Archive for साहित्य

स्मृति शेष – इलाचन्द्र जोशी

आज ख्यात हिन्दी साहित्यकार इलाचन्द्र जोशी का जन्म दिवस है

जोशी जी का हिन्दी साहित्य जगत में विशिष्ट स्थान है, हिन्दी साहित्य जगत में किसानो के माध्यम से न सिर्फ ग्रामीण जीवन बल्कि समाज में निम्न और मध्यम वर्ग की स्थिति को चित्रित करते प्रेमचन्द ने समाज में आदर्श और यथार्थ दोनों ही स्थितियों को सामने रखा पर इसी समय से धीरे-धीरे समाज में परिवर्तन आते जा रहे थे जो आज़ादी के बाद साफ़ नज़र आने लगे थे जिनमे मुख्य बात रही कि समाज में व्यक्ति अधिक महत्वपूर्ण होने लगा था। अब सामाजिक परिस्थितियों से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति की अपनी परिस्थितियाँ हो गई थी। व्यक्ति अपनी समस्याओं पर अधिक सोचने लगा था और अपनी उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहने लगा था। ऐसे में साहित्यकार भी सामाजिक परिस्थितियों की बजाय मन की स्थितियों को अपना विषय बनाने लगे और शुरूवात हुई मनोवैज्ञानिक कहानियों और उपन्यासों की और ऐसे साहित्य के शुरूवाती रचनाकारो में से एक है – इलाचंद्र जोशी

अल्मोडा में जन्मे जोशी जी की साहित्यिक यात्रा ज़ाहिर है अपनी शीतल जन्मभूमि के आकर्षण में बंध कर कविता से ही हुई पर बाद में कथा साहित्य में ही उन्हें प्रसिद्धि मिली। उनका महत्वपूर्ण उपन्यास हैं –   ज़हाज़ का पंछी …..  आत्म कथात्मक शैली में लिखे गए इस उपन्यास में व्यक्ति के मन की ग्रंथियों को जोशी जी ने शब्दों से कुछ इस तरह से खोला हैं कि पाठक पात्र की स्थिति को बहुत अच्छी तरह से समझ पाते हैं। इस उपन्यास में छोटे शहरों से महानगरों की ओर बेहतर जीवन की तलाश में आने वालो द्वारा झेली जाने वाली तकलीफों को शब्द दिए गए हैं। एक झलक देखिए –

“कई दिनों पार्को और फ़ुटपाथो पर काल को काटता या धोखा देता रहा। सुबह से लेकर आधी रात तक का समय अधिकांशतः किसी पार्क में बिता देता और आधी रात के बाद जब पार्क का चौकीदार मुझे धक्का देकर जगाता तब बाहर निकलकर या तो किले के मैदान का आश्रय पकड़ता या किसी फुटपाथ की शरण जाता। जो दो रूपए किसी जुगत से मैंने बचा रखे थे वे भी जब दो-चार दिन तक दो जून चना चिउड़ा चबाने में समाप्त हो गए, तब पेट की ओर से भी बड़ी तीखी और मार्मिक शिकायतें मन के तारों के ज़रिए मेरे मस्तिष्क में पहुँचने लगी। दृढ इच्छा शक्ति से उनका प्रतिरोध या अवज्ञा करने का प्रयत्न करता हुआ मैं निरंतर इस चेष्टा में रहा कि किसी प्रकार की कोई नौकरी मिल जाए”

महानगर में आकर एक नई जीवन शैली से परिचय होता हैं जहां किसी के सुख-दुःख से किसी को विशेष सरोकार नही, सब अपने में मगन हैं। ऐसे में अकेलापन और बढ जाता हैं क्योंकि सामने वाला आपकी ओर नहीं बढ रहा तब उसकी ओर पहल करना भी कठिन हो जाता हैं, नतीजा अपने कष्ट साझा नही हो पाते हैं और जीवन संघर्ष बढ जाता हैं। इसे लेखक ने नायक के मन के द्वंद्व से कुछ यूं बताया हैं –

