स्मृति शेष – कीर्ति चौधरी

आज हिन्दी साहित्य की ख्यात कवियित्री कीर्ति चौधरी की पुण्य तिथि है।  
 
कीर्ति चौधरी को साहित्य प्रेमियों ने जाना अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक से जिनके सात कवियों में एक मात्र कवियित्री रही कीर्ति चौधरी। तार सप्तक (1943) और दूसरा सप्तक (1951) की अगली कडी तीसरा सप्तक का प्रकाशन 1959 में तथा दूसरा व तीसरा संस्करण 1961 और 1967 में हुआ। तीसरा सप्तक की भूमिका में स्वयं अज्ञेय जी ने स्वीकारा है कि अब काव्य की नई प्रवृत्ति को बनाए रखना अनिवार्य हो गया है जिसका अर्थ यह है कि कीर्ति चौधरी जी साहित्य की नई काव्य प्रवृत्ति की माननीय कवियित्री है।  
 
इस दौर में समाज में व्यक्ति अपनो द्वारा ही शोषित हो रहा था। इस तरह की कई नई अनुभूतियों के बावजूद भी कीर्ति जी की रचनाएँ एकदम नए धरातल पर नही रही, कारण कि उन्हें साहित्यिक संस्कार अपनी माँ सुमित्रा कुमारी सिन्हा से मिले जो जानी – मानी कवियित्री और लेखिका है। पति ओंकारनाथ श्रीवास्तव है जो बीबीसी रेडियो की हिन्दी सेवा से जुङे रहे। इसीलिए सिद्धान्तों की प्रमुखता होते हुए भी भावात्मकता है। इसका कारण यही है कि परिवेश में जकङे होने से वह अपने आपको मुक्त न कर पाई अर्थात् रचनाओं में पूरी तरह से नवीनता नहीं है।  स्वयं कीर्ति जी ने यह माना है –
 
” नई कविता परस्पर विरोधी या विरोधी जान पडने वाले गुणो और विशेषताओं का अनोखा  संगम है।” 
 
उन्हें समाज भी ऐसा ही लगा. आधुनिक समाज  का चित्रण करते हुए कीर्ति जी ने यह माना है कि आधुनिक मानव टूटता जा रहा है। परिस्थितियों से मात्र समझौता करना ही मनुष्य के लिए इस समाज में बने रहने के लिए उचित है तभी तो –
 
” कि फर्क जल्दी समझ में नहीं आता
यह दुर्दिन है या सुदिन है “
 
हर्ष व रूदन में अंतर न कर पाने का कारण यही है –
 
” जैसे घृणा और प्यार के जो नियम है
उन्हें कोई नहीं जानता “
 
सभी का जीवन एक ही लीक पर गतिमान है और उसके लिए वह विवश भी है –
 
” यह कैसी लाचारी है
कि हमने अपनी सहजता भी
एकदम बिसारी है “
 
वक़्त शीर्षक की इस रचना में कीर्ति जी का कहना है कि जीवन एक ही लीक पर गतिमान है और इसके लिए वह विवश भी है। जीवन की भावशून्यता या यांत्रिकी जीवन शैली को इस पंक्ति से बताया  – 
 
” कि किसी को कडी बात कहो,  तो भी वह बुरा नहीं मानता ” 
 
सभी अपने ढ़ंग से जीने के लिए विवश है। अपनी अंतरात्मा की प्रेरणा पर वह कुछ कर नहीं पाते अपितु परिस्थितियॉँ ही उन्हें जीवन का एक मार्ग चुन कर देती है। प्रबल वर्जनाओं को झेलता हुआ भी आधुनिक मानव जीवित है और भविष्य के प्रति आशान्वित है। इस आशा का कारण आवाज़ कविता में इस तरह से है –
 
” सभी क्षुब्ध खिलाड़ी
असफलता का राज़ तुम्हे बतलाएगे।
अब कैसे कौन कहाँ अनजाने
गिर पडता जतलाएगे।
पथ – दर्शन जो चलने पर
उनको नहीं मिला दे जाएगे। “
 
कार्यक्रम कविता में एक क़दम और आगे बढ कर कहा कि क्षोभ से जीवन नीरस हो रहा है किन्तु –
 
” हम सब से सच मनो
कुछ नहीं होना।
ज़िन्दगी को वैसा न बनाओ
कि लगे बोझ ढोना 
………
थोडा हाथ पैर चलाओ
इन्ही पैरो की चाप से
निर्झर फूटेगे “
 
इसी युग में कविता में जीवन के लिए बोझ शब्द का प्रयोग होने लगा था। वैसे काव्यगत प्रवृतियों में भले ही परिवर्तन हो जाए किन्तु प्रेम, प्रकृति और सौन्दर्य सदैव ही कविता का विषय रहे। कालिदास से वर्तमान युग तक कुछ विषय कविता की परिधि से छूटते गए पर प्रेम की स्थिति संकेन्द्रीय रही। छायावादी शैली में कीर्ति चौधरी ने अपनी कविता अनुपस्थिति में प्रेमी की अनुपस्थिति का चित्रण इस प्रकार किया है –
 
” निर्बल होते मन पर सहसा याद गिरी
केवल एक तुम ही इस गृह में नहीं
आज के दिन ” 
 
पौराणिक घटनाओं का प्रयोग भी किया गया। एकलव्य की कथा को ठीक उसी रूप में ग्रहण करते हुए एक संक्षिप्त सी रचना एकलव्य शार्षक से रची जिसमें द्रोणाचार्य के प्रति एकलव्य के भावों को व्यक्त करती कवियित्री कहती है –
 
