Archive for हैदराबाद की पहचान

हैदराबादी चाय

हैदराबादी चाय का अपना अलग अंदाज हैं, चाय का भी और उससे जुड़ी भाषा का भी।

हैदराबाद में हल्की (लाइट) चाय पसंद की जाती हैं। यहाँ चाय के लिए ट्रे की संस्कृति नही हैं यानि चाय तैयार होती हैं और सीधे छोटी सी छन्नी (छलनी) से छन कर कप में आ जाती हैं।

चाय बनाने का तरीका भी बहुत सीधा हैं। पानी गरम होने के लिए रखा कर उसमे शक्कर (चीनी) और चाय की पत्ती मिला दी जाती हैं। जब उकलने (उबलने) लगे तब उसमे दूध मिला दिया जाता हैं और छान कर सीधे कप में डाल दी जाती हैं।

यह तो हुई सादी चाय। कुल चार तरह की चाय का यहाँ चलन रहा - यह सादी चाय, सुलेमानी चाय, बुर्के वाली चाय और ईरानी चाय।

बिना दूध की चाय को सुलेमानी चाय कहते हैं। विधि वही हैं जो ऊपर बताई गई हैं।

जब ऊपर बताई विधि से चाय तैयार कर छान कर कप में डालने के बाद ऊपर से मलाई डाली जाती हैं तब इसे बुर्के वाली चाय कहते हैं यानि मलाई के पीछे छिपी चाय, हाँ, मलाई ज्यादा होनी चाहिए।

ईरानी चाय तो सभी जानते हैं, बहुत ज्यादा उबली (उकली) हुई चाय। लगातार गरम होते रहने से स्वाद भी थोड़ा बदल जाता हैं जिसके लिए उकलते समय ही इलाइची डाल दी जाती हैं जिससे स्वाद ठीक रहे।

सिर्फ इलाइची ही नही इलाइची के छिलकों का भी उपयोग किया जाता हैं। इलाइची के दानो का उपयोग करने के बाद केवल छिलके चाय की पत्ति के डिब्बे में रख दिए जाते हैं। इन छिलकों के रखा रहने से ही चाय की पत्ति में खुशबू आ जाती हैं। सिर्फ इस पत्ति के उपयोग से ही चाय में अच्छी खुशबू आती हैं और अगर चाय बनाते समय एकाध छिलका भी डाल दे तो खुशबू बढ़ जाती हैं।

अब बात करते हैं चाय से सम्बंधित हैदराबादी भाषा की। चाय यहाँ कप-सॉसर में पी जाती हैं। प्याला-तश्तरी भी कहा जाता हैं जिसमे तश्तरी शब्द बहुत ही कम चलता हैं, सॉसर ही बोला जाता हैं। लेकिन कप के लिए प्याला और छोटे आकार के कप के लिए प्याली कहा जाता हैं। इसके बहुवचन की शब्दावली बहुत मजेदार हैं। प्याला और प्याली के लिए शब्द ठीक हैं प्याले और प्यालियाँ कहा जाता हैं। लेकिन सॉसर के लिए सॉसरां कहा जाता हैं। वैसे कप के लिए भी कपां कहा जाता हैं। कप को कुछ लोग कोप भी कहते हैं और बहुवचन के लिए कोपां कहा जाता हैं।

चाय पीने के लिए अब भी कई लोग कप और सॉसर दोनों का उपयोग करते हैं, कप में से चाय सॉसर में डाली जाती हैं और सॉसर से पीते हैं।

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डबल का मिट्ठा यानि ब्रेड की मिठाई

हैदराबाद की लोकप्रिय मिठाई हैं डबल का मिट्ठा यानि ब्रेड की मिठाई. हम आपको बताते हैं इसे कैसे बनाया जाता हैं.

