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सप्तक सितारा – अज्ञेय

आज ख्यात साहित्यकार अज्ञेय जी की पुण्यतिथि है

अज्ञेय जी ने परिवर्तन के दौर से गुज़र रहे हिन्दी साहित्य को अपने विविध आयामी व्यक्तित्व से सँभाला। साहित्य में तीस के दशक के मध्य में परिवर्तन स्पष्ट होने लगे थे. कविता में छायावादी लक्षण गुम हो रहे थे जिसका कारण था स्वाधीनता के लिए संघर्ष का उग्र होना. ऐसी स्थिति में कोमल भावनाओं को छोड़ समाज की विसंगतियों और जीवन दर्शन पर कवियों का ध्यान जाने लगा. कथा साहित्य में भी आदर्श समाज की स्थापना की कल्पना नहीं की जा रही थी. गोदान में चौराहे पर होरी को मार कर प्रेमचंद ने यही कह कर उपन्यास समाप्त किया कि अब निम्न मध्य वर्ग को संघर्षो से छुटकारा नही.

इन स्थितियों में 1936 में “प्रगतिशील लेखक संघ” की स्थापना हुई. 1942 में इसी संघ ने “अखिल भारतीय लेखक सम्मलेन” का आयोजन किया जिसमे चर्चा हुई कि फुटकर रचनाएँ प्रभाव नही बना पाती इसीलिए कविता का एक संग्रह प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया और इसकी ज़िम्मेदारी सौंपी गई अज्ञेय जी को. साथ ही यह भी निर्णय लिया गया कि इसमे उन्ही कवियों की कविताएँ शामिल की जाए जो कविता को प्रयोग का विषय मानते हो. यह निर्णय भी लिया गया कि इस संग्रह के प्रकाशन से जो आमदनी होगी वह आगे इसी तरह के प्रकाशन में लगाई जाएगी, वह प्रकाशन चाहे काव्य हो या कुछ और. इस तरह इस पहले संग्रह के साथ ही प्रकाशनों की श्रृंखला की भी योजना बन गई.

पहले संग्रह के लिए अज्ञेय जी ने छह कवि चुने – गजानन माधव मुक्तिबोध, नेमीचन्द्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजा कुमार माथुर, रामविलास शर्मा और सातवे वह स्वयं रहे. लेकिन निर्णय के अनुसार सभी कवि प्रयोगवादी नही रहे, कुछ प्रगतिवादी भी रहे और कुछ रचनाओं में छायावादी लक्षण भी रहे यहां तक कि एक ही कवि की रचनाएँ विभिन्न लक्षणों की रही. पर हाँ, उस समय का प्रगतिशील युग सभी में झलका जिसका कारण उस समय सभी क्षेत्रो में होने वाला परिवर्तन रहा. 1943 में प्रकाशित इस संग्रह का शीर्षक “तार सप्तक” रखा गया. सात कवियों के लिए “सप्तक” कहा गया और “तार” शब्द का प्रयोग सभी कवियों में वैषम्य को देखते हुए इन्हे आपस में जोड़ने और संग्रह की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रकाशनों की एक श्रृंखला बनाने के प्रतीक के रूप में किया गया.

1946 में “नया साहित्य” पत्रिका में पहली बार शमशेर बहादुर सिंह ने “तार सप्तक” की समीक्षा की. उन्होंने समीक्षा का आधार काव्य प्रयोगों को बनाया और सिद्ध किया कि यह नए नही है इनका प्रयोग निराला, पंत, नरेंद्र शर्मा कर चुके है. इस दृष्टि से यह सिद्ध होता है कि अज्ञेय ने “तार सप्तक” का सम्पादन कर काव्य की धारा को अविरल बनाया है. छायावाद तक निर्बाध बहने वाली काव्य सलिला अपने लक्षणों के साथ आगे बढ़ रही है साथ ही युगीन चेतना भी उसमे उपलब्ध है. ब्रिटिश राज्य के दबाव में अपने स्वर्णिम इतिहास को याद करते हुए गिरिजा कुमार माथुर ने लिखा –

“नही रहे वे महावंश अब,
वे कनिष्क से, शिलादित्य से नाम हज़ारों,
किन्तु तक्षशिला, साँची, सारनाथ के मंदिर,
और जीवित स्तम्भ धर्म के बोल रहे है
जिस सीमा पर पहुँच न पाई, हुई पराजित
वहां विजय जब हुई प्यार के दूजे से”

“तार सप्तक” के प्रकाशन के सात वर्ष बाद फिर से सात कवियों को ही चुन कर अज्ञेय जी ने 1951 में “दूसरा सप्तक” संपादित कर प्रकाशित करवाया. जैसा कि निर्णय हुआ था प्रकाशनों की श्रृंखला का. यह दूसरा संग्रह भी कविताओं का ही रहा जिससे लगता है उस दौर में साहित्य में अन्य विधाएँ उभर नही पा रही थी. चूंकि अगले प्रकाशनो की स्पष्ट योजना नही थी इसीसे शीर्षक “दूसर सप्तक” ही रखा गया.

