स्मृति शेष – अज्ञेय

 

Dead long dead
long dead !
And my heart is a handful of dust,
And the wheels go over my head,
And my bones are shaken with pain,
For into a shallow grave they are thrust,
Only a yard beneath the street,
And the hoofs of the horses beat, beat
The hoofs of the horses beat
मृत – चिरातीत !
और मेरा हृदय मुट्ठी भर राख हो गया,
पहिए मेरे ऊपर से गुज़रते है,
मेरी अस्थियाँ पीङा से काँपती है,
क्योंकि वे एक तंग कब्र में बंद है,
पथ की सतह के गज़ भर नीचे,
और घोङो की अनवरत टाप टाप टाप …

 

शेखर – एक जीवनी  … उपन्यास के पहले भाग में है यह कविता, इसी रूप में पहले अंग्रेज़ी फिर हिन्दी में जिसके रचनाकार है सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन  ” अज्ञेय ”  जिनकी आज पुण्यतिथि है.

अध्ययनशील अज्ञेय जी ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में लिखा – कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, यात्रा विवरण, यहां तक कि अनुवाद भी किया और सम्पादन कर विभिन्न कवियों को प्रकाश में ले आए.
दो भागों में लिखा गया उपन्यास … शेखर – एक जीवनी …. न केवल अज्ञेय जी की महत्वपूर्ण रचना है बल्कि साहित्य जगत विशेषकर उपन्यासों की दुनिया में महत्वपूर्ण है. जैनेन्द्र जी ने उपन्यास सुनिता लिख कर मनोवैज्ञानिक उपन्यासों की जो शुरूवात की थी उसकी अगली और महत्वपूर्ण कड़ी है – शेखर – एक जीवनी
जैनेन्द्र जी ने केवल मन का विश्लेषण किया था लेकिन अज्ञेय ने मनोविज्ञान के विशेष कर फ्रायड के सिद्धांतों पर शेखर के चरित्र को रचा है. शेखर के मन में केवल द्वंद्व ही नही है बल्कि वह उसका समाधान भी चाहता है, और समाधान न मिलने पर विद्रोही हो उठता है. शेखर की यह प्रवृति बचपन से ही रही है, पिता का कठोर अनुशासन और जिज्ञासु मन को न मिलने वाले समाधानों ने उसे विद्रोही बना दिया. इसीसे कालेज में आकर वह क्रांतिकारियों के दल से आसानी से जुड़ गया. ऎसी ही गतिविधियों से ब्रिटिश सरकार से फांसी का हुक्म मिला और इस अंतिम समय शेखर अपनी जीवन यात्रा याद कर रहा है जिससे यह उपन्यास आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया है और अतीत में यानि फ्लैशबैक में है. भाषा-शैली का प्रवाह कुछ इस तरह है जैसे शेखर अपने मन का मंथन कर रहा है. जिससे चरित्र स्वाभाविक रूप से उभरा.
शेखर के साथ पूरी तरह से जुड़े रहे अज्ञेय जी तभी तो उनका विविध आयामी साहित्यिक रूप नज़र आया और दो-तीन जगह अपनी बात स्पष्ट करने के लिए कविता का प्रयोग किया वो भी अंग्रेज़ी में जिसे फिर हिन्दी में भी लिखा लेकिन शब्द-शब्द अनुवाद नही.
प्रशंसा के साथ एक आलोचना इस उपन्यास की यह भी रही कि पहले भाग में लम्बे चले शेखर के बचपन में उसे उच्च स्तरीय अंग्रेज़ी स्कूल का छात्र बताया गया जबकि हिन्दी माध्यम का छात्र बताना चाहिए था. खैर … उपन्यास का महत्त्व कभी कम नही हुआ  ….
गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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मीरा

होली और जन्माष्टमी के अवसर पर बरबस मीरा की याद हो आती है। वास्तव में जब भी कृष्ण का नाम आता है, राधा और मीरा के नाम साथ ही आते है। इस तरह बचपन से ही मीरा से परिचय हो जता है।

स्कूल के पाठ्यक्रम में भी मीरा की रचनाएं शामिल होती रही। मैंने पांचवी कक्षा में पहली बार मीरा को पढा –

