स्मृति शेष – बालकवि बैरागी

आज बालकवि बैरागी जी का जन्मदिवस है….

बैरागी जी को हम मंच के लोकप्रिय कवि के रूप में जानते है, लेकिन यही उनका एकमात्र परिचय नहीं है। कवि होने के साथ गद्य भी लिखा, फिल्मी गीत भी लिखे,  राजभाषा हिन्दी की सेवा भी की, केवल अपने देश में ही नहीं विदेश में भी। राजनीति में भी सक्रिय रहे … रहे जिस स्थिति में भी, कविता नहीं छोङी….. आख़िर बचपन से साथ जो रहा….

मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले  में 10 फरवरी 1931 को जन्में बैरागी जी का बचपन राजस्थानी संस्कारों में परवान चढ़ा। निमाङी बोली से गहरे जुङे रहे। वास्तविक नाम नंदराम दास बैरागी ….. जो साहित्य से, कविता से अधिक संबंध नहीं रखते उन्हें यह भ्रम बना रहता है कि बैरागी जी बच्चों के लिए कविताएं लिखते है इसीसे बालकवि कहे जाते है…. वास्तव में बैरागी जी बचपन से ही कविताएं लिखने लगे और उनकी कविताएं पसन्द भी की जाती रही, विभिन्न काव्य प्रतियोगिताओं में भी स्थान पाती रही …. कविताएं तो ऊपर चढ़ती रही पर वे थे तो छोटे… इसी से कहलाए बाल कवि  

वे अपनी साहित्यिक प्रतिभा का पूरा आनन्द नहीं ले पाए। सच्चाई तो यही है कि लिखने के लिए काग़ज़ क़लम जुटाना भी कठिन रहा। आरंभिक जीवन बहुत संघर्षों में बीता। आर्थिक और सामाजिक संघर्षों से जूझते अपनी शिक्षा कायदे से पूरी नहीं कर पाए और धीरे-धीरे प्राइवेट पढ़ाई करते हुए एम ए तक की शिक्षा पूरी की…. पिता अपाहिज होने से कोई काम नहीं कर पाते थे, माँ ने श्रम किया और अभावों के बीच ज़िन्दगी चलती रही…. काम पाने के लिए अपना पैत़क निवास छोङ विभिन्न स्थानों पर भटकना भी पङा। आख़िर जिन्दगी की नैय्या पार हुई कविता के ही सहारे  

छुटपुट पत्र-पत्रिकाओ से निकल कर मंच पर पहुँचे और कवि सम्मेलनों में महत्वपूर्ण स्थान पाने लगे। उस दौर में बैरागी जी कवि संम्मेलनों में मंच की शान हुआ करते थे…. फिल्मों तक पहुँचे… लेकिन फिल्मों में एक ही गीत लोकप्रिय रहा – तू चंदा मैं चांदनी – फिल्म रेशमा और शेरा….. कुछ और गीत भी है जिन्हें लोकप्रियता कम ही मिली  

मंच के लोकप्रिय कवि और गीतकार ही बने और इसी लोकप्रियता ने उन्हें राजसभा पहुँचाया फिर चुनाव जीत कर लोकसभा भी पहुँचे लेकिन पार्टी की हार से विपक्ष के ही सांसद बने रहे…. संसद पहुँच कर कविता के साथ-साथ हिन्दी भाषा की सेवा की। राजभाषा हिन्दी के कार्यान्वयन के लिए उनकी विभिन्न गतिविधियाँ रही। विदेश मंत्रालय में भी काम किया विदेश में दूतावास में भी हिन्दी के काम में लगे रहे। अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलनों में सक्रिय योगदान दिया और विभिन्न सत्रों की अध्यक्षता की… और … 13.5.2018 को पंचतत्व में विलीन हो गए  

विभिन्न क्षेत्रों में योगदान रेखांकित हुआ पर लोकप्रियता कविता से ही मिली और हमारे बीच वर्षों तक कवि के रूप में जाने जाएंगे  ….. और गूँजती रहेगी उनकी रचनाएं संस्कृति से जुङी, देशभक्ति से जुङी  …..  एक देश भक्ति गीत अक्सर विविध भारती के वन्दनवार कार्यक्रम में सुनवाया जाता है –  यही है मेरा देश मेरा देश मेरा देश