सामग्री - एक डबलरोटी यानि ब्रेड - बेहतर होगा साबुत ब्रेड ले. मिठाई बनाने से तुरंत पहले इसके चौडाई में पतले टुकडे काटे यानि स्लाइस काटे जिससे ब्रेड का ताजापन बना रहेगा और हवा लगने से सूखापन भी नही रहेगा. अगर साबुत न मिले तो स्लाइस की ब्रेड भी ले सकते हैं, एक चम्मच घी, स्वाद के अनुसार शक्कर, बारीक कटा सूखा मेवा, एक गिलास दूध

विधि - ब्रेड के स्लाइस के भूरे किनारे निकाल ले. सफ़ेद ब्रेड को घी में सुनहरा होने तक भूने. ब्रेड बहुत नरम होती हैं, जल्दी भुन जाती हैं. अब दूध मिला दे और पकने दे. थोड़ा पकने पर शक्कर मिला दे और अच्छी तरह से पक जाए तो आंच से उतार ले. पकाते समय चम्मच चलाते रहे ताकि तली पर न लगे. मिठाई तैयार हैं.

कढ़ाई में थोड़ा सा घी गरम करे. उसमे सूखे मेवे डाल कर सुनहरा होने तक भूने. फिर इसे गरम-गरम ही मिठाई पर बिखरा दे. हैदराबादी डबल का मिट्ठा पूरी तरह से तैयार हैं.

अच्छे स्वाद के लिए दो बातो का ध्यान रखे -

घी का ही उपयोग करे, तेल न ले यहाँ तक कि रिफाइंड तेल भी न ले.

दूध में ही पकाए, पानी का उपयोग न करे.

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बघारे बैंगन

हैदराबाद की लोकप्रिय सब्जी हैं - बघारे बैंगन जिसे यहाँ भगारे बैंगन भी कहा जाता हैं।

यह सिर्फ शाकाहारी ही नही मांसाहारियों को भी पसंद हैं। दैनिक भोजन से लेकर विशेष भोजन में भी यह शामिल हैं। अगर कोई दावत हैं या घर पर किसी को खाने पर बुलाया हैं, यहाँ तक कि शादी-ब्याह के भोजन में भी यह बनाई जाती हैं। इसका मुख्य कारण हैं हैदराबाद और आस-पास के क्षेत्रो की मिट्टी बैंगन उगाने के लिए समुचित हैं। इसकी चर्चा हम अपने पहले के चिट्ठो में कर चुके हैं। आइए आज इसे बनाना बताते हैं।

पहले हम एक बात बता दे कि अगर आप पसंद न करते हो तो प्याज, लहसुन न ले।

सामग्री हैं - एक किलो गोल छोटे बैंगन जो बहुत छोटे न हो, एक चम्मच इमली, एक चम्मच तेल, दो-चार प्याज, लहसुन की दो-चार कलियाँ, दो-चार सूखी मिर्च, एक छोटा चम्मच जीरा, राई, मेथी मिलाकर दाने, एक चम्मच जीरा, राई, मेथी का पाउडर मिलाकर, एक चम्मच गरम मसाला, एक चम्मच बोजवार मसाला जिसके बारे में हम अपने पिछले चिट्ठो में बता चुके हैं, हरा मसाला यानी कोथमीर (हरा धनिया), पुदीना, करयापाक (करी पत्ता), लहसुन-अदरक का पेस्ट एक-चौथाई चम्मच, एक चम्मच पिसी हुई मूंगफली जिसके लिए मूंगफली के दानो को भून कर पीस ले, एक चम्मच पिसी तिल्ली या तिल जिसे भी मूंगफली की तरह भून कर पीस ले, नमक, मिर्च, हल्दी अपने स्वाद के अनुसार।

तैयारी - इमली को आधे घंटे तक पानी में भिगा कर रखे। एक-दो प्याज का पेस्ट बना ले जिसके लिए प्याज का छिलका निकाल कर पीस ले।

