Archive for रामेश्वरम

पूर्व राष्ट्रपति का पैतृक निवास और पामबन पुल

रामेश्वरम प्रमुख तीर्थ स्थल होने से देश के कोने-कोने से लोग आते है।

तीर्थ स्थल पर अक्सर उम्रदराज लोग आते है। यह जीवन का ऐसा पढाव होता है जहाँ खान-पान संयमित होता है। इस बात का यहाँ पूरा-पूरा ख़्याल रखा गया है। मन्दिर के आस-पास ही कई होटल या भोजनालय है जहाँ विभिन्न प्रान्तों का भोजन मिलता है। आप चाहे महाराष्ट्र से आए हो या उत्तर प्रदेश से आपको घर जैसा भोजन मिलेगा।

रामेश्वरम का एक और आकर्षण है, यहाँ मन्दिर से कुछ ही दूरी पर है पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम का पैतृक निवास -

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अगर आप ध्यान से देखें तो इस तस्वीर में दरवाज़े की जाली के ऊपर सफ़ेद जाली से अंग्रेज़ी में लिखा है - हाउज़ आँफ़ अब्दुल कलाम।

वास्तव में रामेश्वरम तक पहुँचना ही पहले समुद्र के कारण कठिन था। स्वयं राम भी समुद्र को लाँघ कर यहाँ पहुँचे थे। तीर्थ यात्री रामेश्वरम द्वीप में समुद्र मार्ग से ही आते थे। अँग्रेज़ों ने अपने शासन काल में एक साहसिक कदम उठाया और चेन्नै से रामेश्वरम तक समुद्र में पुल बना और रेल की पटरियाँ बिछाई गई -

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इसे नाम दिया गया पामबन पुल। यहाँ नावें भी देखी जा सकती है जिनमें से मछुआरे मछलियाँ पकड़ते है। यह रेलमार्ग है तो अच्छा पर है तो समुद्र का रास्ता…

राजीव गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में यहाँ एक पुल बनाया गया जो सड़क मार्ग बना। इस तस्वीर में आप सड़क मार्ग और रेल मार्ग दोनों देख सकते है -

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सड़क का पुल थोड़ा ऊँचाई पर है। यहाँ से नीचे समुद्र में रेल जाती हुई नज़र आती है जो एक विलक्षण दृश्य है। हमने जब रेल को देखा तो इतने तन्मय हो गए कि रेल गुज़र चुकी तब तस्वीर खींचने का ध्यान आया -

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इस रेल मार्ग का पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है। समुद्र के पूरे रेल मार्ग में बीच-बीच में रेल की पटरियों से जुड़े छोटे कैबिन बने है जिसमें से गार्ड झंडी दिखाते है ताकि रेल समुद्र से सुरक्षित गुज़र सकें।

इस सड़क मार्ग से बसें निरन्तर चेन्ने की ओर आती-जाती है। इस तरह हमारी रामेश्वरम की यात्रा पूरी हुई। बीच में एक दिन के लिए हम मदुरै गए जिसकी चर्चा अगले किसी चिट्ठे में…

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रामेश्वरम की ख़ूबसूरत सुबह – समुद्र किनारे सूर्योदय

रामेश्वरम में जिस होटल में हम ठहरे थे वहाँ की बालकनी से देखा लहराता समुद्र।

सूर्योदय देखने हम सवेरे पाँच बजे से बालकनी में टहलने लगे। इस समय भी सुरमई होता काला अँधेरा कम सुन्दर नहीं लग रहा था। अब किनारे से निकल कर एक नाव धीरे-धीरे आगे बढती दिखाई दी। उसके पीछे रस्सी से बँधी दूसरी नाव फिर उसके पीछे एक-दो नावे फिर संख्या बढती गई -

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धीरे-धीरे कालिमा छँटती गई और आकाश सुरमई हो गया -

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फिर आकाश सुरमई से सुनहरा होता गया और नावों का काफ़िला समुद्र में आगे बढता गया -

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धीरे-धीरे जाल नाव से निकल कर समुद्र में छाने लगे मछलियाँ पकड़ने -

