Archive for साहित्य

स्मृति शेष – केदारनाथ सिंह

आज हिन्दी साहित्य जगत के ख़्यात कवि केदारनाथ सिंह का जन्मदिवस है।
साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से वर्ष 2013  में सम्मानित कवि  केदारनाथ सिंह जी हिन्दी काव्य जगत में पचास के दशक में उभरने वाले प्रमुख कवियों में से एक नाम है जिन्हें पाठकों का विशाल समूह दिया अज्ञेय जी ने अपने महत्वपूर्ण संकलन  ” तीसरा सप्तक ” द्वारा। इसके सात महत्वपूर्ण कवियों में केदारनाथ सिंह जी को भी सम्मिलित किया गया जिससे उनका नाम साहित्य में भी  रेखांकित हुआ।
साहित्य में ” तीसरा सप्तक ”  एक चुनौतीपूर्ण प्रयोग था क्योंकि सप्तकों की श्रृंखला में पिछले दो सप्तकों – तार सप्तक और दूसरा सप्तक ने आधार लगभग निश्चित से कर दिए थे। इस स्थिति में भी 1959 में प्रकाशित ” तीसरा सप्तक ” के 1961 में दूसरे और 1967 में तीसरे संस्करण का प्रकाशन हर्ष का विषय है। इसे स्वयं अज्ञेय ने भी स्वीकारा है –
” तार सप्तक ” एक नई ( काव्य ) प्रवृत्ति का पैरवीकार मांगता था, इससे अधिक विशेष कुछ नहीं। ” तीसरा सप्तक ” तक पहुँचते – पहुँचते प्रवृत्ति की पैरवी अनावश्यक हो गई और कवियों की पैरवी का तो सवाल ही क्या है ?  …
भूमिका में यह कह अज्ञेय ने सातों कवियों की महत्ता सिद्ध कर दी।  इस तरह कवि केदारनाथ सिंह जी पचास के दशक में साहित्य पटल से अनेकों पाठकों तक पहुँचे। आपके पिता राजनीति में सक्रिय थे। इसी से प्रभावित प्रथम रचना का विषय  ” सुभाष की मृत्यु ” था। अज्ञेय ने केदारनाथ सिंह जी की रचनाओं के बारे में लिखा –
” सभी रचनाएं नई कविता की प्रवृत्तियों के अंतर्गत रखी जाती है तथापि आपके विचार में नई कविता दोषयुक्त है कारण यहाँ बिम्बों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त नहीं हुआ है जिसके प्रयोग पर आप बार-बार बल देते है। “
इससे स्पष्ट हो जाता है कि कवि केदारनाथ सिंह जी यथार्थ का चित्रण करते-करते स्पष्टवादी भी हो गए थे, तभी तो साहित्य के अन्य पूर्व कवियों की भांति अपने-अपने कवि कर्म अथवा युग की कविता की पैरवी नहीं की, उसे पूरे गुण-दोषों के साथ आत्मसात किया।
उनकी रचनाओं में प्रेम की अभिव्यक्ति का अपना अनोखा ढ़ंग भी है। कोमलता के विपरीत शब्दों का चयन कर भावों का कुछ इस रूप में चित्रण हुआ है  –
”  ठाठें मारता है एक नया भाव
मेरी धमनियों में
हाँ, हड्डी – हड्डी को
पसली-पसली को
नदी के अरार की तरह टूटने दो
……
अगर नहीं है मेरे स्वरों में तुम्हारे स्वर  “
यदि प्रेयसी के प्रति मन में प्रेम भाव का अंकुर न हुआ हो तो उसे जीवन व्यर्थ लगता है, किन्तु  इस प्रेम का प्रेयसी को भी स्वीकार्य होना अनिवार्य है –
” अगर बन्द है मेरी मुट्ठी में तुम्हारी नदियाँ
अगर कैद है मेरी छाती में तुम्हारे तान
तो ओ रे भाई
मुझे ज़ंग लगे लोहे की तरह टूटने दो  “
काव्य की परम्परागत प्रवृत्ति को भी बनाए रखते हुए भावों की अभिव्यक्ति में प्रकृति को भी आधार बनाया। साथ ही स्पष्ट न कह कर परोक्ष कहने की प्रवृत्ति भी निभाई। इन पंक्तियों में व्यंजकता देखिए जिसमें कहा जा रहा कि क्या नूतन वर्ष भी पिछले वर्ष की भांति समस्याओं से परिपूर्ण होगा अथवा इस वर्ष कुछ समाधान भी होंगें –
 ” चोट खाए बादलों की टूक टूक जिजीविषा
या फिर
भवन में स्वरों का चढ़ता हुआ आलाप  “
भविष्य में कुछ कर दिखाने की आकांक्षा है किन्तु वह है क्या  ?  यह कुछ निश्चित नहीं है –
 ”  एक नन्हा बीज मैं नव युग का
आह, कितना कुछ – सभी कुछ – न जाने क्या-क्या
समूचा विश्व होना चाहता हूँ
भोर से पहले तुम्हारे द्वार
तुम मुझे देखो न देखो “
अपनी रचनाओं के लिए विविधता लिए अपार शब्द भंडार जुटाया है – तत्सम शब्द है – तरू, क्षत-विक्षत, संकल्प, देशज शब्दों का भी प्रयोग किया – ठाठें मारना, उमरिया, भींज गया, पछाङ खाना, उर्दू अल्फाज़ भी लिए – मदरसों, क़िस्सों, मनहूस और टेबुल, कैफ़े जैसे अंग्रेज़ी शब्द भी है तथा चिङचिङी, वर-वर जैसे नादात्मक शब्द भी है साथ ही हरा-भरा के लिए नया शब्द भी गढ़ा है – हहरा ….  यह थी एक झलक केदारनाथ सिंह जी के काव्य की …
हिन्दी साहित्य जगत के गौरवशाली कवि को सादर नमन !
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शुभ जन्मदिन ! मन्नू भंडारी जी