एक सप्तक (तार सप्तक) पढने के बाद यह निश्चित हो गया था कि सभी कवि एक समूह के नही है स्वाभाविक है “दूसरा सप्तक” को भी किसी एक श्रेणी का नही मान कर ही स्वागत किया गया. तार सप्तक के समय (1943) स्वतंत्रता नही मिली थी जबकि दूसरा सप्तक के समय (1951) में तभी मिली स्वतंत्रता से सभी उत्साहित थे –

अब उठो कंधे मिलाकर
फिर नया जीवन बनाओ
——————
फिर नई यात्रा करो आरम्भ
अब शिशिरांत भी नज़दीक है

हरिनारायण व्यास जी की इन पंक्तियों में आह्वान है. इस समय परिस्थितियां ऎसी ही थी. ऐसे में पहले से चले आ रहे किसी वाद (प्रगतिवाद और प्रयोगवाद) को लेकर आगे बढ़ने के बजाए कवियों ने अपने नए उत्साह को नई रचनावली में ढाला. युगीन चेतना से प्रभावित कवि कवितायेँ रच रहे थे जिसमे नए प्रयोग भी रहे और प्रगति भी, इस तरह रची गई रचनाएँ “नई कविता” रही. इसीसे “दूसरा सप्तक” की रचनाएँ पढ़ कर लगता है कि यह कृति केवल कविता विधा को आगे बढ़ाने के लिए है. लेकिन इसका अर्थ यह नही कि यह स्थिति मान्य हो गई. अज्ञेय जी ने धर्मवीर भारती जी की इस रचना को शामिल कर स्पष्ट किया कि यह साहित्यिक माहौल पसंद नही किया जा रहा –

“मर गई कविता नही सुना तुमने
भूख ने उसकी जवानी तोड़ दी
उस अभागिन की अछूती मांग का सिन्दूर
मर गया बन कर तपेदिक का मरीज़
और विचारों से कही मासूम संताने
माँगने को भीख है मजबूर”

इन सारी स्थितियों को दर्शाने के लिए अज्ञेय जी ने इन सात कवियों का चयन किया – भवानी प्रसाद मिश्र, शकुन्तला माथुर, हरिनारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश कुमार मेहता, रघुवीर सहाय और धर्मवीर भारती।
फिर भी इस नई कविता को स्वीकार किया गया और अब कविता के आधार निश्चित होने लगे जिससे अज्ञेय जी अगला संग्रह भी कविताओं का ही ले आए और स्वाभाविक है शीर्षक दिया – “तीसरा सप्तक” जिसका प्रकाशन सात वर्ष बाद 1959 में सात कवियों की चुनी हुई रचनाओं से हुआ. अज्ञेय जी ने इन सात कवियो को चुना – प्रयाग नारायण त्रिपाठी, कीर्ति चौधरी, मदन वात्स्यायन, केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण. विजयदेव नारायण साही और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

पिछले दो सप्तको की तरह इन सात कवियों में भी वैषम्य ही है. अब अज्ञेय जी भी यह निश्चित कर चुके थे कि काव्य धारा नए रूप में आगे बढ़ रही है और काव्य में एक नई विधा “नई कविता” स्थापित हो चुकी है. तभी तो “तीसरा सप्तक” की भूमिका में अज्ञेय जी ने लिखा –

“तार सप्तक एक नई प्रवृत्ति का पैरवीकार मांगता था, इससे अधिक विशेष कुछ नही, तीसरा सप्तक तक पहुंचते-पहुंचते प्रवृत्ति की पैरवी अनावश्यक हो गई.”

“तीसरा सप्तक” की कविताएं भी अपने समाज की स्थिति बताती है. बढती निराशा और आधुनिकता की चर्चा तो है ही साथ ही भविष्य के लिए आशा भी है. मदन वात्स्यायन जी की यह पंक्तितयां –

“हारी हुई बाजियों ने जब मुझे परेशान कर रखा था
मुझे तबाह कर रखा था
खाए डाल रही थी मुझे
उस वक़्त मेरे हाथ में एक बार और ताश के पत्तों की तरह
उषे, तुम फिर एक बार आ गई

उषा यानि सुबह जो प्रतीक है आशा का.

इस तरह “नई कविता” को स्थापित करने के साथ-साथ साहित्य के इतिहास में सप्तकों की श्रृंखला भी गौरवान्वित हुई जिसका श्रेय अज्ञेय जी को ही है.

