Archive for सिनेमा

गुलशन नन्दा की फिल्में – शर्मिली

फिल्म और उपन्यास का एक ही नाम  – शर्मिली

लेकिन फिल्म में कुछ बदलाव है।  हमशक्ल बहने लेकिन स्वभाव अलग – एक शर्मिली ( कंचन ) दूसरी बोल्ड ( कामिनी ) ( दुहरी भूमिका में राखी )

फौजी अफसर ( शशि कपूर ) को बोल्ड कामिनी  से प्यार है लेकिन एक ही शक्ल के धोखे में शर्मिली कंचन से विवाह होता है और सच मालूम होने पर नहीं अपनाता। बोल्ड कामिनी देश द्रोहियों के चंगुल में फंस जाती है और इस गिरोह को पकङने की ज़िम्मेदारी इसी फौजी अफसर पर है। उपन्यास में कामिनी का चरित्र नकारात्मक ही है और अंत में बचने-भागने में मर ही जाती है लेकिन फिल्म में इस चरित्र को पूरा नकारात्मक नहीं किया।  उपन्यास में कामिनी कैबरे भी करती है ….. कहते है फिल्म में भी पहले कैबरे – रेशमी उजाला है गीत राखी से ही करवाया गया था लेकिन बाद में अन्य अभिनेत्री से ….  फिर भी फिल्म और उपन्यास दोनों लोकप्रिय हुए,  दोनों अंदाज़ पाठकों-दर्शकों को पसन्द आए … …

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गुलशन नन्दा की फिल्में – झील के उस पार

फिल्म और उपन्यास का एक ही नाम – झील के उस पार

इस कहानी में मनोरंजन के सभी मसाले है। झील के उस पार और इस पार यानि गांव शहर की कहानी। नायिका शेफाली ( मुमताज़ ) ग़रीब, गांव की और एक बङे व्यक्ति की ग़लती से हुई अंधी, इस बङे शहरी व्यक्ति का बेटा नायक समीर राय (धर्मेन्द्र ) है जो कलाकार है। मुकदमे के सिलसिले में गांव आता है और सौतलेपन से लेकर कई राज़ सामने आते है जिन्हें नायक ठीक करता है

मनोरंजक उपन्यास और फिल्म

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गुलशन नन्दा की फिल्में – नया ज़माना

फिल्म और उपन्यास का एक ही नाम – नया ज़माना

विषय बहुत ही पुराना घिसा-पिटा है – अमीरी और ग़रीबी के बीच की खाई और इन दो वर्गों के बीच की दूरी के कम होने की आशा। फिर भी उपन्यास और फिल्म दोनों रोचक रहे और दोनों लोकप्रिय हुए। अमीर नायिका हेमामालिनी का ग़रीब लेखक नायक धर्मेन्द्र से प्रेम। अमीर प्रकाशक प्राण की हेमा मालिनी से विवाह की इच्छा और धर्नेन्द्र के लिखे उपन्यास – नया ज़माना … को अपने नाम से प्रकाशित करना। सभी मसाले मौजूद …

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गुलशन नन्दा की फिल्में – खिलौना

पत्थर के होंठ – उपन्यास पर बनी है फिल्म – खिलौना

संजीव कुमार की बेहतरीन फिल्म। फिल्म और उपन्यास दोनों लोकप्रिय।

समाज का महिलाओं के प्रति नज़रिया बताती कहानी, कई बार महिलाएं समाज के हाथों खिलौना बन जाती है। एक धनिक का पुत्र ( संजीव कुमार ) मानसिक विकलांग है। डाक्टरी सलाह है कि विवाह से वह ठीक हो सकता है जिसके लिए वह धनिक बदनाम बस्ती से एक पेशेवर लङकी चॉद ( मुमताज़) को कान्ट्रैक्ट पर ले आते है बहू बना कर। असर होता है, बेटा ठीक हो जाता है। इस बीच बहू ननद को चरित्रहीन पङोसी ( शत्रुघ्न सिन्हा) से बचाती है। घटनाक्रम कुछ ऐसा बनता है कि शहर से आए देवर ( जितेन्द्र) से संबंध बता कर बहू को ही चरित्रहीन बताया जाता है, गन्दे खून की बात तक कही जाती है, साथ ही यह सच भी सामने आ जाता है कि बहू वास्तव में एक समाज सुधारक की ही बेटी है