आज हिन्दी जगत की सुविख्यात कथाकार मन्नू भंडारी का जन्मदिन हैं।

आज चर्चा करते है उनकी बहुचर्चित कहानी – यही सच है .. की जिस पर बनी फिल्म रजनीगन्धा बहुत लोकप्रिय रही। वास्तव में यह कहानी, कहानी नही लगती, किसी भी लड़की के जीवन की झलक लगती है। हमारे समाज में ऎसी बहुत सी दीपाएं मिल जाएगी। नायिका दीपा को कॉलेज के दिनों में निशीथ से प्यार हो जाता है। कुछ ऐसा होता है कि सम्बन्ध टूटा सा लगता है। आगे दीपा को संजय से प्यार हो जाता है। एक इंटरव्यू के सिलसिले में दीपा दूसरे शहर आती है जहां निशीथ से मिलती हैं और वही उसे पूरा सहयोग देता है और दीपा की नियुक्ति हो जाती है। निशीथ के साथ इन पलो में दीपा का पुराना प्यार जाग उठता है जिसे बढावा मिलता है यह अनुभव कर कि शायद निशीथ इसी प्यार से अब भी बंधा है पर निशीथ की ओर से कोई सीधी प्रतिक्रया नही मिलती। दीपा निशीथ की ओर खिंचने लगती है और निशीथ और संजय की तुलना भी करने लगती है  कि निशीथ समय का पाबन्द है, उसका बहुत ख्याल रखता है जबकि संजय उससे घंटो इंतज़ार करवाता है, उससे बातचीत से अधिक ऑफिस की राजनीति पर बात करता है। इस दुविधा को लेखिका ने इस तरह कलम से उतारा –

” मन में प्रचंड तूफान !  पर फिर भी निर्विकार भाव से मैं टैक्सी में आकर बैठती हूँ फ़िर वही मौन, वही दूरी। पर जाने क्या है कि मुझे लगता है कि निशीथ मेरे बहुत निकट आ गया है, बहुत ही निकट !  बार-बार मेरा मन करता है कि क्यों नहीं निशीथ मेरा हाथ पकड़ लेता, क्यों नहीं मेरे कन्धे पर हाथ रख देता ?  मैं ज़रा भी बुरा नहीं मानूँगी, ज़रा भी नहीं !  पर वह कुछ भी नहीं करता। सोते समय रोज़ की तरह मैं आज भी संजय का ध्यान करते हुए ही सोना चाहती हूँ, पर निशीथ है कि बार-बार संजय की आकृति को हटाकर स्वयं आ खड़ा होता है।”

अपने शहर लौटने के बाद भी दीपा अपने आपको निशीथ की ओर ही आकर्षित पाती है,  मन ही मन में कहती है  –

” मुझे क्षमा कर दो संजय और लौट जाओ। तुम्हें मुझ जैसी अनेक दीपाएँ मिल जाएँगी, जो सचमुच ही तुम्हें प्रियतम की तरह प्यार करेंगी। आज एक बात अच्छी तरह जान गई हूँ कि प्रथम प्रेम ही सच्चा प्रेम होता है, बाद में किया हुआ प्रेम तो अपने को भूलने का, भरमाने का प्रयास-मात्र होता है।”