इसके बाद थोड़ा व्यवधान आया. सात वर्ष के अंतराल से सात कवियों की चुनी हुई रचनाओं के प्रकाशन “सप्तक” का अगला पड़ाव समय से नही रहा. लेकिन “तीसरा सप्तक” का दूसरा संस्करण 1961 में और तीसरा संस्करण 1967 में प्रकाशित हुआ. इस बीच 1963 में “तार सप्तक” का दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ. बीस वर्ष का अंतराल पूरा होने से “तार सप्तक” को “ऐतिहासिक कृति” माना गया क्योंकि बीस वर्षों की एक पीढी मानी जाती है. बीस वर्ष के अंतराल को पार करने के लिए इसमे हर कवि की एक नई रचना भी रखी गई.

“तार सप्तक” को “ऐतिहासिक कृति” का गौरव मिलने के बाद भी एक बारगी यूं लगा कि काव्य विशेष की श्रृंखला तीन सप्तको में सिमट गई. लेकिन यह भ्रम टूटा बीस वर्ष बाद 1979 में “चौथा सप्तक” के प्रकाशन से और देरी का कारण भी स्पष्ट हो गया. अज्ञेय जी को भी इस बात का अनुभव हो गया था कि प्रकाशनों की यह श्रृंखला केवल साहित्य का संग्रह नहीं अपितु साहित्य में काव्य धारा को आगे ले जाने में सहायक है. “चौथा सप्तक” की भूमिका में अज्ञेय जी ने लिखा –

“काव्य को नई दिशा देने और “कविता क्षेत्र” में “नए आंदोलनों” को खड़ा करने में भी “सप्तकों” का योगदान रहा है.”

इसका प्रमुख आधार यही है कि अज्ञेय जी ने तीनों सप्तकों में चुनी हुई रचनाओं का संकलन किया. तीसरे और चौथे सप्तक के बीच बीस वर्षों के अंतराल का भी यही कारण है कि रचनाओं का चुनाव कठिन हो रहा था. इन बीस वर्षो के अंतराल में परिवेश बदला जिससे कवियों की दृष्टि में परिवर्तन आया जो रचनाओं में छलका। इस दौर में एक महत्वपूर्ण बात हुई – 1975 और आस-पास के समय की स्थितियां, जिसका प्रभाव कवियों की “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” पर पड़ा. “चौथे सप्तक” की भूमिका में इस बात को स्पष्ट करते हुए अज्ञेय जी ने कहा कि आज के दौर की कविता में “मैं” छा गया है. अवधेश कुमार ने “और उसकी आस्तीन की तह में” शीर्षक कविता में आधुनिक परिवेश की भयावहता में जीवन की सार्थकता पर प्रश्न चिन्ह लगाया है –

“और वहां कैक्टस के पीप का समंदर है
और वहां गुम्बद के भीतर एक गूँज आत्महत्या की है
और वहां शेर के पंजे में छुपा एक काँटा है
और वहां बैल का पिचका हुआ कंधा है
और वहां सांप की निकाल ली गई ज़हर की थैली है
और वहां कंकाल को सूंघती हुई निराकार आत्मा है
और वहां भौंचक खड़ा एक परमेश्वर है
और वहां परमेश्वर के पैरों को धर कर जमता सीमेंट है
और वहां सीमेंट में बदलता यह ब्रह्माण्ड है
और वहां आने वाले कल की खबरों वाला एक अखबार है
और इन सब के नीचे दबा जो हस्ताक्षर है
मैं : वह केवल मैं हूँ”

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इन बीस वर्षों की कविता साहित्य से नदारद रही. “चौथा सप्तक” में इस अंतराल के दौर की कवितायेँ भी है. चौथा सप्तक के सात कवि – अवधेश कुमार, राजकुमार कुम्भज, स्वदेश भारती, नन्द किशोर आचार्य, सुमन राजे, श्रीराम शर्मा, राजेन्द्र किशोर

चौथा सप्तक के प्रकाशन के सात वर्ष बाद 1987 में जब पांचवे सप्तक की प्रतीक्षा की जा रही थी तब अज्ञेय जी ने इस संसार से विदा ले ली. छायावाद के बाद काव्य धारा को जिस तरह समेट कर अज्ञेय जी ने सप्तकों के माध्यम से व्यवस्थित किया था अब फिर से वह बिखरने लगी. खेद है कि सप्तकों के कवियों में से किसी ने भी अज्ञेय जी की सप्तक परम्परा को आगे बही बढाया। इस तरह अस्सी के दशक से आज तक काव्य साहित्य बिखरा हुआ है, न व्यवस्थित है और न ही अध्ययन के लिए सुलभ.

सप्तक सितारा अज्ञेय जी को सादर नमन !

