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हरिवंश राय बच्चन – स्मृति शेष

आज हिन्दी जगत के ख्यात साहित्यकार हरिवंश राय बच्चन  का जन्म दिवस है …..

बच्चन जी पहले ऐसे व्यक्ति रहे जिन्हें स्वतंत्रता मिलने के बाद सरकारी काम में अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी लाने की ज़िम्मेदारी दी गई। लेकिन कवि हृदय और साहित्यसृजक बच्चन जी के लिए यह काम सरल नहीं था ….

उन्ही दिनों की एक घटना है जब देश में प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू और राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन थे तब संसद के बजट अधिवेशन के समय राष्ट्रपति द्वारा मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार भाषण अनुवाद के लिए डॉ हरिवंश राय बच्चन के पास भेजा गया। डॉ राधाकृष्णन अंग्रेजी के विद्वान थे। उनके द्वारा प्रयुक्त अंग्रेजी शब्दों और वाक्य संयोजन के अनुसार ही हिंदी के शब्दों का चयन कर वाक्य संयोजन करते हुए डॉ बच्चन ने हिंदी में अनुवाद किया। संसद की परम्परा के अनुसार राष्ट्रपति का भाषण यदि अंग्रेजी में हो तो उसका हिंदी अनुवाद उप राष्ट्रपति पढते है। इस तरह डॉ बच्चन द्वारा किए गए हिंदी अनुवाद को उपराष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन द्वारा पढा जाना था। नेहरू जी ने हिंदी अनुवाद देख कर कहा कि भाषण के अनेक शब्दों का उ च्चारण करने में डॉ जाकिर हुसैन को दिक्कत होगी साथ ही सभी के लिए इस भाषण को समझना कठिन होगा। तब यह निर्णय लिया गया कि सरकारी काम में सरल हिंदी का प्रयोग किया जाए।

यहाँ से भाषा के धरातल पर बच्चन जी दो रास्तो पर चलते रहे – एक रास्ता सरकारी काम का रहा जहां सबका ध्यान रखते हुए सरल हिन्दी का प्रयोग करते रहे और दूसरा रास्ता साहित्य सृजन का रहा जहां साहित्यिक हिन्दी का प्रयोग करने लगे। बच्चन जी ने विभिन्न विषयो पर कविताएं लिखी, प्रेम गीत, प्रेम में विरह के गीत, देश भक्ति और जीवन के विभिन्न अनुभवों के साथ जीवन दर्शन की भी चर्चा की। हालांकि ऐसे गीतों की संख्या कम नही जिनका उपयोग फिल्मो में किया जा सकता था फिर भी वास्तव में उनकी एक ही रचना का प्रयोग किया गया है, गीत – कोई गाता मैं सो जाता, फिल्म आलाप में ….. इसी फिल्म में सरस्वती वंदना भी है जो वन्दना ही है जिसमे अन्य काव्य रचनाओं की तरह बच्चन जी के भाव या विचार नही है। इसके अतिरिक्त फिल्म सिलसिला के लिए एक लोक गीत को हिन्दी शब्द दिए जिससे यह लोकप्रिय होली गीत बन कर उभरा – रंग बरसे  …  अपने इस छोटे से फ़िल्मी सफ़र की अंतिम रचना है – अग्निपथ जिसे कविता के ही रूप में अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म अग्निपथ में रखा गया है जिसके लिए स्वर भी अमिताभ जी ने ही दिया है। इस फिल्म को जब दुबारा बनाया गया तब भी यह रचना रखी गई…… यहाँ यही रचना ….

वृक्ष हों भले खड़े, हों घने हों बड़े,
एक पत्र छांह भी, मांग मत, मांग मत, मांग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

तू न थकेगा कभी, तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी, कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

यह महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत रक्त से, लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

बच्चन जी पर कुछ और चर्चा फिर कभी …. हिन्दी जगत के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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छायावाद का शतक  …. देशभक्ति की धारा 

हिन्दी साहित्य में पहली बार एकता का राष्ट्रीय भाव उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में दिखाई दिया। इस समय देश में अंग्रेज़ों के खिलाफ माहौल गर्माने लगा था। वैसे 1857 की क्रान्ति के बाद से ही विद्रोह की चिंगारियां चारों ओर फैल गई थी और समय पा कर धधक उठती थी। ऐसे में साहित्य मे गद्य का विकास कर पत्रिकाओं के सहारे समाज को देश के लिए जागरूक करने की कोशिश की जा रही थी तो दूसरी ओर काव्य में देश भक्ति की रचनाएं रची जा रही थी।