लेकिन  संजय से मिलकर दीपा को लगता है कि  उसे वास्तव में संजय से ही प्यार है। इस सच्चाई को लेखिका ने इन शब्दों में व्यक्त किया है –

अठारह वर्ष की आयु में किया हुआ प्यार भी कोई प्यार होता है भला ! निरा बचपन होता है, महज पागलपन ! उसमें आवेश रहता है पर स्थायित्व नहीं, गति रहती है पर गहराई नहीं। जिस वेग से वह आरम्भ होता है, ज़रा-सा झटका लगने पर उसी वेग से टूट भी जाता है। और उसके बाद आहों, आँसुओं और सिसकियों का एक दौर, सारी दुनिया की निस्सारता और आत्महत्या करने के अनेकानेक संकल्प और फिर एक तीखी घृणा। जैसे ही जीवन को दूसरा आधार मिल जाता है, उन सबको भूलने में एक दिन भी नहीं लगता। फिर तो वह सब ऐसी बेवकूफी लगती है, जिस पर बैठकर घंटों हँसने की तबीयत होती है। तब एकाएक ही इस बात का अहसास होता है कि ये सारे आँसू, ये सारी आहें उस प्रेमी के लिए नहीं थीं, वरन् जीवन की उस रिक्तता और शून्यता के लिए थीं, जिसने जीवन को नीरस बनाकर बोझिल कर दिया था।”

तभी तो मन्नू भण्डारी जी ने शीर्षक दिया – यही सच है … लेकिन ऐसे शीर्षक फिल्मो के लिए नही चलते और बासु चटर्जी ने लेखिका की ही इन पंक्तियों से शीर्षक लिया – रजनीगन्धा

एक बार मैंने यों ही कह दिया था कि मुझे रजनीगन्धा के फूल बड़े पसन्द हैं, तो उसने नियम ही बना लिया कि हर चौथे दिन ढेर-सारे फूल लाकर मेरे कमरे में लगा देता है। और अब तो मुझे भी ऐसी आदत हो गई है कि एक दिन भी कमरे में फूल न रहें तो न पढ़ने में मन लगता है, न सोने में। ये फूल जैसे संजय की उपस्थिति का आभास देते रहते हैं।”

मन्नू भंडारी जी को जन्मदिन की अनेको शुभकामनाएं !  हम उनके अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घ आयु की कामना करते है !

 

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भक्त कवि सूरदास

आज वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी है। आज ही के दिन पन्द्रहवीं शताब्दी में भक्त कवि सूरदास का जन्म हुआ था।

कृष्ण भक्त सूरदास का स्थान हमारे समाज में और हिन्दी साहित्य में विशिष्ट है। साहित्य में बचपन का, वात्सल्य रस का जितना सूक्ष्म वर्णन सूरदास ने अपनी बंद आँखों से किया उतना किसी कवि ने अपनी खुली आँखों से नहीं किया। माना जाता है कि सूरदास जन्मांध है लेकिन उनके पदों को पढ़ कर ऐसा नहीं लगता। यह साहित्य में अक्सर चर्चा का विषय बना रहा कि सूरदास जन्म से दृष्टिहीन है या बाद में उनकी आँखों की ज्योति गई

उनकी रचनाओं के आधार पर यह तर्क दिया जाता है कि बचपन में कुछ वर्षों तक उन्होने संसार अवश्य देखा होगा बाद में उनकी दृष्टि गई होगी तभी तो कृष्ण के बाल रूप का बहुत सजीव चित्रण किया है। सूरदास के काव्य का मुख्य विषय कृष्ण की बाललीलाएं और किशोर अवस्था तक की उनकी क्रीङाएं है जिनमें राधा और गोपियों संग रासलीला भी सम्मिलित है। हालांकि युवावस्था से कृष्ण का महानायक का रूप उभरता है, गीता और महाभारत के युद्ध से सूरदास दूर ही दिखाई दिए।

