मौलाली – उर्स-ए-शरीफ़ का महत्वपूर्ण स्थान

हैदराबाद के छोर पर है मौलाली का पहाड़।

रमज़ान से पहले आने वाले रज्जब महीने में इस स्थान का बहुत महत्व है। हम भी पिछले दिनों रज्जब के महीने में यहाँ पहुँचे।

मज़हबी (धार्मिक) कथा के अनुसार कर्बला की लड़ाई के दौरान कुछ समय के लिए मोहम्मद साहब ने अपने दोनों बेटे हसन और हुसैन तथा अपनी बेगम (पत्नी) फ़ातिमा ज़ोरा के साथ पहाड़ पर विश्राम किया था। इसी की स्मृति में हैदराबाद शहर के छोर के पहाड़ी क्षेत्र में यह पवित्र स्थान बनाया गया है जहाँ हर साल रज्जब के महीने की 16 तारीख़ को उर्स होता है।

यहाँ मुख्य रूप से तीन स्थान है। इन तीनों ही स्थानों पर जाने के लिए एक हज़ार सीढियाँ चढनी पड़ती है। प्रमुख स्थान है मोहम्मद साहब का जहाँ तक पहुँचने के लिए लगभग 500 सीढियाँ है। ज्यादातर लोग सिर्फ़ यहीं जाते है। वैसे मुख्य रूप से चढावा यहीं होता है।

यह पूरा शहरी इलाक़ा है। भरी-पूरी बस्ती है। यहीं से एक गली है जहाँ मुख्य द्वार है और द्वार से ही सीढियाँ शुरू है। देखिए इस तस्वीर में जो सीढियों पर से ली गई है -

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लगभग 300 सीढियाँ चढने के बाद कुछ खुला क्षेत्र है, जहाँ पौधे भी है, यहाँ कुछ देर आराम किया जा सकता है -

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इस तस्वीर में ऊपर जाती सफ़ेद सीढिया नज़र आ रही है। पूरी सीढियाँ पार कर ऊपर जो कमान सी नज़र आ रही है वहाँ से आगे एक कक्ष में मोहम्मद साहब की मज़ार (समाधि) है। रज्जब के महीने में भीतर केवल मुसलमान ही प्रवेश कर सकते है लेकिन अन्य दिनों में सभी प्रवेश कर सकते है। चूँकि हम रज्जब के महीने में गए थे इसीलिए भीतर नहीं जा सके और बाहर से ही माथा टेक लिया। यहाँ मीठी बूँदी का प्रसाद मिला।

एक बात की ज़रूर तारीफ़ की जानी है कि यह जगह बहुत-बहुत साफ़-सुथरी है। चौड़ी सीढियाँ जैसा कि आप नीचे तस्वीर में देख सकते है बहुत साफ़ सुथरी है और दोनों छोर पर मुंडेर इतनी चौड़ी और साफ़ है कि चढते समय कुछ देर बैठ सकते है।

यह पहाड़ को काट कर बनाया गया है इसीलिए सीढियों के दोनों ओर पहाड़ है जो चित्र में नज़र आ रहे है। कुछ श्रृद्धालु सीढियाँ चढने की बजाय पहाड़ पर चल कर जा रहे थे। हमने कुछ सीढियाँ चढी और कुछ पहाड़ से चल कर गए। मुंडेर पर बैठ कर दूसरी ओर पहाड़ पर आसानी से पैर रखे जा सकते है -

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इस तस्वीर में देखिए पहाड़ से लौट रहा एक अपाहिज श्रृद्धालु। दूर दूसरी पहाड़ी पर नज़र आ रही है सफ़ेद सीढियाँ जहाँ ऊपर उनके दोनों बेटों हसन और हुसैन की मज़ार जिसे हसन-हुसैन की दरगाह कहते है -