मन रे परसि हरि के चरण।

छठी कक्षा से संगीत की शिक्षा आरम्भ हुई और मीरा के कई भजन सीखने का अवसर मिला। साथ ही पाठ्यक्रम में भी कुछ पद पढे। एम ए में भक्ति साहित्य का अध्ययन करते हुए विभिन्न चर्चाओं, व्याख्यानों द्वारा मीरा के बारे में अधिक जानने का अवसर मिला। एक चर्चा यह भी रही कि मूल रूप से मीरा कृष्ण की भक्तिन है और उनके पद उनकी भक्ति को व्यक्त करते है अर्थात उनकी भावनाएं शब्द बन कर निकल पड़ती है, इस तरह मीरा साहित्य की कवियित्री कैसे हुई, वो तो भक्तिन ही है।

कृष्ण प्रेम में पगी मीराबाई ने कृष्ण के प्रति जो कुछ भी अनुभव किया उसे शब्दों में ढाला जिससे उन रचनाओं में स्वाभाविकता रही। भक्ति रस में डूबी होने से एकतारा लेकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करती रही जिससे उनकी रचनाएं लयबद्ध हो गई। संतो के साथ मंदिर-मंदिर घूमती मीराबाई के ये पद दूसरे भी गाने लगे। अपने व्यक्तिगत जीवन की त्रासदी से मीरा को वैसे भी लोग जानने लगे थे। उदयपुर के राजघराने की बहू मीरा गृहस्थ्य धर्म न निभा पाने के कारण घर छोड चुकी थी। इस तरह राजघराना छोडना और मंदिरों में भक्ति गीत गाना मीराबाई की लोकप्रियता को बढाता गया। उनके रचे पद भी दूर – दूर तक गाए जाने लगे, पदों की संख्या भी बढती गई, ऐसे में स्वाभाविक है कि ये पद काव्य संसार का अंग बन साहित्य जगत में शामिल होते।

चूंकि मीरा की बोली बृज रही जिससे ये पद भी बृज बोली में ही रचे गए। साहित्य में स्थान पा कर इन पदों की बोली बृज भी भाषा का महत्त्व पाने लगी। यहाँ हम एक बात बता दे कृष्ण भक्त सूरदास की बोली भी बृज ही रही और उनके पदों की लोकप्रियता और विपुलता बङा कारण रही बृज को बोली से भाषा का स्थान दिलाने में।

एक चर्चा मीरा की भक्ति भावना पर भी होती रही। भक्ति जगत में कबीर की तरह निर्गुण निराकार के विपरीत मीरा ने सगुण भक्ति की और कृष्ण की आराधना की। कृष्ण को अपना पति माना और इस रूप में भक्ति करना कठिन है। साधारणतः भक्त अपने आपको अपने आराध्य के सेवक मानते है और प्रभु का गुणगान करते है लेकिन प्रभु को पति के रूप में मानना और विरह के पद गाना कठिन है। वास्तव में बहुत कठिन रही मीरा की भक्ति।

यूं तो मीरा का अध्ययन बाद में किया पर हमेशा से ही हम रेडियो से मीरा भजन सुनते रहे, कुछ फ़िल्मी गीतों के और कुछ भक्ति गीतों के कार्यक्रम में। मीरा भजन सबसे अधिक पसंद किए गए सुविख्यात गायिका जुतिका राय के स्वर में। मीरा पर सबसे पहले फिल्म बनी तमिल भाषा में जिसका नाम भी मीरा ही रहां। दोनों ही भाषाओं की फिल्मो में कर्नाटक शास्त्रीय संगीत जगत की सुविख्यात गायिका एम एस सुब्बालक्ष्मी ने मीरा का अभिनय किया और मीरा भजन गाए – हिंदी और तमिल दोनों ही भाषाओं में जिसके लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला और मीरा की कहानी भी जन साधारण तक पहुंची। बाद के समय में हेमामालिनी को लेकर गुलज़ार ने भी फिल्म बनाई – मीरा। यह फिल्म भी पसंद की गई। इस समय मीरा भजनों के लिए एक और गायिका उभर कर आई – वाणी जयराम जिनके मधुर कंठ ने मीरा के भजनों को नई पीढ़ी में भी लोकप्रिय बनाया। इस दौरान कई फिल्मो में भक्ति गीत की तरह मीरा भजन रखे गए और ऐसे कई भजनों को लता मंगेशकर ने अपना स्वर दिया। भक्ति गीत के साथ कुछ फिल्मो में सामाजिक परिस्थितियों को उभारने के लिए भी मीरा भजन का सुन्दर प्रयोग किया गया।
हिन्दी साहित्य जगत की गौरवशाली भक्त कवियित्री को सादर नमन !