हिन्दी के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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शुभ जन्मदिन – स्वदेश भारती जी

आज कवि और रूपाम्भरा पत्रिका के संपादक – स्वदेश भारती का जन्मदिन है।  

स्वदेश भारती जी की काव्य रचनाओं को अज्ञेय जी ने 1979 में प्रकाशित चौथा सप्तक में संपादित किया। 1959 में तीसरा सप्तक के प्रकाशन के बीस वर्षों बाद चौथा सप्तक का प्रकाशन हुआ। इन बीस वर्षों यानि साठ और सत्तर के दशक के प्रमुख सात कवियों को इसमें स्थान मिला जिनमें से एक है – स्वदेश भारती

आपने अपनी शिक्षा पूरी नहीं की जिसका कारण देश प्रेम की तरंगे है जो उन्हें विनोबा भावे के पास ले गई। साहित्यिक जीवन के ठोस होने का कारण रमेश बक्षी, सुनील गंगोपाध्याय जैसे मित्र है। आधुनिक कवियों में से एक होते हुए भी आप कविता को आत्मा के सौन्दर्य की सच्चाई मानते है साथ ही यह भी माना है कि कविता को अपने समय का दर्पण होना चाहिए। यह स्वयं स्वदेश भारती जी ने चौथा सप्तक के वक्तव्य में कहा। आगे कहते है –

” मैं आधुनिक हिन्दी कविता को नए धरातल पर, ताज़ा मौलिक परिवेश में सम्मान के साथ प्रस्थापित करना चाहता हूँ। यह मेरी प्रारंभिक यात्रा है। ”  

इसमें  स्वदेश भारती जी की विभिन्न प्रवृत्तियों की रचनाएं सम्मिलित है – आधुनिक जीवन की निराशा, भविष्य के प्रति आशा, प्रेम की अभिव्यक्ति और प्रकृति चित्रण। आज हम केवल एक ही रचना की चर्चा करेंगे – अँधेरा

यह आधुनिक जीवन का अँधेरा है। स्वदेश भारती जी को लगता है कि आधुनिक समाज में मनुष्य को प्रति क्षण मृत्यु का बोध होता है फिर भी वह जीवित है क्योंकि जीवित रहने के लिए विवश है। इस परिप्रेक्ष्य में निराश होना स्वाभाविक है –

” वर्तमान में व्याप्त
अँधेरा
मिटने वाला नहीं है
और मैं काले समय के चक्रव्यूह को
तोङ कर
युद्ध करने में असमर्थ हूँ  ”

मानव समाज में इतनी सामर्थ्य भी नहीं रही कि वे परिस्थितियों से जूझते हुए काले समय के इस चक्रव्यूह को तोङे और स्वयं को स्वतंत्र करें। इस स्वच्छन्द जीवन के उसने स्वप्न अवश्य देखें है जिससे उत्पन्न आशा की किरणों ने उसे प्रेरित किया –

” पलकों में खामोश रातों के
सपने जाग रहे है और
रोशनी की रक्तात्र ऊँगलियाँ
कितनी ही बार मेरे बंद दरवाज़े पर
दस्तक दे कर लौट गई है ”

किन्तु सभी असफल रहे। उसके कानों में निरन्तर यही स्वर गूँजता है – ”  उठो युद्ध करों ”

और उससे प्रेरित हो मनुष्य अपने अस्तित्व के आहत होने पर भी युद्ध के लिए तत्पर हो जाता है। किन्तु आज संघर्ष झेलना औसत मानव की नियति बन गई है और वही उससे अनुनय करती है –

” … सुनो
युद्ध पर मत जाओ  ”

यहाँ नियति का भीगी पलकों से अनुनय करना इस बात का साक्षी है कि संभव है युद्ध से जीवन और भी अधिक उलझ जाए। यह सत्य भी है कि आधुनिक परिवेश में यह स्वच्छन्दता नहीं रह गई कि अपनी स्वतंत्रता हेतु कुछ कह सकें। आगे कविश्री ने और भी सुन्दर अभिव्यक्ति दी है कि यदि उसे युद्ध करना भी है तो –