फिर साहित्य का माहौल बदलने लगा। गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर की गीतांजलि से प्रेरणा लेकर कवि प्रकृति को कविता का आधार बनाने लगे थे। गुरूदेव ने प्रकृति में मानवीय भावों को देखा, ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता सुझाया था और इन कवियों ने प्रकृति में स्वंय की भावनाएं देखी जैसे पत्ते पर पङी ओस की बून्दे प्रेम में विरह के आंसू लगे। इस तरह पहली बार खुद की अनुभूति ( स्वानुभूति या आत्मानुभूति ) कविता का विषय बनी जिसे बिगङते सामाजिक वातावरण में रामचन्द्र शुक्ल जैसे विद्वानों ने पागलपन की कविता ही माना। पर ये कवि कब रूकने वाले  …. इस तरह अपनी भावनाओं की छाया को प्रकृति में देखने वाला काव्य छायावाद कहलाया। इसका अर्थ यह नहीं कि कवि केवल अपनी अनुभूतियां ही काव्य में ढ़ालते रहे, अपने वातावरण के प्रति ये कवि पूरी तरह से सजग थे तभी तो समानान्तर ऐसा काव्य भी रचा जिससे हमारा गौरवशाली इतिहास ही नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति से, पुराणों से ऐसे संदर्भ चुने गए जिससे वर्तमान समाज को प्रेरणा मिले जो इस समय सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी शक्ति ब्रिटिश शासन को ललकार रहा था। इन्हीं समानान्तर रचनाओं की चर्चा हम यहाँ कर रहे है –

जयशंकर प्रसाद ने महाकाव्य लिखा – कामायनी –  जिसमें प्रलय की पौराणिक कथा को आधार बना कर मानव सृष्टि के आरंभ की चर्चा की और जीवन दर्शन समझाया। मनु अकेले है, श्रृद्धा से मिलते है। दोनों जीवन का आरंभ करते है। यहीं से मानवीय सभ्यता का विकास बताया है। ईङा से मिलकर मनु सारस्वत प्रदेश बसाते है और सत्ता के मद में अहंकारी हो उठते है –

मै शासक मैं चिर स्वतंत्र, तुम पर भी हो मेरा अधिकार असीम

प्रजा इस निरंकुश शासन का विरोध करती है और मनु सब कुछ छोङ कर हिमालय जा कर ध्यान निरत हो आनंद प्राप्त करते है। विकास, शासन का मोह, निरंकुशता और जनता का विद्रोह तत्कालीन परिस्थितियों के लिए आवश्यक वर्णन था, श्रृद्धा के माध्यम से भारतीय नारी का त्याग तो दुसरी ओर ईङा के माध्यम से कर्मठ नारी को दर्शाया। यह सब उस दौर में समाज में जागरूकता के लिए आवश्यक था।

इस आरंभिक या प्रागैतिहासिक युग के बाद भारतीय संस्कृति के अध्ययन में महाभारत कालीन पात्रों का चित्रण कवियों ने परिस्थितियों के वशीभूत हो कर किया है। प्रमुख पात्र कृष्ण के दोनों रूपों – बृजवासी एवं कुरूक्षेत्र के युद्ध के तेजस्वी रूप का वर्णन हुआ है। अन्य पात्र – दुष्यन्त, भरत, शकुन्तला, बभ्रुवाहन के जीवन के ऐसे पक्ष को दर्शाया है जिससे स्वतंत्रता प्राप्ति के युद्ध में निरत वीरों को उत्साह मिले।

कृष्ण अपने सत्कार्यों के कारण ही महाभारत के नायक कहलाए। कवि सुमित्रान्नदन पन्त के काव्य संग्रह युगपथ में एक रचना है – मर्यादा पुरूषोत्तम के प्रति  …. तत्कालीन परिस्थितियों के संदर्भ में पन्त जी ने राम व कृष्ण की तरह कर्मयोगी की आवश्यकता पर बल दिया। इन परिस्थितियों से जूझने के लिए –

हृदय कमल में भू के फिर उतरो पुरूषोत्तम

कह कर यही स्पष्ट किया है कि यह समय किसी असाधारण प्रतिभा को पा कर ही शान्ति प्राप्त कर सकता है। राम का लोक कल्याणकारी और कृष्ण का लोक रंजककारी रूप छायावाद के लिए एक ऐसा आदर्श है जिसकी इस नैराश्यपूर्ण युग को आवश्यकता है।