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राजकुमार कुंभज – जन्मदिन मुबारक !

आज आधुनिक हिन्दी साहित्य के जाने-माने कवि राजकुमार कुंभज का जन्मदिन है।

न केवल साहित्य जगत में अपितु जीवन में भी राजकुमार कुंभज आधुनिक ही रहे। जीवन के प्रति विचार इतने आधुनिक है कि 1977 में पारम्परिक मान्यताओं एवं पारम्परिक रूढ़ियों को तोङते हुए स्वतंत्रता पूर्वक प्रेमविवाह किया। साहित्य के क्षेत्र में कवि को स्वयं यह स्मरण नहीं कि पहली रचना कब की। सामयिक विषयों पर निरन्तर उनकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और संकलनों में प्रकाशित होती रही।  यहां 1979 में प्रकाशित चौथा सप्तक में संकलित एक काव्य रचना की चर्चा करते है – पानी नहीं मिलेगा

जल के अभाव में जीवन दुष्कर है। जीवन की स्थूल आवश्यकताएं भी जल की ही भांति महत्वपूर्ण है। आधुनिक समाज में जीवन की स्थूल आवश्यकताओं की व्यवस्था कठिन हो जाती है –

”  पानी नहीं मिलेगा
तो तुम क्या कर लोगे ? तुम्हारी ये ताक़त नहीं रही
जब कि पाताल तक पहुँच सको नींद पर
हरकत करो कोई और जाग पङो  “अंतिम दो पंक्तियां मानव की निष्क्रियता की ओर संकेत है कि जागरूक न होने का अर्थ है कि अब वह चुस्त नहीं रहा कि अपनी आवश्यकताओं के लिए सदैव सक्रिय रह सकें। किन्तु यह सक्रियता उसके लिए आवश्यक है क्योंकि -” अंगारे नहीं खा सकोगे  ”

अर्थात् कठिन समय को नहीं झेल पाओगे जिसमें –

” नहीं बन सकोगे कबूतर तक भी
हो जाओगे शायद मछली
और कि तङपोगे  ”

कबूतर से तात्पर्य स्वच्छन्दता से है जो तभी मिलती है जब जीवन की स्थूल आवश्यकताएं पूर्ण हो जाए अन्यथा उसकी दशा वही हो जाएगी जो जल के अभाव में मछली की होती है। आगे इसकी व्याख्या इस तरह की है –

” पानी नहीं मिलेगा
तो भविष्य का वृक्ष नहीं होगा
वर्तमान का दुःख नहीं होगा
नहीं होगा भूत का अँधेरा
दरअसल कि सब क़यावद में
और खामोश  ”

यह चुप्पी आधुनिक मानव की उस दशा की ओर इंगित करती है जहां उसका जीवन के प्रति लगाव नहीं रह गया। न अब वह अतीत से कोई प्रेरणा ग्रहण करता है और न ही भविष्य के लिए कोई योजना बनाता है। उसकी निष्क्रियता यहां तक बढ़ गई है कि वह वर्तमान दुःख भी अनुभव नहीं कर पा रहा है। किन्तु जीवन के लिए आरंभिक सुविधाएं उसके लिए अत्यंत ही आवश्यक है अन्यथा उसका जीवन बोझ बन जाएगा और उस बोझ को ढ़ोते हुए वह भीतर से खोखला हो जाएगा और उसे इसका अनुभव भी नहीं होगा –

” पानी नहीं मिलेगा
तो यह रास्ता पीठ पर चढ़ेगा
तुम हो जाओगे खाली
आकाश धरती
जादू की गिरफ्त में
और बेखबर दिन ”

यह जटिल परिस्थितियां इन्द्र बनी जल के अभाव में और जून की धूप में आधुनिक मानव को मृत्यु की प्रतीक्षा में रत देखना चाहती है –

” कतई नहीं मिलेगा पानी
आदेश है इन्द्र का तुम्हारे लिए
कि कुछ दिन ऐसे ही रह कर दिखाओ
पत्थर और जून की धूप नापो
लगभग मौत आने तक  ”

