Archive for श्रीरंगपट्टनम

शेर-ए-दक्कन टीपू सुल्तान

हम उस टीपू सुल्तान के महल में घूम रहे थे जिसे शेर-ए-दक्कन का ख़िताब दिया गया था।

टीपू सुल्तान की जाँबाज़ी के बहुत से क़िस्से है जिनमें से एक है उनकी शेर से लड़ाई। एक बार शिकार के दौरान जंगल में टीपू सुल्तान के सामने शेर आ गया और एक जाँबाज़ सिपाही की तरह टीपू सुल्तान उससे भी भिड़ गए।

जिन्होनें बहुत पहले दूरदर्शन पर संजय ख़ान का धारावाहिक द सोर्ड आँफ टीपू सुल्तान देखा हो उन्हें याद होगा कि इस घटना को संजय ख़ान पर बहुत अच्छी तरह से फ़िल्माया गया था। पर्यटकों के लिए बेचे जा रहे चित्रों में भी एक चित्र ऐसा है जिसमें टीपू सुल्तान को शेर से लड़ता हुआ दिखाया गया है।

यही सब देखते जानते शहर हो चुके महल में हम वाटर हाउज़ यानि स्नानघर देख कर थोड़ा ही आगे बढे कि हमने देखा यह बोर्ड लगा था

यही वह स्थल है जहाँ अंग्रेज़ों ने उस पर फायर किया था और टीपू सुल्तान के मृत शरीर को यहीं छोड़ गए थे। जहाँ उनकी मृत देह मिली उस स्थान को रेखांकित किया गया है -

यहाँ एक पत्थर लगा है जिस पर अंग्रेज़ी में खुदा है कि टीपू सुल्तान का मृत शरीर यहाँ पाया गया - द बाँडी आँफ टीपू सुल्तान वाज़ फाउंड हियर

हम सोचने लगे कि इतिहास का वह क्या पल रहा होगा जब सैनिक अपने सुल्तान को ढूंढते हुए वहाँ पहुँचे और वहाँ पाया अकेला पड़ा मृत शरीर उस सुल्तान का जो शेर से अकेला ही भिड़ गया था पर अपने आपको अंग्रेज़ सैनिकों से नहीं बचा पाया।

वहाँ से थोड़ा ही आगे बढने पर कमान नज़र आई जो कभी महल का द्वार हुआ करती थी। जैसा पहले होता था हर महल के चार दिशाओं में चार द्वार हुआ करते थे। और हम इस कमान से, महल के इस द्वार से बाहर निकल आए और आगे बढ गए मैसूर की ओर।

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शहर बना टीपू सुल्तान का महल

टीपू सुल्तान का मकबरा देख कर हम बाहर निकले। आस-पास नज़र दौड़ाई तो माहौल देख कर लगा कि यह पुराना शहर है।

आगे बढे तो गलीनुमा सड़कें दिखाई दी। इक्का-दुक्का ताँगें भी दौड़ रहे थे। हमें पता चला कि यह टीपू सुल्तान का महल ही है जिसमें अब शहर बस गया है।

कुछ दूर आगे बढे तो दाहिनी ओर नज़र आई मस्जिद जिस पर अंग्रेज़ी और उर्दू मे लिखा था जामी मस्जिद। इसी मस्जिद में टीपू सुल्तान नमाज़ अदा करते थे। इस मस्जिद को सजाया संवारा गया है क्योंकि खंडहर जैसी नहीं लगी।

आगे बहुत दूर निकल आने पर बाईं ओर पत्थरों से बना बड़ा घर जैसा लगा जो खंडहर हो चला था। यहाँ अंग्रेज़ी में किखा था वाटर हाउज़। बताया गया कि यह टीपू सुल्तान का स्नानघर था।

वाटर हाउज़ से थोड़ा आगे वह स्थान है जहाँ टीपू सुल्तान ने यह संसार छोड़ा जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में…

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टीपू सुल्तान की समाधि

संगम से हम लौट कर आए। जहाँ सड़क समाप्त हुई वहीं है टीपू सुल्तान का मकबरा (समाधि)

यहाँ तीन-चार घोड़े खड़े थे और घोड़े वाले पर्यटकों से घुड़सवारी के लिए कह रहे थे। शायद कुछ दूर तक घुड़सवारी कराई जाती है, शायद बच्चों को ही, वैसे जितनी देर हम बाहर थे हमने कोई घुड़सवारी नहीं देखी।

तीन-चार दुकानें सजी थी जहाँ खिलौने, गुब्बारे, टोपियाँ, चूड़ियाँ आदि बिक रहे थे। एक दुकान पर समाधि पर चढाई जाने वाली चादरें बिक रही थी।