कृष्ण के जन्म समय का जयशंकर प्रसाद ने अपने काव्य संग्रह कानन-कुसुम में श्रीकृष्ण जयन्ति शीर्षक रचना में वर्णन किया है। जन्म समय के वातावरण का चित्रण मात्र ही इस रचना मं हुआ है कि चारों ओर अंधकार था। इस अंधकार की तुलना उस समय के नैराश्यपूर्ण वातावरण से की।

इसी में कुरूक्षेत्र नामक कविता में कृष्ण के बृजवासी रूप से शुरूवात की, आगे द्वारका में शासन, पांडवों के पास आना, शिशुपाल वध, शकुनि की दयूत क्रीङा, रणभूमि में दोनों सेनाओं का जुटना, अर्जुन का युद्ध से इंकार, कृष्ण का गीतोपदेश है। इस तरह वीरता से लेकर जीवन दर्शन तक है।

एक और रचना में शकुन्तला-दुष्यन्त के पुत्र भरत की निर्भीकता का चित्रण किया है। भरत शिशु सिंह के साथ खेलते है और उससे कहते है –

खोल, खोल, मुख सिंह बाल, मैं देख कर गिन लूँगा तेरे दाँतों को

बालक के शिशु के साथ इस तरह के व्यवहार को देख कर सिहनी गरजने लगती है, तब भरत हाथ में छङी ले उसे फटकारता हुआ कहता है –

बाधा देगी क्रीङा में यदि तू कभी मार खाएगी,
और तुझे दूँगा नहीं इस बच्चे को,
चली जी अरी भाग जा

और काव्य संग्रह चित्राधार में बभ्रुवाहन शीर्षक कविता में अर्जुन चित्रांगदा पुत्र बभ्रुवाहन की वीरता का चित्रण है। घटना है कि विवाह के बाद अर्जुन हस्तिनापुर लौट जाते है। एक दिन बभ्रुवाहन ने माता चित्रांगदा को सूचना दी कि पांडवों का अश्वमेघ अश्व राज्य की सीमा तक पहुँच गया है और वह स्वयं उसे पकङने का इच्छुक है। माता ने स्पष्ट किया कि अश्व की रक्षा उसके पिता कर रहे है। पिता-पुत्र में युद्ध हुआ और अर्जुन मूर्छित हुए।

इसी काव्य संग्रह में वन मिलन शीर्षक से कविता लिखी जिसमें शकुन्तला दुष्यन्त के गंधर्व विवाह के बाद दुष्यन्त का शकुन्तला को राजधानी जा कर भूल जाना फिर श्राप मुक्ति के बाद शकुंतला का वन में सबसे विदा ले कर वापस राजधानी लौटना है। इस तरह एक और वीर राजा का बखान हुआ।

राजा पुरूरवा के पराक्रम का वर्णन अपनी पहली ही रचना – उर्वशी में किया है।

इन कथानकों के सहारे कवियों ने बालपन की वीरता भी दिखाई जिससे स्वतंत्रता में निरत लोगों को उत्साह मिले।

अब चर्चा रामायण काल की। रामायण की कथा का प्रयोग सांकेतिक रूप में अधिक किया गया।

कवि प्रसाद ने अपने काव्य संग्रह काानन कुसुम में चित्रकूट शीर्षक से कविता लिखी। चित्रकूट राम के वनवासी जीवन का निवास स्थल है जहां उनके साथ पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण है जो पत्नी और भ्रातृ प्रेम के प्रतीक है। यहाँ भरत आते है। भरत मिलन का मार्मिक चित्रण कवि ने किया है। भरत ने राम के दूत के रूप में शासन किया जो उस दौर के लिए आवश्यक आदर्श चित्रण है।

काव्य संग्रह चित्राधार में – अयोध्या का उद्धार – शीर्षक कविता में कहा कि रघु, दिलीप, दशरथ तथा राम के बाद अयोध्या नगरी का वैभव कम होने लगा। यह माना जाता है कि स्वर्ग जाने से पहले राम ने अपने राज्य का बंटवारा किया। संभवतः इसी कारण अयोध्या का वैभव नष्ट हो गया, किन्तु इसे बाद में फिर से बसाया गया। यह तत्कालीन परिस्थितियों में भविष्य के प्रति आशावादी संकेत है।