इन्द्र जटिल परिस्थितियों का प्रतीक है और पत्थर व जून की धूप जीवन के अभावों का प्रतीक है और यही आधुनिक मानव का यथार्थ चित्रण है।

यहां चौथा सप्तक में संकलित एक और काव्य रचना की चर्चा करते है – शब्द। …. इसमें प्रकृति के क्रियाकलापों की चर्चा देखिए

कवि कहता है कि यदि वायु का प्रवाह धीरे-धीरे भी हो तब भी पेङों की डाली पर बैठे पक्षी कांपने लगते है। सूर्य भी हवा के झोंकों से कभी डाली के पीछे छिपता है कभी दृष्टिगोचर होता है अर्थात् वह भी कांपता हुआ प्रतीत होता है –

”  हवा की मुस्कुराहट पर कांपते है पक्षी
पेङों पर सूर्य  ”

इस समय जंगल में इकट्ठा होती है मृत मछलियां जो स्मृतियों का प्रतीक है और जंगल मन का –

”  और जंगल में इकट्ठा होती है
स्मृतियों की मृतक मछलियां  “सूर्य की उपस्थिति में जब बयार का वेग हो तो लगता है प्रत्येक वस्तु की बनने वाली छाया उसकी गिरफ्त में है। अभिप्राय की हृटय में स्मृतियां अनुभूति की लहर उद्वेलित होने पर एकत्रित होती है जिनसे भावनाएं कांपने लगती है यानि हृदय से बाहर निकलने का प्रयास करती है किन्तु यह सभी परछाइयों के रूप में हृदय में ही गिरफ्तार है जबकि शब्द मुक्त हो मुखरित हो जाते है। लाख शब्दों से मन की बात कहते जाए फिर भी मन कभी खाली नहीं हो पाता है, सारी अनुभूतियां ज्यों की त्यों संजोई रह जाती है, मन की गिरफ्त से बाहर नहीं आ पाती ……राजकुमार कुम्भज की कुछ और रचनाओं पर चर्चा फिर कभी ….

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स्मृति शेष – शमशेर बहादुर सिंह

आज हिन्दी साहित्य के प्रगतिशील कवि शमशेर बहादुर सिंह का जन्मदिन है। शमशेर बहादुर सिंह का शैशव काल से ही पारिवारिक वातावरण साहित्यिक व कलाप्रिय होने के कारण कविता में परम्परावादिता कुछ अधिक और स्वयं की स्पष्टवादिता कम है.  इक़बाल, रविन्द्रनाथ टैगोर, शैली के साथ-साथ महादेवी, पंत का प्रभाव व आगे चलकर दूसरी बार साहित्य में क़दम रखने यानि कवि बनने पर बच्चन से प्रभावित शमशेर जी से यह आशा करना समीचीन है कि साहित्य में दो वर्गों के मध्य विभाजित रेखा नही खीची जा सकती। यह सब स्पष्ट होता है उनकी रचनाओं से।  उनकी कविताओं में से एक है कवियित्री सुभद्राकुमारी चौहान के निधन पर लिखी रचना, शीर्षक भी उसी दिन का दिया है  –  वसंत पंचमी की शाम  ( 1948 )  –
” डूब जाती है, कहीं
जीवन में, वह
सरल शक्ति
( म्यान सूनी है
आज )  …. क्यों
मृत्यु बन आई
आसक्ति आज ”
म्यान सूनी कह कर कवि ने उनकी सुप्रसिद्ध रचना ” झांसी की रानी की ओर इंगित किया है. रचनाओं में प्रकृति से लिए गए प्रतीक भी देखे जा सकते है जो छायावादी प्रभाव स्पष्ट करते है –
” हे वसन्तवती,
द्वार के नभ पर तुम्हारे
झुका जो हेमंत का शिर-भार,
लूट लो उसको ”
वहां वसन्तवती नायिका है, हेमंत नायक है, लूट लो उसको का अर्थ है समर्पण प्राप्त कर लो.  इसी क्रम में प्रकृति का मानवीकरण देखिए –
” संध्या की पलकें झुकी
फैली अलके भारी ”
यह शाम के समाप्त होने और अंधकार फैलने का चित्र है. और सपाट शब्दों में ढली पंक्तियाँ देखिए –
” चुका भी हूँ मैं नही
कहाँ किया मैंने प्रेम
अभी ”
शमशेर बहादुर सिंह जी की रचनाओं पर कुछ और चर्चा फिर कभी …..
गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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उषा प्रियंवदा जी – जन्मदिन मुबारक !