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हिन्दी काव्य धारा

आज विश्व कविता दिवस है ….साहित्य की पहली विधा है – कविता  …. भारतीय साहित्य की बात करें तो पहला ग्रन्थ है रामायण जिसके रचयिता है वाल्मिकी और दूसरा ग्रन्थ है महाभारत जिसके रचयिता व्यास है लेकिन इनका रचनाकाल पता नहीं । इतना कहा जा सकता है कि इन ग्रन्थों की भाषा वेदों की भाषा संस्कृत है और लिपि देवनागरी। इसके बाद कितना समय बीता कहा नहीं जा सकता फिर शुरू हुआ हमारा समय यानि पहली सदी शुरू हुई। दूसरी या तीसरी शताब्दी में लिखा गया साहित्य उपलब्ध है। पहले कवि है – महाकवि कालिदास

अब साहित्य में दूसरी विधा शुरू हुई – नाटक… लेकिन नाटकों में भी संवाद पद्य में ही रहे। कालिदास की पहली रचना नाटक है – मालविकाग्निमित्रम  …. जो शासक अग्निमित्र पर केन्द्रित है। दूसरी रचना है –  अभिज्ञान शाकुन्तलम जो सबसे अधिक लोकप्रिय है। काव्य सौन्दर्य की दृष्टि से मेघदूत सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है जो एक खण्ड काव्य है। इन रचनाओं की भाषा संस्कृत है और लिपि देवनागरी। आगे संस्कृत में साहित्यकार हुए जिनके ग्रन्थ भी उपलब्ध है।

समय के साथ समाज में परिवर्तन हुए और साहित्य भी बदला। अब शक्ति के रूप में ईश्वर को माना जाने लगा, ध्यान का महत्व बढ़ा, योग, सिद्धि जैसी बातें प्रचलित हुई और जो साहित्य रचा गया वो एक तरह से संत साहित्य ही रहा और जनता से जुङने के लिए जनता की भाषा का प्रयोग होने लगा यानि संस्कृत ही न हो कर पाली और प्राकृत भाषाओं में भी लिखा जाने लगा। यहां बौद्ध और जैन धर्मों का भी प्रभाव बढ़ने लगा। ये उपदेशात्मक साहित्य बहुत कम उपलब्ध है। लगभग दसवीं शताब्दी तक यही स्थिति रही। फिर कवियों ने पौराणिक, सामाजिक आधार छोङ अपने राजाओं को अपनी रचनाओं का केन्द्र बनाया। दूसरी ओर भाषा भी परिवर्तित होने लगी। स्थानीय बोलियां या भाषाएं भी अब साहित्य में प्रयोग होने होने लगी। इस समय यानि ग्यारहवीं सदी में पृथ्वीराज चौहान का राज था। राजकवि थे चन्द्र बरदाई। दिल्ली और कुछ स्थानों पर अपभ्रंश भाषा का प्रभाव था जिसे अवहट्ट भी कहते है। चन्द्र बरदाई ने पृथ्वीराज चौहान के जीवन पर एक ग्रन्थ लिखा – पृथ्वीराज रासो  …. जिसमें संस्कृत साहित्य की तरह दोहे, चौपाए है, लिपि देवनागरी है लेकिन भाषा अवहट्ट है जो इस स्थान की हिन्दी का प्रारंभिक रूप है –

“‘बज्जिय घोर निसाँन रांन चौहान चहुँ दिसि। सकल सूर सामंत समर बल जंत्र मंत्र तिसि।।”

यहां हम बता दे कि विभिन्न स्थानों पर हिन्दी का विकास प्राकृत और स्थानीय बोलियों के साथ विभिन्न रूपों में हुआ। इस तरह हिन्दी का पहला महाकाव्य सामने आया – पृथ्वीराज रासो  …. और पहले कवि बने चन्द्र बरदाई। यह महाकाव्य विभिन्न छोटे-बङे संस्करणों में उपलब्ध है और मूल प्रामाणिक ग्रन्य़ की पहचान कठिन है।

राजदरबारी कवियों का अपने आश्रयदाता राजाओं के लिए साहित्य रचा जाना जारी रहा। इस तरह इस दौर को वीरगाथा काल या हिन्दी साहित्य का आदिकाल कहा गया। अगली सदी यानि बारहवीं सदी में अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में कवि हुए – अमीर खुसरो  …इस समय मेरठ के आस-पास खङी बोली लोकप्रिय हो रही थी। अमीर खुसरो ने खङी बोली में भी साहित्य रचा, यह फुटकर साहित्य रहा जो पहेलियों पदों के रूप में मिलता है –

“छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके”

इस तरह अमीर खुसरो खङी बोली हिन्दी के पहले कवि माने गए। अब परिस्थितियां कुछ बदलने लगी। युद्ध, संघर्ष से लोग परेशान होने लगे थे। ऐसे में भक्ति की ओर झुकाव होने लगा। मिथिला प्रदेश में स्थानीय बोली मैथिली में विद्यापति ने कृष्ण भक्ति के पद रचे –

