यों के साथ पधारे। सभी शिष्य वैशाली की गलियों में भिक्षा माँगने लगे लेकिन एक भिक्षु के प्रति आम्रपाली आकर्षित हुई और उसने उस भिक्षु को अपने महल में रहने का निमन्त्रण दिया जिसे शिष्य ने बुद्ध की अनुमति से स्वीकार किया। ..फिर – धीरे धीरे स्वयं आम्रपाली जीवन के रहस्यो से परिचित होती गई और बुद्ध से अनुमति ले भिक्षुणी बनी और इस तरह पहली बार किसी महिला को यह अवसर मिला।

बाद में आम्रपाली ने महिला उत्थान के कार्य भी किए। स्वयं शास्त्री जी ने अपने इस उपन्यास को अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति बताया। इसकी भूमिका में लिखा – 

“मैं अब तक की अपनी सारी रचनाओं को रद्द करता हूँ, और वैशाली की नगरवधू को अपनी एकमात्र रचना घोषित करता हूँ। ” 

इसी विषय पर आम्रपाली नाम से फिल्म भी बनी …. शास्त्री जी के साहित्य पर चर्चा फिर कभी …..

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

 

 

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स्मृति शेष – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

आज हिन्दी भाषा और साहित्य जगत के युगपुरूष भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की पुण्यतिथि है।

9 सिम्बर के दिन वर्ष 1850 में उनका जन्म हुआ था और 6 जनवरी 1885 को 35 वर्ष की अल्पायु में ही उनका निधन हो गया था.  इत्तेफाक देखिए कि सितम्बर और जनवरी दोनों ही महीने हिन्दी के लिए महत्वपूर्ण है।  14 सिम्बर 1949 को हिन्दी को संघ की भाषा के रूप में संविधान ने मान्यता दी थी और जनवरी का महीना भी विश्वव्यापीकरण और संचार माध्यम के इस युग में हिन्दी के लिए सितम्बर की तरह ही महत्वपूर्ण है. सूरीनाम में 2003 में आयोजित सातवें विश्व हिन्दी सम्मलेन में पारित प्रस्ताव के अनुसार वर्ष 2006 में भारत सरकार ने हिन्दी को विदेशों में मान्यता दिलाने के लिए 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया.  इस निर्णय को लागू करते हुए एशिया और यूरोपीय देशो में वर्ष 2006 से हर वर्ष 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस का आयोजन किया जाता है. 

हिन्दी भाषा की चर्चा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी की चर्चा के बिना अधूरी है. हिन्दी भाषा का आज हम जिस रूप में प्रयोग कर रहे है वह रूप भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी का दिया हुआ हैं। पहले साहित्य की भाषा और बोलचाल की भाषा अलग थी। साहित्य काव्य में लिखा जाता था और साहित्य पढने और लिखने वाले विशिष्ट समूह के ही लोग होते थे यानि आम जनता से भाषा के कारण साहित्य दूर ही था। 17 वी शताब्दी में राज दरबारों में कवि विराजा करते थे और स्वाभाविक हैं कि काव्य शासको को प्रसन्न रखने के लिए रचा जाता था। इसीसे उस समय के काव्य में तलवार की टंकार और श्रृंगार की झंकार होती थी । 18 वी शताब्दी तक आते-आते राजनैतिक सामाजिक परिस्थितियाँ बदलने लगी थी। जनता को जागरूक रखने और पूरी तरह से समाज से जोडने का प्रयास किया जा रहा था जिसके लिए साहित्य एक सशक्त माध्यम बन सकता था। ऐसे में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने शुरूवात की साहित्य में पद्य के स्थान पर गद्य को आसीन करने की। गद्य यानि बोलचाल की भाषा में साहित्य रचा जाने लगा और बोलचाल की हिन्दी के रूप में खडी बोली का विकास हो रहा था जिससे खड़ी बोली साहित्य की भाषा बनी और हिंदी साहित्य का यह युग भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के नाम पर कहलाया भारतेन्दु युग और इसे गद्य के विकास का युग माना गया।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने विभिन्न विधाओं, नाटक, रिपोर्ट लिखने की शैली, कथात्मक शैली की शुरूवात की। हिन्दी में नाटको का आरम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी से ही माना जाता हैं। उन्होंने अंधेर नगरी चौपट राजा जैसे हास्य प्रधान नाटक लिख कर आम जनता को साहित्य से जोडा। हालांकि उनकी रचनाओं में विशेषकर काव्य में बृज भाषा प्रभावी हैं पर देश की परिस्थितियां देखते हुए उन्होंने हिन्दी पर बल दिया और हिन्दी को मातृ भाषा यानि मातृ भूमि की भाषा माना और इसके लिए रचे कुछ दोहे –

निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को सूल।
अंग्रेजी पढि के जदपि सब गुन होत प्रवीन, पै निज भाषा ज्ञान बिन रहत हीन के हीन।
उन्नति पूरी है तबहि जब घर उन्नति होय, निज शरीर उन्नति किए रहत मूढ़ सब कोय।
निज भाषा उन्नति बिना कबहुं न ह्यैहैं सोय, लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय।
इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग, तबै बनत है सबन सों मिटत मूढ़ता सोग।
और एक अति लाभ यह या में प्रगट लखात, निज भाषा में कीजिए जो विद्या की बात।
तेहि सुनि पावै लाभ सब बात सुनै जो कोय, यह गुन भाषा और महं कबहूं नाही होय।
विविध कला शिक्षा अमित ज्ञान अनेक प्रकार, सब देसन से लै करहू भाषा माहि प्रचार।
भारत में सब भिन्न अति ताहीं सों उत्पात, विविध देस मतहू विविध भाषा विविध लखात।
सब मिल तासों छाडि कै दूजे और उपाय, उन्नति भाषा की करहु अहो भातगन आय।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के साहित्य पर कुछ और चर्चा फिर कभी …..
हिन्दी भाषा और साहित्य जगत के युगपुरूष को सादर नमन !