‘ कृष्णा मौसी को सुषमा से बड़ा प्यार था। वह कानपुर आई तो सुषमा की गरमी की छुट्टियाँ थीं। मौसी हर रोज़ एक नई सुंदर साड़ी निकालकर पहनतीं। सुषमा आई तो वह झट बोलीं—

‘‘वायल दे दो तो कढ़वा दूँगी। ऐसी बढ़िया कढ़ेगी कि तुम्हारी सहेलियाँ भी देखती रह जाएँगी।’’

अम्माँ ने अपनी राय दी, ‘‘एक नीरू के लिए भी कढ़वा देना। साल-छः महीने में उसकी शादी होगी तो काम आएगी।’’

कृष्णा मौसी ने आश्चर्य से कहा, ‘‘तो क्या दीदी, सुषमा को कुँवारी रखोगी ? इसका ब्याह नहीं करोगी जो अभी से नीरू के लिए दहेज जोड़ने लगीं।’’

अम्माँ ने बड़े मजे से उत्तर दिया, ‘‘तुम जानों कृष्णा, सुषमा की शादी तो अब हमारे बस की बात रही नहीं। इतना पढ़-लिख गई, अच्छी नौकरी है और अब तो, क्या कहने हैं, होस्टल में वार्डन भी बनने वाली है। बँगला और चपरासी अलग से मिलेगा, बताओ, इसके जोड़ का लड़का मिलना तो मुश्किल ही है। तुम्हारे जीजा तो कहते हैं कि लड़की सयानी है, जिससे मन मिले, उसी से कर ले। हम खुशी-खुशी शादी में शामिल हो जाएँगे।’’

‘‘अरे जाओ दीदी, जब लड़की की उम्र थी तब तो आज़ादी दी नहीं। अब वह कहाँ ढूँढने जाएगी। लड़कियाँ सभी की होती हैं, शादियाँ भी सभी करते हैं। तुम्हारी तरह हाथ-पर-हाथ रखकर बैठने वाला कोई नहीं देखा।’’

छोटी बहन से फटकार सुन अम्मा अप्रतिभ हो आईं। उनसे कोई उत्तर न बन पड़ा। सुषमा को उनका सूखा-सा चेहरा देख बड़ी दया लगी, वह बात बदलती हुई बोली,

‘‘मौसी शाम को चलकर वायल ले आएँगे, दो मैं ले लूँगी, एक साड़ी नीरू के लिए बनवा देंगे।’’

पचपन खम्बे लाल दीवारें – उपन्यास का अंश है यह जिसकी लेखिका है – उषा प्रियंवदा – जिनका आज जन्मदिन है।

यह रचना पढ़ कर ऐसा नही लगता कि कोई किताब पढ़ रहे है बल्कि ऐसा लगता है जैसे हम अपने आस-पास के किसी घर परिवार के बारे में जान रहे है।  नौकरी पेशा लड़कियां अपने परिवार की ज़िम्मेदारी भी संभालती है और खुद अपनी ज़िंदगी के फैसले भी ले लेती है। एक तरह से इसे हम लड़कियों का शोषण मान सकते है तो दूसरी ओर हमें यह रचना लड़का और लड़की में वास्तविक समानता का बोध कराती है.

इस उपन्यास पर धारावाहिक बना कर दूरदर्शन से प्रसारित भी किया गया था।  

हम उषा प्रियंवदा जी के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करते है।

जन्मदिन की अनेको शुभकामनाएं !

