हॉर्सलि हिल्स

हॉर्सलि हिल्स दक्षिण का हिल स्टेशन हौ जो आन्ध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले में है।  ब्रिटिश शासन काल में यहाँ एक कलेक्टर थे – जॉर्ज  हॉर्सलि –

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जिन्होने इस स्थान की पहचान की और इसे हिल स्टेशन के रूप में विकसित किया। यहाँ दो व्यू प्वाइंट है जहाँ से खूबसूरत प्राकृतिक नज़ारा दिखता है –

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एक ओर है – गाली बंडा  …. हवा को तेलुगु में गाली कहते है और पत्थर को बंडा कहते है. बहुत बढ़िया स्थान है यह। खुले आसमान के नीचे दूर तक फैला हुआ पथरीला भाग है जहाँ सरसराती हवा का आनन्द लिया जाता है –

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आगे का विवरण अगली पोस्ट में जारी  ….

 

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स्मृति शेष – आचार्य चतुरसेन शास्त्री

आज ख्यात साहित्यकार आचार्य चतुरसेन शास्त्री की पुण्यतिथि है।

हम चर्चा कर रहे है शास्त्री जी की श्रेष्ठ कृति की – वैशाली की नगर वधू 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रचा गया है यह उपन्यास जो मगध साम्राज्य के समय को दर्शाता है। बिम्बसार का राज्य और अजातशत्रु की शौर्य गाथा भी है इसमे लेकिन प्रमुख चरित्र है – आम्रपाली या अम्बपाली। आम के उद्यान में निःसन्तान सेवक दम्पति को शिशु रूप में मिली इस लड़की का नाम आम्रपाली ही रखा गया। माँ के निधन के बाद पिता ने अधिक दुलार से पाला। नृत्य की शिक्षा भी दी … परिणाम मात्र ग्यारह वर्ष की आयु में ज़बरन वैश्य घोषित कर दी गई और वैशाली राज्य की नगरवधू बन गई। 

राजनर्तकी बनी आम्रपाली के प्रशंसक भी बहुत रहे और प्रेमी भी, अजातशत्रु भी उसका प्रेमी रहा। लेकिन उसके जीवन की दिशा बदली बुद्ध के वैशाली आगमन के बाद। बुद्ध वहां अपने दस हज़ार शिष्यों के साथ पधारे। सभी शिष्य वैशाली की गलियों में भिक्षा माँगने लगे लेकिन एक भिक्षु के प्रति आम्रपाली आकर्षित हुई और उसने उस भिक्षु को अपने महल में रहने का निमन्त्रण दिया जिसे शिष्य ने बुद्ध की अनुमति से स्वीकार किया। ..फिर – धीरे धीरे स्वयं आम्रपाली जीवन के रहस्यो से परिचित होती गई और बुद्ध से अनुमति ले भिक्षुणी बनी और इस तरह पहली बार किसी महिला को यह अवसर मिला।

बाद में आम्रपाली ने महिला उत्थान के कार्य भी किए। स्वयं शास्त्री जी ने अपने इस उपन्यास को अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति बताया। इसकी भूमिका में लिखा – 

“मैं अब तक की अपनी सारी रचनाओं को रद्द करता हूँ, और वैशाली की नगरवधू को अपनी एकमात्र रचना घोषित करता हूँ। ” 

इसी विषय पर आम्रपाली नाम से फिल्म भी बनी …. शास्त्री जी के साहित्य पर चर्चा फिर कभी …..

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

 

 

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स्मृति शेष – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

आज हिन्दी भाषा और साहित्य जगत के युगपुरूष भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की पुण्यतिथि है।

9 सिम्बर के दिन वर्ष 1850 में उनका जन्म हुआ था और 6 जनवरी 1885 को 35 वर्ष की अल्पायु में ही उनका निधन हो गया था.  इत्तेफाक देखिए कि सितम्बर और जनवरी दोनों ही महीने हिन्दी के लिए महत्वपूर्ण है।  14 सिम्बर 1949 को हिन्दी को संघ की भाषा के रूप में संविधान ने मान्यता दी थी और जनवरी का महीना भी विश्वव्यापीकरण और संचार माध्यम के इस युग में हिन्दी के लिए सितम्बर की तरह ही महत्वपूर्ण है. सूरीनाम में 2003 में आयोजित सातवें विश्व हिन्दी सम्मलेन में पारित प्रस्ताव के अनुसार वर्ष 2006 में भारत सरकार ने हिन्दी को विदेशों में मान्यता दिलाने के लिए 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया.  इस निर्णय को लागू करते हुए एशिया और यूरोपीय देशो में वर्ष 2006 से हर वर्ष 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस का आयोजन किया जाता है. 