विधि - कढ़ाई में तेल गरम करे। बैगन को आधा-तिरछा दो चीरा लगा कर चार फांके करे पर नीचे से जुड़े होने चाहिए। बैगनो को काट कर तुरंत तले, अगर तलने में देरी हैं तो बैगन को काट कर पानी में रखे क्योंकि थोड़ी सी हवा लगते ही बैगन काले हो जाते हैं। तले हुए बैगन अलग रखे।

अब तेल में जीरा, राई, मेथी दाने डाले, दाने चटकने पर प्याज के लम्बे, पतले कटे टुकडे, सूखी मिर्च डाले और गुलाबी होने तक भूने। फिर प्याज का पेस्ट डाले और गुलाबी होने तक भूने, फिर लहसुन-अदरक का पेस्ट डाले और थोड़ा भूने। यहाँ ध्यान रखे जितना प्याज का पेस्ट लिया हैं उसका एक-चौथाई लहसुन अदरक का पेस्ट ले। अब पिसी तिल्ली, पिसी मूंगफली, गरम मसाला, बोजवार मसाला एक के बाद एक डाले और भूनते जाए। अब मिर्च पाउडर और हल्दी मिलाए फिर इमली का गाढा पानी यानि खट्टा मिलाए। अब इसमे थोड़ा सा पानी डाले और नमक मिलाए फिर तले बैगन मिला दे। थोड़ी देर आंच पर रखे। चम्मच से हल्का हिलाते रहे ताकि मसाला अच्छा मिल जाए पर तली पर न चिपके। अब हरा मसाला ऊपर से बिखरा कर आंच से उतारे और पांच मिनट तक ढक दे।

यह पराठो के साथ भी अच्छा लगता हैं और पूरियो के साथ भी पर सबसे अच्छा लगता हैं बघारा चावल यानि फ्राइड राईस के साथ। हैदराबाद में बघारा बैगन बघारे चावल के साथ ही पसंद किया जाता हैं।

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हैदराबादी पुडिंग

पुडिंग बहुत ही जानी-पहचानी चीज हैं। बेकरी से लेकर फ़ूड वर्ल्ड और रेस्तरां तक, यहाँ तक कि रेलवे के भोजन में भी पुडिंग शामिल रहती हैं।

इसका स्वाद मुझे हर जगह अलग-अलग लगा और देखने में भी अलग दिखी। कहीं आइसक्रीम पुडिंग नजर आई तो कहीं इसमे मैंने ब्रेड के टुकडे देखे तो कही इसमे फल नजर आए। इसी के अनुसार स्वाद भी अलग-अलग रहा पर मुझे तो हैदराबादी पुडिंग ही पसंद आती हैं।

आइए आज हम आपको भी हैदराबादी पुडिंग बनाना सिखाते हैं।

सामग्री हैं - 100 ग्राम कस्टर्ड पाउडर, एक लीटर दूध, स्वाद के अनुसार शक्कर (चीनी), 4-5 इलाइची, थोड़ा सा घी

विधि - दूध गरम करने रखे। जब दूध उबलने लगे तब इसमे शक्कर मिला दे। अब धीमी आंच पर दूध को औंटने दे। इसमे से थोड़ा दूध एक कटोरी में निकाले। इस थोड़े से दूध में कस्टर्ड पाउडर धीरे-धीरे डालते हुए घोले। ध्यान रहे चम्मच लगातार चलाए जिससे डल्ले (गांठे) न रह जाए। अब इस घोल को आंच पर रखे दूध में धीरे-धीरे मिलाए। अब धीमी आंच पर ही लगातार चम्मच चलाए जिससे डल्ले (गांठे) न रह जाए।

जब घोल गाढा हो जाए तो आंच से उतार ले। ट्रे पर घी लगा दे फिर उस पर इस घोल को डाल कर फैला दे। ध्यान रहे परत बहुत मोटी न होने पाए। इस पर इलाइची के दाने बिखरा दे। इसे सूखने दे। सूखने पर चौकोर टुकडे काट ले। पुडिंग तैयार हैं।

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हैदराबादी लोक संगीत – ढोलक के गीत