सूरदास को कृष्ण वर्णन में वात्सल्य और श्रृंगार रस ही भाया विशेषकर कृष्ण-यशोदा के पद बहुत भावुक है। अपने आराध्य देव कृष्ण के इस रूप का, संगीत का भी ज्ञान रखने वाले सूरदास ने अपनी बोली बृज मे गाकर वर्णन किया। सूर साहित्य मे कुछ पदों के लिए शास्त्रीय संगीत के राग भी बताए गए और उन पदों को उन्हीं रागों में स्वरबद्ध कर गाया जाता है। इस तरह अपनी भक्ति को गाकर प्रस्तुत करने से बृज बोली जानने वालों में ये पद बहुत लोकप्रिय हुए। लोकप्रियता के आधार पर ही बृज को बोली न मान कर भाषा माना गया और साहित्य में बृज को भाषा का दर्जा मिला।

इसमें कोई दो मत नहीं कि साहित्य रचना सूरदास का उद्येश्य नहीं था लेकिन अपने ईष्टदेव की आराधना शब्दों में ढ़ालकर भक्त से गायक कवि और साहित्यकार बन गए।

श्रेष्ठ कवि, गायक, भक्त को सादर नमन !

 

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स्मृति शेष  – सुभद्राकुमारी चौहान

मेरा मंदिर,मेरी मसजिद, काबा काशी यह मेरी .
पूजा पाठ,ध्यान,जप,तप,है घट-घट वासी यह मेरी.
कृष्णचन्द्र की क्रीड़ाओं को अपने आंगन में देखो .
कौशल्या के मातृ-मोद को, अपने ही मन में देखो.
प्रभु ईसा की क्षमाशीलता, नबी मुहम्मद का विश्वास.
जीव-दया जिनवर गौतम की,आओ देखो इसके पास .
परिचय पूछ रहे हो मुझसे, कैसे परिचय दूँ इसका .
वही जान सकता है इसको, माता का दिल है जिसका
बालिका का परिचय – कविता का अंश है यह जिसकी रचयिता है – सुभद्राकुमारी चौहान जिनकी आज पुण्यतिथि है.

झांसी की रानी – कविता से लोकप्रिय हुई। अपने पारिवारिक वातावरण से बचपन से ही वह देशभक्त रही।  असहयोग आंदोलन में भी भाग लिया।  विवाह के बाद भी वह राजनीति में सक्रिय रही। देश और समाज के प्रति जागरूक इस कवियित्री की रचनाएं ह्रदय से निकली सीधी-सच्ची भावनाएं है तभी तो बहुत सरल शब्दो में है इसीसे स्कूल के दिनों से ही हम सुभद्राकुमारी चौहान जी से परिचित हो जाते है। 1948 में आज ही के दिन एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई  ……

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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स्मृति शेष – इलाचन्द्र जोशी

आज ख्यात हिन्दी साहित्यकार इलाचन्द्र जोशी का जन्म दिवस है

जोशी जी का हिन्दी साहित्य जगत में विशिष्ट स्थान है, हिन्दी साहित्य जगत में किसानो के माध्यम से न सिर्फ ग्रामीण जीवन बल्कि समाज में निम्न और मध्यम वर्ग की स्थिति को चित्रित करते प्रेमचन्द ने समाज में आदर्श और यथार्थ दोनों ही स्थितियों को सामने रखा पर इसी समय से धीरे-धीरे समाज में परिवर्तन आते जा रहे थे जो आज़ादी के बाद साफ़ नज़र आने लगे थे जिनमे मुख्य बात रही कि समाज में व्यक्ति अधिक महत्वपूर्ण होने लगा था। अब सामाजिक परिस्थितियों से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति की अपनी परिस्थितियाँ हो गई थी। व्यक्ति अपनी समस्याओं पर अधिक सोचने लगा था और अपनी उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहने लगा था। ऐसे में साहित्यकार भी सामाजिक परिस्थितियों की बजाय मन की स्थितियों को अपना विषय बनाने लगे और शुरूवात हुई मनोवैज्ञानिक कहानियों और उपन्यासों की और ऐसे साहित्य के शुरूवाती रचनाकारो में से एक है – इलाचंद्र जोशी

अल्मोडा में जन्मे जोशी जी की साहित्यिक यात्रा ज़ाहिर है अपनी शीतल जन्मभूमि के आकर्षण में बंध कर कविता से ही हुई पर बाद में कथा साहित्य में ही उन्हें प्रसिद्धि मिली। उनका महत्वपूर्ण उपन्यास हैं –   ज़हाज़ का पंछी …..  आत्म कथात्मक शैली में लिखे गए इस उपन्यास में व्यक्ति के मन की ग्रंथियों को जोशी जी ने शब्दों से कुछ इस तरह से खोला हैं कि पाठक पात्र की स्थिति को बहुत अच्छी तरह से समझ पाते हैं। इस उपन्यास में छोटे शहरों से महानगरों की ओर बेहतर जीवन की तलाश में आने वालो द्वारा झेली जाने वाली तकलीफों को शब्द दिए गए हैं। एक झलक देखिए –