हिन्दी भाषा की चर्चा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी की चर्चा के बिना अधूरी है. हिन्दी भाषा का आज हम जिस रूप में प्रयोग कर रहे है वह रूप भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी का दिया हुआ हैं। पहले साहित्य की भाषा और बोलचाल की भाषा अलग थी। साहित्य काव्य में लिखा जाता था और साहित्य पढने और लिखने वाले विशिष्ट समूह के ही लोग होते थे यानि आम जनता से भाषा के कारण साहित्य दूर ही था। 17 वी शताब्दी में राज दरबारों में कवि विराजा करते थे और स्वाभाविक हैं कि काव्य शासको को प्रसन्न रखने के लिए रचा जाता था। इसीसे उस समय के काव्य में तलवार की टंकार और श्रृंगार की झंकार होती थी । 18 वी शताब्दी तक आते-आते राजनैतिक सामाजिक परिस्थितियाँ बदलने लगी थी। जनता को जागरूक रखने और पूरी तरह से समाज से जोडने का प्रयास किया जा रहा था जिसके लिए साहित्य एक सशक्त माध्यम बन सकता था। ऐसे में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने शुरूवात की साहित्य में पद्य के स्थान पर गद्य को आसीन करने की। गद्य यानि बोलचाल की भाषा में साहित्य रचा जाने लगा और बोलचाल की हिन्दी के रूप में खडी बोली का विकास हो रहा था जिससे खड़ी बोली साहित्य की भाषा बनी और हिंदी साहित्य का यह युग भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के नाम पर कहलाया भारतेन्दु युग और इसे गद्य के विकास का युग माना गया।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने विभिन्न विधाओं, नाटक, रिपोर्ट लिखने की शैली, कथात्मक शैली की शुरूवात की। हिन्दी में नाटको का आरम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी से ही माना जाता हैं। उन्होंने अंधेर नगरी चौपट राजा जैसे हास्य प्रधान नाटक लिख कर आम जनता को साहित्य से जोडा। हालांकि उनकी रचनाओं में विशेषकर काव्य में बृज भाषा प्रभावी हैं पर देश की परिस्थितियां देखते हुए उन्होंने हिन्दी पर बल दिया और हिन्दी को मातृ भाषा यानि मातृ भूमि की भाषा माना और इसके लिए रचे कुछ दोहे –

निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को सूल।
अंग्रेजी पढि के जदपि सब गुन होत प्रवीन, पै निज भाषा ज्ञान बिन रहत हीन के हीन।
उन्नति पूरी है तबहि जब घर उन्नति होय, निज शरीर उन्नति किए रहत मूढ़ सब कोय।
निज भाषा उन्नति बिना कबहुं न ह्यैहैं सोय, लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय।
इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग, तबै बनत है सबन सों मिटत मूढ़ता सोग।
और एक अति लाभ यह या में प्रगट लखात, निज भाषा में कीजिए जो विद्या की बात।
तेहि सुनि पावै लाभ सब बात सुनै जो कोय, यह गुन भाषा और महं कबहूं नाही होय।
विविध कला शिक्षा अमित ज्ञान अनेक प्रकार, सब देसन से लै करहू भाषा माहि प्रचार।
भारत में सब भिन्न अति ताहीं सों उत्पात, विविध देस मतहू विविध भाषा विविध लखात।
सब मिल तासों छाडि कै दूजे और उपाय, उन्नति भाषा की करहु अहो भातगन आय।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के साहित्य पर कुछ और चर्चा फिर कभी …..
हिन्दी भाषा और साहित्य जगत के युगपुरूष को सादर नमन !

