प्रेमचन्द – स्मृति शेष

आज हिन्दी जगत के सुविख्यात कथाकार प्रेमचंद का जन्मदिवस हैं।

प्रेमचन्द ने किसानो पर सशक्त लेखनी चलाई।  किसानो की दयनीय स्थिति का उन्होंने चारो ओर से जायज़ा लिया, तभी तो उनकी लेखनी एक तरफा नहीं रही। गोदान उपन्यास तो पूरी ही तरह से किसानो को समर्पित रहा पर कहानियां भी इससे अछूती नही रही। किसानो की स्थिति के लिए जितना दोषी उन्होंने ज़मींदारो और महाजनों को ठहराया उतना ही दोषी उन्होंने खुद किसान को भी बताया। किसानो की कमजोरी और उनका आलसीपन भी कई बार उनकी प्रगति में बाधक रहा। इसका उदाहरण है  कहानी – पूस की रात ….  

इस कहानी को पहली बार मैंने नाट्य रूप में विविध भारती के हवामहल कार्यक्रम में सुना था। उन दिनों मैं दसवी कक्षा में पढती थी और पाठ्यक्रम में प्रेमचन्द की कहानी पंच परमेश्वर पढी थी और पूस की रात मेरी जानकारी में आई दूसरी कहानी थी। इसके बाद कई बार मैंने हवामहल में यह नाट्य प्रस्तुति सुनी –


हल्कू को खेती से जितनी आमदनी होती है वो क़र्ज़ चुकाने में चली जाती  हैं, यहाँ तक कि पूस ( पौष ) माह के जाडो के लिए भी उसके पास कम्बल खरीदने के लिए भी पैसे नही हैं। इसीसे तंग आकर उसकी पत्नी  मुन्नी कहती हैं –

” तुम खेती छोड क्यों नही देते ? मर – मर कर काम करो, उपज हो तो बाक़ी दे दो, बाक़ी चुकाने के लिए ही हमारा जन्म हुआ हैं। पेट के लिए मजूरी करो। ऐसी खेती से बाज़ आए।  “


यहाँ प्रेमचन्द ने यह भी बताया कि क़र्ज़ से दबा किसान किसानी छोड मज़दूर बन रहा हैं, अपने खेत का मालिक रहने के बजाए दूसरो का मज़दूर बन रहा हैं। क्योंकि दिन भर खेत में काम करते हुए वह मज़दूरी कर नहीं पाता और अपनी खेती से पेट नहीं भर रहा, इसीसे खेती छोड किसान मज़दूर बनने को मजबूर हैं। वैसे हल्कू भी जीवन के प्रति जागरूक नहीं हैं। जैसा चल रहा हैं चलने दो .. सा अंदाज़ हैं। यह सच हैं कि खेत की रखवाली के लिए सर्दियों की रात में ख़ास कर पूस के जाडे में उसे खेत में बिना कम्बल सोना पडता हैं पर वह यह नही सोच रहा कि अच्छी तरह रखवाली कर फसल तैयार कर ले और कुछ पैसे बचाने की कोशिश करे जिसके लिए कुछ अतिरिक्त मेहनत मजूरी भी कर ले, ताकि आवश्यकता के अनुसार खर्च के लिए पैसे का जुगाड हो जाए, इतनी सक्रियता उसमे नही, प्रेमचंद लिखते हैं –


” फसल तैयार हैं। पर ये दुष्ट जानवर उसका सत्यानाश किए डालते हैं। हल्कू पक्का इरादा करके उठा और दो – तीन क़दम चला पर एकाएक हवा का ऐसा ठण्डा, चुभने वाला, बिच्छु के डंक सा झोका लगा कि वह फिर बुझते हुए अलाव के पास आ बैठा और राख को कुरेद कर अपनी ठंडी देह को गरमाने लगा। जबरा ( कुत्ता ) अपना गला फाड़ता रहा, नील गाय खेत का सफाया किए डालती थी और हल्कू गर्म राख के पास शांत बैठा हुआ था। अकर्मण्यता ने रस्सियों की भाँति उसे चारो तरफ से जकड रखा था। उसी गर्म राख के पास ज़मीन पर वह चादर ओढ कर सो गया। “


इन पंक्तियों में लेखक स्पष्ट करते हैं कि कुत्ता जी-जान से जुटा हैं फसल का सफाया करती नील गायों को भगाने के लिए पर हल्कू आलसी बना बैठा हैं।  हद तो तब हो गई जब पूरी फसल बर्बाद होने के बाद भी उसे चिंता नही है बल्कि वह खुश हैं कि अब रात में जाडे में उसे खेत में सोना तो न पडेगा। कहानी की अंतिम पंक्तियाँ खुद किसानो को भी उनकी दयनीय स्थिति के लिए कुछ तक ज़िम्मेदार ठहराती हैं –


” मुन्नी के चहरे पर उदासी छायी थी पर हल्कू प्रसन्न था। मुन्नी ने चिंतित होकर कहा – अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पडेगी। हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा – रात को ठण्ड में यहाँ सोना तो न पडेगा। “


प्रेमचंद  की किसी और रचना पर चर्चा फिर कभी ….