” कौन सा लक्ष्य बेधने के लिए ”

अभिप्राय कि वह किस-किस से युद्ध करेगा क्योंकि किसी एक विशेष से संघर्ष नहीं अपितु अशान्ति तो चारों ओर व्याप्त है। इस अशान्ति का परिवर्तन शान्ति में करने के लिए मुख्य युद्ध किससे हो यह –

” न जान पाने की असमर्थता ने
मेरी आस्थाओं को
मौन की थपकी देकर सुला दिया है  ”

इसी कारण आज वह चुप है। इस चुप्पी का कारण कोई नहीं जानता, सभी अपने अनुसार ही इसका कारण बताते है – मित्र गर्विला कहते है, आत्मीय सनकी कहते है और समाज उसकी इस स्थिति पर व्यंग्य करता है जिससे उसे लगता है कि वह परास्त हो गया है –

”  सभी तरफ से सभी युद्धों से
बिना युद्ध किए ही  ”

इस निराशा से और साथ ही मशीनी दिनचर्या से धीरे-धीरे उसके मन में घृणा का बीज अंकुरित हो रहा है। उसे यूँ लग रहा है कि ” घर ” जो जीवन का आश्रय स्थल है वह भी उसे निराश ही कर रहा है तभी तो वह कहता है –

” आश्रय तो कहीं भी मिल सकता है
इतना बङा आकाश है
और धरती का विस्तार है
अब मैं अपने अँधेरे कमरे का
दुर्भाग्य नहीं सह सकता ”

अर्थात् जीवन में शान्ति का इतना अभाव हो गया है कि वह उसे अपने ही घर में नहीं मिल सकती – कारण ढ़ेर सारी समस्याएं है। इसी से मानव इतना एकाकी हो गया है कि वह आत्मीय के मध्य रहे अथवा निर्बन्ध कोई अन्तर नहीं।  …

यह थी एक रचना चौथा सप्तक से … कुछ और रचनाओं पर कुछ और चर्चा फिर कभी …

स्वदेश भारती जी को जन्मदिन की शुभकामनाएं !

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सुल्ला पार्क – जम्मू

जम्मू, कटरा में सुल्ला पार्क सैर के लिए एक अच्छी जगह है –

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पार्क में एक मंदिर भी है

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दो कुण्ड भी है जिसमे मछलियां है,  विभिन्न तरह के पेड़ो-पौधों से सजा हरा-भरा पार्क है –

 

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सुल्ला पार्क की सैर के बाद हम जम्मू से लौट आए।

 

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बाबा पियाई की जलधारा – जम्मू

जम्मू, कटरा में पहाड़ से गिरती जलधारा जिसे कहते है – बाबा पियाई की जलधारा

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सैर के लिए एक अच्छी जगह है.

कुछ देर यहां अच्छा समय बिताने के बाद हम गए सुल्ला पार्क जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में

 

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अगहर जित्तो मंदिर

जम्मू , कटरा में माँ वैष्णो देवी का परम भक्त – अगहर जित्तो

रोज़ पहाड़ी पर चढ़ कर जाता और माँ के दर्शन करता। उसी के अथक प्रयासों से सूखे गाँव में पानी मिलने लगा।

पानी की इस सौगात और माँ की भक्ति से उनकी स्मृति हमेशा बनाए रखने के लिए उनका मंदिर बनाया गया जिसमे माँ वैष्णो देवी की मूर्ति के साथ अगहर जित्तो की भी मूर्ति है –

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यहां नमन करने के बाद हम गए बाबा पियाई जलधारा देखने जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …..

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नौ देवी मंदिर – कटरा

जम्मू, कटरा में वैष्णौ देवी के दर्शन के बाद हमने कटरा में अन्य स्थल देखे। सबसे पहले देखा नौ देवी मंदिर –

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गुफा को काट कर बनाया गया है. नीचे सीढिया उतर कर जाना है. बाई ओर चट्टान काट कर आकार में बना हुए है शिव, गणेश और विश्राम की मुद्रा में हनुमान

कुछ और सीढिया उतर कर सामने है गुफा, प्रवेश द्वार..