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स्मृति शेष – सुमन राजे

आज हिन्दी जगत की ख्यात कवियित्री सुमन राजे की पुण्यतिथि है।

कविता की चर्चा करें तो कहना न होगा कि हिन्दी साहित्य में कविता का लोकप्रिय युग रहा है – छायावाद .. जिसमें पहली बार मानव मन की सूक्ष्म अनुभूतियों को कविता का विषय बनाया गया। विशेष गुण रहा प्रकृति में मानवीय भावों की छाया देखना – प्रकृति का मानवीकरण। यह युग तीस के दशक के अंत से ही समाप्त होता गया लेकिन बहुत कम कवि ऐसे रहे जिन्होनें अपनी आधुनिक काव्य शैली में भी कुछ रचनाओं के माध्यम से  इस शैली को आगे बढ़ाया जिनमें से एक है कवियित्री सुमन राजे जिन्होने सत्तर के दशक तक छायावादी शैली को बनाए रखा।

प्रकृति का मानवीकरण प्रस्तुत है – 
गंगा उलट कर निगल जाती है पूरा समुद्र
और चन्द्रमा सूर्य को बन्दी बना लेता है

इतना ही नहीं अपितु अपने दर्द की व्याख्या भी इसी शैली में हुई जैसे – 

मेरा दर्द मुझसे भी बङा हो गया
और रू-ब-रू आदमक़द
मेरे ही सामने खङा हो गया

वास्तव में सुमन जी ने अपनी कविताओं द्वारा समाज के प्रति अपने उद्गार प्रकट किए। कहीं अभिव्यक्ति प्रत्यक्ष रही तो कहीं प्रेरणा का पुट सम्मिलित रहा। सुमन जी ने स्वयं माना है कि वास्तव में कविता मिट्टी खाकर मिट्टी रचती है। सपने खा कर सपने उगलती है …  सुमन जी के इस कथन को उनकी रचनाएं प्रमाणित भी करती है।

आरंभिक रचनाओं के समय कवियित्री ग्रामीण परिवेश से घिरी थी। बाद में लखनऊ आ गई जिससे कविताओं में आंचलिकता के साथ बौद्धिकता का मिश्रण झलकता है। कविता में हृदय की तीव्र अनुभूतियों के साथ – साथ मस्तिषक की विचार रूपी लहरें भी समान रूप से विद्यमान है। रचना प्रक्रिया में इनमें टकराव नहीं है। सुमन जी का मानना है कि अकेले व्यक्ति के प्रयत्नों से न समाज को गति मिल सकती है और न ही जीवन सार्थक हो सकता है। हर युग में आवश्यकता होती है किसी न किसी रूप में एक क्रान्ति की। उगे हुए हाथों के जंगल – रचना से कुछ पंक्तियां – 

संभावनाओं के दरवाज़े पर धरना दिए
ज़िन्दगानियां रीत गई
ये ज़ंग लगे दरवाज़े खोले नहीं तोङे गए

लेकिन इस तरह के संदेशों से कहीं युवा पीढ़ी अपने ही बल पर ऐसे आगे न बढ़ने लगे कि गरिमामय अतीत को ही बिसरा दें, इसी से कहा – 

इतिहास की शिनाख्त अब ज़ुबान से कभी नहीं होगी
क्योंकि ज़ुबाने काट कर हमने माथे पर सजा ली है

जीवन की सच्चाईयों को भी कविताओं का प्रमुख विषय बनाया है। आधुनिक जीवन में संबंधों के बदलते समीकरण की प्रस्तुति इन शब्दों में – 

भाषा से काट दे चाहे
जीवन में संबंध वाचक शब्द अभी बाक़ी है

सुमन जी के शब्द संसार में तत्सम, उर्दू, अंग्रेज़ी और देशज शब्दों के साथ शब्दों की नादात्मकता भी दिखाई देती है – प्रत्यंचा, आले, ग़ुबार, सीरीज़, ठनठना … साथ ही नए शब्द भी गढ़े है जैसे ज़ख्माते ..  