“प्रत्येक बार मैं सोचता कि अगले व्यक्ति के आगे अपनी व्यथा की करूण कथा अवश्य प्रकट करूंगा पर हर बार ज़बान पर जैसे ताला लग जाता। मेरे मुंह से जो बात निकल नहीं पाती थी उसका एक कारण तो स्पष्ट ही मेरे भीतर युगों-युगों से अवरूद्ध सांस्कृतिक संस्कार था।”

बेहतर जीवन की तलाश में जीवन स्तर और कम ही होता लगता हैं। नायक को काम नही मिलता जिससे हर ओर से अभाव आ घेरते हैं तिस पर न रहने की जगह और न कोई संगी साथी का होना, ऐसे में वह भटकता रहता हैं। यहाँ तक की लोग उसे चोर और गुण्डा भी समझने लगते हैं। ऐसे में उसका मानसिक द्वंद्व और बढ जाता हैं, वह सोचने लगता हैं –

“मेरे बचपन के उन सुनहले स्वप्नों के पूर्णतया कुचले जाने और घनिष्ठ से घनिष्ठ व्यक्तियों से भी असहानुभूति धोखा और विशवासघात पाने पर भी मैं न तो कभी अपनी स्वभावगत ईमानदारी के लिए पछताया और न मनुष्य पर से मेरा विश्वास कभी हटा।”

इस तरह एक बार अपनी जडो से कट कर वह भटकता ही रह जाता है, पर कब तक, बिलकुल ज़हाज़ के उस पंछी की तरह जो भटकने के बाद उसी ज़हाज़ पर आ टिकता हैं। एक व्यक्ति के संघर्ष में सामाजिक समस्याओं के बजाए खुद उसके मन के द्वंद्व को जानना अधिक रूचिकर लगा। हालांकि कोई समाधान नही फिर भी मन का विश्लेशण शब्दों में बांधना सबके बस की बात नही …

इलाचंद्र जोशी की अन्य रचनाओं पर चर्चा फिर कभी ….

हिन्दी के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

 

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स्मृति शेष – भगवतीचरण वर्मा

“इक्‍कीस दिन के पाठ के इक्‍कीस रुपए और इक्‍कीस दिन तक दोनों बखत पाँच-पाँच ब्राह्मणों को भोजन करवाना पड़ेगा,”

कुछ रुककर पंडित परमसुख ने कहा – “सो इसकी चिंता न करो, मैं अकेले दोनों समय भोजन कर लूँगा और मेरे अकेले भोजन करने से पाँच ब्राह्मण के भोजन का फल मिल जाएगा।”

यह तो पंडितजी ठीक कहते हैं, पंडितजी की तोंद तो देखो!” मिसरानी ने मुस्‍कुराते हुए पंडितजी पर व्‍यंग्‍य किया।

“अच्‍छा तो फिर प्रायश्चित का प्रबंध करवाओ, रामू की माँ ग्‍यारह तोला सोना निकालो, मैं उसकी बिल्‍ली बनवा लाऊँ – दो घंटे में मैं बनवाकर लौटूँगा, तब तक सब पूजा का प्रबंध कर रखो – और देखो पूजा के लिए…”

पंडितजी की बात खतम भी न हुई थी कि महरी हाँफती हुई कमरे में घुस आई और सब लोग चौंक उठे। रामू की माँ ने घबराकर कहा –

“अरी क्‍या हुआ री?” महरी ने लड़खड़ाते स्‍वर में कहा – “माँजी, बिल्‍ली तो उठकर भाग गई!”

प्रायश्चित – कहानी का अंश है यह जिसके रचनाकार है भगवतीचरण वर्मा  जिनकी आज पुण्यतिथि है।

यह रचना धर्मभीरू समाज और धर्म की आङ में श्रद्धालुओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का अंदाज़ा लगा कर उन्हें लूटने वाले पंडो पर व्यंग्य करती है। भगवती बाबू ने इतनी रोचक शैली में लिखा है कि हम मुस्कुराए बिना नहीं रह सकते।