“देखदेख राधा-रूप अपार।, अपुरुष के बिहि आनि मिला, ओल।खिति-बल लावनि-सार ।
अंगहि अंग अनंग मुरछायत, हेरए पडए अधीर।”

इन पदों की लोकप्रियता से मैथिल कोकिल कहलाए  …. आगे इस तरह का साहित्य बढ़ने लगा और इस दौर का साहित्य कहलाया – भक्ति काल

अब साहित्यकार समाज के बीच से ही निकलने लगे थे। बड़ी बात यह रही कि अपने अनुभव को शब्दो में ढाला जाने लगा और अधिकाँश कवि शिक्षित भी नही है। इस तरह कविता यथार्थता बताने लगी और आवश्यकता के अनुसार उपदेश भी देने लगी। इन्ही बातों का संकलन काव्य कहलाया। वास्तव में ये साहित्यकार न हो कर समाज जागरूकता में लगे या अपने आप को ईश्वर से जोङने वाले रहे जिन्हें संत भी कहा जाने लगा। यह तेरहवी सदी का समय रहा। कई तरह के अनुभवों के आधार पर भक्ति काव्य दो रूपो में सामने आया। कुछ संतों ने ईश्वर को निराकार, निर्गुण माना और ईश्वर को पाने के दो रास्ते बताए – पहले रास्ते के संतो ने ज्ञान को महत्त्व दिया जिनमे प्रमुख है – कबीर

” पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूँ पहाड़ ताते ये चक्की भली पीस खाए संसार “

संतो की इस वाणी को संकलित किया गया जो काव्य साहित्य बना जिसकी भाषा जनता की, बोलचाल की भाषा रही। ये साहित्य अधिकतर दोहों के रूप में मिलता है। दूसरे रास्ते के संतों ने प्रेम को महत्त्व दिया जो ईश्वर से प्रेम कर उसे पाना चाहते है यह अलौकिक प्रेम है. इसमे अधिकाँश सूफी हुए जिनमे प्रमुख है मलिक मोहम्मद जायसी। अलौकिक प्रेम को समझाने के लिए सांसारिक प्रेम का सहारा लिया। अलाउद्दीन खिलजी और पद्मिनी प्रकरण को ध्यान में रखते हुए पद्मिनी और राजा रत्नसेन की प्रेम गाथा को लेकर एक ग्रन्थ रचा – पद्मावत  …. जो दूसरा महाकाव्य है। पद्मिनी को पाने के लिए राजा रत्नसेन कठिन प्रयत्न करते है और इसमें हीरामन सुग्गा ( तोता ) सहायता करता है। यहां पद्मिनी ईश्वर का प्रतीक है और हीरामन गुरू है जो रत्नसेन को मार्ग दिखाता है। यह महाकाव्य अवधि बोली में लिखा गया जिसके जानकार उस समय अधिक थे।

इस समय ऐसा साहित्य भी रचा गया जिसमें साकार ईश्वर की भक्ति की गई। दो रूपों में ईश्वर को माना गया। राम रूप में जिसमें प्रमुख कवि है – तुतसीदास  …. जिनका प्रमुख ग्रन्थ है रामचरित मानस  …. यह तीसरा महाकाव्य है। इसकी भाषा भी अवधि है। दूसरा रूप है – कृष्ण  ….. प्रमुख कवि है – सूरदास, मीरा  …. जिन्होने अपनी बोली बृज में कृष्ण भक्ति के पद रचे। वास्तव में इन कवियों ने साहित्य नहीं रचा बल्कि ईश्वर के प्रति अपनी आस्था विभिन्न रूपों में व्यक्त की जिनका शाब्दिक संकलन साहित्य कहलाया। इस तरह कविता जनता के निकट रही तभी तो अवधि और बृज बोलियों को भाषा का दर्जा मिला। यह स्थिति सोलहवीं शताब्दी तक रही।

सत्रहवीं सदी के आरंभ से कवियों को राजदरबार में आश्रय मिलने लगा।  इस तरह वातावरण बदलने से साहित्य भी बदल। अब कविता रचना अपना पाण्डित्य प्रदर्शन हो गया। बृज बोली में कविता लिखी जाने लगी और कविता को छंद अलंकारो से सजाया जाने लगा। कविता की रीति बनी तभी इस दौर को काव्य का रीति काल कहा गया। काव्य में अब भी दोहे, मुक्तक लिखे जाते रहे। कविता दरबार में होने से विलासिता के रंग में आई। श्रृंगार रस का महत्त्व बढ़ गया। नायिका के सौन्दर्य पर अधिकाँश काव्य रचा जाने लगा। कई बार यह वर्णन बढ़-चढ़ कर रहा चूंकि राजदरबार में युद्ध की भी चर्चा होती थी इसीसे काव्य में श्रृंगार की झन्कार और तलवार की टंकार दोनों सुनाई देने लगी। इस दौर के प्रमुख कवि है बिहारी, केशव