यह थी एक झलक सुमन जी की उन रचनाओं की जो 1979 में अज्ञेय जी द्वारा चौथा सप्तक में सम्पादित की गई जिसमें सात कवियों में अकेली कवियित्री रही – सुमन राजे … जिन्हे पढ़ कर यूं कहा जा सकता है कि हिन्दी काव्य में मीरा के पदों से जो आरंभ महिलाओं का रहा, वह काव्य धारा सुभद्रा कुमारी चौहान की झांसी  की रानी से होती हुई महादेवी वर्मा की नीर भरी बदली से बरस कर आधुनिक युग में सुमन राजे की काव्य धारा के रूप में सदी के अंतिम छोर तक बढ चली।

सुमन जी की रचनाओं पर कुछ और चर्चा फिर कभी ….गौरवशाली कवियित्री को सादर नमन !

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स्मृति शेष – कृश्न चन्दर

फसादियों में लाहौर के गंडासिंह फल विक्रेता भी थे, जिनकी लाहौरी दरवाजे के बाहर फलों की बहुत बड़ी दुकान और माडल टाउन में एक आलीशान कोठी थी। इस हिसाब से एक आलीशान कोठी उन्हें यहां भी मिलनी चाहिए थी, सो भगवान की कृपा से उन्हें सैयद करामतअली शाह की नई बनी बनायी कोठी मिल गई। जब मैं वहां पहुंचा तो गंडासिंह लाइब्रेरी की समस्त पुस्तकें एक-एक करके बाहर फेंक रहे थे और लाइब्रेरी को फलों से भर रहे थे। यह शेक्सपियर का सेट गया और तरबूज़ों का टोकरा भीतर आया! ये गालिब के दीवान बाहर फेंके गए और महीलाबाद के आम भीतर रखे गए! यह खलील जिबरान गए और खरबूजे आए! थोड़े समय के बाद सब पुस्तकें बाहर थीं और सब फल भीतर। अफलातून के स्थान पर आलू बुखारे, सुकरात के स्थान पर सीताफल! जोश के स्थान पर जामुन,  मोमिन के स्थान पर मोसम्बी, शेली के स्थान पर शहतूत, कीट्स के स्थान पर ककड़ियां, कृश्न चन्दर के स्थान पर केले और ल. अहमद के स्थान पर लीमू भरे हुए थे।

एक गधे की आत्म कथा …. रचना का अंश है यह जिसका कहीं-कहीं शीर्षक एक गधे की वापसी या एक गधा नेफे में … भी है जिसके रचनाकार है कृष्ण चंद्र …. जिनका आज जन्मदिन है

कृष्ण चंद्र उर्दू-हिन्दी के लोकप्रिय व्यंग्यकार हैं। इस रचना में बंटवारे के बाद की सामाजिक स्थिति का चित्रण हैं। बटवारे का लाभ कुछ लोग ले रहे थे लेकिन इन नई स्थितियों में आम आदमी निरीह हो गया था , नई मिली आज़ादी के माहौल में भी उसे चैन नही था, अब वह अपनों से ही शोषित हो रहा था इस तरह आम आदमी का प्रतीक बन गया था – गधा

यह रचना इतनी लोकप्रिय है कि इसका लगभग सभी भारतीय भाषाओं में और कुछ विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हुआ। कुछ नाट्य समूहों ने मंच प्रस्तुतियां भी दी ….

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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राम की शक्ति पूजा – निराला

आज हम चर्चा करते है सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी की एक काव्य रचना की – राम की शक्ति पूजा

रचनाकाल के समय भारत राजनीतिक क्षेत्र में विश्व की सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी शक्ति ब्रिटेन को ललकार रहा था। इस स्थिति में निराला जी ने अपनी संस्कृति से गौरवान्वित चरित्रों के माध्यम से शक्ति के संचय की बात कहने राम कथा का सहारा लिया। इन प्रसंगों का चित्रण किया –

राम और रावण के बीच युद्ध छिङ गया, राम स्मरण करते है जनक वाटिका में सीता के साथ प्रथम मिलन का दृश्य और इसी के साथ युद्ध में विजय प्राप्त करने का निश्चय करते है जिसमें आत्मविश्वास दृढ़ करने के लिए ताङका, सुबाहु आदि राक्षसों का स्मरण करते है जिनका वध पहले ही कर चुके है। रचना की अंतिम पंक्तियों में निराला जी ने राम की विजय के संकेत दिए है।