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जयशंकर प्रसाद – स्मृति शेष

गुरू नानक जयन्ति के अवसर पर आज हम चर्चा करते है जयशंकर प्रसाद जी की एक काव्य रचना की – शेरसिंह का शस्त्र समर्पण …. हालांकि इस रचना का सीधा संबंध गुरूनानक जी से नहीं है

जयशंकर प्रसाद जी छायावादी युग के प्रमुख कवि है जिनका रचनाकाल तीस के दशक में अपने चरम पर रहा। इसी समय देश में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष चल रहा था।  इस स्थिति से प्रसाद जी का कवि ह्रदय अछूता नही था। उन्हें लग रहा था कि हमारे देश में वीरता और स्वाभिमान के साथ जो द्वेष भावना निहित है वही आपसी फूट के रूप में उभर कर विदेशियों को शासन करने का खुला निमंत्रण देती है। इसी पर आधारित है ” लहर ” में संग्रहित रचना – शेरसिंह का शस्त्र समर्पण

इसमें सन् 1843 के पंजाब का वर्णन है। केवल एक ही ऐतिहासिक घटना से तत्कालीन पंजाब की राजनीतिक स्थिति को आंका जा सकता है। यह घटना सेनापति लाल सिंह के षडयंत्र पर आधारित है जिसमें शेरसिंह के शस्त्र समर्पण और मृत्यु का उल्लेख है। इसी घटना को आधार बना कर कवि ने सिक्खों को –

” आज के पराजित जो विजयी थे कल ही ” 

कहकर राजा रणजीत सिंह की प्रशंसा की। 1839 में स्वर्ग सिधारे राजा रणजीत सिंह का उल्लेख शेर के रूप में करते हुए इतिहास कहता है कि अंग्रेज़ों द्वारा सिंध को आधीन करने के बाद पंजाब का वह भाग शेष रह गया था जिसकी शक्ति का निर्माण पंजाब के शेर राजा रणजीत सिंह ने किया था। राजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद उनका ज्येष्ठ पुत्र खड्गसिंह गद्दी पर बैठा लेकिन एक वर्ष बाद ही परलोक सिधार गया। इसके तुरन्त बाद एक दुर्घटना में इनके पुत्र नौनिहाल सिंह की भी मृत्यु हो गई। तब नौनिहाल सिंह की माता चाँद कौर राजकाज देखने लगी। महिला के हाथों शासन की बागडोर देखकर स्वयं राजा के मंत्री ध्यानसिंह और उसके नायब शेरसिंह ने, जिसे इतिहासकारों नें राजा रणजीत सिंह का दत्तक बताया है, आँखें फेर ली। अधिक से अधिक सैनिकों को अपने पक्ष में कर विधवा रानी के स्थान पर शेरसिंह 1841 में सिंहासन पर बैठा। चाँद कौर जागीर लेकर अलग हो गई जिसके संबंध में प्रसाद जी ने लिखा है – 

” एक पुत्र वत्सला दुराशामयी विधवा, 
प्रकट पुकार उठी प्राण भरी पीड़ा से ” 

इस आपसी फूट के प्रति त्रस्त मुख से निकल पङा –

” आह विजयी हो तुम 
और है पराजित हम, 
तुम तो कहोगे, इतिहास भी कहेगा यही, 
किन्तु यह विजय प्रशंसा भरी मन की, 
एक छलना है ” 

जन्मभूमि का यह अपमान अंग्रेज़ों के लिए सुनहरा अवसर था। अपने कुचक्र द्वारा षडयंत्र रचाकर 1843 में शेरसिंह, उसके पुत्र और वज़ीर ध्यानसिंह को मौत के घाट उतारा गया। उसके पश्चात रणजीत सिंह जी की छोटी रानी जिन्दा के पांच वर्षीय पुत्र दिलीप सिंह का राजतिलक हुआ तथा ध्यानसिंह का पुत्र हरिसिंह वज़ीर बना जिसे 1844 में रानी के भाई जवाहर सिंह ने गोली मार दी और लाल सिंह से मिलकर शासक बन गया। प्रसाद जी ने भी इसी को आधार बना लाल सिंह के सम्मुख सिंक्खों के शस्त्र समर्पण को चित्रित किया है – 

” लालसिंह ! जीवित कलुष पंचनद का, 
देख दिए देता है, 
सिंहों का समूह नख दन्त आज अपना ” 

अंग्रेज़ों के कुचक्र और लाल सिंह के सम्मुख शस्त्र समर्पण की जानकारी नन्द कुमार देव शर्मा की पुस्तक सिक्खों का उत्थान और पतन में भी मिलती है –

” अनुपम वीरता, अलौकिक साहस, अद् भुत धैर्य का परिचय देकर शेरसिंह ने सोलह हज़ार सिक्खों के साथ आत्म समर्पण कर दिया ”  