” सब था तुम्हारा 
अरे सब कुछ तुम्हारा
तुम्ही उससे अभिज्ञ रहे 
अथवा वह मेरा समर्पण अब झूठा था “
 
कला पक्ष में परम्परा और नूतनता दोनों का समावेश है। तत्सम शब्द, ऊर्दू और अंग्रेज़ी के शब्द तथा देशज शब्दों का भी प्रयोग हुआ है साथ ही शब्दों में नादात्मकता भी दिखाई देती है। शब्द संसार की एक झलक –
 
स्निग्ध, दीठ, बावले, नियामतें, पैड, दिशि-दिशि के अलावा हरे – भरे होना के लिए नया शब्द भी बनाया – हरियाघे …
 
काव्य सौष्ठव पर एक नज़र – प्रिय की प्रतीक्षा में रत इस समाज की बेङियों में जकङी रह कर उसे लक्ष्मण रेखा माना है। यह लाक्षणिक अभिव्यक्ति प्रस्तुत है –
 
” मृग तो नहीं था कहीं
बावले भरमते से इंगित पर चले गए। 
तुम भी नहीं थे –
बस केवल यह रेखा थी
जिस में बंध कर मैंनें दुःसह प्रतीक्षा की। ”  
 
कीर्ति जी की रचनाओं पर कुछ और चर्चा फिर कभी ….
 
हिन्दी जगत की गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !
 
 

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स्मृति शेष – हज़ारी प्रसाद द्विवेदी

इतिहास अपनी गति से आगे बढ़ता गया. पलीते वाली बंदूकों ने, कारतूसों ने, तोपों ने, बमों ने, बमवर्षक वायुयानों ने इतिहास को किस कीचड भरे घाट तक घसीटा है, यह  सबको मालूम है. नखधर मनुष्य अब एटम  बम पर भरोसा कर आगे की ओर चल पड़ा है. पर उसके नाख़ून अब भी बढ़ रहे हैं. अब भी प्रकृति मनुष्य को उसके भीतर वाले अस्त्र से वंचित नहीं कर रही है. अब भी वह याद दिला देती है कि तुम्हारे नाख़ून को भुलाया नहीं जा सकता. तुम वही लाख वर्ष पहले के  नखदंतावलम्बी  जीव हो – पशु के साथ एक ही सतह पर विचरने वाले और चरने वाले.

नाखून क्यों बढ़ते है – निबन्ध का अंश है यह जिसके लेखक है हज़ारी प्रसाद द्विेवेदी जिनकी आज पुण्यतिथि है।

यह निबन्ध कुछ शिक्षण संस्थानों ने कॉलेज के पाठ्यक्रम में भी रखा था। इसमें बढ़िया संदेश है कि नाखून बढ़ना हमारी पशु प्रवृत्ति का प्रतीक है और उसे काटते रहना हमारी मनुष्यता है। भाषा, विचार, प्रत्येक स्तर से द्विवेदी जी की विद्धता झलकती है। अन्य रचनाओं की भी यही स्थिति है ….

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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अज्ञेय – स्मृति शेष

and as a literary force, at any rate, Nirala is already dead …..

सुविधा के लिए हम इस बात को हिन्दी में बता रहे है –

निराला की साहित्यिक क्षमता कमज़ोर हो चुकी है …..

यह बात अज्ञेय जी ने कही …… गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के शान्ति निकेतन से प्रकाशित पत्रिका – विश्व भारती क्वाटर्ली  – के वर्ष 1937-38 के एक अंक में छपे लेख द्वारा

पूरी बात इस तरह है – हिंदी काव्य में 1915 के आसपास कुछ अलग तरह की कविताएं लिखी जाने लगी थी जिनमें व्यक्ति की सूक्ष्म भावनाओं को स्थान मिला था। प्रेम, सौन्दर्य और प्रकृति की चर्चा कविता में होने लगी थी, यह सब पहली बार हुआ था कि कवि की आत्मानुभूति कविता में छलकने लगी थी। इस तरह कवि अपनी मानवीय भावनाओं की छाया प्रकृति में देखने लगे थे जिससे इस दौर का काव्य छायावाद कहलाया, जिसमें आदर्श भी स्थापित किए गए थे, सुखद कल्पनाओँ द्वारा उच्च जीवन शैली भी बताई गई थी।

लेकिन 1935 के आस-पास से समाज में परिस्थितियां जटिल होने लगी जिससे प्रेम और सौंदर्य की कोमल भावनाओं के स्थान पर जीवन का कठोर सत्य सामने आने लगा और कवि यही कठोरता काव्य में ढालने लगे. अब साहित्य में वही लिखा जाने लगा है जो हम परिवेश के अनुसार भोग रहे थे यानि जीवन के, समाज के कठोर यथार्थ को जैसा का तैसा लिखना ही साहित्य कहलाया। इसीसे कहा गया कि साहित्यिक शक्ति कमज़ोर हो चुकी है।

यहां साहित्यिक शक्ति का अर्थ है कल्पना से अनुभूतियों का साहित्य रचना। ब्रिटिश हुकूमत से जूझते समाज में ऐसी कल्पनाएं न के बराबर थी और जीवन की कठोरता से रूबरू होते कवि यथार्थवादी कविताएं लिखने लगे थे ….. ऐसी कविताएं प्रगतिवादी कविताएं कहलाई और इस तरह की रचनाओं का साहित्य प्रगतिवाद कहलाया …. यह शुरूवात सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी से मानी जाती है, उनकी – वह तोङती पत्थर – कविता से  …….

आज पुण्यतिथि पर गौरवशाली साहित्यकार अज्ञेय जी को सादर नमन !

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