यह हम सब जानते है कि साहित्यकार अपने युगीन परिवेश और संस्कृति से प्रभावित रहता है जिसकी छाया सीधे या परोक्ष रूप से साहित्य में दिखाई देती है। इस रचना में बंगला संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट है। इस संस्कृति में राम को महाशक्ति दुर्गा का अनन्य भक्त माना गया है। दशहरा त्यौहार जो राम की विजय और रावण की पराजय का प्रतीक है बंगाल में दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। इस प्रभाव को आरंभ में ही रावण की विजय के लक्षणों से स्पष्ट किया है कि रावण महाशक्ति का भक्त है, इसीसे रणभूमि में अपने बाणों को व्यर्थ होते देख राम चिन्तित है –

कल लङने को हो रहा विकल वह बार – बार
असमर्थ मानता मन उद्वन्त हो हार-हार

सेनापति जाम्बवन्त ने राम को भक्ति का उत्तर भक्ति से देने की सलाह दी। राम ने महाशक्ति दुर्गा की आराधना की। अंत में माँ दुर्गा ने राम की परीक्षा भी ली, अंतिम कमल पुष्प को विलीन कर दिया तब राम फूल के स्थान पर अपने नैन अर्पित करने को तैयार हो गए, तब माँ ने प्रसन्न होकर आशिर्वाद दिया –

होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन
कह महाशक्ति राम के बदन में हुई लीन

इसमें वाल्मिकी रचित रामायण से प्रसंग लिए गए जो इस प्रकार है – अरण्यकाण्ड के 19 वें और 20 वें सर्ग में राम द्वारा राक्षसों का वध वर्णित है –

निपाती तान् प्रेष्य रणे तु राक्षसान् प्रधाविता शूर्पणखा पुन स्ततः
वर्ध च तेषां निखिलेन रक्षसां शीस सर्व भोगनी खरस्य सा ।।

इसी काण्ड से युद्ध का वर्णन आरंभ होता है जो आगे सुन्दरकाण्ड आदि में भी वर्णित है। राम की विजय का वर्णन युद्ध काण्ड में है –

ततो विनेदुः सुदृष्टा वानरा जितकाशिनः ।
वदन्तो राघव जयं रावणस्य च तद्वधम् ।।

बंगीय संस्कृति से प्रभावित निराला जी ने राष्ट्रीय भाव को प्रकट किया कि इन परिस्थितियों से जूझने के लिए भारत में नैतिक शक्ति का अब भी चयन होता है। विभिन्न राक्षसों के वध द्वारा उत्पन्न वीर भाव जन मानस के आत्मविश्वास को दृढ़ करने में सहायक है कि भारत में विभिन्न युद्धों में वीरों ने अपना शौर्य प्रदर्शित किया तब वह ब्रिटिश साम्राज्य से भी टक्कर ले सकते है।

 

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स्मृति शेष – भारत भूषण अग्रवाल

आज हिन्दी काव्य जगत के ख्यात कवि भारत भूषण अग्रवाल का जन्म दिन है। भारत भूषण जी प्रयोगवादी कवि है। हिन्दी काव्य के क्षेत्र में तीस के दशक के मध्य में छायावादी शैली की लोकप्रियता चरम पर आने के बाद से ही कविता में अन्य प्रयोग शुरू हो गए थे. चालीस के दशक तक आते-आते कई प्रयोगवादी कवियों की रचनाएं दिखाई देने लगी थी और चालीस के दशक में एक काव्य संग्रह की योजना बनी जिसका भार लिया अज्ञेय जी ने और सामने आया सात कवियों की रचनाओं का संग्रह – तार सप्तक  …. जिसकी भूमिका में अज्ञेय जी ने स्पष्ट किया कि इस संग्रह का

” एक सिद्धांत यह था कि संग्रहित कवि सभी ऐसे होंगे जो कविता को प्रयोग का विषय मानते है. ”

और इन सात कवियों में तीसरे कवि है – भारत भूषण अग्रवाल  … जिससे भारत भूषण जी का प्रयोगवादी कवि होना प्रमाणित हो गया…

लेकिन छायावादी परम्परा की शैली पूरी तरह से छूटी नही. छायावाद का आकर्षण रहा प्रकृति द्वारा मानवीय भावों को समझना, भारत भूषण जी की यह पंक्तियाँ देखिए –

