हॉर्सलि हिल्स

हॉर्सलि हिल्स दक्षिण का हिल स्टेशन हौ जो आन्ध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले में है।  ब्रिटिश शासन काल में यहाँ एक कलेक्टर थे – जॉर्ज  हॉर्सलि –

20180528_091813

जिन्होने इस स्थान की पहचान की और इसे हिल स्टेशन के रूप में विकसित किया। यहाँ दो व्यू प्वाइंट है जहाँ से खूबसूरत प्राकृतिक नज़ारा दिखता है –

20180526_110542

एक ओर है – गाली बंडा  …. हवा को तेलुगु में गाली कहते है और पत्थर को बंडा कहते है. बहुत बढ़िया स्थान है यह। खुले आसमान के नीचे दूर तक फैला हुआ पथरीला भाग है जहाँ सरसराती हवा का आनन्द लिया जाता है –

20180526_160950.jpg

आगे का विवरण अगली पोस्ट में जारी  ….

 

Advertisements

टिप्पणी करे

बोईकुण्डा गंगम्मा मंदिर

चित्तूर ज़िले के मादन्नापल्ली शहर की सीमा पर है बोईकुण्डा गंगम्मा मंदिर –

20180528_135949
महाकाली के मंदिर में प्रवेश की सीढियों पर दोनों ओर कतार में माता की मूर्तियां बनी है –

 

20180528_140852
मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर भस्मासुर वध की मूर्तियाँ है –

 

20180528_135841
भीतर एक अलग चीज़ देखी, मन्नत के धागों के स्थान पर चूङियाँ बँधी देखी –

20180528_133722
गर्भगृह में माँ काली के दर्शन होते है।
इसके बाद हम हैदराबाद लौट आए।

टिप्पणी करे

हॉर्सलि हिल्स – 4

हॉर्सलि हिल्स में दो किलोमीटर के दायरे में एक सूखी झील है – गंगोत्री झील –

20180527_105950
जिसके पीछे जंगल है –

 

20180527_110808
नीचे है हरी-भरी ऋषि घाटी –

20180527_102041
प्रकृति का आनन्द लेने के बाद हम शहरी भाग में यानि मादन्नापल्ली आए जहाँ सीमा पर देखा बोईकुण्डा गंगम्मा मंदिर जिसकी चर्रा अगले चिट्ठे में  ….

 

टिप्पणी करे

हॉर्सलि हिल्स – 3

हॉर्सलि हिल्स में सामने के भाग में वन विहार है यानि ज़ू जिसमें विभिन्न जीव-जन्तु है –

20180526_144644

 

20180526_144852

 

20180526_145242

 

20180526_151926

 

20180526_152305

यहाँ का विशेष आकर्षण है 150 साव पुराना नीलगिरि का पेङ जिसका व़क्षारोपण जॉर्ज  हार्सलि ने किया था जो अब भी हरा-भरा है –

 

20180526_150927

आगे का विवरण अगली पोस्ट में जारी

 

टिप्पणी करे

हॉर्सलि हिल्स – 2

हॉर्सलि हिल्स में बच्चो के लिए झूले और अन्य खेल तो है ही साथ ही छोटे-बङे बच्चों और युवा वर्ग के लिए ट्रैकिंग की सुविधा भी है। निरीक्षकों की देख रेख में इस वर्ग ने ट्रैकिंग का आनन्द लिया –

20180526_135831

प्रकृति की गोद में प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र भी है। विभिन्न रोगों के लिए प्राकृतिक, आयुर्वेदिक चिकित्सा, मालिश आदि की व्यवस्था है साथ ही एक विशेष इलाज भी है। टब मे पानी में छोटी-छोटी मछलियाँ होती है इसमें पैर रख कर बैठने पर मछलियाँ पैरों पर खास कर एङियों सहित पूरे निचले भाग में आ जाती है और त्वचा की मृत कोशिकाएं ( डेड स्किन सेल ) खाने लगती है –

20180526_162826

 

जिसके बाद नई त्वचा आती है जिससे पैरों में कांति आती है। यह भी कहा जाता है कि इससे तनाव भी दूर होता है।

यहाँ पर मल्लम्मा मंदिर भी है –

20180526_165516.jpg

माना जाता है कि पहले इस घने जंगल में हाथी अधिक थे और मल्लम्मा नामक आदिवासी लङकी कुछ हाथियों को नियमित चारा खिलाया करती थी जिसकी स्मृति में माता का मंदिर बनवाया गया है।

आगे का विवरण अगली पोस्ट में जारी  ……

 

टिप्पणी करे

शुभ जन्मदिन ! मन्नू भंडारी जी

आज हिन्दी जगत की सुविख्यात कथाकार मन्नू भंडारी का जन्मदिन हैं।

आज चर्चा करते है उनकी बहुचर्चित कहानी – यही सच है .. की जिस पर बनी फिल्म रजनीगन्धा बहुत लोकप्रिय रही। वास्तव में यह कहानी, कहानी नही लगती, किसी भी लड़की के जीवन की झलक लगती है। हमारे समाज में ऎसी बहुत सी दीपाएं मिल जाएगी। नायिका दीपा को कॉलेज के दिनों में निशीथ से प्यार हो जाता है। कुछ ऐसा होता है कि सम्बन्ध टूटा सा लगता है। आगे दीपा को संजय से प्यार हो जाता है। एक इंटरव्यू के सिलसिले में दीपा दूसरे शहर आती है जहां निशीथ से मिलती हैं और वही उसे पूरा सहयोग देता है और दीपा की नियुक्ति हो जाती है। निशीथ के साथ इन पलो में दीपा का पुराना प्यार जाग उठता है जिसे बढावा मिलता है यह अनुभव कर कि शायद निशीथ इसी प्यार से अब भी बंधा है पर निशीथ की ओर से कोई सीधी प्रतिक्रया नही मिलती। दीपा निशीथ की ओर खिंचने लगती है और निशीथ और संजय की तुलना भी करने लगती है  कि निशीथ समय का पाबन्द है, उसका बहुत ख्याल रखता है जबकि संजय उससे घंटो इंतज़ार करवाता है, उससे बातचीत से अधिक ऑफिस की राजनीति पर बात करता है। इस दुविधा को लेखिका ने इस तरह कलम से उतारा –

