काली घाट का मंदिर

कोलकता में सबसे पहले हम काली घाट गए  …. काली माँ का मंदिर

यह पहला शक्ति पीठ है, मानना है कि यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है तभी तो यहां के लिए कहते है – जय काली कलकत्ते वाली तेरा वचन न जाए खाली …

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संकरी और छोटी गली में मंदिर है और आस-पास की छोटी संकरी गलियों में पूजापा की दुकाने सजी है,

यहाँ दर्शन करने के बाद हम दक्षिणेश्वर मंदिर गए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में  …

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लोदी पार्क

दिल्ली का लोदी पार्क इतिहास की गवाही देता है

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पीछे लोदी वंश के शासको की समाधियां है

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पत्थरों की बनी ये इमारते ठण्डी और सुकून देती है

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सामने हरे-भरे विभिन पेड़-पौधे करीने से सजे है, फव्वारे है, पक्षी भी है

 

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कुल मिलाकर यहां सैर करना अच्छा लगा

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इण्डिया गेट

दिल्ली का इण्डिया गेट याद दिलाता है हमारे स्वाधीनता संघर्ष को

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मुख्य इमारत पर शहीदों के नाम लिखे है जिसे हम आसानी से पढ़ तो पाए लेकिन कैमरे में क़ैद नही कर पाए

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यहां कुछ देर समय बिताना अच्छा लगा

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कुतुबमीनार

दिल्ली में कुतुबमीनार

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अब मीनार में भीतर जाने की मनाही है, बंद दरवाज़ा –

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बाहर से ही घूम कर देखा जाना है, ठण्डे गलियारों में टहलना अच्छा लगा

 

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खंडहर हो चुके भागो की भी अपनी शान है

 

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क़ुतुब देखने के बाद हम इण्डिया गेट गए जिसकी चर्च अगले चिट्ठे में

 

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स्मृति शेष – बालकवि बैरागी

आज बालकवि बैरागी जी का जन्मदिवस है….

बैरागी जी को हम मंच के लोकप्रिय कवि के रूप में जानते है, लेकिन यही उनका एकमात्र परिचय नहीं है। कवि होने के साथ गद्य भी लिखा, फिल्मी गीत भी लिखे,  राजभाषा हिन्दी की सेवा भी की, केवल अपने देश में ही नहीं विदेश में भी। राजनीति में भी सक्रिय रहे … रहे जिस स्थिति में भी, कविता नहीं छोङी….. आख़िर बचपन से साथ जो रहा….

मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले  में 10 फरवरी 1931 को जन्में बैरागी जी का बचपन राजस्थानी संस्कारों में परवान चढ़ा। निमाङी बोली से गहरे जुङे रहे। वास्तविक नाम नंदराम दास बैरागी ….. जो साहित्य से, कविता से अधिक संबंध नहीं रखते उन्हें यह भ्रम बना रहता है कि बैरागी जी बच्चों के लिए कविताएं लिखते है इसीसे बालकवि कहे जाते है…. वास्तव में बैरागी जी बचपन से ही कविताएं लिखने लगे और उनकी कविताएं पसन्द भी की जाती रही, विभिन्न काव्य प्रतियोगिताओं में भी स्थान पाती रही …. कविताएं तो ऊपर चढ़ती रही पर वे थे तो छोटे… इसी से कहलाए बाल कवि  

वे अपनी साहित्यिक प्रतिभा का पूरा आनन्द नहीं ले पाए। सच्चाई तो यही है कि लिखने के लिए काग़ज़ क़लम जुटाना भी कठिन रहा। आरंभिक जीवन बहुत संघर्षों में बीता। आर्थिक और सामाजिक संघर्षों से जूझते अपनी शिक्षा कायदे से पूरी नहीं कर पाए और धीरे-धीरे प्राइवेट पढ़ाई करते हुए एम ए तक की शिक्षा पूरी की…. पिता अपाहिज होने से कोई काम नहीं कर पाते थे, माँ ने श्रम किया और अभावों के बीच ज़िन्दगी चलती रही…. काम पाने के लिए अपना पैत़क निवास छोङ विभिन्न स्थानों पर भटकना भी पङा। आख़िर जिन्दगी की नैय्या पार हुई कविता के ही सहारे  

