कायाकल्पनीय कल्पना के चितेरे – प्रेमचंद

आज प्रेमचन्द का जन्म दिवस है।

कथा सम्राट, कलम का सिपाही जैसे अलंकरणों से नवाज़े गए प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के पहले ऐसे लेखक माने जाते है जिन्होनें समाज के यथार्थ को देखा और अपनी कलम से आदर्श स्थापित किए। उनकी रचनाएं पढ़ कर लगता कि वास्तव में ये पात्र समाज में है और ये घटनाएं कहीं न कहीं घटित हो रही है जो सच भी है। फिर भी  …. प्रेमचंद है तो एक इंसान ही, व्यक्ति में कमज़ोरियाँ होती ही है और यह कमज़ोरियाँ साहित्य में झलकी भी, तो क्यों न हम आज प्रेमचंद के साहित्य के उन चंद कमज़ोर अंशों को रेखांकित करें।

सबसे पहले चर्चा उपन्यास प्रेमाश्रम की जिसका प्रकाशन 1921 में हुआ। यह हिन्दी साहित्य का पहला ऐसा उपन्यास है जिसमें राजनीतिक पृष्ठभूमि भी है। मुख्य पात्र गाँव से निकल कर राजनीति में प्रवेश करते है। अपने इसी विषय से इस उपन्यास को भी बहुत पसन्द किया गया। विषय निर्वाह करते-करते विषय विस्तार हो गया जो खटक गया।  इसकी भूमिका में खुद प्रेमचंद ने अपनी दो कमज़ोरियों को स्वीकार किया – पहली – यही यानि इसका कलेवर बहुत बङा हो गया। दूसरी बात पात्रों के नामों की एकरूपता पाठक को उलझा देती है। एक नज़र –  लाला जटाशंकर, उन का छोटा भाई प्रभाशंकर  ….. लाला जटाशंकर के दो पुत्र – प्रेमशंकर और ज्ञानशंकर। ज्ञानशंकर का पुत्र मायाशंकर ….. प्रभाशंकर के बेटे – दयाशंकर, तेजशंकर, पद्मशंकर, उदयशंकर  … एक-दो नाम उन पात्रों के भी जो इस परिवार के नहीं है जैसे गिरिजाशंकर

ख़ैर … यह बहुत खटकने वाली बात नहीं है लेकिन 1926 में प्रकाशित उपन्यास कायाकल्प में कई बातें न सिर्फ खटकती है, उपहास भी बन जाता है।  इस पर चर्चा से पहले हम यह जान ले कि प्रेमचंद अधिक शिक्षित नहीं थे, इंटर तक पढ़े थे। साहित्य रचने के लिए अध्ययन नहीं करते थे बल्कि समाज के पात्र और घटनाओं की स्थिति बताते थे और एक आदर्श की कल्पना करते थे। यह दौर स्वतंत्रता के पहले का था। इस समय यह माना जाता था कि हमारी प्रतिभाएं ब्रिटिश राज में दब सी गई है आज़ादी के बाद जिन्हें खुल कर मौक़ा मिलेगा और हमारा देश विकास के पथ पर बहुत आगे निकलेगा। इसी को चित्रित करने में प्रेमचंद ने विज्ञान के क्षेत्र में कई ग़लतियाँ कर दी। सच कहे तो विज्ञान के क्षेत्र को प्रेमचंद ठीक से समझ नहीं पाए। आयुर्वेद से लेकर कई वैज्ञानिक बातों को इस तरह प्रस्तुत किया कि कल्पना से परे वह हास्यास्पद बन गई।

पति-पत्नी के प्यार भरे पलों का चित्रण करते हुए यह बताया कि फूल महक रहे है,, दोनों झूला झूल रहे है, उनकी उमर का न कोई अंदाज़ा है और न ही उन्हें अपने जीवन की कोई चिंता। प्रेमचन्द का यह मानना कि मृत्यु को भी विज्ञान द्वारा वश में किया जा सकता है, जब इच्छा हो तभी जीवन से विदा ली जा सकती है यानि इच्छा मृत्यु  …

क्या प्रेमचन्द का यह लेखन संभव है ?

एक और चित्र –  प्रेमचंद लिखते है –
सुधाबिन्दु की कुछ बूँदें लेकर रानी जी युवा लगने लगती है.
सुधा बिन्दु को अमृत के समान बताया है। यह कीमती है और रानी जी इसे एक शीशी में तिजोरी में रखती है। जब थकान, बुढ़ापा महसूस करने लगती तब कुछ बूँदे ले लेती है जिससे शरीर में उत्तेजना आती है, चेहरे पर कान्ति आती है जिससे वह युवा हो जाती है।  …

क्या प्रेमचन्द का यह लेखन संभव है ?