इसके बाद प्रसाद जी ने सतलज तट के उस युद्ध का भी वर्णन किया है जिसके फलस्वरूप पंजाब पर अंग्रेज़ों का आधिपत्य हो गया। इस प्रभुता का कारण आपसी मतभेद है – 

” छल में विलीन बल
बल में निषाद था
विकल – विलास का । 
भवन के हाथों से स्वतंत्रता को छीनकर, 
खेलता था यौवन विलासी मत पंचनद ” 

आपसी छल में ही स्वतंत्रता प्राप्ति का बल विलीन हो जाता है जिसमें शासकों की विलासप्रियता विष के रूप में निहित होती है। किन्तु फिर भी स्वाभिमानी सिक्ख प्रसाद जी के काव्य शब्दों में – 

” स्वत्व रक्षा में प्रबुद्ध थे, जीना जानते थे ” 

और जब तक वे जीवित रहे वीरता से ओत-प्रोत रहे तथा स्वतंत्रता को प्राप्त करने का हर संभव प्रयास करते रहे। इस प्रकार यह रचना भीषण स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि के रूप में गौरवान्वित है। 

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन ! 

गुरूनानक जयन्ति की शुभकामनाएं !

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अन्नपूर्णानन्द वर्मा – स्मृति शेष

” दाम लगाइए, जो अधिक दाम दे वह ले जाए

यही सही, आप उसका पचास रूपया दे रहे थे, मैं सौ देता हूँ

मैं डेढ़ सौ देता हूँ

मैँ दो सौ देता हूँ

अजी मैं ढ़ाई सौ देता हूँ, यह कह कर बिलवासी जी ने ढ़ाई सौ के नोट लाला झाऊलाल के आगे फेंक दिए

साहब को भी अब ताव आ गया, उसने कहा आप ढ़ाई सौ देते है तो मैं पांच सौ देता हूँ

लोटा आपका हुआ ले जाइए, मेरे पास ढ़ाई सौ से अधिक नहीं है

यह सुनना था कि साहब के चेहरे पर प्रसन्नता की कूंची फिर गई। उसने झपटकर लोटा उठा लिया और बोला, अब मैं हंसता हुआ अपने देश लौटूँगा। मेजर डगलस की डींग सुनते-सुनते मेरे कान पक गए थे।

मेजर डगलस कौन है

मेजर डगलस मेरे पङौसी है। पुरानी चीज़ों का संग्रह करने में मेरी उनकी होङ रहती है। गत वर्ष वे हिन्दुस्तान आए थे और यहाँ से जहाँगीरी अण्डा ले गए थे।

जहांगीरी अण्डा

जी हाँ, जहाँगीरी अण्डा, मेजर डगलस ने समझ रखा था कि हिन्दुस्तान से वे ही ऐसी चीज़े ला सकते है ”

 

अकबरी लोटा – हास्य-व्यंग्य कहानी का अंश है यह जिसके लेखक है अन्नपूर्णानन्द वर्मा जिनका आज जन्मदिवस है।

हिन्दी गद्य में हास्य-व्यंग्य के आरंभिक दौर के लेखक है वर्मा जी जिनकी यह एक ही रचना बहुत लोकप्रिय है और वर्मा जी की पहचान भी इसी रचना से है। यह रचना है ही खास।

इस रचना में अंग्रेज़ो के समय के सामाजिक जीवन का चित्र है। अंग्रेज़ हम भारतीयों का शोषण करते रहे लेकिन वे हम भारतीयों के रहन-सहन, खान-पान के प्रति आकर्षित रहे जिसे आधार बना कर भारतीय अपना गुस्सा भी अवसर पा कर अंग्रेज़ो पर निकालने लगे। ऐसी ही घटना है जहाँ सामान्य लोटा अकबर बादशाह और सामान्य अण्डा जहांगीर बादशाह के समय का बता कर ऊँची कीमत पर अंग्रेज़ो को बेच दिया गया।

अपनी इसी विशेषता के कारण यह रचना हाई स्कूल के पाठ्यक्रम में कई शिक्षण संस्थानों ने शामिल की। अन्य रचनाओं की अधिक जानकारी नहीं है। खेद है कि अन्नपूर्णानन्द वर्मा जी का साहित्य जगत में विशिष्ट स्थान नहीं बन पाया।

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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