छुटपुट पत्र-पत्रिकाओ से निकल कर मंच पर पहुँचे और कवि सम्मेलनों में महत्वपूर्ण स्थान पाने लगे। उस दौर में बैरागी जी कवि संम्मेलनों में मंच की शान हुआ करते थे…. फिल्मों तक पहुँचे… लेकिन फिल्मों में एक ही गीत लोकप्रिय रहा – तू चंदा मैं चांदनी – फिल्म रेशमा और शेरा….. कुछ और गीत भी है जिन्हें लोकप्रियता कम ही मिली  

मंच के लोकप्रिय कवि और गीतकार ही बने और इसी लोकप्रियता ने उन्हें राजसभा पहुँचाया फिर चुनाव जीत कर लोकसभा भी पहुँचे लेकिन पार्टी की हार से विपक्ष के ही सांसद बने रहे…. संसद पहुँच कर कविता के साथ-साथ हिन्दी भाषा की सेवा की। राजभाषा हिन्दी के कार्यान्वयन के लिए उनकी विभिन्न गतिविधियाँ रही। विदेश मंत्रालय में भी काम किया विदेश में दूतावास में भी हिन्दी के काम में लगे रहे। अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलनों में सक्रिय योगदान दिया और विभिन्न सत्रों की अध्यक्षता की… और … 13.5.2018 को पंचतत्व में विलीन हो गए  

विभिन्न क्षेत्रों में योगदान रेखांकित हुआ पर लोकप्रियता कविता से ही मिली और हमारे बीच वर्षों तक कवि के रूप में जाने जाएंगे  ….. और गूँजती रहेगी उनकी रचनाएं संस्कृति से जुङी, देशभक्ति से जुङी  …..  एक देश भक्ति गीत अक्सर विविध भारती के वन्दनवार कार्यक्रम में सुनवाया जाता है –  यही है मेरा देश मेरा देश मेरा देश

हिन्दी के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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शुभ जन्मदिन – स्वदेश भारती जी

आज कवि और रूपाम्भरा पत्रिका के संपादक – स्वदेश भारती का जन्मदिन है।  

स्वदेश भारती जी की काव्य रचनाओं को अज्ञेय जी ने 1979 में प्रकाशित चौथा सप्तक में संपादित किया। 1959 में तीसरा सप्तक के प्रकाशन के बीस वर्षों बाद चौथा सप्तक का प्रकाशन हुआ। इन बीस वर्षों यानि साठ और सत्तर के दशक के प्रमुख सात कवियों को इसमें स्थान मिला जिनमें से एक है – स्वदेश भारती

आपने अपनी शिक्षा पूरी नहीं की जिसका कारण देश प्रेम की तरंगे है जो उन्हें विनोबा भावे के पास ले गई। साहित्यिक जीवन के ठोस होने का कारण रमेश बक्षी, सुनील गंगोपाध्याय जैसे मित्र है। आधुनिक कवियों में से एक होते हुए भी आप कविता को आत्मा के सौन्दर्य की सच्चाई मानते है साथ ही यह भी माना है कि कविता को अपने समय का दर्पण होना चाहिए। यह स्वयं स्वदेश भारती जी ने चौथा सप्तक के वक्तव्य में कहा। आगे कहते है –

” मैं आधुनिक हिन्दी कविता को नए धरातल पर, ताज़ा मौलिक परिवेश में सम्मान के साथ प्रस्थापित करना चाहता हूँ। यह मेरी प्रारंभिक यात्रा है। ”  

इसमें  स्वदेश भारती जी की विभिन्न प्रवृत्तियों की रचनाएं सम्मिलित है – आधुनिक जीवन की निराशा, भविष्य के प्रति आशा, प्रेम की अभिव्यक्ति और प्रकृति चित्रण। आज हम केवल एक ही रचना की चर्चा करेंगे – अँधेरा

यह आधुनिक जीवन का अँधेरा है। स्वदेश भारती जी को लगता है कि आधुनिक समाज में मनुष्य को प्रति क्षण मृत्यु का बोध होता है फिर भी वह जीवित है क्योंकि जीवित रहने के लिए विवश है। इस परिप्रेक्ष्य में निराश होना स्वाभाविक है –