हम भीतर पहुँचे। ऊँचे-ऊंचे पेड़ जिनमें से सामने ही कैरियों से लदे आम के पेड़ थे। दोनों ओर हरियाली भी थी, बाग़ की तरह संवारा भी गया था पर सामने की ओर मकबरे तक जाने वाला सीधा रास्ता मिट्टी का ही था।

भीतर बीच के कक्ष में तीन समाधियाँ है - बाईं ओर टीपू सुल्तान की माँ शायद आमेना या अमीना बेगम बीच में पिता हैदर अली और दाहिनी ओर टीपू सुल्तान। तीनों समाधियों पर श्रृद्धालुओं द्वारा चढाई गई रंग-बिरंगी चादरें थी। कक्ष में नीम अँधेरा था और शान्त वातावरण। देखभाल करने वाले दो-तीन व्यक्ति वहाँ मौजूद थे।

कक्ष से बाहर पीछे की ओर टीपू सुल्तान के परिवार वालों की समाधियाँ थी। हर समाधि पर नाम और रिश्ता लिखा था। वहाँ से हम नीचे आँगन में उतर आए।

आँगन में ख़ास सिपहसलारों और मंत्रियों की समाधियाँ थी जो बहुत ही व्यवस्थित क्रम में थी। दाहिनी ओर बड़ी समाधि सेनापति की थी। प्रमुख मंत्रियों की समाधियाँ थी और बाईं ओर क्रम से सिपहसलारों की। हर समाधि पर नाम, पदनाम और वो कारनामा लिखा था जिससे उन्हें वीरगति मिली थी।

मुझे खेद है कि एक भी नाम याद नहीं आ रहा। तुर्की नाम वैसे भी याद रखना कठिन ही होता है।

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संगम

टीपू सुल्तान का म्यूज़ियम देखने के बाद हम आगे बढे टीपू सुल्तान का मकबरा (समाधि) देखने।

जैसे ही हम वहाँ पहुँचे हमने देखा बाईं ओर जाने के लिए एक सड़क वहीं से शुरू हुई और वहीं लगे बोर्ड पर लिखा था - संगम।

हमने सोचा पहले संगम ही जाएगें और पहले संहम जाना ही ठीक है क्योंकि मकबरे से शुरू टीपू सुल्तान का क्षेत्र दाहिनी ओर बढता जाता है और यही सड़क आगे मैसूर की ओर जाती है इसीलिए हम आगे बढ गए बाईं सड़क पर संगम की ओर।

सड़क के अंतिम छोर पर है संगम - तीन नदियों का संगम - ये तीन नदियाँ है - कावेरी, हेमावती और लोकपावनी।

चित्र में आप देख सकते है बाएं दाएं और सामने तीन दिशाओं से आता पानी और संगम स्थल। पानी में शिवलिंग भी दिखाई दे रहे है। सामने एक साफ़ नज़र आ रहा है जिसके पीछे दूसरा है और दाहिनी ओर तीसरा है जो चित्र में आ नहीं पाया।

हिन्दु धर्म की आस्था का केन्द्र है यह संगम जहाँ अपने पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति के लिए पानी छोड़ा जाता है। यहाँ पितृकार्य भी संपन्न होते है। जब तक हम वहाँ थे तब तक ऐसा कोई कार्य हमने वहाँ नहीं देखा पर हाँ कुछ लोगों को पूर्वजों के लिए पानी छोड़ते अवश्य देखा।

दो-तीन नौकाएं भी दिखाई दी जिनमें लोग कुछ दूरी तक चक्कर लगा रहे थे। इक्का-दुक्का संगम में स्नान कर रहे थे और कुछ किनारे पर बैठे-बैठे ही संगम के पानी से हाथ-मुँह धो कर औपचारिकता पूरी कर रहे थे।

एक बात अच्छी लगी कि घाट अधिक गन्दा नहीं था कुछ साफ़ ही नज़र आया। घाट की सीढियों पर कुछ देर तक हम भी बैठे रहे।

घाट पर छोटा सा बाज़ार सजा था जहाँ दूर्वा के गट्ठर बिक रहे थे जो तर्पण के लिए अनिवार्य होता है। इसके अलावा नारियल पानी, गन्ने का रस, फल और छोटी-छोटी एक-दो दुकानों पर बिन्दी चूड़ी जैसी चीज़े बिक रही थी।

घाट पर लगे बोर्ड पर तीनों नदियों के नाम, उद्गम और घाट क्षेत्र आदि के बारे में सामान्य जानकारी कन्नड़ और अंग्रेज़ी भाषा में लिखी थी।