“कई दिनों पार्को और फ़ुटपाथो पर काल को काटता या धोखा देता रहा। सुबह से लेकर आधी रात तक का समय अधिकांशतः किसी पार्क में बिता देता और आधी रात के बाद जब पार्क का चौकीदार मुझे धक्का देकर जगाता तब बाहर निकलकर या तो किले के मैदान का आश्रय पकड़ता या किसी फुटपाथ की शरण जाता। जो दो रूपए किसी जुगत से मैंने बचा रखे थे वे भी जब दो-चार दिन तक दो जून चना चिउड़ा चबाने में समाप्त हो गए, तब पेट की ओर से भी बड़ी तीखी और मार्मिक शिकायतें मन के तारों के ज़रिए मेरे मस्तिष्क में पहुँचने लगी। दृढ इच्छा शक्ति से उनका प्रतिरोध या अवज्ञा करने का प्रयत्न करता हुआ मैं निरंतर इस चेष्टा में रहा कि किसी प्रकार की कोई नौकरी मिल जाए”

महानगर में आकर एक नई जीवन शैली से परिचय होता हैं जहां किसी के सुख-दुःख से किसी को विशेष सरोकार नही, सब अपने में मगन हैं। ऐसे में अकेलापन और बढ जाता हैं क्योंकि सामने वाला आपकी ओर नहीं बढ रहा तब उसकी ओर पहल करना भी कठिन हो जाता हैं, नतीजा अपने कष्ट साझा नही हो पाते हैं और जीवन संघर्ष बढ जाता हैं। इसे लेखक ने नायक के मन के द्वंद्व से कुछ यूं बताया हैं –

“प्रत्येक बार मैं सोचता कि अगले व्यक्ति के आगे अपनी व्यथा की करूण कथा अवश्य प्रकट करूंगा पर हर बार ज़बान पर जैसे ताला लग जाता। मेरे मुंह से जो बात निकल नहीं पाती थी उसका एक कारण तो स्पष्ट ही मेरे भीतर युगों-युगों से अवरूद्ध सांस्कृतिक संस्कार था।”

बेहतर जीवन की तलाश में जीवन स्तर और कम ही होता लगता हैं। नायक को काम नही मिलता जिससे हर ओर से अभाव आ घेरते हैं तिस पर न रहने की जगह और न कोई संगी साथी का होना, ऐसे में वह भटकता रहता हैं। यहाँ तक की लोग उसे चोर और गुण्डा भी समझने लगते हैं। ऐसे में उसका मानसिक द्वंद्व और बढ जाता हैं, वह सोचने लगता हैं –

“मेरे बचपन के उन सुनहले स्वप्नों के पूर्णतया कुचले जाने और घनिष्ठ से घनिष्ठ व्यक्तियों से भी असहानुभूति धोखा और विशवासघात पाने पर भी मैं न तो कभी अपनी स्वभावगत ईमानदारी के लिए पछताया और न मनुष्य पर से मेरा विश्वास कभी हटा।”

इस तरह एक बार अपनी जडो से कट कर वह भटकता ही रह जाता है, पर कब तक, बिलकुल ज़हाज़ के उस पंछी की तरह जो भटकने के बाद उसी ज़हाज़ पर आ टिकता हैं। एक व्यक्ति के संघर्ष में सामाजिक समस्याओं के बजाए खुद उसके मन के द्वंद्व को जानना अधिक रूचिकर लगा। हालांकि कोई समाधान नही फिर भी मन का विश्लेशण शब्दों में बांधना सबके बस की बात नही …

इलाचंद्र जोशी की अन्य रचनाओं पर चर्चा फिर कभी ….