अन्य गंभीर रचनाओं के साथ यह हास्य-व्यंग्य रचना  भगवती बाबू को समाज की नब्ज़ पहचानने वाले सशक्त लेखक के रूप में उभारती है।  इस रचना को कुछ शिक्षण संस्थानों ने स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल किया है।

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

 

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स्मृति शेष – जयशंकर प्रसाद

कृष्ण जन्म का विवरण व्यास जी ने महाभारत में विष्णु पर्व में रचा है। इसी को आधार बना कर जयशंकर प्रसाद ने भी एक कविता रची – श्री कृष्ण जयन्ति – जो ” कानन कुसुम ” में  संग्रहित है। …. कृष्ण के जन्म के समय चारों ओर अंधकार व्याप्त था। इस काल रात्रि की तुलना प्रसाद जी ने कंस के हृदय से की –
” कंस हृदय की दुश्चिन्ता सा जगत में अंधकार है व्याप्त ”
कृष्ण जन्म को लेकर उनके मामा कंस को अपनी जीवन रक्षा हेत् अधिक चिन्ता थी क्योंकि उनकी जीवन लीला का समापन वसुदेव-देवकी के पुत्र द्वारा ही निश्चित था। विष्णु पर्व में नारद जी कहते है कि कंस को देवकी के गर्भ से भय है-
” गर्भस्थानामपि गीतविज्ञिया चैव देहिनाम्।
नारदेन हि गर्भेभ्यो भयं नः सभुदाहतम् ।। ”
इसीलिए कंस ने देवकी प्रसूत सभी शिशुओं का वध करने का निश्चय किया। इस तरह प्रसाद जी ने केवल रात्रि के भयावह वातावरण को कंस हृदय की उपमा देकर संक्षिप्त में ही इस तथ्य का संकेत दिया। आगे की पंक्तियां देखिए –
” यमुने, अपना क्षीण प्रवाह बढ़ा रखो
और वेग से बहो कि चरण पवित्र से
संगम हो कर नीलकमल खिल जाएगा ”
यहां भी वसुदेव द्वारा कृष्ण को जन्म के बाद कारावास से मुक्त करा कर यमुना नदी के पार, कंस की नगरी से दूर ले जाने का संकेत है जो प्रकृति चित्रण के माध्यम से दिया है। यह प्रसंग विष्णुपर्व में इस तरह है –
” वसुदेवस्तु संग्रह्य दारकं क्षिप्रमेव च यशोदया गृहं रात्रों विवेश सुतवत्सलः ”
यानि जन्म के उपरान्त वसुदेव ने नवजात शिशु ( कृष्ण ) को रात्रि के अंधकार में कारावास से मुक्त करा यशोदा के घर ले गए एवं उसकी कन्या को देवकी के पास ले आए। ….. इस तरह इस कविता में केवल कृष्ण जन्म के समय के वातावरण का ही चित्रण है जो हर जन्माष्टमी पर अनुभव किया जा सकता है।
हिन्दी जगत के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !
आप सभी को जन्माष्टमी की शुभकामनाएं !

 

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स्मृति शेष – अज्ञेय

 

Dead long dead
long dead !
And my heart is a handful of dust,
And the wheels go over my head,
And my bones are shaken with pain,
For into a shallow grave they are thrust,
Only a yard beneath the street,
And the hoofs of the horses beat, beat
The hoofs of the horses beat
मृत – चिरातीत !
और मेरा हृदय मुट्ठी भर राख हो गया,
पहिए मेरे ऊपर से गुज़रते है,
मेरी अस्थियाँ पीङा से काँपती है,
क्योंकि वे एक तंग कब्र में बंद है,
पथ की सतह के गज़ भर नीचे,
और घोङो की अनवरत टाप टाप टाप …

 

शेखर – एक जीवनी  … उपन्यास के पहले भाग में है यह कविता, इसी रूप में पहले अंग्रेज़ी फिर हिन्दी में जिसके रचनाकार है सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन  ” अज्ञेय ”  जिनकी आज पुण्यतिथि है.