सूर्य कांत त्रिपाठी निराला ने अपनी रचना – राम की शक्ति पूजा – के माध्यम से नैतिक शक्ति के संचय व आत्मविश्वास की बात कही। माँ दुर्गा ही शक्ति है जिसे प्राप्त कर राम ने रावण पर विजय पाई। यहाँ राम ताङका, सुबाहू आदि के वध को याद कर अपने आत्मविश्वास को दृढ़ करते है। रचना की अंतिम पंक्तियां है –

होगी जय ! होगी जय ! हे ! पुरूषोत्तम नवीन, कह महाशक्ति राम के बदन में हुई लीन

इससे कवि निराला जी ने जन मानस के आत्म विश्वास को दृढ़ करने का प्रयास किया कि ब्रिटिश साम्राज्य से भी टक्कर ली जा सकती है।

छायावादी काव्य में पौराणिक युग के बाद अब हम ऐतिहासिक युग की चर्चा करते है।

महाप्राण निराला ने द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में एक काव्य रचना की – भगवान बुद्ध के प्रति – स्वाधीनता के संघर्षपूर्ण वातावरण में करूणा का भाव महत्वपूर्ण होने लगा था, इस भाव का संबंध बुद्ध से है यानि निराला जी ने बुद्ध के आदर्शों को मानव कल्याण हेतु प्रस्तुत किया। इस रचना में कवि ने बुद्ध के जीवन के केवल उस दौर को प्रस्तुत किया जहां गौतम सिद्धार्थ से बुद्ध हुए,उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई जिसका उन्होनें प्रचार किया।

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध से संबंधित प्रसाद जी की दो कविताएं लहर नामक संग्रह में मिलती है। पहली रचना में सिद्धार्थ का गृह त्याग कर सत्य ज्ञान को प्राप्त करना एवं उस ज्ञान के ज्योति पुंज को विश्व में विकीर्ण करने के प्रयास को चित्रित किया और बुद्ध के इसी रूप के चिरन्तन बने रहने की कामना की। दूसरी कविता में कवि प्रसाद ने सिद्धार्थ को बौद्ध धर्म के प्रवर्तक के रूप में चित्रित किया और यह भी बताया कि आगे शिष्यों द्वारा बुद्ध के ज्ञान का प्रसार लोक कल्याण के लिए हुआ।

बुद्ध के पश्चात इतिहास से एक और चर्चित व्यक्तित्व – सम्राट अशोक  …. कलिंग विजय के बाद एक नए युग का आरंभ हुआ। यह युग शान्ति, सामाजिक प्रगति तथा धार्मिक प्रचार का युग था। इसी समय की एक झांकी अर्थात कलिंग विजय एवं धार्मिक प्रचार के युग के मध्य अशोक के मन में व्याप्त चिन्ता को कवि प्रसाद ने – अशोक की चिन्ता – कविता में चित्रित किया। तेरहवें शिलालेख में स्पष्ट उल्लिखित है कि कलिंग विजयोपरांत अशोक ने यह घोषणा कर दी कि अब वह रणघोष के स्थान पर धम्मघोष करेगा। यह घोषणा जिस चिन्ता का प्रतिफल रही उसे प्रसाद जी ने अंकित किया –

यह सुख कैसा शासन का ? शासन रे मानव मन का,
गिरि भार बना सा तिनका यह घटाटोप दो दिन का

चिन्ता के बाद अशोक के आध्यात्मिक रूप की ओर भी प्रसाद जी ने इंगित किय़ा। शासन से विरक्ति, करूणा की भावना और यह जीवन दर्शन उस समय की स्थितियों में कवि उभारना चाहते थे।

ऐतिहासिक स्थलों को भी कवियों ने कविता का आधार बनाया। उदयशंकर भट्ट् का पहला खण्ड काव्य है – तक्षशिला – तक्षशिला विश्वविद्यालय प्राचीन शिक्षण केन्द्रों में से एक है। कहा जाता है कि मध्य एशिया तथा चीन से भी विद्यार्थी यहाँ अध्ययन करने आते थे। तक्षशिला पर कई विदेशी आक्रमण हुए। तक्षशिला के वैभव से आकर्षित विदेशी उसे अपने अधिकार में लेना चाहते थे। अंत में हूणों के आक्रमण से सभी प्रसिद्ध नगर ध्वस्त हो गए। कवि ने तक्षशिला के वैभव का विनाश और उसके पतन के वर्णन से रचना का समापन किया, पंक्तियां बहुत मार्मिक है –

दुःख में वैभव भरी कहानी है धीरज उपचार,
करें छलकती आँसू झङियों से यह कुछ उपकार,
हे भग्नावशेष इस कारण गाई गाथा आज,
दुःख घटा में जिसके चमके द्रुत बिजसी का साज़