हर प्रदेश की अपनी लोक संस्कृति होती हैं और होता हैं लोक संगीत।

हैदराबाद की लोक संस्कृति में दक्खिनी जुबान की मिठास हैं। यह जुबान (भाषा) पूरी तरह से न उर्दू हैं न हिन्दी। अलग ही हैं शब्दावली जिसे आज हैदराबादी भाषा के नाम से जाना जाता हैं। इसी हैदराबादी भाषा यानि दक्खिनी जुबान में हैं हैदराबाद का लोक संगीत जिसमे हैं ढोलक के गीत।

अन्य लोक गीतों की तरह ढोलक के गीतों के बारे में भी कहा जाता है कि ये गीत किसने लिखे, कब लिखे, कोई नही जानता। सालों से हैदराबाद की तहज़ीब का एक हिस्सा है ये गीत। पहले शहर में होने वाली शादियों में ये गीत ज़रूर गूंजा करते थे पर अब तो शहर में शायद ही ये गीत कही सुनाई देते हैं, कारण कि नई पीढी की लड़कियों ने इन गीतों को सीखा ही नहीं। इन गीतों की ख़ास बात ये है कि केवल महिलाएं ही इन गीतों को गाती है। जी हां ! पुरूष ये गीत नहीं गाते। महिलाओं के इस समूह में छोटी लड़की से लेकर उम्रदराज महिलाएं भी शामिल है।

ढोलक के गीत यानि वो गीत जो ढोलक पर गाए जाते है। कौन सी ढोलक ? आमतौर पर प्रयोग में आने वाली दो साज़ों की ढोलक नहीं है ये। अण्डाकार ढोलक का ये एक ही साज़ है जिसके दोनों गोलाकार किनारों पर दोनों हाथों से इसे बजाया जाता है और डोरी से गले में भी लटकाया जाता है। सिर्फ़ इसी साज़ पर ये गीत गाए जाते है। इसे ढोलकी कहते हैं पर ढोलकी के गीत न कह कर ढोलक के गीत कहा जाता हैं। वैसे सहायता के लिए हारमोनियम भी बजाया जाता हैं। हारमोनियम रेडियो कार्यक्रम या ऐसे ही अवसरों पर बजाया जाता हैं पर शादी-ब्याह के अवसर पर सिर्फ ढोलकी ही बजाई जाती हैं। ढोलकी के साथ एक और महत्वपूर्ण आवाज होती हैं, यह हैं गायिकाओं की तालियों की आवाज।

गीत की शुरूवात होती है ढोलक की थाप से फिर सभी की तालियों के सुर शुरू होते है, धीमे-धीमे शुरू हो कर तेज़ होने लगते है। फिर शुरू होता है गीत एक आवाज़ में, दो आवाज़ों में, कोरस में। कभी-कभार गीत के शुरू में और बोलो के अनुसार बीच-बीच में भी लड़कियों की हँसने-खिलखिलाने की आवाजे भी होती हैं।

दूसरी ख़ास बात इन गीतों की यह है कि ज्यादातर शादी-ब्याह के गीत ही है जबकि आमतौर पर लोक गीतों में सभी तरह के गीत शामिल होते है जैसे त्यौहारों, बेटे का जन्म आदि मौको पर गाए जाने वाले गीत। और भी ख़ास बात ये है कि ज्यादातर छेड़-छाड़ वाले गीत ही है। वर पक्ष (दूल्हें वाले) और वधू पक्ष (दुल्हन वाले) एक दूसरे को छेड़ते है।