अध्ययनशील अज्ञेय जी ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में लिखा – कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, यात्रा विवरण, यहां तक कि अनुवाद भी किया और सम्पादन कर विभिन्न कवियों को प्रकाश में ले आए.
दो भागों में लिखा गया उपन्यास … शेखर – एक जीवनी …. न केवल अज्ञेय जी की महत्वपूर्ण रचना है बल्कि साहित्य जगत विशेषकर उपन्यासों की दुनिया में महत्वपूर्ण है. जैनेन्द्र जी ने उपन्यास सुनिता लिख कर मनोवैज्ञानिक उपन्यासों की जो शुरूवात की थी उसकी अगली और महत्वपूर्ण कड़ी है – शेखर – एक जीवनी
जैनेन्द्र जी ने केवल मन का विश्लेषण किया था लेकिन अज्ञेय ने मनोविज्ञान के विशेष कर फ्रायड के सिद्धांतों पर शेखर के चरित्र को रचा है. शेखर के मन में केवल द्वंद्व ही नही है बल्कि वह उसका समाधान भी चाहता है, और समाधान न मिलने पर विद्रोही हो उठता है. शेखर की यह प्रवृति बचपन से ही रही है, पिता का कठोर अनुशासन और जिज्ञासु मन को न मिलने वाले समाधानों ने उसे विद्रोही बना दिया. इसीसे कालेज में आकर वह क्रांतिकारियों के दल से आसानी से जुड़ गया. ऎसी ही गतिविधियों से ब्रिटिश सरकार से फांसी का हुक्म मिला और इस अंतिम समय शेखर अपनी जीवन यात्रा याद कर रहा है जिससे यह उपन्यास आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया है और अतीत में यानि फ्लैशबैक में है. भाषा-शैली का प्रवाह कुछ इस तरह है जैसे शेखर अपने मन का मंथन कर रहा है. जिससे चरित्र स्वाभाविक रूप से उभरा.
शेखर के साथ पूरी तरह से जुड़े रहे अज्ञेय जी तभी तो उनका विविध आयामी साहित्यिक रूप नज़र आया और दो-तीन जगह अपनी बात स्पष्ट करने के लिए कविता का प्रयोग किया वो भी अंग्रेज़ी में जिसे फिर हिन्दी में भी लिखा लेकिन शब्द-शब्द अनुवाद नही.
प्रशंसा के साथ एक आलोचना इस उपन्यास की यह भी रही कि पहले भाग में लम्बे चले शेखर के बचपन में उसे उच्च स्तरीय अंग्रेज़ी स्कूल का छात्र बताया गया जबकि हिन्दी माध्यम का छात्र बताना चाहिए था. खैर … उपन्यास का महत्त्व कभी कम नही हुआ  ….
गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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मीरा

होली और जन्माष्टमी के अवसर पर बरबस मीरा की याद हो आती है। वास्तव में जब भी कृष्ण का नाम आता है, राधा और मीरा के नाम साथ ही आते है। इस तरह बचपन से ही मीरा से परिचय हो जता है।

स्कूल के पाठ्यक्रम में भी मीरा की रचनाएं शामिल होती रही। मैंने पांचवी कक्षा में पहली बार मीरा को पढा –

मन रे परसि हरि के चरण।

छठी कक्षा से संगीत की शिक्षा आरम्भ हुई और मीरा के कई भजन सीखने का अवसर मिला। साथ ही पाठ्यक्रम में भी कुछ पद पढे। एम ए में भक्ति साहित्य का अध्ययन करते हुए विभिन्न चर्चाओं, व्याख्यानों द्वारा मीरा के बारे में अधिक जानने का अवसर मिला। एक चर्चा यह भी रही कि मूल रूप से मीरा कृष्ण की भक्तिन है और उनके पद उनकी भक्ति को व्यक्त करते है अर्थात उनकी भावनाएं शब्द बन कर निकल पड़ती है, इस तरह मीरा साहित्य की कवियित्री कैसे हुई, वो तो भक्तिन ही है।