बहुत अच्छी कहानी …

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गुलशन नन्दा की फिल्में – नीलकमल

फिल्म और उपन्यास का एक ही नाम – नीलकमल

फिल्म लोकप्रिय रही लेकिन बहुत बङी लोकप्रियता नहीं मिली जबकि उपन्यास बहुत पसन्द किया गया

कहानी पुर्नजन्म की है। भारती ( वहीदा रहमान ) फिल्म में नाम सीता – पिछले जन्म में राजकुमारी नीलकमल थी जिनसे कलाकार ( राजकुमार ) को प्यार था। दोनों का मेल नहीं हो पाया। इस जन्म में भारती ( सीता ) का विवाह हो गया। उसे नींद में चलने की बीमारी है, सपने में अब भी राजकुमार उसे आवाज़ देते है और आवाज़ सुन कर वह चल पङती है। इन सब बातों से पति राम ( मनोज कुमार ) को छोङ ससुराल वाले विशेषकर सास और ननद भारती ( सीता ) के चरित्र पर संदेह करते है। ऐसी कहानी में स्वाभाविक है कि विवाह का दृश्य महत्वपूर्ण होता है जिसे और भावुक बनाया बिदाई गीत ने जो रफी साहब की आवाज़ पाकर समाज में बेटी की बिदाई का लोकप्रिय गीत बन गया – बाबुल की दुवाएं लेती जा

अन्य गीत भी लोकप्रिय है …

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गुलशन नन्दा की फिल्में – पत्थर के सनम

निर्मोही – उपन्यास पर बनी है फिल्म – पत्थर के सनम

बहुत लोकप्रिय रही यह फिल्म हालांकि इसमें अंत बदल दिया गया। स्टेट मैनेजर की नौकरी पर आए राजेश ( मनोज कुमार ) से शहर से पढ़ कर आई स्टेट के मालिक की बेटी मीना ( मुमताज़) और उसकी गांव की सहेली तरूणा ( वहीदा रहमान ) को प्यार का मज़ाक करते-करते वास्तव में प्यार हो जाता है. मीना का चरित्र उपन्यास में नकारात्मक है वह अमीरी के बल पर अपना प्यार पाना चाहती है. मैनेजर प्यार की परीक्षा लेने अंधेपन का ढोंग करता है और तरूणा परीक्षा में खरी उतरती है, उसे अंधा पति भी स्वीकार है. लेकिन फिल्म में मीना के चरित्र को बाद में अच्छा बताया है। समानान्तर कहानियां भी है और ऐसी ही घटना के चलते मीना को गोली लगती है और उसकी मृत्यु हो जाती है। यह बदलाव भी अच्छा लगा।

फिल्म और उपन्यास दोनों लोकप्रिय रहे। इसके सभी गीत लोकप्रिय है।

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गुलशन नन्दा की फिल्में – सावन की घटा

फिल्म और उपन्यास का एक ही नाम – सावन की घटा

फिल्म को कुछ लोकप्रियता मिली पर बङी सफलता नहीं मिली जबकि उपन्यास लोकप्रिय रहा

कहानी का प्रमुख चरित्र है – सलोनी … जो गॉव की लङकी है जिसकी भूमिका में है – मुमताज़ … लेकिन बिना कहानी बदले फिल्म में प्रस्तुति कुछ ऐसी रही कि सलोनी की भूमिका सिमट गई और शर्मिला टैगोर की भूमिका कुछ उभर कर आई जो शहरी लङकी की भूमिका में है हालांकि जिसकी भूमिका उपन्यास में कम ही है। शायद यही कारण रहा हो फिल्म की कम लोकप्रियता का

वैसे इस फिल्म के गीत बहुत लोकप्रिय है जिसका कारण ओ पी नैय्यर, एस एच बिहारी, आशा भोंसले और मोहम्मद रफी की टीम है

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