स्मृति शेष – हज़ारी प्रसाद द्विवेदी

इतिहास अपनी गति से आगे बढ़ता गया. पलीते वाली बंदूकों ने, कारतूसों ने, तोपों ने, बमों ने, बमवर्षक वायुयानों ने इतिहास को किस कीचड भरे घाट तक घसीटा है, यह  सबको मालूम है. नखधर मनुष्य अब एटम  बम पर भरोसा कर आगे की ओर चल पड़ा है. पर उसके नाख़ून अब भी बढ़ रहे हैं. अब भी प्रकृति मनुष्य को उसके भीतर वाले अस्त्र से वंचित नहीं कर रही है. अब भी वह याद दिला देती है कि तुम्हारे नाख़ून को भुलाया नहीं जा सकता. तुम वही लाख वर्ष पहले के  नखदंतावलम्बी  जीव हो – पशु के साथ एक ही सतह पर विचरने वाले और चरने वाले.

नाखून क्यों बढ़ते है – निबन्ध का अंश है यह जिसके लेखक है हज़ारी प्रसाद द्विेवेदी जिनकी आज पुण्यतिथि है।

यह निबन्ध कुछ शिक्षण संस्थानों ने कॉलेज के पाठ्यक्रम में भी रखा था। इसमें बढ़िया संदेश है कि नाखून बढ़ना हमारी पशु प्रवृत्ति का प्रतीक है और उसे काटते रहना हमारी मनुष्यता है। भाषा, विचार, प्रत्येक स्तर से द्विवेदी जी की विद्धता झलकती है। अन्य रचनाओं की भी यही स्थिति है ….

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

टिप्पणी करे

अज्ञेय – स्मृति शेष

and as a literary force, at any rate, Nirala is already dead …..

सुविधा के लिए हम इस बात को हिन्दी में बता रहे है –

निराला की साहित्यिक क्षमता कमज़ोर हो चुकी है …..

यह बात अज्ञेय जी ने कही …… गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के शान्ति निकेतन से प्रकाशित पत्रिका – विश्व भारती क्वाटर्ली  – के वर्ष 1937-38 के एक अंक में छपे लेख द्वारा

पूरी बात इस तरह है – हिंदी काव्य में 1915 के आसपास कुछ अलग तरह की कविताएं लिखी जाने लगी थी जिनमें व्यक्ति की सूक्ष्म भावनाओं को स्थान मिला था। प्रेम, सौन्दर्य और प्रकृति की चर्चा कविता में होने लगी थी, यह सब पहली बार हुआ था कि कवि की आत्मानुभूति कविता में छलकने लगी थी। इस तरह कवि अपनी मानवीय भावनाओं की छाया प्रकृति में देखने लगे थे जिससे इस दौर का काव्य छायावाद कहलाया, जिसमें आदर्श भी स्थापित किए गए थे, सुखद कल्पनाओँ द्वारा उच्च जीवन शैली भी बताई गई थी।

लेकिन 1935 के आस-पास से समाज में परिस्थितियां जटिल होने लगी जिससे प्रेम और सौंदर्य की कोमल भावनाओं के स्थान पर जीवन का कठोर सत्य सामने आने लगा और कवि यही कठोरता काव्य में ढालने लगे. अब साहित्य में वही लिखा जाने लगा है जो हम परिवेश के अनुसार भोग रहे थे यानि जीवन के, समाज के कठोर यथार्थ को जैसा का तैसा लिखना ही साहित्य कहलाया। इसीसे कहा गया कि साहित्यिक शक्ति कमज़ोर हो चुकी है।

यहां साहित्यिक शक्ति का अर्थ है कल्पना से अनुभूतियों का साहित्य रचना। ब्रिटिश हुकूमत से जूझते समाज में ऐसी कल्पनाएं न के बराबर थी और जीवन की कठोरता से रूबरू होते कवि यथार्थवादी कविताएं लिखने लगे थे ….. ऐसी कविताएं प्रगतिवादी कविताएं कहलाई और इस तरह की रचनाओं का साहित्य प्रगतिवाद कहलाया …. यह शुरूवात सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी से मानी जाती है, उनकी – वह तोङती पत्थर – कविता से  …….