” सघन बर्फ की कडी पर्त सी

एक एक कर अमित रूढ़ियाँ
सदियों से जमती जाती है
 तह पर तह
मानव जीवन पर “
रचना ” अपने कवि से ” पढ़ कर भी यूं लगता है जैसे काव्य की सृजनात्मकता में परम्परा अब भी विद्यमान है –
” देवता बदल गए, बदली न मूर्ति ” कह कर कवि ने यही प्रमाणित किया है –
” कितनी संकुचित जीर्ण, वृद्धा हो गई आज कवि की भाषा
कितने प्रत्यावर्तन जीवन में चंचल लहरों के समान
आए, बह गए ; काल बुदबुदा सा उठा, मिटा, पर परम्परा
अभियुक्त अभी परिवर्तित हुई न परिभाषा “
किन्तु कवि को यह स्वीकार्य नही कि इस नितांत आधुनिकता की अभिव्यक्ति पारम्परिक शैली में हो –
”  हमको न ज़रुरत आज देववाणी की, हम खुद झोकेंगे
जीवन की भट्टी में भाषा, जी चाहा रूप बना लेंगे “
जब जीवन को ही मानव स्वयं गति दे रहा है, वह अपनी दिशा का स्वयं निर्माता है तब उनकी यह मान्यता उचित भी है. तभी तो कहा है –
” निज दिव्य दृष्टि से ! रे ! तेरी यह भाषा तो है मात्र मुकुर
उस दर्शन का जिसने देखा आसमान धोया नीला
नश्वरता से डर कर जिसने देखी न प्रकृति चिर गतिशील  “
स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत जब सभी सुनहरे भविष्य के स्वप्न देखते यथार्थ से दूर थे तब भी कवि वर्तमान को देखते हुए भविष्य की भयावहता को पहचान रहा था. इस स्थिति की इन काव्य पंक्तियों में लाक्षणिक अभिव्यक्ति देखिए –
” वे आँखे बंद किए सपनो में डूबे थे,
और मैं जिसका स्वर सदा दर्द से गीला रहा,
जिसके भर्राए गले से कुछ चीखे ही निकल सकी
मैं हारा बल लगाकर
आँखे खोले
यथार्थ को देख रहा था “
इस तरह भारत भूषण जी परम्परा से जुड़े प्रयोगवादी कवि है। भारत भूषण जी की रचनाओं पर कुछ और चर्चा फिर कभी …..
हिन्दी साहित्य जगत के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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स्मृति शेष – केदारनाथ सिंह