” मन में प्रचंड तूफान !  पर फिर भी निर्विकार भाव से मैं टैक्सी में आकर बैठती हूँ फ़िर वही मौन, वही दूरी। पर जाने क्या है कि मुझे लगता है कि निशीथ मेरे बहुत निकट आ गया है, बहुत ही निकट !  बार-बार मेरा मन करता है कि क्यों नहीं निशीथ मेरा हाथ पकड़ लेता, क्यों नहीं मेरे कन्धे पर हाथ रख देता ?  मैं ज़रा भी बुरा नहीं मानूँगी, ज़रा भी नहीं !  पर वह कुछ भी नहीं करता। सोते समय रोज़ की तरह मैं आज भी संजय का ध्यान करते हुए ही सोना चाहती हूँ, पर निशीथ है कि बार-बार संजय की आकृति को हटाकर स्वयं आ खड़ा होता है।”

अपने शहर लौटने के बाद भी दीपा अपने आपको निशीथ की ओर ही आकर्षित पाती है,  मन ही मन में कहती है  –

” मुझे क्षमा कर दो संजय और लौट जाओ। तुम्हें मुझ जैसी अनेक दीपाएँ मिल जाएँगी, जो सचमुच ही तुम्हें प्रियतम की तरह प्यार करेंगी। आज एक बात अच्छी तरह जान गई हूँ कि प्रथम प्रेम ही सच्चा प्रेम होता है, बाद में किया हुआ प्रेम तो अपने को भूलने का, भरमाने का प्रयास-मात्र होता है।”

लेकिन  संजय से मिलकर दीपा को लगता है कि  उसे वास्तव में संजय से ही प्यार है। इस सच्चाई को लेखिका ने इन शब्दों में व्यक्त किया है –

अठारह वर्ष की आयु में किया हुआ प्यार भी कोई प्यार होता है भला ! निरा बचपन होता है, महज पागलपन ! उसमें आवेश रहता है पर स्थायित्व नहीं, गति रहती है पर गहराई नहीं। जिस वेग से वह आरम्भ होता है, ज़रा-सा झटका लगने पर उसी वेग से टूट भी जाता है। और उसके बाद आहों, आँसुओं और सिसकियों का एक दौर, सारी दुनिया की निस्सारता और आत्महत्या करने के अनेकानेक संकल्प और फिर एक तीखी घृणा। जैसे ही जीवन को दूसरा आधार मिल जाता है, उन सबको भूलने में एक दिन भी नहीं लगता। फिर तो वह सब ऐसी बेवकूफी लगती है, जिस पर बैठकर घंटों हँसने की तबीयत होती है। तब एकाएक ही इस बात का अहसास होता है कि ये सारे आँसू, ये सारी आहें उस प्रेमी के लिए नहीं थीं, वरन् जीवन की उस रिक्तता और शून्यता के लिए थीं, जिसने जीवन को नीरस बनाकर बोझिल कर दिया था।”

तभी तो मन्नू भण्डारी जी ने शीर्षक दिया – यही सच है … लेकिन ऐसे शीर्षक फिल्मो के लिए नही चलते और बासु चटर्जी ने लेखिका की ही इन पंक्तियों से शीर्षक लिया – रजनीगन्धा

एक बार मैंने यों ही कह दिया था कि मुझे रजनीगन्धा के फूल बड़े पसन्द हैं, तो उसने नियम ही बना लिया कि हर चौथे दिन ढेर-सारे फूल लाकर मेरे कमरे में लगा देता है। और अब तो मुझे भी ऐसी आदत हो गई है कि एक दिन भी कमरे में फूल न रहें तो न पढ़ने में मन लगता है, न सोने में। ये फूल जैसे संजय की उपस्थिति का आभास देते रहते हैं।”

मन्नू भंडारी जी को जन्मदिन की अनेको शुभकामनाएं !  हम उनके अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घ आयु की कामना करते है !

 

टिप्पणी करे

झीलों की नगरी – भोपाल

भोपाल को झीलों की नगरी कहा जाता है पर ऐसा लगा नहीं। शाहपुर झील पर ठीक लगा.
वन विहार में अधिक आनन्द नहीं आया। गर्म मौसम  के कारण पशु-पक्षी जन्तु खुल कर बाहर विचरते नज़र नहीं आए –

20180331_110611.jpg

लेकिन जंगल से क्षेत्र में घूमना अच्छा लगा –

 

कुछ और आकर्षण भी रहे – राजा भोज सेतु अच्छा लगा और पानी में राजा भोज की मूर्ति भी –

20180331_114208.jpg

 

 

 

20180331_115036.jpg

 
इसके अलावा कुछ स्थानों पर दीवारों पर उकेरी गई मध्य प्रदेश की संस्कृति की झलक भी अच्छी लगी –
इसके बाद हम हैदराबाद लौट आए।

टिप्पणी करे

Older Posts »