हिन्दी के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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स्मृति शेष – कीर्ति चौधरी

आज हिन्दी साहित्य की ख्यात कवियित्री कीर्ति चौधरी की पुण्य तिथि है।  
 
कीर्ति चौधरी को साहित्य प्रेमियों ने जाना अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक से जिनके सात कवियों में एक मात्र कवियित्री रही कीर्ति चौधरी। तार सप्तक (1943) और दूसरा सप्तक (1951) की अगली कडी तीसरा सप्तक का प्रकाशन 1959 में तथा दूसरा व तीसरा संस्करण 1961 और 1967 में हुआ। तीसरा सप्तक की भूमिका में स्वयं अज्ञेय जी ने स्वीकारा है कि अब काव्य की नई प्रवृत्ति को बनाए रखना अनिवार्य हो गया है जिसका अर्थ यह है कि कीर्ति चौधरी जी साहित्य की नई काव्य प्रवृत्ति की माननीय कवियित्री है।  
 
इस दौर में समाज में व्यक्ति अपनो द्वारा ही शोषित हो रहा था। इस तरह की कई नई अनुभूतियों के बावजूद भी कीर्ति जी की रचनाएँ एकदम नए धरातल पर नही रही, कारण कि उन्हें साहित्यिक संस्कार अपनी माँ सुमित्रा कुमारी सिन्हा से मिले जो जानी – मानी कवियित्री और लेखिका है। पति ओंकारनाथ श्रीवास्तव है जो बीबीसी रेडियो की हिन्दी सेवा से जुङे रहे। इसीलिए सिद्धान्तों की प्रमुखता होते हुए भी भावात्मकता है। इसका कारण यही है कि परिवेश में जकङे होने से वह अपने आपको मुक्त न कर पाई अर्थात् रचनाओं में पूरी तरह से नवीनता नहीं है।  स्वयं कीर्ति जी ने यह माना है –
 
” नई कविता परस्पर विरोधी या विरोधी जान पडने वाले गुणो और विशेषताओं का अनोखा  संगम है।” 
 
उन्हें समाज भी ऐसा ही लगा. आधुनिक समाज  का चित्रण करते हुए कीर्ति जी ने यह माना है कि आधुनिक मानव टूटता जा रहा है। परिस्थितियों से मात्र समझौता करना ही मनुष्य के लिए इस समाज में बने रहने के लिए उचित है तभी तो –
 
” कि फर्क जल्दी समझ में नहीं आता
यह दुर्दिन है या सुदिन है “
 
हर्ष व रूदन में अंतर न कर पाने का कारण यही है –
 
” जैसे घृणा और प्यार के जो नियम है
उन्हें कोई नहीं जानता “
 
सभी का जीवन एक ही लीक पर गतिमान है और उसके लिए वह विवश भी है –
 
” यह कैसी लाचारी है
कि हमने अपनी सहजता भी
एकदम बिसारी है “
 
वक़्त शीर्षक की इस रचना में कीर्ति जी का कहना है कि जीवन एक ही लीक पर गतिमान है और इसके लिए वह विवश भी है। जीवन की भावशून्यता या यांत्रिकी जीवन शैली को इस पंक्ति से बताया  – 
 
” कि किसी को कडी बात कहो,  तो भी वह बुरा नहीं मानता ” 
 
सभी अपने ढ़ंग से जीने के लिए विवश है। अपनी अंतरात्मा की प्रेरणा पर वह कुछ कर नहीं पाते अपितु परिस्थितियॉँ ही उन्हें जीवन का एक मार्ग चुन कर देती है। प्रबल वर्जनाओं को झेलता हुआ भी आधुनिक मानव जीवित है और भविष्य के प्रति आशान्वित है। इस आशा का कारण आवाज़ कविता में इस तरह से है –
 
” सभी क्षुब्ध खिलाड़ी
असफलता का राज़ तुम्हे बतलाएगे।
अब कैसे कौन कहाँ अनजाने
गिर पडता जतलाएगे।
पथ – दर्शन जो चलने पर
उनको नहीं मिला दे जाएगे। “
 