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स्मृति शेष – सुमन राजे

आज हिन्दी जगत की ख्यात कवियित्री सुमन राजे की पुण्यतिथि है।

कविता की चर्चा करें तो कहना न होगा कि हिन्दी साहित्य में कविता का लोकप्रिय युग रहा है – छायावाद .. जिसमें पहली बार मानव मन की सूक्ष्म अनुभूतियों को कविता का विषय बनाया गया। विशेष गुण रहा प्रकृति में मानवीय भावों की छाया देखना – प्रकृति का मानवीकरण। यह युग तीस के दशक के अंत से ही समाप्त होता गया लेकिन बहुत कम कवि ऐसे रहे जिन्होनें अपनी आधुनिक काव्य शैली में भी कुछ रचनाओं के माध्यम से  इस शैली को आगे बढ़ाया जिनमें से एक है कवियित्री सुमन राजे जिन्होने सत्तर के दशक तक छायावादी शैली को बनाए रखा।

प्रकृति का मानवीकरण प्रस्तुत है – 
गंगा उलट कर निगल जाती है पूरा समुद्र
और चन्द्रमा सूर्य को बन्दी बना लेता है

इतना ही नहीं अपितु अपने दर्द की व्याख्या भी इसी शैली में हुई जैसे – 

मेरा दर्द मुझसे भी बङा हो गया
और रू-ब-रू आदमक़द
मेरे ही सामने खङा हो गया

वास्तव में सुमन जी ने अपनी कविताओं द्वारा समाज के प्रति अपने उद्गार प्रकट किए। कहीं अभिव्यक्ति प्रत्यक्ष रही तो कहीं प्रेरणा का पुट सम्मिलित रहा। सुमन जी ने स्वयं माना है कि वास्तव में कविता मिट्टी खाकर मिट्टी रचती है। सपने खा कर सपने उगलती है …  सुमन जी के इस कथन को उनकी रचनाएं प्रमाणित भी करती है।

आरंभिक रचनाओं के समय कवियित्री ग्रामीण परिवेश से घिरी थी। बाद में लखनऊ आ गई जिससे कविताओं में आंचलिकता के साथ बौद्धिकता का मिश्रण झलकता है। कविता में हृदय की तीव्र अनुभूतियों के साथ – साथ मस्तिषक की विचार रूपी लहरें भी समान रूप से विद्यमान है। रचना प्रक्रिया में इनमें टकराव नहीं है। सुमन जी का मानना है कि अकेले व्यक्ति के प्रयत्नों से न समाज को गति मिल सकती है और न ही जीवन सार्थक हो सकता है। हर युग में आवश्यकता होती है किसी न किसी रूप में एक क्रान्ति की। उगे हुए हाथों के जंगल – रचना से कुछ पंक्तियां – 

संभावनाओं के दरवाज़े पर धरना दिए
ज़िन्दगानियां रीत गई
ये ज़ंग लगे दरवाज़े खोले नहीं तोङे गए

लेकिन इस तरह के संदेशों से कहीं युवा पीढ़ी अपने ही बल पर ऐसे आगे न बढ़ने लगे कि गरिमामय अतीत को ही बिसरा दें, इसी से कहा – 

इतिहास की शिनाख्त अब ज़ुबान से कभी नहीं होगी
क्योंकि ज़ुबाने काट कर हमने माथे पर सजा ली है

जीवन की सच्चाईयों को भी कविताओं का प्रमुख विषय बनाया है। आधुनिक जीवन में संबंधों के बदलते समीकरण की प्रस्तुति इन शब्दों में – 

भाषा से काट दे चाहे
जीवन में संबंध वाचक शब्द अभी बाक़ी है

सुमन जी के शब्द संसार में तत्सम, उर्दू, अंग्रेज़ी और देशज शब्दों के साथ शब्दों की नादात्मकता भी दिखाई देती है – प्रत्यंचा, आले, ग़ुबार, सीरीज़, ठनठना … साथ ही नए शब्द भी गढ़े है जैसे ज़ख्माते ..  

यह थी एक झलक सुमन जी की उन रचनाओं की जो 1979 में अज्ञेय जी द्वारा चौथा सप्तक में सम्पादित की गई जिसमें सात कवियों में अकेली कवियित्री रही – सुमन राजे … जिन्हे पढ़ कर यूं कहा जा सकता है कि हिन्दी काव्य में मीरा के पदों से जो आरंभ महिलाओं का रहा, वह काव्य धारा सुभद्रा कुमारी चौहान की झांसी  की रानी से होती हुई महादेवी वर्मा की नीर भरी बदली से बरस कर आधुनिक युग में सुमन राजे की काव्य धारा के रूप में सदी के अंतिम छोर तक बढ चली।

सुमन जी की रचनाओं पर कुछ और चर्चा फिर कभी ….गौरवशाली कवियित्री को सादर नमन !

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