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जहाँ ऊपर की तस्वीर में हमने कमान देखी थी वहीं बाईं ओर से पहाड़ से चल कर यहाँ जा सकते है पर सीढियों से जाना हो तो दूसरी गली से रास्ता है। यहाँ 300 से अधिक सीढियाँ है। यहाँ बाईं ओर दूर हल्की सी नज़र बारीक सफ़ेद लकीर की तरह सीढियाँ जो नीचे की तस्वीर में कुछ स्पष्ट है यह है उनकी बेगम फ़ातिमा ज़ोरा की दरगाह् -

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यहाँ भी पहाड़ से चल कर जा सकते है पर सीढियों से जाना हो तो दूसरी गली से रास्ता है। यहाँ 200 से अधिक सीढियाँ है।

उर्स में श्रृद्धालु सन्दल (चढावा) लेकर पहाड़ों पर से चढ कर जाते है। सिर्फ़ लोग ही नहीं ऊँट भी पहाड़ चढते है। श्रृद्धालुओं की भीड़ ऊँटों के साथ पहले मुख्य पहाड़ चढती है फिर हसन-हुसैन की दरगाह फिर बेगम फ़ातिमा ज़ोरा की दरगाह पर इबारत के बाद वहीं से नीचे उतरते है। इस तरह एक ओर से चढ कर दूसरी ओर से नीचे आते है।

हम भीतर न जा पाने के खेद और रज्जब को छोड़ किसी और महीने में आने की सोचते हुए लौट आए।

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हैदराबाद में बारकस का जाम

आज चर्चा करेंगे बारकस के जाम की। जी नहीं बारकस किसी व्यक्ति का नाम नहीं है यह एक स्थान का नाम है और जाम… न ट्रैफ़िक जाम है और न ही शराब का जाम, हैदराबाद में अमरूद को जाम कहते है।

हैदराबाद की मिट्टी अमरूद फल के लिए अधिक उपयुक्त है। मिट्टी जिन चीज़ों की पैदावार के लिए अधिक उचित होगी उसी की पैदावार अधिक होती है न, इस तरह यहाँ जाम (हम यहाँ अमरूद नहीं जाम ही कहेंगे) अधिक होता है।

पूरे हैदराबाद शहर में घर-घर में जाम के पेड़ देखे जा सकते है जिन्हें यहाँ जाम का झाड़ कहते है। बारकस के पूरे इलाके में जाम के झाड़ थे। यहाँ का जाम आकार में बड़ा होता था और कुछ झाड़ों के जाम भीतर से लाल होते थे। वैसे अक्सर हैदराबाद के जाम भीतर से सफ़ेद होते है -

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बारकस पुराने शहर के अंतिम छोर पर है। अब जो नया अंतर्राष्ट्रीय राजीव गाँधी हवाई अड्डा बना है, वहाँ जाने का एक रास्ता बारकस के पास से भी गुज़रता है। अब बारकस में जाम के झाड़ एक्का दुक्का ही रह गए है और बस्ती ही रह गई है।

पहले बारकस में एक विशेष समुदाय के लोग ही रहते थे जिन्हें चाउश कहते है, ये तुर्की लोग है। बरसों पहले तुर्क से आकर ये लोग हैदराबाद में बस गए। इनका काम फलों का व्यापार है, विशेषकर जाम। इस समुदाय की संस्कृति मुस्लिम संस्कृति है पर बहुत बारीक सा फ़र्क है इसीलिए इनकी मस्जिद अलग होती है।

इनके पुरूषों का पहरावा बहुत सादा होता है, लुंगी और कुर्ता पहनते है। लुंगी आमतौर पर लाल, हरी और नीले रंग की होती है और चौकड़ियों (चेक्स) की होती है। कुर्ता मोटे कपड़े का बना होता है और गले पर धागों की कढाई होती है जो घर पर महिलाओं द्वारा की जाती है। महिलाएँ सलवार कमीज़ पहनती है और बड़ा दुपट्टा सिर पर से ओढती है।