रीतिसिद्ध उन कवियों को कहा गया है, जिनका काव्य ,काव्य के शास्त्रीय ज्ञान से तो आबद्ध था, लेकिन वे लक्षणों के चक्कर में नहीं पड़े । लेकिन इन्हें काव्य-शास्त्र का पूरा ज्ञान था । इनके काव्य पर काव्यशास्त्रीय छाप स्पष्ट थी । रीतिसिद्ध कवियों में सर्वप्रथम जिस कवि का नाम लिया जाता है, वह है – बिहारी । बिहारी रीतिकाल के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि हैं । बिहारी की एक ही रचना मिलती है, …. बिहारी का वियोग, वर्णन बड़ा अतिशयोक्ति पूर्ण है। यही कारण है कि उसमें स्वाभाविकता नहीं है, विरह में व्याकुल नायिका की दुर्बलता का चित्रण करते हुए उसे घड़ी के पेंडुलम जैसा बना दिया गया है –
इति आवत चली जात उत, चली, छसातक हाथ। चढी हिंडोरे सी रहे, लगी उसासनु साथ॥

गणित संबंधी तथ्य से परिपूर्ण यह दोहा देखिए –
कहत सवै वेदीं दिये आंगु दस गुनो होतु। तिय लिलार बेंदी दियैं अगिनतु बढत उदोतु।।

नायक और नायिका के प्रेम को दर्शाने वाला यह दोहा भी प्रसिद्ध है –
कहत ,नटत,रीझत ,खीझत ,मिळत ,खिलत ,लजियात । भरे भौन में करत है,नैनन ही सों बात ।

अठारहवी सदी की शुरूवात में ही ब्रिटिश कंपनी भारत में व्यापार करने आई और धीरे शासन करने लगी। अब समाज को जागरूक करने के लिए साहित्य का भी सहारा लेना पड़ा। साहित्य द्वारा जनता तक सन्देश पहुंचाने के लिए गद्य में साहित्य रचा जाने लगा यानि कविता का साहित्य में एकाधिकार समाप्त हो गया , इस बदलते साहित्य की समयावधि कहलाई – आधुनिक काल  ….  अब कविता के विषय भी बदले। प्रमुख रूप से उभरे – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र  … जिन्होंने हिन्दी में नाटको की शुरूवात की और बृज बोली में कविता लिखने लगे –
‘ हाय हाय भारत दुर्दशा देखी न जाय ‘

के साथ हिंदी भाषा के लिए अनमोल पंक्तियाँ दी –
‘ निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल ‘

खड़ी बोली में कविता लिखना भी यहीं से आरम्भ हुआ। इस तरह यह पुनर्जागरण काल रहा इसे भारतेन्दु युग कहा गया। आगे इतिहास पुराण से चरित्र और घटनाएं लेकर काव्य रचा जाने लगा जिनके मूल में सीधे या परोक्ष रूप से देश भक्ति ही रही. इस समय हिंदी में दो महाकाव्य रचे गए – मैथिलीशरण गुप्त का साकेत  … जो लक्ष्मण पत्नी उर्मिला की विरह गाथा के साथ नारी के धैर्य और त्याग को दर्शाता रहा। रामधारी सिंह दिनकर की उर्वशी  …. जिसमे पुरूरवा के शौर्य से भारत की वीर भावना दर्शायी गई। इस दौर में सोहनलाल द्विवेदी जी की देशभक्ति रचनाएं महत्वपूर्ण रही। यह दौर महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम से द्विवेदी युग कहालाया। हालांकि महावीर प्रसाद द्विवेदी ने गद्य में विभिन्न विधाओं में साहित्य रचा और इन्ही सेवाओं के कारण पहले हिन्दी साहित्यकार रहे जिन्हें आचार्य की पदवी मिली। उन्नीसवीं शताब्दी में तीस के दशक से कविता का रूप बदल। इस समय दो महाकाव्य रचे गए – जयशंकर प्रसाद का कामायनी  … जो बहुत लोकप्रिय है।  और सुमित्रानंद पन्त का लोकायतन  …. जिसे पन्त जी की अन्य रचनाओं जैसी लोकप्रियता नही मिली। इस तरह कामायनी हिंदी का अंतिम लोकप्रिय महाकाव्य है।