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आगे बढ़ कर बैठे-बैठे चलते हुए गुफा के भीतर जाने पर नौ देवी के दर्शन होते है ,

एक साथ माँ के नौ रूप एक चक्राकार में है

यहां से निकल कर हम गए अगहर जित्तो जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

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स्मृति शेष – जयशंकर प्रसाद

आज ख्यात हिंदी साहित्यकार जयशंकर प्रसाद की पुण्यतिथि है। आज हम चर्चा करते है प्रसाद जी के महाकाव्य कामायनी की।

यह महाकाव्य एक ऐसी कथा पर आधारित है जो सभी संस्कृतियों में है – प्रथम मानव की कहानी जिसे मनु श्रृद्धा की कहानी कहे, आदम हव्वा की या एडम ईव की। मूल कथा वही है कि प्रलय से चारों ओर पानी के अतिरिक्त कुछ नहीं था। केवल एक व्यक्ति बचा था। आगे एक महिला से भेंट हुई और बना परिवार, इस तरह आरंभ हुई सृष्टि। इन्हीं के जीवन के उतार-चढ़ाव से जीवन को जगत को समझा जाता है।

प्रसाद जी ने पौराणिक कथा ली और जीवन दर्शन बताया अद्वैतवाद से जो शैव दर्शन पर आधारित है। जब भी कामायनी पर चर्चा हुई, इन दो मुद्दों पर ही चर्चा हुई इन के अतिरिक्त इस महाकाव्य का तीसरा आधार भी महत्वपूर्ण है – यह है मनोवैज्ञानिक आधार जिस पर चर्चा बहुत ही कम हुई। आज हम इस महाकाव्य के केवल मनोवैज्ञानिक आधार की चर्चा करेंगें।

इस पौराणिक कथा को प्रसाद जी ने 15 सर्गों में कहा है। हर सर्ग का एक शीर्षक है। इन शीर्षकों का क्रम ही मनोवैज्ञानिक आधार है। आरंभ प्रलय से है। चारों ओर केवल पानी है। केवल मनु जीवित है और चिंतित है जीवन के लिए। इस पहले सर्ग का शीर्षक है – चिंता .. यहाँ स्पष्ट है कि जब अभाव होता है तभी चिंता होती है, जिस वस्तु की कमी है उसी की हम चिंता करते है तभी तो प्रसाद जी ने चिंता को अभाव की बालिका कहा –

“हे अभाव की चपल बालिके, री ललाट की खलखेला
हरी-भरी-सी दौड़-धूप, ओ जल-माया की चल-रेखा।”

बहुत चिंतन-मनन से आशा की एक किरण दिखाई देती है। दूसरे सर्ग का शीर्षक है – आशा … जिसकी आरंभिक पंक्तियाँ है –

“ऊषा सुनहले तीर बरसती, जयलक्ष्मी-सी उदित हुई,
उधर पराजित काल रात्रि भी, जल में अतंर्निहित हुई।”

सुबह हुई और आशान्वित हो मनु जीवन का आधार खोजने लगे, तभी भेंट हुई श्रृद्धा से। तीसरा सर्ग है – श्रृद्धा .. श्रृद्धा मानव मन की एक ऐसी भावना है जिसमें प्रेम, भक्ति और विश्वास है। स्वाभाविक है कि अकेले भटकते मनु को जब सामने एक महिला दिखाई दी तब मन में प्रेम और भक्ति की भावना उमङ आती और साथ ही जीवन के लिए विश्वास जगता है। श्रृद्धा ने भी मनु को प्रोत्साहन दिया, कहा –

“बनो संसृति के मूल रहस्य, तुम्हीं से फैलेगी वह बेल,
विश्व-भर सौरभ से भर जाय, सुमन के खेलो सुंदर खेल।”

श्रृद्धा का सम्बल पा कर मनु के मन में प्रेम की भावना उग्र हो उठती है। अगला सर्ग है – काम .. मनु काम भावना के वशीभूत होने लगते है –

“मधुमय वसंत जीवन-वन के, बह अंतरिक्ष की लहरों में,
कब आये थे तुम चुपके से रजनी के पिछले पहरों में?”