कृष्ण प्रेम में पगी मीराबाई ने कृष्ण के प्रति जो कुछ भी अनुभव किया उसे शब्दों में ढाला जिससे उन रचनाओं में स्वाभाविकता रही। भक्ति रस में डूबी होने से एकतारा लेकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करती रही जिससे उनकी रचनाएं लयबद्ध हो गई। संतो के साथ मंदिर-मंदिर घूमती मीराबाई के ये पद दूसरे भी गाने लगे। अपने व्यक्तिगत जीवन की त्रासदी से मीरा को वैसे भी लोग जानने लगे थे। उदयपुर के राजघराने की बहू मीरा गृहस्थ्य धर्म न निभा पाने के कारण घर छोड चुकी थी। इस तरह राजघराना छोडना और मंदिरों में भक्ति गीत गाना मीराबाई की लोकप्रियता को बढाता गया। उनके रचे पद भी दूर – दूर तक गाए जाने लगे, पदों की संख्या भी बढती गई, ऐसे में स्वाभाविक है कि ये पद काव्य संसार का अंग बन साहित्य जगत में शामिल होते।

चूंकि मीरा की बोली बृज रही जिससे ये पद भी बृज बोली में ही रचे गए। साहित्य में स्थान पा कर इन पदों की बोली बृज भी भाषा का महत्त्व पाने लगी। यहाँ हम एक बात बता दे कृष्ण भक्त सूरदास की बोली भी बृज ही रही और उनके पदों की लोकप्रियता और विपुलता बङा कारण रही बृज को बोली से भाषा का स्थान दिलाने में।

एक चर्चा मीरा की भक्ति भावना पर भी होती रही। भक्ति जगत में कबीर की तरह निर्गुण निराकार के विपरीत मीरा ने सगुण भक्ति की और कृष्ण की आराधना की। कृष्ण को अपना पति माना और इस रूप में भक्ति करना कठिन है। साधारणतः भक्त अपने आपको अपने आराध्य के सेवक मानते है और प्रभु का गुणगान करते है लेकिन प्रभु को पति के रूप में मानना और विरह के पद गाना कठिन है। वास्तव में बहुत कठिन रही मीरा की भक्ति।

यूं तो मीरा का अध्ययन बाद में किया पर हमेशा से ही हम रेडियो से मीरा भजन सुनते रहे, कुछ फ़िल्मी गीतों के और कुछ भक्ति गीतों के कार्यक्रम में। मीरा भजन सबसे अधिक पसंद किए गए सुविख्यात गायिका जुतिका राय के स्वर में। मीरा पर सबसे पहले फिल्म बनी तमिल भाषा में जिसका नाम भी मीरा ही रहां। दोनों ही भाषाओं की फिल्मो में कर्नाटक शास्त्रीय संगीत जगत की सुविख्यात गायिका एम एस सुब्बालक्ष्मी ने मीरा का अभिनय किया और मीरा भजन गाए – हिंदी और तमिल दोनों ही भाषाओं में जिसके लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला और मीरा की कहानी भी जन साधारण तक पहुंची। बाद के समय में हेमामालिनी को लेकर गुलज़ार ने भी फिल्म बनाई – मीरा। यह फिल्म भी पसंद की गई। इस समय मीरा भजनों के लिए एक और गायिका उभर कर आई – वाणी जयराम जिनके मधुर कंठ ने मीरा के भजनों को नई पीढ़ी में भी लोकप्रिय बनाया। इस दौरान कई फिल्मो में भक्ति गीत की तरह मीरा भजन रखे गए और ऐसे कई भजनों को लता मंगेशकर ने अपना स्वर दिया। भक्ति गीत के साथ कुछ फिल्मो में सामाजिक परिस्थितियों को उभारने के लिए भी मीरा भजन का सुन्दर प्रयोग किया गया।
हिन्दी साहित्य जगत की गौरवशाली भक्त कवियित्री को सादर नमन !

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राजकुमार कुंभज – जन्मदिन मुबारक !