तीस के दशक में छायावाद अपने चरम पर रहा लेकिन 1936 से काव्य में छायावादी प्रवृतियां कम होने लगी. जिसका कारण बदलता परिवेश रहा. स्वतंत्रता के लिए संघर्ष बढ़ने लगा था, ऐसे में कवियों के लिए जीवन की सूक्ष्म अनुभूतियों के साथ प्रकृति चित्रण सहज नही रहा. छायावादी कवियों की रचनाओं में परिवर्तन दिखाई देने लगा. छायावाद के प्रमुख चार स्तम्भों में से एक सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने “वह तोड़ती पत्थर” की रचना की जिसमे छायावादी लक्षण नही थे, जीवन का संघर्ष था और उस संघर्ष के लिए शब्दावली भी कोमल न रही. यह कविता में एक नया प्रयोग था. इसी तरह निराला जी आगे बढ़ते गए और अपने प्रयोगों से प्रयोगवादी कवि कहलाए. साथ ही छायावाद के दूसरे प्रमुख कवि सुमित्रानंदन पंत स्वतंत्रता के संघर्ष से प्रभावित हो अरविंद के दर्शन को मानने लगे. यही से उनके काव्य में प्रकृति के स्थान पर समाज, जीवन और दर्शन दिखाई देने लगा और इस प्रगति से पंत जी प्रगतिवादी कवि भी कहलाए. इस तरह प्रगतिवाद और प्रयोगवाद कविता में साथ-साथ चला. वास्तव में नई काव्य प्रवृतियों का आरम्भ 1932 में हरिवंश राय बच्चन की रचना “तेरी हार” और 1934 में नरेंद्र शर्मा की रचना शूल फूल से हुआ.

कविता में नए प्रयोग होने लगे और समाज को भी काव्य में स्थान मिलने लगा जिससे इन रचनाओं में प्रगतिवादी लक्षण दिखाई दिए साथ ही प्रगतिवादी रचनाओं में अपने भाव अभिव्यक्त करने के लिए प्रयोग किए जाने लगे जिससे प्रगतिवादी और प्रयोगवादी रचनाएँ निकट आई और इन वादो के कुछ-कुछ लक्षण लेकर जो कविता बानी वह “नई कविता” कहलाई.नई कविता के आरम्भ से ही इसके समानांतर अस्सी के दशक तक विभिन्न वर्गों में भिन्न-भिन्न शीर्षकों से काव्य धारा बहती रही जो इस तरह है –

सनातन सूर्योदयी कविता – इसकी घोषणा वीरेन्द्र कुमार जैन ने ” भारती ” नामक पत्रिका के मार्च 1962 के अंक में की. किन्तु इसी पत्रिका के फरवरी 1965 के अंक में नूतन कविता का स्वर सुनाई दिया.

युयुत्सवादी कविता – इसके प्रवर्तक श्री शलभ, श्री राम सिंह है. इसका सम्बन्ध ” युयुत्सा ” नामक पत्रिका से रहा. सबसे पहले यह ” रूपमभरा ” पत्रिका के 1966 के अंक में प्रस्तुत की गई.

अस्वीकृत कविता – 1966 में श्री राम शुक्ल ने इसे स्वर दिया. इसकी परिभाषा दी – सत्य को सत्य न कह पाने की विषमता कभी अवरोध तोड़कर बाह निकलती है और तभी जन्म होता है अस्वीकृत कविता का.

अकविता – इसका आरम्भ डॉ श्याम परमार ने किया। इसका समय 1965 व माध्यम ” अकविल्प ‘ नामक छोटी सी पत्रिाका है.

बीट कविता – अमरीकी बीटनीक के प्रभाव से डॉ प्रभाकर माचवे, बंगला साहित्य की भूखी पीढ़ी की कविता के प्रभाव से राजकमल चौधरी और निम्न वर्ग से प्रभावित हो त्रिलोचन और शमशेर बहादुर सिंह ने बीट कविता से अपने आप को जोड़ा. ” कृति ” और ” अभिव्यक्ति ” नामक पत्रिकाओं में अपनी धारण को घोषित भी किया.

ताज़ी कविता – नई कविता में नयापन न होने की बात कह कर लक्ष्मी कान्त वर्मा ने ताज़ी कविता का आंदोलन आरम्भ किया जो अधिक समय न चला.

प्रतिबद्ध कविता – इसके प्रवर्तक डॉ परमानंद श्रीवास्तव रहे.

सहज कविता – इसके प्रवर्तक डॉ रविन्द्र भ्रमर है तथा समर्थक अज्ञेय और इंद्रनाथ मदान है. इसका आरम्भ 1967 में हुआ. 1968 में ” सहज कविता संग्रह ” प्रकाशित हुआ.

नवगीत – इसका आरम्भ 1958 से है. यह समानांतर चल रहा है और स्थापित हो गया है.

इस तरह अस्सी के दशक तक मुख्य रूप से दो विधाएँ रही – नई कविता और नवगीत … और यही दोनों विधाएँ आज भी जारी है. वैसे सत्तर के दशक से ही कोई नया समूह, कोई नई दिशा काव्य जगत में नज़र नही आई.