आज पुण्यतिथि पर गौरवशाली साहित्यकार अज्ञेय जी को सादर नमन !

टिप्पणी करे

हरिवंश राय बच्चन – स्मृति शेष

आज हिन्दी जगत के ख्यात साहित्यकार हरिवंश राय बच्चन  का जन्म दिवस है …..

बच्चन जी पहले ऐसे व्यक्ति रहे जिन्हें स्वतंत्रता मिलने के बाद सरकारी काम में अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी लाने की ज़िम्मेदारी दी गई। लेकिन कवि हृदय और साहित्यसृजक बच्चन जी के लिए यह काम सरल नहीं था ….

उन्ही दिनों की एक घटना है जब देश में प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू और राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन थे तब संसद के बजट अधिवेशन के समय राष्ट्रपति द्वारा मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार भाषण अनुवाद के लिए डॉ हरिवंश राय बच्चन के पास भेजा गया। डॉ राधाकृष्णन अंग्रेजी के विद्वान थे। उनके द्वारा प्रयुक्त अंग्रेजी शब्दों और वाक्य संयोजन के अनुसार ही हिंदी के शब्दों का चयन कर वाक्य संयोजन करते हुए डॉ बच्चन ने हिंदी में अनुवाद किया। संसद की परम्परा के अनुसार राष्ट्रपति का भाषण यदि अंग्रेजी में हो तो उसका हिंदी अनुवाद उप राष्ट्रपति पढते है। इस तरह डॉ बच्चन द्वारा किए गए हिंदी अनुवाद को उपराष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन द्वारा पढा जाना था। नेहरू जी ने हिंदी अनुवाद देख कर कहा कि भाषण के अनेक शब्दों का उ च्चारण करने में डॉ जाकिर हुसैन को दिक्कत होगी साथ ही सभी के लिए इस भाषण को समझना कठिन होगा। तब यह निर्णय लिया गया कि सरकारी काम में सरल हिंदी का प्रयोग किया जाए।

यहाँ से भाषा के धरातल पर बच्चन जी दो रास्तो पर चलते रहे – एक रास्ता सरकारी काम का रहा जहां सबका ध्यान रखते हुए सरल हिन्दी का प्रयोग करते रहे और दूसरा रास्ता साहित्य सृजन का रहा जहां साहित्यिक हिन्दी का प्रयोग करने लगे। बच्चन जी ने विभिन्न विषयो पर कविताएं लिखी, प्रेम गीत, प्रेम में विरह के गीत, देश भक्ति और जीवन के विभिन्न अनुभवों के साथ जीवन दर्शन की भी चर्चा की। हालांकि ऐसे गीतों की संख्या कम नही जिनका उपयोग फिल्मो में किया जा सकता था फिर भी वास्तव में उनकी एक ही रचना का प्रयोग किया गया है, गीत – कोई गाता मैं सो जाता, फिल्म आलाप में ….. इसी फिल्म में सरस्वती वंदना भी है जो वन्दना ही है जिसमे अन्य काव्य रचनाओं की तरह बच्चन जी के भाव या विचार नही है। इसके अतिरिक्त फिल्म सिलसिला के लिए एक लोक गीत को हिन्दी शब्द दिए जिससे यह लोकप्रिय होली गीत बन कर उभरा – रंग बरसे  …  अपने इस छोटे से फ़िल्मी सफ़र की अंतिम रचना है – अग्निपथ जिसे कविता के ही रूप में अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म अग्निपथ में रखा गया है जिसके लिए स्वर भी अमिताभ जी ने ही दिया है। इस फिल्म को जब दुबारा बनाया गया तब भी यह रचना रखी गई…… यहाँ यही रचना ….

वृक्ष हों भले खड़े, हों घने हों बड़े,
एक पत्र छांह भी, मांग मत, मांग मत, मांग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

तू न थकेगा कभी, तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी, कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

यह महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत रक्त से, लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

बच्चन जी पर कुछ और चर्चा फिर कभी …. हिन्दी जगत के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

टिप्पणी करे

« Newer Posts · Older Posts »