इनका काम पहले केवल जाम बेचना ही था। अब अन्य व्यापार भी करने लगे है। पहले सुबह-सवेरे पेड़ों से जाम तोड़ना, उन्हें टोकरों में भरकर छोटे व्यापारियों को बेचना और खुद ठेलों पर जाम लेकर बेचने निकलना था। ठेले को हैदराबाद में बण्डी कहते है इसीलिए यहाँ हम भी बण्डी ही लिखेंग़ें। वह नज़ारा ही कुछ अलग था - सुबह होते ही जाम की बण्डियाँ लेकर चाउश निकल पड़ते थे। पहले केवल चाउश ही जाम का कारोबार करते थे अब बहुत ही कम चाउश इस व्यापार में है, अधिकतर दूसरे लोग ही यह कारोबार कर रहे है।

पूरे शहर में जाम की बण्डियाँ जगह-जगह पर हमेशा देखी जा सकती है। पहले एक जाम कुछ पैसों में बिकता था फिर दाम बढने लगे, एक और दो रूपए में एक जाम बिकने लगा फिर किलो से बिकना शुरू हुआ। आजकल 10-12 रूपए में एक किलो मिलता है।

यहाँ स्कूलों ख़ासकर लड़कियों के स्कूल के पास जाम बहुत बिकते है। हमने भी स्कूल के दिनों में बहुत जाम खाए है। एक और ख़ास बात… हैदराबाद में पूजा के बाद अर्क देने के लिए भी जाम का प्रयोग किया जाता है। अर्क खजूर या मौसंबी से भी देते है पर यहाँ जाम को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि यहाँ की मिट्टी का फल यही है।

अब एक नज़र जाम के पोषक तत्वों पर -

100 ग्राम जाम में विटामिन सी 212 मिली ग्राम, लवण 0.7 मिली ग्राम, थायामिन 0.03 मिली ग्राम, रिबोफ़्लेविन 0.03 मिली ग्राम, निकोफ़ेरिक 0.3 मिली ग्राम होता है।

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केसरगुट्टा मन्दिर के दामन में उद्यान

पिछले चिट्ठे में मैनें बताया आन्ध्र प्रदेश के केसरगुट्टा के शिव मन्दिर के बारे में जहाँ श्रावण मास में पूजा का महत्व है।

श्रावण की पूजा के बाद सावन का आनन्द लेने के लिए मन्दिर की पहाड़ी के दामन है ख़ूबसूरत उद्यान जिसके ऊपर पहाड़ी से दिखते कमल सरोवर की तस्वीर भी हम पिछले चिट्ठे में दिखा चुके।

पूजा समाप्त करने के बाद हम पहाड़ी से नीचे आए और उद्यान में प्रवेश कर गए। प्रवेश करते ही सामने है शिव पार्वती गणेश और कार्तिकेय यानि पूरे परिवार की सुन्दर मूर्तियाँ -

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और इन मूर्तियों के सामने बड़ी मूर्ति नन्दी की भी है। पूरे उद्यान में हरियाली फैली है -

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सुन्दर रंगबिरंगे फूलों और बिना फूलों के ऊँचे घने वृक्ष और पौधे थोड़ी-थोड़ी दूर पर उद्यान की शोभा बढा रहे है। -

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बाईं ओर एक रेस्तराँ भी है। दाहिनी ओर से आगे झूलें लगे है -

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यहीं आगे है कमल सरोवर जो ऊपर मन्दिर से दिख रहा था जिसमें बहुत से गुलाबी और सफ़ेद कमल खिले थे। सरोवर के पास तक जाने की मनाही है, पर वहाँ के चौकीदार सुन्दर कमल अनुरोध पर सबको दे रहे थे।

सामने ऊपर देखने पर नज़र आया पहाड़ और चोटी पर मन्दिर -

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यहाँ एक बात बहुत अच्छी लगी। कुछ परिवारों के लोग मिलकर आए थे जो ऊपर पूजा करने के बाद नीचे उद्यान में अपने-अपने घरों से लाया भोजन सब मिलकर नीचे पंक्ति में बैठकर खा रहे थे। बहुत बड़ा समूह था। आजकल भारतीय परम्परा के ऐसे नज़ारे बहुत कम ही देखने को मिलते है।

एक अच्छा समय यहाँ बिताने के बाद और श्रावण की पूजा तथा सावन का आनन्द लेकर हम लौट आए।

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