आज आधुनिक हिन्दी साहित्य के जाने-माने कवि राजकुमार कुंभज का जन्मदिन है।

न केवल साहित्य जगत में अपितु जीवन में भी राजकुमार कुंभज आधुनिक ही रहे। जीवन के प्रति विचार इतने आधुनिक है कि 1977 में पारम्परिक मान्यताओं एवं पारम्परिक रूढ़ियों को तोङते हुए स्वतंत्रता पूर्वक प्रेमविवाह किया। साहित्य के क्षेत्र में कवि को स्वयं यह स्मरण नहीं कि पहली रचना कब की। सामयिक विषयों पर निरन्तर उनकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और संकलनों में प्रकाशित होती रही।  यहां 1979 में प्रकाशित चौथा सप्तक में संकलित एक काव्य रचना की चर्चा करते है – पानी नहीं मिलेगा

जल के अभाव में जीवन दुष्कर है। जीवन की स्थूल आवश्यकताएं भी जल की ही भांति महत्वपूर्ण है। आधुनिक समाज में जीवन की स्थूल आवश्यकताओं की व्यवस्था कठिन हो जाती है –

”  पानी नहीं मिलेगा
तो तुम क्या कर लोगे ? तुम्हारी ये ताक़त नहीं रही
जब कि पाताल तक पहुँच सको नींद पर
हरकत करो कोई और जाग पङो  “अंतिम दो पंक्तियां मानव की निष्क्रियता की ओर संकेत है कि जागरूक न होने का अर्थ है कि अब वह चुस्त नहीं रहा कि अपनी आवश्यकताओं के लिए सदैव सक्रिय रह सकें। किन्तु यह सक्रियता उसके लिए आवश्यक है क्योंकि -” अंगारे नहीं खा सकोगे  ”

अर्थात् कठिन समय को नहीं झेल पाओगे जिसमें –

” नहीं बन सकोगे कबूतर तक भी
हो जाओगे शायद मछली
और कि तङपोगे  ”

कबूतर से तात्पर्य स्वच्छन्दता से है जो तभी मिलती है जब जीवन की स्थूल आवश्यकताएं पूर्ण हो जाए अन्यथा उसकी दशा वही हो जाएगी जो जल के अभाव में मछली की होती है। आगे इसकी व्याख्या इस तरह की है –

” पानी नहीं मिलेगा
तो भविष्य का वृक्ष नहीं होगा
वर्तमान का दुःख नहीं होगा
नहीं होगा भूत का अँधेरा
दरअसल कि सब क़यावद में
और खामोश  ”

यह चुप्पी आधुनिक मानव की उस दशा की ओर इंगित करती है जहां उसका जीवन के प्रति लगाव नहीं रह गया। न अब वह अतीत से कोई प्रेरणा ग्रहण करता है और न ही भविष्य के लिए कोई योजना बनाता है। उसकी निष्क्रियता यहां तक बढ़ गई है कि वह वर्तमान दुःख भी अनुभव नहीं कर पा रहा है। किन्तु जीवन के लिए आरंभिक सुविधाएं उसके लिए अत्यंत ही आवश्यक है अन्यथा उसका जीवन बोझ बन जाएगा और उस बोझ को ढ़ोते हुए वह भीतर से खोखला हो जाएगा और उसे इसका अनुभव भी नहीं होगा –

” पानी नहीं मिलेगा
तो यह रास्ता पीठ पर चढ़ेगा
तुम हो जाओगे खाली
आकाश धरती
जादू की गिरफ्त में
और बेखबर दिन ”

यह जटिल परिस्थितियां इन्द्र बनी जल के अभाव में और जून की धूप में आधुनिक मानव को मृत्यु की प्रतीक्षा में रत देखना चाहती है –

” कतई नहीं मिलेगा पानी
आदेश है इन्द्र का तुम्हारे लिए
कि कुछ दिन ऐसे ही रह कर दिखाओ
पत्थर और जून की धूप नापो
लगभग मौत आने तक  ”

इन्द्र जटिल परिस्थितियों का प्रतीक है और पत्थर व जून की धूप जीवन के अभावों का प्रतीक है और यही आधुनिक मानव का यथार्थ चित्रण है।

यहां चौथा सप्तक में संकलित एक और काव्य रचना की चर्चा करते है – शब्द। …. इसमें प्रकृति के क्रियाकलापों की चर्चा देखिए