कुल मिला कर कर्नाटक में स्थित यह संगम अच्छा ही लगा।

यहाँ एक बात हम आपको बता दें कि पिछले कुछ चित्रों से चित्र पर तिथि में दिन और महीना तो ठीक आ रहा है पर वर्ष 2008 के बजाय 2006 आ रहा है। यह गलती कैमरे में सेल लगाते समय हुई और यह हम यात्रा की समाप्ति के बाद ही देख पाए।

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टीपू सुल्तान के जीवन की झलक

श्रीरंगपट्टनम में टीपू सुल्तान द्वारा बनवाया गया रंगनाथ स्वामी मन्दिर देखने के बाद हम पहुँचे टीपू सुल्तान का म्यूज़ियम देखने।

बस यूँ समझिए पौराणिक काल से निकल कर हम ऐतिहासिक काल में पहुँच गए।

यह संग्रहालय विशाल हरे-भरे परिसर में स्थित है। बीचों-बीच सीधी कतार में रंग-बिरंगे फूलों की बहार भी है जिनमें संग्रहालय के पास लाल-लाल फूल धूप में दमक रहे थे।

संग्रहालय बाहर से सामान्य है पर भीतर पहुँचने पर लगता है जैसे किसी महल में आ गए। दीवारों और छत पर सुनहरी महीन नक्काशी। महीन नक्काशीदार सुनहरी कमानें भी थी।

संग्रहालय में चित्रों के माध्यम से टीपू सुल्तान के जीवन की झलक बताई गई है। जीवन की सभी महत्वपूर्ण घटनाओं के चित्र है - नन्हें टीपू से लेकर गद्दीनशीं सुल्तान तक और हर चित्र के साथ लिखा है विवरण। पिता हैदर अली, माँ, दादी, अभिन्न मित्र पंडित पूर्णय्या के साथ बिताए पल भी चित्रों में है।

सबसे अच्छा चित्र मुझे लगा क़िले पर दुर्गम चढाई का। बड़े से कैनवैस पर क़िले के ऊपरी छोर से लेकर नीचे ज़मीन तक फैला भाग और क़िले पर कई-कई सैनिक चढाई कर रहे है। सचमुच यह चित्र उस समय के युद्ध की जीवन्त तस्वीर है।

सबसे मार्मिक चित्र है टीपू सुल्तान के दो राजकुमारों को अंग्रेज़ों द्वारा बन्दी बनाए जाने पर टीपू सुल्तान की ओर से सेनापति की गवर्नर से चर्चा का। दोनों राजकुमार सामने खड़े है, उनके सामने बैठे सेनापति गवर्नर से वार्तालाप कर रहे है।

सबसे आकर्षक चित्र है ताजपोशी के बाद गद्दीनशीं टीपू सुल्तान।

एक कक्ष में हथियार प्रदर्शित किए गए है। विभिन्न बादशाहों और राजाओं द्वारा टीपू सुल्तान को भेंट किए गए छोटे-बड़े तुर्की सैनिक हथियार जैसे चाकू, कटार आदि यहाँ रखे गए है। यह छोटे आकार के चाकू टीपू सुल्तान हमेशा अपने पास रखा करते थे। इन्हीं के साथ रखी है टीपू सुल्तान की प्रसिद्ध ऐतिहासिक तलवार।

संग्रहालय देख कर हम बाहर परिसर में आ गए। ऊँचे पेड़ों की छाया में हरियाली पर हाथों में चप्पलें उठाए हम नंगे पैर चलने लगे तभी सुना एक महिला स्वर। नज़रे वहाँ गई तो देखा एक महिला छोटी सी कुर्सी पर बैठी है, हाथ में पुस्तक है, सामने तीन कतार में बच्चे अर्धगोलाकार बैठे है और सुन रहे है।

वाह ! क्या कक्षा है। इस तरह से टीपू सुल्तान का पाठ पढेगें तो फ़ेल होना तो दूर की बात रही बच्चों के तो इतिहास में नम्बर भी कम नहीं होंगें।

और हमें याद आ गई जितेन्द्र की कक्षा। बूँद जो बन गई मोती फ़िल्म में जितेन्द्र क्लास रूम में कविता न पढाकर बच्चों को प्रकृति की गोद में ले आते है और गूँज उठती है मुकेश की आवाज -

हरी भरी वसुन्धरा पे नीला-नीला ये गगन
ये किसके बादलों की पालकी उड़ा रहा पवन
दिशाएं देखो रंग भरी चमक रही उमंग भरी
ये किसने फूल फूल पे किया श्रृंगार है
ये कौन चित्रकार है

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रंगनाथ स्वामी का मन्दिर

रंगनाथ स्वामी है शेषनाग की शैय्या पर विराजे विष्णु।

श्रीरंगपट्टनम का यह विष्णु मन्दिर टीपू सुल्तान ने बनवाया था। मन्दिर के बाहर भरा-भरा सा बाज़ार है। पूजा की सामग्री मिल रही है जिसमें तुलसीदल की माला प्रमुख है। पूजा की सामग्री लेकर हम भीतर पहुँचे।