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स्मृति शेष – नरेंद्र शर्मा

आज हिन्दी जगत के सुविख्यात गीतकार कवि और विविध भारती के जनक पंडित नरेंद्र शर्मा की पुण्यतिथि है।

सौ वर्ष  पूरे हो चुके है,   1913  में 28 फरवरी के दिन उत्तर प्रदेश में पंडित नरेंद्र शर्मा जी का जन्म हुआ था. पण्डित नरेन्द्र शर्मा जी से मेरा परिचय स्कूल के दिनों में हुआ जब स्कूल में हम हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीखा करते थे। उन दिनों विविध भारती से एक गीत सुना करते थे – ज्योति कलश छलके … यह गीत बहुत अच्छा लगता था क्योंकि यह गीत उन गीतों जैसा लगता था जो हम संगीत की कक्षा में विभिन्न रागों में सीखते थे। बाद में विवरण भी सुनने लगे तब पता चला  कि यह गीत पण्डित नरेन्द्र शर्मा का लिखा है जिसे लता मंगेशकर ने सुधीर फडके के संगीत निर्देशन में भाभी की चूडिया फिल्म के लिए गाया है।

नरेन्द्र शर्मा जी का दूसरा गीत मैंने सुना फिल्म सत्यम शिवम् सुन्दरम का शीर्षक गीत जो सुनने में बहुत अच्छा लगता रहा। बाद में जब साहित्य का अधिक अध्ययन करने लगे,  यूनिवर्सिटी जाने लगे तब लगने लगा कि इस गीत का सही उपयोग नही किया गया। इसी दौर में गीतकार नरेन्द्र शर्मा जी को अधिक जानने का अवसर मिला। उनकी रचनाएं पढी और तब अक्सर भूले बिसरे गीत कार्यक्रम में कुछ गीतों के लिए गीतकार के रूप में उनका नाम सुना और बाद में यह भी पता चला कि विविध भारती के जनक पण्डित नरेन्द्र शर्मा जी ही है।

इस दौर में स्वाभाविक है कि फिल्म और साहित्य के साथ की भी चर्चा होती। तब लगने लगा कि फिल्म और साहित्य का साथ अक्सर होता है पर यह साथ निभना कठिन होता है। विशेष रूप से शुद्ध साहित्यिक धरातल पर लिखने वाले रचनाकारों के लिए फ़िल्मी डगर रोचक नही होती। फ़िल्मी गीत जन साधारण को ध्यान में रख कर लिखे जाते है इसीसे शुद्ध साहित्यिक गीतों को फिल्मो के लिए लेना फिल्मकारों के लिए जोखिम का काम है। एक दृष्टि हम नरेन्द्र शर्मा जी के फ़िल्मी काम पर डालते है तो लगता है  कुछ  फिल्मकारों  के लिए नरेन्द्र शर्मा जी के गीत लेना  जोखिम नही रहा। भाभी की चूडिया फिल्म के सभी गीत लोकप्रिय रहे यहाँ तक कि मीनाकुमारी जी पर फिल्माया गया यह गीत – लौ लगाती गीत गाती,  इसके बोल देखिए –

आशा की पाँखुरी, श्वासों की बाँसुरी,
थाली ह्र्दय की ले, नित आरती सजाती

इसे पूजा अर्चना की तरह फिल्माया गया है। और रत्न घर फिल्म के इस लोकप्रिय गीत के बोल –

ऐसे है सुख सपन हमारे,  ऐसी इन सपनों की माया
जल पर जैसे चांद की छाया, चांद किसी के हाथ न आया
चाहे जितना हाथ पसारे, ऐसे हैं सुख सपन हमारे….

न केवल भाभी की चूड़ियाँ जैसी फिल्म बल्कि अफसर जैसी व्यावसायिक फिल्म के लिए भी उनका लिखा गीत बेहद लोकप्रिय रहा और वो भी सुरैया की आवाज़ में उन्ही पर फिल्माया गाया – नैना दीवाने एक नही माने। कही बोल साधारण भी हो जाए तब भी भाव असाधारण रहे –

जाना ना जाना मन ही ना जाना,  चितवन का मन बनता निशाना
कैसा निशाना कैसा निशाना,  मन ही पहचाने ना,  माने ना माने ना
नैना दीवाने

सुन्दर प्रतीक और बिम्ब का सहारा लेकर गीतों में भाव स्पष्ट किए जिससे न केवल सुनने में अपितु इन गीतों के अनुभव में अनूठापन रहा –

अम्बर कुमकुम कण बरसाये,  फूल पँखुड़ियों पर मुस्काये
बिन्दु तुहिन जल के,  ज्योति कलश छलके

हिन्दी के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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