लगता है प्रंमचंद ने विज्ञान का आधार हमारे पुराणों से ही लिया है और उन्हें लगता है कि इसके अलावा विश्व मे विज्ञान का और कोई आधार नहीं।  उपन्यास में बताया गया कि पहाङों पर वेधशालाएं है और उनमें शोध चल रही है और वायुयान बनने की भी जानकारी दी। कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत है –

राजकुमार – सहसा मैनें एक वृद्ध पुरूष को सामने की गुफा से निकल कर पर्वत शिखर की ओर जाते देखा। जिन शिलाओं पर कल्पना के भी पाँव डगमगा जाए उन पर इतनी सुगमता से चले जाते थे

महात्मा पहाङ पर  खङाऊ पहन कर इस तरह से चढ़ रहे है जैसे हम आराम से ज़मीन पर चलते है। राजकुमार अपनी महात्मा से हुई बातचीत बता रहे है –

महात्मा – मैं योगी नही प्रयोगी हूँ। आपने द्वारविन का नाम सुना होगा ?  पूर्व जन्म में मेरा ही नाम द्वारविन था।

मैंने ( राजकुमार  ने ) विस्मित होकर कहा – आप ही डारविन थे ?

महात्मा – हाँ, उन दिनों मैं प्राणीशास्त्र का प्रेमी था। अब प्राणशास्त्र का खोजी हूँ

मैं फुर्ती से उठ बैठा और महात्मा जी के चरणों पर झुकने लगा किन्तु उन्होने मुझे रोककर कहा – तुम मुझे शिलाओं पर देख कर विस्मित हो गए पर वह समय आ रहा है जब आने वाली जाति जल, स्थल और आकाश में समान रीति से चल सकेगी। पृथ्वी का पिण्ड उन्हें छोटा मालूम होगा। वह पृथ्वी से अन्य पिण्डों में उतनी ही सुगमता से आ-जा सकेगें जैसे एक देश से दूसरे देश में।

महात्मा – मैने कितनी ही नई-नई बातें खोज निकाली, पर उनका गौरव आज दूसरों को प्राप्त है। लेकिन इसकी क्या चिन्ता !  मैं विज्ञान का उपासक हूँ, अपनी ख्याति और गौरव का नहीं  ……. मेरा यान आकाश में जितनी ऊँचाई तक पहुँच सकता है, उसकी योरोप वाले कल्पना भी नहीं कर सकते। मुझे विश्वास है कि शीघ्र ही मेरी चन्द्रलोक की यात्रा सफल होगी। योरोप के वैज्ञानिकों की तैयारियाँ देख-देखकर मुझे हंसी आती है। जब तक हमको वहाँ की प्राकृतिक स्थिति का त्रान न हो हमारी यात्रा सफल नहीं हो सकती। सबसे पहले विचारधारा को वहाँ ले जाना होगा।

इससे स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद को लगता था कि पौराणिक ग्रन्थों द्वारा ही हम देवताओं की भूमि, चाँद सितारों की प्राकृतिक अवस्था को जान पाएंगें और देवताओं के जीवन -दर्शन का अध्ययन करने के बाद ही चन्द्रलोक में पहुँचना उचित रहेगा।

प्रेमचंद के अन्य उपन्यासों की तरह कायाकल्प उपन्यास को भी सराहा गया। इस उपन्यास की प्रशंसा में कहा जाता है कि आदर्शों की स्थापना करते-करते प्रेमचंद ने इस उपन्यास में गाँव का कायाकल्प ही कर दिया। इस तारीफ़ के नीचे ये कमज़ोरियाँ दब सी गई।

सादर नमन !

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कबीर ……… नमन !

आज ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है, कबीर का जन्म दिवस है…

निर्धन परिवेश में जुलाहा परिवार में पले-बङे कबीर का जन्म चौदहवी शताब्दी में कब हुआ कोई नही जानता। उनके द्वारा कही गई बातों से शोध कर्ताओं द्वारा अंदाज़ा लगाया गया जाता रहा

हिन्दी साहित्य के अध्ययन में सबसे पहले हम कबीर से ही परिचित होते है. यूं तो साहित्य में कबीर का स्थान भक्ति काल में है और इससे पहले है वीरगाथा काल लेकिन ग्रंथों की सुलभ उपलब्धता के अनुसार कबीर का नाम ऊपर है.

कबीर, कबीरदास या संत कबीर, हिन्दी साहित्य में निर्गुण भक्ति काल के प्रमुख कवि माने गए है यानि उन्होंने निर्गुण ईश्वर की भक्ति की. ईश्वर निर्गुण, निराकार है जिससे उसका किसी धर्म से सम्बन्ध नही है. कबीर का मानना है कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त है. हर व्यक्ति के मन में विराजता है इसीसे सभी समान है और समाज में कोई भेद-भाव नही…

संत कबीर को शत नमन !

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कोलकता – स्वाद में 

कोल्कता के पारम्परिक व्यंजन
आलू  पोश्तो –
20200316_172013
शुक्तो  –  मिक्स्ड सब्ज़ी जिसमे हमे कच्चा केला, सूरन, करेला, बैगन का स्वाद आया –
20200316_171951
इसके आलावा आलू भाजा, बैगुन भाजा
संदेश , लौंग लतिका, खीर क़दम
20200317_120648
संकरी गलियों में विभिन्न दुकानों पर कोलकता के पान मिले
सिर्फ रोशगुल्ला ही नही विभिन्न लज़ीज़ व्यंजनों के स्वाद, परंपरा और इतिहास की गवाही देखने के बाद हम हैदराबाद लौट आए

 

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