इस तरह कवि ने इस खण्ड काव्य में एशियायी और भारत की प्राचीन संस्कृति का उल्लेख किया साथ ही यह भी बताया कि हमारी भूमि पर विदेशी आक्रमण होते रहे, विदेशी राज करते रहे और इसी के सहारे कवि ने परतंत्र देशवासियों में राष्ट्र भक्ति और स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना जाग्रत करने का प्रयास किया है।

छायावादी काव्य में ऐतिहासिक युग की कुछ और चर्चा हम करेंगे अगली किसी पोस्ट में …

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कायाकल्पनीय कल्पना के चितेरे – प्रेमचंद

आज प्रेमचन्द का जन्म दिवस है।

कथा सम्राट, कलम का सिपाही जैसे अलंकरणों से नवाज़े गए प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के पहले ऐसे लेखक माने जाते है जिन्होनें समाज के यथार्थ को देखा और अपनी कलम से आदर्श स्थापित किए। उनकी रचनाएं पढ़ कर लगता कि वास्तव में ये पात्र समाज में है और ये घटनाएं कहीं न कहीं घटित हो रही है जो सच भी है। फिर भी  …. प्रेमचंद है तो एक इंसान ही, व्यक्ति में कमज़ोरियाँ होती ही है और यह कमज़ोरियाँ साहित्य में झलकी भी, तो क्यों न हम आज प्रेमचंद के साहित्य के उन चंद कमज़ोर अंशों को रेखांकित करें।

सबसे पहले चर्चा उपन्यास प्रेमाश्रम की जिसका प्रकाशन 1921 में हुआ। यह हिन्दी साहित्य का पहला ऐसा उपन्यास है जिसमें राजनीतिक पृष्ठभूमि भी है। मुख्य पात्र गाँव से निकल कर राजनीति में प्रवेश करते है। अपने इसी विषय से इस उपन्यास को भी बहुत पसन्द किया गया। विषय निर्वाह करते-करते विषय विस्तार हो गया जो खटक गया।  इसकी भूमिका में खुद प्रेमचंद ने अपनी दो कमज़ोरियों को स्वीकार किया – पहली – यही यानि इसका कलेवर बहुत बङा हो गया। दूसरी बात पात्रों के नामों की एकरूपता पाठक को उलझा देती है। एक नज़र –  लाला जटाशंकर, उन का छोटा भाई प्रभाशंकर  ….. लाला जटाशंकर के दो पुत्र – प्रेमशंकर और ज्ञानशंकर। ज्ञानशंकर का पुत्र मायाशंकर ….. प्रभाशंकर के बेटे – दयाशंकर, तेजशंकर, पद्मशंकर, उदयशंकर  … एक-दो नाम उन पात्रों के भी जो इस परिवार के नहीं है जैसे गिरिजाशंकर

ख़ैर … यह बहुत खटकने वाली बात नहीं है लेकिन 1926 में प्रकाशित उपन्यास कायाकल्प में कई बातें न सिर्फ खटकती है, उपहास भी बन जाता है।  इस पर चर्चा से पहले हम यह जान ले कि प्रेमचंद अधिक शिक्षित नहीं थे, इंटर तक पढ़े थे। साहित्य रचने के लिए अध्ययन नहीं करते थे बल्कि समाज के पात्र और घटनाओं की स्थिति बताते थे और एक आदर्श की कल्पना करते थे। यह दौर स्वतंत्रता के पहले का था। इस समय यह माना जाता था कि हमारी प्रतिभाएं ब्रिटिश राज में दब सी गई है आज़ादी के बाद जिन्हें खुल कर मौक़ा मिलेगा और हमारा देश विकास के पथ पर बहुत आगे निकलेगा। इसी को चित्रित करने में प्रेमचंद ने विज्ञान के क्षेत्र में कई ग़लतियाँ कर दी। सच कहे तो विज्ञान के क्षेत्र को प्रेमचंद ठीक से समझ नहीं पाए। आयुर्वेद से लेकर कई वैज्ञानिक बातों को इस तरह प्रस्तुत किया कि कल्पना से परे वह हास्यास्पद बन गई।

पति-पत्नी के प्यार भरे पलों का चित्रण करते हुए यह बताया कि फूल महक रहे है,, दोनों झूला झूल रहे है, उनकी उमर का न कोई अंदाज़ा है और न ही उन्हें अपने जीवन की कोई चिंता। प्रेमचन्द का यह मानना कि मृत्यु को भी विज्ञान द्वारा वश में किया जा सकता है, जब इच्छा हो तभी जीवन से विदा ली जा सकती है यानि इच्छा मृत्यु  …

क्या प्रेमचन्द का यह लेखन संभव है ?