इन गीतों को शहर में जन-जन तक पहुंचाने में आकाशवाणी के हैदराबाद केंद्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही हैं। पचास के दशक से लगभग अस्सी के दशक तक आकाशवाणी के हैदराबाद केन्द्र से इन गीतों ने धूम मचाई। बहुत ही ख़ास बात ये है कि कलाकार केवल दो ही रहे - एक श्रीमती अर्जुमन नज़ीर और दूसरी श्रीमती कनीज़ फ़ातिमा। दोनों का अपना-अपना समूह था। उर्दू कार्यक्रमों में रात साढे नौ बजे से प्रसारित होने वाले नयरंग कार्यक्रम और दोपहर में प्रसारित होने वाले महिलाओं के कार्यक्रम में सप्ताह में कम से कम एक बार जरूर सुनवाए जाते। हालात ये कि रात में लगभग 10 बजे ये गीत प्रसारित होते थे और लगभग सुनसान सड़कों और गलियों में घरों की खिड़कियों से छन कर गूंजा करते थे ये गीत।

वैसे अस्सी के दशक तक आते-आते इन गीतों का प्रसारण कम होने लगा था और अब तो शायद ही कभी सुनवाए जाते हैं। इसी तरह से शहर के शादी-ब्याह के समारोहों में भी इन गीतों की महफ़िल अब नही जमती। नई पीढी शायद ही इन गीतों को जानती हैं। हालांकि आजकल कई राज्यों में लगता हैं लोक संगीत का दौर लौट आया हैं पर हैदराबाद में अब भी ढोलक के गीतों की दुबारा शुरूवात नही हो पाई हैं।

कुछ गीत यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। गीतों के पूरे बोल मुझे याद नही आ रहे जितना याद आ रहा ही उतना लिख रही हूँ।

यह गीत बहुत ही लोकप्रिय रहा -

चार बैंगन हरे-हरे फूफी का चूहा ग़ज़ब किया
दुल्हन आपा की चोटी काट लिया रे
उनकी अम्मा बोले ये क्या हुआ
उनकी सास बोले अच्छा हुआ

चार बैंगन हरे-हरे फूफी का चूहा ग़ज़ब किया
दुल्हन आपा का कान काट लिया रे
उनकी भैना बोले ये क्या हुआ
उनकी नन्दा बोले अच्छा हुआ

इन दक्खिनी शब्दों के मतलब हैं - भैना - बहनें, नन्दा - ननदें, दुल्हन आपा - नई ब्याह्ता

यहां एक बात हम बता दें कि हैदराबाद में सब्जियों में बैंगन का बहुत उपयोग होता है। उसी का यहां प्रयोग हुआ है। हरे बैंगन जो कच्चे होते है चूहे की तरह लगते है।

एक और गीत प्रस्तुत है जिसमे दूल्हा गाँव का हैं और दुल्हन शहर की हैं। गाँव से बारात शहर में आई, दुल्हन वालो ने अपनी शहरी सभ्यता से बरात का स्वागत किया पर गाँव के बारातियों को अपने ही परिवेश की आदत हैं, शहरी परिवेश समझ नही पा रहे, इस पर छेड़-छाड़ देखिए -

अय्यो मा दूल्हे के नाखतरे लोगा

दूल्हा आता बोलको मै मोटर मंगाई
अय्यो मा बन्डियों पर चढने के लोगा
अय्यो मा दूल्हे के नाखतरे लोगा

दूल्हा आता बोलको मैं चादर मंगाई
अय्यो मा बोरियो पर लोटने के लोगा
अय्यो मा दूल्हे के नाखतरे लोगा

बन्डियां शब्द का अर्थ हैं - बैलगाड़ियां

एक ऐसा ही गीत है जिसमें ये कहा गया है कि बारात शहर में आई है। दूल्हें की मां चारमीनार के आस-पास की रौनक में खो गई है -

समधन खो गई मा चारमीनार की सड़क पे
समधन खो गई मा

इधर देखी उधर देखी लाड़ बज़ार की गलियां
हाय समधन मिल गई मा चूड़ी वाले की दुकान पे
समधन खो गई मा चारमीनार की सड़क पे
समधन खो गई मा

इधर देखी उधर देखी चारकमान की गलियां
हाय समधन मिल गई मा फूल वाले की दुकान पे
समधन खो गई मा चारमीनार की सड़क पे
समधन खो गई मा