आज हिन्दी साहित्य जगत के ख़्यात कवि केदारनाथ सिंह का जन्मदिवस है।
साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से वर्ष 2013  में सम्मानित कवि  केदारनाथ सिंह जी हिन्दी काव्य जगत में पचास के दशक में उभरने वाले प्रमुख कवियों में से एक नाम है जिन्हें पाठकों का विशाल समूह दिया अज्ञेय जी ने अपने महत्वपूर्ण संकलन  ” तीसरा सप्तक ” द्वारा। इसके सात महत्वपूर्ण कवियों में केदारनाथ सिंह जी को भी सम्मिलित किया गया जिससे उनका नाम साहित्य में भी  रेखांकित हुआ।
साहित्य में ” तीसरा सप्तक ”  एक चुनौतीपूर्ण प्रयोग था क्योंकि सप्तकों की श्रृंखला में पिछले दो सप्तकों – तार सप्तक और दूसरा सप्तक ने आधार लगभग निश्चित से कर दिए थे। इस स्थिति में भी 1959 में प्रकाशित ” तीसरा सप्तक ” के 1961 में दूसरे और 1967 में तीसरे संस्करण का प्रकाशन हर्ष का विषय है। इसे स्वयं अज्ञेय ने भी स्वीकारा है –
” तार सप्तक ” एक नई ( काव्य ) प्रवृत्ति का पैरवीकार मांगता था, इससे अधिक विशेष कुछ नहीं। ” तीसरा सप्तक ” तक पहुँचते – पहुँचते प्रवृत्ति की पैरवी अनावश्यक हो गई और कवियों की पैरवी का तो सवाल ही क्या है ?  …
भूमिका में यह कह अज्ञेय ने सातों कवियों की महत्ता सिद्ध कर दी।  इस तरह कवि केदारनाथ सिंह जी पचास के दशक में साहित्य पटल से अनेकों पाठकों तक पहुँचे। आपके पिता राजनीति में सक्रिय थे। इसी से प्रभावित प्रथम रचना का विषय  ” सुभाष की मृत्यु ” था। अज्ञेय ने केदारनाथ सिंह जी की रचनाओं के बारे में लिखा –
” सभी रचनाएं नई कविता की प्रवृत्तियों के अंतर्गत रखी जाती है तथापि आपके विचार में नई कविता दोषयुक्त है कारण यहाँ बिम्बों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त नहीं हुआ है जिसके प्रयोग पर आप बार-बार बल देते है। “
इससे स्पष्ट हो जाता है कि कवि केदारनाथ सिंह जी यथार्थ का चित्रण करते-करते स्पष्टवादी भी हो गए थे, तभी तो साहित्य के अन्य पूर्व कवियों की भांति अपने-अपने कवि कर्म अथवा युग की कविता की पैरवी नहीं की, उसे पूरे गुण-दोषों के साथ आत्मसात किया।
उनकी रचनाओं में प्रेम की अभिव्यक्ति का अपना अनोखा ढ़ंग भी है। कोमलता के विपरीत शब्दों का चयन कर भावों का कुछ इस रूप में चित्रण हुआ है  –
”  ठाठें मारता है एक नया भाव
मेरी धमनियों में
हाँ, हड्डी – हड्डी को
पसली-पसली को
नदी के अरार की तरह टूटने दो
……
अगर नहीं है मेरे स्वरों में तुम्हारे स्वर  “
यदि प्रेयसी के प्रति मन में प्रेम भाव का अंकुर न हुआ हो तो उसे जीवन व्यर्थ लगता है, किन्तु  इस प्रेम का प्रेयसी को भी स्वीकार्य होना अनिवार्य है –
” अगर बन्द है मेरी मुट्ठी में तुम्हारी नदियाँ
अगर कैद है मेरी छाती में तुम्हारे तान
तो ओ रे भाई
मुझे ज़ंग लगे लोहे की तरह टूटने दो  “
काव्य की परम्परागत प्रवृत्ति को भी बनाए रखते हुए भावों की अभिव्यक्ति में प्रकृति को भी आधार बनाया। साथ ही स्पष्ट न कह कर परोक्ष कहने की प्रवृत्ति भी निभाई। इन पंक्तियों में व्यंजकता देखिए जिसमें कहा जा रहा कि क्या नूतन वर्ष भी पिछले वर्ष की भांति समस्याओं से परिपूर्ण होगा अथवा इस वर्ष कुछ समाधान भी होंगें –
 ” चोट खाए बादलों की टूक टूक जिजीविषा
या फिर
भवन में स्वरों का चढ़ता हुआ आलाप  “
भविष्य में कुछ कर दिखाने की आकांक्षा है किन्तु वह है क्या  ?  यह कुछ निश्चित नहीं है –
 ”  एक नन्हा बीज मैं नव युग का
आह, कितना कुछ – सभी कुछ – न जाने क्या-क्या
समूचा विश्व होना चाहता हूँ
भोर से पहले तुम्हारे द्वार
तुम मुझे देखो न देखो “
अपनी रचनाओं के लिए विविधता लिए अपार शब्द भंडार जुटाया है – तत्सम शब्द है – तरू, क्षत-विक्षत, संकल्प, देशज शब्दों का भी प्रयोग किया – ठाठें मारना, उमरिया, भींज गया, पछाङ खाना, उर्दू अल्फाज़ भी लिए – मदरसों, क़िस्सों, मनहूस और टेबुल, कैफ़े जैसे अंग्रेज़ी शब्द भी है तथा चिङचिङी, वर-वर जैसे नादात्मक शब्द भी है साथ ही हरा-भरा के लिए नया शब्द भी गढ़ा है – हहरा ….  यह थी एक झलक केदारनाथ सिंह जी के काव्य की …
हिन्दी साहित्य जगत के गौरवशाली कवि को सादर नमन !

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