बाल गोपाल का मन्दिर
बैंग्लोर से हम सुबह-सुबह ही निकल पड़े मैसूर की ओर।
जी नहीं सीधे मैसूर नहीं… जैसे कि आमतौर पर कहा जाता है बैंग्लोर-मैसूर पर वास्तव में यह कुल चार स्थान है जिनमें से एक स्थान का ऐतिहासिक महत्व बहुत है - टीपू सुल्तान का श्रीरंगपट्टनम जिससे जुड़ा एक और स्थान है मंड्यार जिसे शुगर सिटी कहते है, यहाँ शक्कर के कारख़ाने अधिक है पर और कोई विशेष पर्यटन स्थल नहीं है इसीलिए इस स्थान का नाम हाशिए पर है।
तो हम निकले बैंग्लोर से… रास्ते में गरमा-गरम नाश्ता किया और आगे चल पड़े। सबसे पहले पहुँचे बालगोपाल के मन्दिर। जहाँ गाड़ी रूकी लगा यह पुराना शहर है। पुराने घर और टूटी-फूटी सी खंडहरनुमा जगह नज़र आई। वहाँ पत्थर के स्तम्भ भी नज़र आए लगा यहाँ कोई इमारत थी।
सुबह का ही समय था सो दो-तीन महिलाएँ फूलमालाएँ बेचती नज़र आई। शायद यहाँ बहुत कम लोग आते है और आस-पास की औरतें ही फूलमालाएँ बेच लेती है। दो तरह की मालाएँ थी - एक तो सफ़ेद फूलों की माला जो सामान्य थी पर दूसरी हरी ताज़ा दमकती हुई माला तुलसी दल की थी।
हमें ध्यान आया कि यह कृष्ण मन्दिर है और कृष्ण जी को तुलसी चढाई जाती है। वास्तव में दक्षिण में शिव मन्दिर अधिक है और आन्ध्रपदेश में कृष्ण जी की मूर्ति पर तुलसी दल चढा दिए जाते है और तुलसीदल की मालाएँ नहीं होती।
यहाँ हमने दोनों तरह की मालाएँ ली और मन्दिर की ओर बढे। बहुत ही पुराने ज़माने का मन्दिर लगा पत्थर से बना हुआ जिसमें बीच-बीच में पत्थर के स्तम्भ है।
हमने दर्शन किए बालगोपाल के। बहुत ही सुन्दर सलोनी मूर्ति है। बताया गया कि जिनकी संतान नहीं होती वे महिलाएँ यहाँ पूजा करती है और संतान प्राप्ति की कामना करती है।
वैसे दक्षिण में गोपाल के मंदिर है ही कम और बालगोपाल का मंदिर यह एक ही नजर आया. यहाँ से निकल कर हम आगे बढे रंगनाथ स्वामी मंदिर की ओर।