इस तरह से इस गीत में चारमीनार के चारो ओर का माहौल बताया गया हैं। चारमीनार के एक ओर हैं लाड बाजार जो बरसों से आज भी उसी तरह सजा हैं। यहाँ मशहूर हैदराबादी चूड़ियों के साथ महिलाओं के श्रृंगार की हर चीज मिलती हैं। चारमीनार के दूसरी ओर का क्षेत्र चारकमान कहलाता हैं जहां पहले कतार में फूलो की दुकाने हुआ करती थी पर अब यह दुकाने नजर नही आती हैं। शेष दोनों ओर के माहौल के बारे में भी हैं पर बोल मुझे याद नही आ रहे।

हैदराबादी भोजन में मिर्ची का सालन बहुत लोकप्रिय हैं जिसकी जानकारी और सालन बनाने का तरीका मैं अपने पिछले एक चिट्ठे में दे चुकी हूँ, इस सालन पर भी एक गीत हैं जिसमे यह कहा गया हैं कि मुर्गी की जगह यह सालन बनाया गया हैं। इस गीत का मुखड़ा और अंतिम पंक्ति ही मुझे याद हैं जो इस तरह हैं -

सुनो मोहल्ले वालो मेरी काली मुर्गी खो गई मा
मिर्ची का सालन घी के पराठे
काली मुर्गी खो गई मा

काली मुर्गी मिल गई मा (अंतिम पंक्ति)

एक गीत फिल्म में भी रखा गया हैं। फिल्म का नाम हैं - बाजार।

अस्सी के दशक की इस लोकप्रिय कलात्मक फिल्म में स्मिता पाटिल, नजीरूद्दीन शाह, फारूख शेख, सुप्रिया पाठक ने काम किया हैं। सागर सरहदी की यह फिल्म हैदराबादी जन-जीवन पर आधारित हैं। इसमे एक ढोलक का गीत रखा गया हैं जिसे पैमिला चोपड़ा और साथियो ने गाया हैं। हालांकि इस गीत में देसीपन कम हैं क्योंकि आर्केस्ट्रा का प्रयोग किया गया हैं। वैसे इस फिल्म के अन्य गीतों की तुलना में यह गीत कम पसंद किया गया। सिंगार (श्रृंगार) के इस गीत के बोल हैं -

चले आओ सैंय्या रंगीले मैं वारि रे

सजन मोहे तुम बिन भाए न गजरा
न मोतिया चमेली न जूही न चम्पा
चले आओ सैंय्या रंगीले मैं वारि रे

सजन मोहे तुम बिन भाए न गहना
न झुमका न हार न चूड़ी न कंगना
चले आओ सैंय्या रंगीले मैं वारि रे

सजन मोहे तुम बिन भाए न सिंगार
न मिस्सी न काजल न मेहंदी न गजरा
चले आओ सैंय्या रंगीले मैं वारि रे

जो ढोलक के गीतों की गायकी का अंदाज जानना चाहते हैं वे इस गीत को सुनकर जान सकते हैं।

माना जाता है कि कुछ गीत ऐसे भी है जिन्हें बाद में लिखा गया हैं जिसमे होली के गीत और बचपन के कुछ खेलो के गीत शामिल हैं। कुछ पारंपरिक गीतों के बोलों में फेर-बदल भी किया गया।

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हैदराबादी रसोई से दालचा

अपने पिछले एक चिट्ठे में मैंने खट्टी दाल बनाना बताया था, आज मैं दालचा बनाना बता रही हूँ. खट्टी दाल की तरह यह भी यहाँ लोकप्रिय और पारंपरिक व्यंजन हैं.