भीतर से आज भी यह मन्दिर प्राचीन मन्दिरों में से एक नज़र आता है। पत्थरों से बना है और ऊँची छत होने से यहाँ बहुत ठंडक है और नीम अँधेरा है।

हमने गलियारा पार किया और देखी सामने काले पत्थर से बनी विष्णु की विशाल मूर्ति।

शेषनाग की शैय्या पर विष्णु दाहिनी करवट लेटे है। शान्त मुख मुद्रा। शीर्ष पर शेषनाग के सात फन है। काले पत्थर से शेषनाग का आपस में जुड़ा एक-एक फन स्पष्ट नज़र आ रहा है यहाँ तक कि मुख से निकलने वाले बाल भी साफ़ दिखाई दे रहे थे। बाई ओर से विष्णु के पैर दबाती लक्ष्मी की छोटी सी मूर्ति।

दर्शन कर हम जैसे ही परिधि से बाहर आए तो देखा दाहिनी ओर छोटी तीन मूर्तियाँ - राम, लक्ष्मण और सीता की।

बाहर निकलते समय द्वार पर प्रसाद बिक रहा था। हमने दस रूपए दिए तो उसने एक लिफ़ाफ़े में पाँच लड्डू रख कर हमें दिए। हमने बाहर आकर जैसे ही लिफ़ाफ़ा खोल कर लड्डू को हाथ लगाया लड्डू भरभरा कर टूट गए। हमें आश्चर्य हुआ शक्कर मिलाकर रवे से बनाए गए ये लड्डू इतनी कोमलता से कैसे उसने सहेज कर लिफ़ाफ़े में रखे कि एकदम गोल और साबुत थे और हमारे छूने भर से ही भरभरा गए…

यह स्वादिष्ट प्रसाद ग्रहण कर हम आगे बढ गए।

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बाल गोपाल का मन्दिर

बैंग्लोर से हम सुबह-सुबह ही निकल पड़े मैसूर की ओर।

जी नहीं सीधे मैसूर नहीं… जैसे कि आमतौर पर कहा जाता है बैंग्लोर-मैसूर पर वास्तव में यह कुल चार स्थान है जिनमें से एक स्थान का ऐतिहासिक महत्व बहुत है - टीपू सुल्तान का श्रीरंगपट्टनम जिससे जुड़ा एक और स्थान है मंड्यार जिसे शुगर सिटी कहते है, यहाँ शक्कर के कारख़ाने अधिक है पर और कोई विशेष पर्यटन स्थल नहीं है इसीलिए इस स्थान का नाम हाशिए पर है।

तो हम निकले बैंग्लोर से… रास्ते में गरमा-गरम नाश्ता किया और आगे चल पड़े। सबसे पहले पहुँचे बालगोपाल के मन्दिर। जहाँ गाड़ी रूकी लगा यह पुराना शहर है। पुराने घर और टूटी-फूटी सी खंडहरनुमा जगह नज़र आई। वहाँ पत्थर के स्तम्भ भी नज़र आए लगा यहाँ कोई इमारत थी।

सुबह का ही समय था सो दो-तीन महिलाएँ फूलमालाएँ बेचती नज़र आई। शायद यहाँ बहुत कम लोग आते है और आस-पास की औरतें ही फूलमालाएँ बेच लेती है। दो तरह की मालाएँ थी - एक तो सफ़ेद फूलों की माला जो सामान्य थी पर दूसरी हरी ताज़ा दमकती हुई माला तुलसी दल की थी।

हमें ध्यान आया कि यह कृष्ण मन्दिर है और कृष्ण जी को तुलसी चढाई जाती है। वास्तव में दक्षिण में शिव मन्दिर अधिक है और आन्ध्रपदेश में कृष्ण जी की मूर्ति पर तुलसी दल चढा दिए जाते है और तुलसीदल की मालाएँ नहीं होती।

यहाँ हमने दोनों तरह की मालाएँ ली और मन्दिर की ओर बढे। बहुत ही पुराने ज़माने का मन्दिर लगा पत्थर से बना हुआ जिसमें बीच-बीच में पत्थर के स्तम्भ है।

हमने दर्शन किए बालगोपाल के। बहुत ही सुन्दर सलोनी मूर्ति है। बताया गया कि जिनकी संतान नहीं होती वे महिलाएँ यहाँ पूजा करती है और संतान प्राप्ति की कामना करती है।

वैसे दक्षिण में गोपाल के मंदिर है ही कम और बालगोपाल का मंदिर यह एक ही नजर आया. यहाँ से निकल कर हम आगे बढे रंगनाथ स्वामी मंदिर की ओर।

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