एक और चित्र –  प्रेमचंद लिखते है –
सुधाबिन्दु की कुछ बूँदें लेकर रानी जी युवा लगने लगती है.
सुधा बिन्दु को अमृत के समान बताया है। यह कीमती है और रानी जी इसे एक शीशी में तिजोरी में रखती है। जब थकान, बुढ़ापा महसूस करने लगती तब कुछ बूँदे ले लेती है जिससे शरीर में उत्तेजना आती है, चेहरे पर कान्ति आती है जिससे वह युवा हो जाती है।  …

क्या प्रेमचन्द का यह लेखन संभव है ?

लगता है प्रंमचंद ने विज्ञान का आधार हमारे पुराणों से ही लिया है और उन्हें लगता है कि इसके अलावा विश्व मे विज्ञान का और कोई आधार नहीं।  उपन्यास में बताया गया कि पहाङों पर वेधशालाएं है और उनमें शोध चल रही है और वायुयान बनने की भी जानकारी दी। कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत है –

राजकुमार – सहसा मैनें एक वृद्ध पुरूष को सामने की गुफा से निकल कर पर्वत शिखर की ओर जाते देखा। जिन शिलाओं पर कल्पना के भी पाँव डगमगा जाए उन पर इतनी सुगमता से चले जाते थे

महात्मा पहाङ पर  खङाऊ पहन कर इस तरह से चढ़ रहे है जैसे हम आराम से ज़मीन पर चलते है। राजकुमार अपनी महात्मा से हुई बातचीत बता रहे है –

महात्मा – मैं योगी नही प्रयोगी हूँ। आपने द्वारविन का नाम सुना होगा ?  पूर्व जन्म में मेरा ही नाम द्वारविन था।

मैंने ( राजकुमार  ने ) विस्मित होकर कहा – आप ही डारविन थे ?

महात्मा – हाँ, उन दिनों मैं प्राणीशास्त्र का प्रेमी था। अब प्राणशास्त्र का खोजी हूँ

मैं फुर्ती से उठ बैठा और महात्मा जी के चरणों पर झुकने लगा किन्तु उन्होने मुझे रोककर कहा – तुम मुझे शिलाओं पर देख कर विस्मित हो गए पर वह समय आ रहा है जब आने वाली जाति जल, स्थल और आकाश में समान रीति से चल सकेगी। पृथ्वी का पिण्ड उन्हें छोटा मालूम होगा। वह पृथ्वी से अन्य पिण्डों में उतनी ही सुगमता से आ-जा सकेगें जैसे एक देश से दूसरे देश में।

महात्मा – मैने कितनी ही नई-नई बातें खोज निकाली, पर उनका गौरव आज दूसरों को प्राप्त है। लेकिन इसकी क्या चिन्ता !  मैं विज्ञान का उपासक हूँ, अपनी ख्याति और गौरव का नहीं  ……. मेरा यान आकाश में जितनी ऊँचाई तक पहुँच सकता है, उसकी योरोप वाले कल्पना भी नहीं कर सकते। मुझे विश्वास है कि शीघ्र ही मेरी चन्द्रलोक की यात्रा सफल होगी। योरोप के वैज्ञानिकों की तैयारियाँ देख-देखकर मुझे हंसी आती है। जब तक हमको वहाँ की प्राकृतिक स्थिति का त्रान न हो हमारी यात्रा सफल नहीं हो सकती। सबसे पहले विचारधारा को वहाँ ले जाना होगा।

इससे स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद को लगता था कि पौराणिक ग्रन्थों द्वारा ही हम देवताओं की भूमि, चाँद सितारों की प्राकृतिक अवस्था को जान पाएंगें और देवताओं के जीवन -दर्शन का अध्ययन करने के बाद ही चन्द्रलोक में पहुँचना उचित रहेगा।

प्रेमचंद के अन्य उपन्यासों की तरह कायाकल्प उपन्यास को भी सराहा गया। इस उपन्यास की प्रशंसा में कहा जाता है कि आदर्शों की स्थापना करते-करते प्रेमचंद ने इस उपन्यास में गाँव का कायाकल्प ही कर दिया। इस तारीफ़ के नीचे ये कमज़ोरियाँ दब सी गई।

सादर नमन !

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