हिन्दी के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

 

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स्मृति शेष – भगवतीचरण वर्मा

“इक्‍कीस दिन के पाठ के इक्‍कीस रुपए और इक्‍कीस दिन तक दोनों बखत पाँच-पाँच ब्राह्मणों को भोजन करवाना पड़ेगा,”

कुछ रुककर पंडित परमसुख ने कहा – “सो इसकी चिंता न करो, मैं अकेले दोनों समय भोजन कर लूँगा और मेरे अकेले भोजन करने से पाँच ब्राह्मण के भोजन का फल मिल जाएगा।”

यह तो पंडितजी ठीक कहते हैं, पंडितजी की तोंद तो देखो!” मिसरानी ने मुस्‍कुराते हुए पंडितजी पर व्‍यंग्‍य किया।

“अच्‍छा तो फिर प्रायश्चित का प्रबंध करवाओ, रामू की माँ ग्‍यारह तोला सोना निकालो, मैं उसकी बिल्‍ली बनवा लाऊँ – दो घंटे में मैं बनवाकर लौटूँगा, तब तक सब पूजा का प्रबंध कर रखो – और देखो पूजा के लिए…”

पंडितजी की बात खतम भी न हुई थी कि महरी हाँफती हुई कमरे में घुस आई और सब लोग चौंक उठे। रामू की माँ ने घबराकर कहा –

“अरी क्‍या हुआ री?” महरी ने लड़खड़ाते स्‍वर में कहा – “माँजी, बिल्‍ली तो उठकर भाग गई!”

प्रायश्चित – कहानी का अंश है यह जिसके रचनाकार है भगवतीचरण वर्मा  जिनकी आज पुण्यतिथि है।

यह रचना धर्मभीरू समाज और धर्म की आङ में श्रद्धालुओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का अंदाज़ा लगा कर उन्हें लूटने वाले पंडो पर व्यंग्य करती है। भगवती बाबू ने इतनी रोचक शैली में लिखा है कि हम मुस्कुराए बिना नहीं रह सकते।

अन्य गंभीर रचनाओं के साथ यह हास्य-व्यंग्य रचना  भगवती बाबू को समाज की नब्ज़ पहचानने वाले सशक्त लेखक के रूप में उभारती है।  इस रचना को कुछ शिक्षण संस्थानों ने स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल किया है।

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

 

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स्मृति शेष – जयशंकर प्रसाद

कृष्ण जन्म का विवरण व्यास जी ने महाभारत में विष्णु पर्व में रचा है। इसी को आधार बना कर जयशंकर प्रसाद ने भी एक कविता रची – श्री कृष्ण जयन्ति – जो ” कानन कुसुम ” में  संग्रहित है। …. कृष्ण के जन्म के समय चारों ओर अंधकार व्याप्त था। इस काल रात्रि की तुलना प्रसाद जी ने कंस के हृदय से की –
” कंस हृदय की दुश्चिन्ता सा जगत में अंधकार है व्याप्त ”
कृष्ण जन्म को लेकर उनके मामा कंस को अपनी जीवन रक्षा हेत् अधिक चिन्ता थी क्योंकि उनकी जीवन लीला का समापन वसुदेव-देवकी के पुत्र द्वारा ही निश्चित था। विष्णु पर्व में नारद जी कहते है कि कंस को देवकी के गर्भ से भय है-
” गर्भस्थानामपि गीतविज्ञिया चैव देहिनाम्।
नारदेन हि गर्भेभ्यो भयं नः सभुदाहतम् ।। ”
इसीलिए कंस ने देवकी प्रसूत सभी शिशुओं का वध करने का निश्चय किया। इस तरह प्रसाद जी ने केवल रात्रि के भयावह वातावरण को कंस हृदय की उपमा देकर संक्षिप्त में ही इस तथ्य का संकेत दिया। आगे की पंक्तियां देखिए –
” यमुने, अपना क्षीण प्रवाह बढ़ा रखो
और वेग से बहो कि चरण पवित्र से
संगम हो कर नीलकमल खिल जाएगा ”
यहां भी वसुदेव द्वारा कृष्ण को जन्म के बाद कारावास से मुक्त करा कर यमुना नदी के पार, कंस की नगरी से दूर ले जाने का संकेत है जो प्रकृति चित्रण के माध्यम से दिया है। यह प्रसंग विष्णुपर्व में इस तरह है –
” वसुदेवस्तु संग्रह्य दारकं क्षिप्रमेव च यशोदया गृहं रात्रों विवेश सुतवत्सलः ”
यानि जन्म के उपरान्त वसुदेव ने नवजात शिशु ( कृष्ण ) को रात्रि के अंधकार में कारावास से मुक्त करा यशोदा के घर ले गए एवं उसकी कन्या को देवकी के पास ले आए। ….. इस तरह इस कविता में केवल कृष्ण जन्म के समय के वातावरण का ही चित्रण है जो हर जन्माष्टमी पर अनुभव किया जा सकता है।
हिन्दी जगत के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !
आप सभी को जन्माष्टमी की शुभकामनाएं !

 

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