इसके लिए सामग्री हैं -

100 ग्राम मसूर (माष) की दाल, एक मध्यम आकार का कद्दू (जो लंबा हरा होता हैं जिसे शायद कुछ क्षेत्रो में लौकी कहते हैं), चार टमाटर, एक मध्यम आकार का अदरक, एक छोटा चम्मच मेथी, राई और जीरा के दाने मिलाकर, दो सूखी लाल मिर्च, एक छोटा चम्मच हल्दी, चुटकी भर हिंग, स्वाद के अनुसार नमक, एक बड़ा चम्मच तेल, थोड़ा सा हरा मसाला यानि कोथमीर (हरा धनिया), पोदिना और करयापाक (करी पत्ता)

अगर आप पसंद करते हो तो एक बड़ा चम्मच घी

एक प्याज, एक बड़ा चम्मच प्याज का पेस्ट, एक छोटा चम्मच लहसुन-अदरक का पेस्ट, तीन चार लहसुन की कलियाँ, अगर आप नही लेना चाहे तो ये चीजे न ले.

विधि -

कदू का छिलका निकाल कर तीन-चार इंच लम्बाई के टुकड़ो में काट ले और टुकडे मोटे रखे क्योंकि पकाने के बाद टुकडे नरम हो जाते हैं और आकार में छोटे लगते हैं. हर टमाटर के चार टुकडे करे. अदरक को घिस ले यानि कदू कस कर ले. बेहतर होगा अदरक के छोटे टुकडे न करे क्योंकि टुकडे अक्सर मुंह में आने लगते हैं जिससे स्वाद में फर्क आता हैं.

दाल, कदू, टमाटर के टुकडे, घिसा अदरक, हल्दी और नमक मिलाकर पका ले. पकने के बाद चम्मच से कदू के टुकड़ो को बचाते हुए अच्छी तरह हिलाए जिससे दाल, टमाटर एक रस हो जाए यानि अच्छे घुलमिल जाए पर ध्यान रहे कदू के टुकड़ो को चम्मच भी लगाने से टुकडे टूटने का डर रहता हैं.

अब पानी इतना मिलाए कि दाल पतली भी न रहे और बहुत गाढी भी न हो.

अब भगार या बघार करना हैं यानि छौंक लगाना हैं. इसके लिए कढ़ाई में तेल गरम करे. जीरा, राई, मेथी के दाने डाले, सूखी लाल मिर्च डाले, प्याज के लम्बे पतले कटे टुकडे, लहसुन की कलियाँ डाले और सुनहरा होने तक भूने. प्याज का पेस्ट डाले जिसके लिए प्याज का छिलका निकाल कर प्याज को पीस ले, पेस्ट बन जाएगा. जब गुलाबी होने लगे तब लहसुन-अदरक का पेस्ट मिलाए और थोड़ा भूने. अब इसमे हिंग और लाल मिर्च पाउडर मिला दे.

इसे दाल में डाले और दाल को उकलने (उबलने) के लिए रख दे. ढक दे. एकाध बार किनारे से चम्मच डाल कर हल्का हिलाए जिससे भगार खराब न हो और दाल नीचे तली पर न लगे. जब उकलना शुरू हो जाए तब ढक्कन हटा दे ताकि उबाल की तेजी से दाल, भगार यानि रोगन बाहर बहने न लगे.

जब खूब उकलने लगे तब घी मिला दे. एक मिनट के बाद हरा मसाला बिखरा दे, चाहो तो चम्मच से हल्के हरा मसाला मिला दे और आंच से हटा ले और ढक दे जिससे भाप अन्दर बनी रहेगी और हरा मसाला भी दाल में मिलने लगेगा. पांच मिनट बाद परोसे. सोंधी खुशबू आएगी. चाहे तो रोटी के साथ खाए या चावल के साथ खाए.