काम भावना के वश में मनु के भीतर वासना का जगना स्वाभाविक है। अगला सर्ग – वासना .. वासना वास्तव में इच्छा है। मनु को जीवन के प्रति इच्छा जागृत होती है –

“कौन हो तुम खींचते यों, मुझे अपनी ओर,
ओर ललचाते स्वयं, हटते उधर की ओर”

यहाँ सामान्य जीवन में क्रम से स्वाभाविक रूप में आने वाली भावनाएं दिखाई देती है, इसी क्रम में श्रृद्धा के लिए लज्जा की भावना। सर्ग –  लज्जा में कवि ने बहुत कोमल भावनाओं का चित्रण किया है –

“मैं रति की प्रतिकृति लज्जा हूँ, मैं शालीनता सिखाती हूँ,
मतवाली सुंदरता पग में, नूपुर सी लिपट मनाती हूँ,”

अब मनु जीवन के लिए व्यावहारिक हो उठते है और कर्म की ओर बढ़ते है। अगला सर्ग – कर्म .. जिसमें मनु यज्ञ भी करते है –

“कर्मसूत्र-संकेत सदृश थी, सोम लता तब मनु को,
चढ़ी शिज़नी सी, खींचा फिर, उसने जीवन धनु को।”

दोनों का जीवन व्यावहारिक रूप लेने लगता है। माँ बनने वाली श्रृद्धा आगन्तुक के स्वागत की तैयारी में हमेशा मगन रहती है। यहां मनु को लगता है कि अब श्रृद्धा अपना पूरा ध्यान उनकी ओर नहीं दे पा रही और मन में उठने लगती है ईर्ष्या। यह मानव मन की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है कि जिस पर पूरा अधिकार है वहां अधिकार का बंटना सहन नहीं। इसे प्रसाद जी ने चित्रित किया अगले सर्ग ईर्ष्या में –

“बीजों का संग्रह और इधर, चलती है तकली भरी गीत,
सब कुछ लेकर बैठी है वह, मेरा अस्तित्व हुआ अतीत”

और मनु श्रृद्धा को छोङ जाते है। आगे उन्हे मिलती है – ईङा .. सर्ग है – ईङा … यह पंक्तियाँ देखिए-

वह बोली-” मैं हूँ इड़ा, कहो तुम कौन यहाँ पर रहे डोल”
नासिका नुकीली के पतले पुट, फरक रहे कर स्मित अमोल
“मनु मेरा नाम सुनो बाले, मैं विश्व पथिक स रहा क्लेश।”
स्वागत पर देख रहे हो तुम यह उजड़ा सारस्वत प्रदेश
भौति हलचल से यह, चंचल हो उठा देश ही था मेरा
इसमें अब तक हूँ पड़ी इस आशा से आये दिन मेरा।”

ईङा चाहती है कि मनु उसका उजङा प्रदेश बसा दे। प्रसाद जी ने ईङा को बुद्धि का प्रतीक माना है। श्रृद्धा हृदय का और ईङा मस्तिष्क का प्रतीक है। मानव मन यानि मनु हृदय से चोट खाकर अपना मन किसी काम में लगाना चाहते है और ऐसे में मस्तिष्क से ही काम लिया जाता है। मनु ईङा के साथ मिल कर सारस्वत प्रदेश बसाते है और प्रजापति बन कर असीम अधिकार चाहते है जिससे प्रजा विरोध कर उठती है। प्रजा नहीं चाहती उनकी रानी ईङा पर मनु का अधिकार हो। परिणाम मनु और प्रजा के बीच संघर्ष होता है। यह सब श्रृद्धा स्वप्न में देखती है। यहां मानवीय चेतना को बखूबी उभारा है प्रसाद जी ने। हृदय का प्रतीक श्रृद्धा मनु की हर गति से परिचित होती जाती है। कहते है कि हृदय को सब आभास होता है। कवि ने भी सर्ग का शार्षक स्वप्न ही दिया –

“द्वार बंद कर दो इनको तो, अब न यहाँ आने देना,
प्रकृति आज उत्पाद कर रही, मुझको बस सोने देना”
कह कर यों मनु प्रकट क्रोध में, किंतु डरे-से थे मन में,
शयन-कक्ष में चले सोचते, जीवन का लेना-देना।,
श्रद्धा काँप उठी सपने में, सहसा उसकी आँख खुली,
यह क्या देखा मैंने? कैसे, वह इतना हो गया छली?