कार्यक्रम कविता में एक क़दम और आगे बढ कर कहा कि क्षोभ से जीवन नीरस हो रहा है किन्तु –
 
” हम सब से सच मनो
कुछ नहीं होना।
ज़िन्दगी को वैसा न बनाओ
कि लगे बोझ ढोना 
………
थोडा हाथ पैर चलाओ
इन्ही पैरो की चाप से
निर्झर फूटेगे “
 
इसी युग में कविता में जीवन के लिए बोझ शब्द का प्रयोग होने लगा था। वैसे काव्यगत प्रवृतियों में भले ही परिवर्तन हो जाए किन्तु प्रेम, प्रकृति और सौन्दर्य सदैव ही कविता का विषय रहे। कालिदास से वर्तमान युग तक कुछ विषय कविता की परिधि से छूटते गए पर प्रेम की स्थिति संकेन्द्रीय रही। छायावादी शैली में कीर्ति चौधरी ने अपनी कविता अनुपस्थिति में प्रेमी की अनुपस्थिति का चित्रण इस प्रकार किया है –
 
” निर्बल होते मन पर सहसा याद गिरी
केवल एक तुम ही इस गृह में नहीं
आज के दिन ” 
 
पौराणिक घटनाओं का प्रयोग भी किया गया। एकलव्य की कथा को ठीक उसी रूप में ग्रहण करते हुए एक संक्षिप्त सी रचना एकलव्य शार्षक से रची जिसमें द्रोणाचार्य के प्रति एकलव्य के भावों को व्यक्त करती कवियित्री कहती है –
 
” सब था तुम्हारा 
अरे सब कुछ तुम्हारा
तुम्ही उससे अभिज्ञ रहे 
अथवा वह मेरा समर्पण अब झूठा था “
 
कला पक्ष में परम्परा और नूतनता दोनों का समावेश है। तत्सम शब्द, ऊर्दू और अंग्रेज़ी के शब्द तथा देशज शब्दों का भी प्रयोग हुआ है साथ ही शब्दों में नादात्मकता भी दिखाई देती है। शब्द संसार की एक झलक –
 
स्निग्ध, दीठ, बावले, नियामतें, पैड, दिशि-दिशि के अलावा हरे – भरे होना के लिए नया शब्द भी बनाया – हरियाघे …
 
काव्य सौष्ठव पर एक नज़र – प्रिय की प्रतीक्षा में रत इस समाज की बेङियों में जकङी रह कर उसे लक्ष्मण रेखा माना है। यह लाक्षणिक अभिव्यक्ति प्रस्तुत है –
 
” मृग तो नहीं था कहीं
बावले भरमते से इंगित पर चले गए। 
तुम भी नहीं थे –
बस केवल यह रेखा थी
जिस में बंध कर मैंनें दुःसह प्रतीक्षा की। ”  
 
कीर्ति जी की रचनाओं पर कुछ और चर्चा फिर कभी ….
 
हिन्दी जगत की गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !
 
 

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स्मृति शेष – हज़ारी प्रसाद द्विवेदी

इतिहास अपनी गति से आगे बढ़ता गया. पलीते वाली बंदूकों ने, कारतूसों ने, तोपों ने, बमों ने, बमवर्षक वायुयानों ने इतिहास को किस कीचड भरे घाट तक घसीटा है, यह  सबको मालूम है. नखधर मनुष्य अब एटम  बम पर भरोसा कर आगे की ओर चल पड़ा है. पर उसके नाख़ून अब भी बढ़ रहे हैं. अब भी प्रकृति मनुष्य को उसके भीतर वाले अस्त्र से वंचित नहीं कर रही है. अब भी वह याद दिला देती है कि तुम्हारे नाख़ून को भुलाया नहीं जा सकता. तुम वही लाख वर्ष पहले के  नखदंतावलम्बी  जीव हो – पशु के साथ एक ही सतह पर विचरने वाले और चरने वाले.

नाखून क्यों बढ़ते है – निबन्ध का अंश है यह जिसके लेखक है हज़ारी प्रसाद द्विेवेदी जिनकी आज पुण्यतिथि है।

यह निबन्ध कुछ शिक्षण संस्थानों ने कॉलेज के पाठ्यक्रम में भी रखा था। इसमें बढ़िया संदेश है कि नाखून बढ़ना हमारी पशु प्रवृत्ति का प्रतीक है और उसे काटते रहना हमारी मनुष्यता है। भाषा, विचार, प्रत्येक स्तर से द्विवेदी जी की विद्धता झलकती है। अन्य रचनाओं की भी यही स्थिति है ….

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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