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हैदराबादी खट्टी दाल

आज हम आपको बता रहे हैं हैदराबाद की रसोई में बनाई जाने वाली खट्टी दाल. सामग्री इस तरह हैं -

100 ग्राम अरहर की दाल, एक चम्मच इमली, एक चम्मच तेल, एक प्याज, एक चम्मच प्याज का पेस्ट, एक चौथाई चम्मच लहसुन और अदरक का मिला कर बनाया गया पेस्ट, दो-तीन सूखी लाल मिर्च, एक छोटा चम्मच जीरा, राई, मेथी के दाने मिलाकर, आधा छोटा चम्मच जीरा पाउडर, आधा छोटा चम्मच राई पाउडर, आधा छोटा चम्मच मेथी पाउडर, चुटकी भर हिंग, एक चौथाई छोटा चम्मच हल्दी, नमक और मिर्च पाउडर स्वाद के अनुसार, कोथमीर (हरा धनिया), पुदीना और करयापाक (करी पत्ता) - इन तीनो को हरा मसाला कहते हैं.

अगर आप प्याज लहसुन नही लेना चाहते हो तो न ले.

बनाने की विधि - दाल बनाने से आधा घंटा पहले इमली को भिगो दे.

अरहर की दाल पका ले. इसमे थोड़ा पानी दाल कर चम्मच जोर से चलाए जिससे दाल अच्छी तरह घुट जाएगी और एक रस हो जाएगी. इसमे इमली का पानी दाल दे. इमली में थोड़ा और पानी डाल कर हाथ से थोड़ा मसक ले जिससे अच्छा खट्टा निकला आएगा. इस तरह दो-तीन बार निकाला गया खट्टा मिलाए. फिर इसमे इतना पानी मिलाए कि दाल बहुत गाढी भी न हो और बहुत पतली भी न हो. इसमे नमक मिला दे.

अब बघार करना हैं जिसे हैदराबाद में भगार भी कहते हैं यानि छौंक लगाना हैं.

तेल गरम करे. इसमे जीरा, राई, मेथी के दाने डाले. दाने चटकने पर सूखी लाल मिर्च डाले. अब प्याज के लम्बे पतले कटे टुकडे डाले. प्याज गुलाबी भुन जाने पर प्याज का पेस्ट डाले और गुलाबी होने तक भूने फिर लहसुन अदरक का पेस्ट डाल कर थोड़ा भून ले. अब जीरा, राई, मेथी का पाउडर, डाले फिर हिंग और मिर्च पाउडर डाले, फिर हल्दी डाल कर पूरे छौंक को दाल में डाल दे.

अब दाल को आंच पर रख दे और ढक दे. कुछ देर बाद किनारे से चम्मच डाल कर हल्का हिलाए ताकि छौंक बिखरे नही. इस तरह ऊपर जमे छौंक को हैदराबाद में रोगन कहते हैं. इस तरह दो-तीन बार थोड़ी-थोड़ी देर चम्मच से हिलाए. जब दाल उकलने (उबलने) लगे तब ढक्कन हटा दे.

जब दाल खूब उकलने लगे तब ऊपर से कोथमीर (हरा धनिया), पुदीना, करयापाक बिखरा दे और आंच से हटा कर ढक दे. पांच मिनट तक ढका रहने दे जिससे कोथमीर, पुदीना, करयापाक गरम दाल में मिल जाएगा फिर ढक्कन हटा दे, सोंधी खुशबू आएगी. अब परोसे.

सर्दी का मौसम हो तो टमाटर के खट्टे की खट्टी दाल बनाई जाती हैं. इस मौसम में यहाँ टमाटर बहुत अच्छे मिलते हैं. दाल को छोटे दो-तीन टमाटर के साथ पकाए. यहाँ इमली की जरूरत नही हैं. शेष विधि वैसी ही हैं.

गर्मी के मौसम हो तो कैरी (कच्चा आम) के खट्टे की खट्टी दाल बनाई जाती हैं. दाल को एक मध्यम आकार की कैरी के साथ पकाए. पकने के बाद कैरी को हाथ से मसल दे जिससे खट्टा निकल आएगा. दो-तीन बार कैरी पर थोड़ा पानी डाल कर मसले, पूरा खट्टा निकल आएगा. यहाँ इमली की जरूरत नही हैं. शेष विधि वैसी ही हैं.

इसे चावल या रोटी के साथ खाए. बहुत स्वादिष्ट लगता हैं.

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