आगे संघर्ष सर्ग में मनु का दंभ और प्रजा से संधर्ष का चित्रण है –

“आह प्रजापति यह, न हुआ है, कभी न होगा,
निर्वाधित अधिकार,आज तक किसने भोगा ? ”

संधर्ष के बाद मनु के मन में विरक्ति हो जाती है जो मन की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है जिसका चित्रण निर्वेद सर्ग में है –

“मनु चुप सब अभिशाप पिये- सोच रहे थे,
“जीवन सुख है?  ना, यह विकट पहेली है,
भाग अरे मनु इंद्रजाल से, कितनी व्यथा न झेली है?

और जब संसार से विरक्ति होती है तब मानव ईश्वर के दर्शन को लालायित हो उठत है। दर्शन सर्ग में मनु की भी यही स्थिति है –

“देखा मनु ने नर्त्तित नटेश, हत चेत पुकार उठे विशेष-
“यह क्या श्रद्धे बस तू ले चल, उन चरणों तक, दे निज संबल”

यहां मनु को श्रृद्धा जीवन का रहस्य बताती है। मनोविज्ञान भी यही कहता है जब मन में प्रेम, विश्वास और भक्ति की भावना हो तभी ईश्वर को, जीवन के रहस्य को जान पाते है, इन्हीं तीनों भावों का एकरूप है – श्रृद्धा … अगले सर्ग – रहस्य की ये पंक्तियां देखिए –

“त्रिदिक विश्व, आलोक बिंदु भी, तीन दिखाई पडे अलग व,
त्रिभुवन के प्रतिनिधि थे मानो वे, अनमिल थे किंतु सजग थे।
मनु ने पूछा, “कौन नये, ग्रह ये हैं श्रद्धे मुझे बताओ?
मैं किस लोक बीच पहुँचा, इस इंद्रजाल से मुझे बचाओ”
इस त्रिकोण के मध्य बिंदु, तुम शक्ति विपुल क्षमता वाले ये,
एक-एक को स्थिर हो देखो, इच्छा ज्ञान, क्रिया वाले ये।”

जी हाँ, प्रसाद जी ने यही रहस्य बताया है जीवन के आनन्द का – इच्छा, ज्ञान और क्रिया .. इन तीनों को अपने जीवन में एक के बाद एक स्थिर करों और जीवन का आनन्द लो। अंतिम सर्ग है – आनन्द … मनोविज्ञान भी यही कहता है कि इच्छा, ज्ञान और क्रिया का समन्वय ही चेतना है और इसीसे ही मिलता है जीवन का लक्ष्य .. इस महाकाव्य के अंत में प्रसाद जी ने चेतना से आनन्द प्राप्ति की बात कही, समापन पद प्रस्तुत है –

“समरस थे जड‌़ या चेतन, सुन्दर साकार बना था,
चेतनता एक विलसती, आनंद अखंड घना था।”

यहां क्रम से सभी सर्गों के शीर्षक देखिए जिसमें जीवन के उत्थान के मानसिक स्तर का क्रम नज़र आएगा – चिंता, आशा,  श्रृद्धा,  काम,  वासना,  लज्जा,  कर्म,  ईर्ष्या,  ईङा,  स्वप्न,  संघर्ष,  निर्वेद,  दर्शन,  रहस्य,  आनंद

पौराणिक आख्यान, जीवन दर्शन, मनोवैज्ञानिक आधार के अलावा प्रसाद जी के साहित्य का एक और महत्वपूर्ण आधार है – भारत का गौरवशाली इतिहास … जिस पर चर्चा फिर कभी

हिन्दी जगत के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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