” वर्तमान में व्याप्त
अँधेरा
मिटने वाला नहीं है
और मैं काले समय के चक्रव्यूह को
तोङ कर
युद्ध करने में असमर्थ हूँ  ”

मानव समाज में इतनी सामर्थ्य भी नहीं रही कि वे परिस्थितियों से जूझते हुए काले समय के इस चक्रव्यूह को तोङे और स्वयं को स्वतंत्र करें। इस स्वच्छन्द जीवन के उसने स्वप्न अवश्य देखें है जिससे उत्पन्न आशा की किरणों ने उसे प्रेरित किया –

” पलकों में खामोश रातों के
सपने जाग रहे है और
रोशनी की रक्तात्र ऊँगलियाँ
कितनी ही बार मेरे बंद दरवाज़े पर
दस्तक दे कर लौट गई है ”

किन्तु सभी असफल रहे। उसके कानों में निरन्तर यही स्वर गूँजता है – ”  उठो युद्ध करों ”

और उससे प्रेरित हो मनुष्य अपने अस्तित्व के आहत होने पर भी युद्ध के लिए तत्पर हो जाता है। किन्तु आज संघर्ष झेलना औसत मानव की नियति बन गई है और वही उससे अनुनय करती है –

” … सुनो
युद्ध पर मत जाओ  ”

यहाँ नियति का भीगी पलकों से अनुनय करना इस बात का साक्षी है कि संभव है युद्ध से जीवन और भी अधिक उलझ जाए। यह सत्य भी है कि आधुनिक परिवेश में यह स्वच्छन्दता नहीं रह गई कि अपनी स्वतंत्रता हेतु कुछ कह सकें। आगे कविश्री ने और भी सुन्दर अभिव्यक्ति दी है कि यदि उसे युद्ध करना भी है तो –

” कौन सा लक्ष्य बेधने के लिए ”

अभिप्राय कि वह किस-किस से युद्ध करेगा क्योंकि किसी एक विशेष से संघर्ष नहीं अपितु अशान्ति तो चारों ओर व्याप्त है। इस अशान्ति का परिवर्तन शान्ति में करने के लिए मुख्य युद्ध किससे हो यह –

” न जान पाने की असमर्थता ने
मेरी आस्थाओं को
मौन की थपकी देकर सुला दिया है  ”

इसी कारण आज वह चुप है। इस चुप्पी का कारण कोई नहीं जानता, सभी अपने अनुसार ही इसका कारण बताते है – मित्र गर्विला कहते है, आत्मीय सनकी कहते है और समाज उसकी इस स्थिति पर व्यंग्य करता है जिससे उसे लगता है कि वह परास्त हो गया है –

”  सभी तरफ से सभी युद्धों से
बिना युद्ध किए ही  ”

इस निराशा से और साथ ही मशीनी दिनचर्या से धीरे-धीरे उसके मन में घृणा का बीज अंकुरित हो रहा है। उसे यूँ लग रहा है कि ” घर ” जो जीवन का आश्रय स्थल है वह भी उसे निराश ही कर रहा है तभी तो वह कहता है –

” आश्रय तो कहीं भी मिल सकता है
इतना बङा आकाश है
और धरती का विस्तार है
अब मैं अपने अँधेरे कमरे का
दुर्भाग्य नहीं सह सकता ”

अर्थात् जीवन में शान्ति का इतना अभाव हो गया है कि वह उसे अपने ही घर में नहीं मिल सकती – कारण ढ़ेर सारी समस्याएं है। इसी से मानव इतना एकाकी हो गया है कि वह आत्मीय के मध्य रहे अथवा निर्बन्ध कोई अन्तर नहीं।  …

यह थी एक रचना चौथा सप्तक से … कुछ और रचनाओं पर कुछ और चर्चा फिर कभी …

स्वदेश भारती जी को जन्मदिन की शुभकामनाएं !

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सुल्ला पार्क – जम्मू

जम्मू, कटरा में सुल्ला पार्क सैर के लिए एक अच्छी जगह है –

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पार्क में एक मंदिर भी है

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दो कुण्ड भी है जिसमे मछलियां है,  विभिन्न तरह के पेड़ो-पौधों से सजा हरा-भरा पार्क है –

 

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सुल्ला पार्क की सैर के बाद हम जम्मू से लौट आए।

 

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