कवि कहता है कि यदि वायु का प्रवाह धीरे-धीरे भी हो तब भी पेङों की डाली पर बैठे पक्षी कांपने लगते है। सूर्य भी हवा के झोंकों से कभी डाली के पीछे छिपता है कभी दृष्टिगोचर होता है अर्थात् वह भी कांपता हुआ प्रतीत होता है –

”  हवा की मुस्कुराहट पर कांपते है पक्षी
पेङों पर सूर्य  ”

इस समय जंगल में इकट्ठा होती है मृत मछलियां जो स्मृतियों का प्रतीक है और जंगल मन का –

”  और जंगल में इकट्ठा होती है
स्मृतियों की मृतक मछलियां  “सूर्य की उपस्थिति में जब बयार का वेग हो तो लगता है प्रत्येक वस्तु की बनने वाली छाया उसकी गिरफ्त में है। अभिप्राय की हृटय में स्मृतियां अनुभूति की लहर उद्वेलित होने पर एकत्रित होती है जिनसे भावनाएं कांपने लगती है यानि हृदय से बाहर निकलने का प्रयास करती है किन्तु यह सभी परछाइयों के रूप में हृदय में ही गिरफ्तार है जबकि शब्द मुक्त हो मुखरित हो जाते है। लाख शब्दों से मन की बात कहते जाए फिर भी मन कभी खाली नहीं हो पाता है, सारी अनुभूतियां ज्यों की त्यों संजोई रह जाती है, मन की गिरफ्त से बाहर नहीं आ पाती ……राजकुमार कुम्भज की कुछ और रचनाओं पर चर्चा फिर कभी ….

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स्मृति शेष – शमशेर बहादुर सिंह

आज हिन्दी साहित्य के प्रगतिशील कवि शमशेर बहादुर सिंह का जन्मदिन है। शमशेर बहादुर सिंह का शैशव काल से ही पारिवारिक वातावरण साहित्यिक व कलाप्रिय होने के कारण कविता में परम्परावादिता कुछ अधिक और स्वयं की स्पष्टवादिता कम है.  इक़बाल, रविन्द्रनाथ टैगोर, शैली के साथ-साथ महादेवी, पंत का प्रभाव व आगे चलकर दूसरी बार साहित्य में क़दम रखने यानि कवि बनने पर बच्चन से प्रभावित शमशेर जी से यह आशा करना समीचीन है कि साहित्य में दो वर्गों के मध्य विभाजित रेखा नही खीची जा सकती। यह सब स्पष्ट होता है उनकी रचनाओं से।  उनकी कविताओं में से एक है कवियित्री सुभद्राकुमारी चौहान के निधन पर लिखी रचना, शीर्षक भी उसी दिन का दिया है  –  वसंत पंचमी की शाम  ( 1948 )  –
” डूब जाती है, कहीं
जीवन में, वह
सरल शक्ति
( म्यान सूनी है
आज )  …. क्यों
मृत्यु बन आई
आसक्ति आज ”
म्यान सूनी कह कर कवि ने उनकी सुप्रसिद्ध रचना ” झांसी की रानी की ओर इंगित किया है. रचनाओं में प्रकृति से लिए गए प्रतीक भी देखे जा सकते है जो छायावादी प्रभाव स्पष्ट करते है –
” हे वसन्तवती,
द्वार के नभ पर तुम्हारे
झुका जो हेमंत का शिर-भार,
लूट लो उसको ”
वहां वसन्तवती नायिका है, हेमंत नायक है, लूट लो उसको का अर्थ है समर्पण प्राप्त कर लो.  इसी क्रम में प्रकृति का मानवीकरण देखिए –
” संध्या की पलकें झुकी
फैली अलके भारी ”
यह शाम के समाप्त होने और अंधकार फैलने का चित्र है. और सपाट शब्दों में ढली पंक्तियाँ देखिए –
” चुका भी हूँ मैं नही
कहाँ किया मैंने प्रेम
अभी ”
शमशेर बहादुर सिंह जी की रचनाओं पर कुछ और चर्चा फिर कभी …..
गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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