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फिर सुनहरापन बढता गया और पौ फटने लगी और समुद्र के कुछ ऊपर आकाश में सूर्यदेवता प्रकट हुए -

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फिर लालिमा छाने लगी और एक पतली लाल रेखा समुद्र के पानी में खिंच आई -

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यह है अरूण -

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फिर सूर्य बढने लगा -

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आकाश में एक्का-दुक्का बादल भी थे। कभी सूर्य बादल की ओट में रहा फिर बाहर निकल आया -

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यह है समुद्र का किनारा जहाँ नावों का काफ़िला है जो समुद्र में आगे बढ रहा है, किनारे श्रृद्धालु पवित्र स्नान कर रहे है। यह वही स्थल है - अग्नि तीर्थम जिसकी शुरूवाती चिट्ठे में हमने चर्चा की थी -

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अगले चिट्ठे में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का पैतृक निवास, पामबन पुल और कुछ बातें खाने-पीने की…

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गन्धमादन पर्वत और शबरी के बेर

रामेश्वरम में रामसेतु के पत्थर देखने के बाद हम पहुँचे गन्धमादन पर्वत।

रास्ते में आरंभ में ही बाईं ओर छोटा सा हनुमान मन्दिर है जिसमें स्थापित हनुमान जी की मूर्ति बाहर से ही दिखाई देती है, इसे साक्षी हनुमान का मन्दिर कहा जाता है।

माना जाता है कि राम लंका जाने के लिए निकटतम स्थल रामेश्वरम द्वीप पहुँचे और यहाँ स्थित गन्धमादन पर्वत पर चढ कर उन्होनें पहली बार लंका को देखा और इस पल के साक्षी रहे हनुमान। इसीलिए यह मन्दिर साक्षी हनुमान का मन्दिर कहलाता है और इस पल की स्मृति के लिए पर्वत पर बनाया गया मन्दिर पादुका मन्दिर कहलाता है।

हनुमान जी के दर्शन के बाद गन्धमादन पर्वत की चढाई सड़क मार्ग से बढती जाती है लेकिन गाड़ी चलाने में अधिक कठिनाई नहीं होती। बताया गया कि गन्धमादन पर्वत पर स्थित यह पादुका मन्दिर 24 फीट की ऊँचाई पर है लेकिन कुछ लोगों ने ऊँचाई 18 फीट बताई। ऊपर मन्दिर तक जाने के लिए सीढियाँ है।

यह पूरा क्षेत्र शबरी का है और आज भी वह वर्चस्व कायम है। मन्दिर की सीढियों पर शबरी के बेर बेचे जाते है। इस तस्वीर में देखिए पादुका मन्दिर जो पर्वत की ऊँचाई पर है और सीढियों पर बेचे जा रहे है बेर -

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मन्दिर में काले पत्थर से बने पादुका की एक जोड़ी है जिसके दर्शन किए जाते है और जिन्हें प्रणाम किया जाता है। चारों ओर अहाता है जहाँ से नीचे शहर नज़र आता है।

दर्शन कर हम नीचे आने लगे। सीढियों पर टोकरों में बेर भर कर उसे काग़ज़ की पुड़िया में डालकर बेचा जा रहा था। साथ में अमरूद, तोतापरी कैरी (कच्चे आम) भी बेचे जा रहे थे। इसे श्रृद्धा कहे या आसक्ति लगभग हर आने जाने वाले एक पुड़िया बेर तो खरीद ही रहे थे। हमने भी खरीदे। बेर बिल्कुल खट्टे थे हालांकि शबरी के बेर मीठे थे। बताया गया कि यहाँ हमेशा बेर बेचे जाते है जबकि हर मौसम में बेर नहीं मिलते। हो सकता है यहाँ बेर की झाड़ियाँ हो और कच्चे पक्के बेर हमेशा मिलते हो वैसे यहाँ झाड़-झंखाड़ तो नज़र आए।

यहाँ से नीचे लौटने के बाद हमें थोड़ी दूर पर एक झरना नज़र आया जिसे सीता झरना कहते है। माना जाता है कि जब सीताजी को प्यास लगी तब रामजी ने धरती पर एक तीर छोड़ा जिससे मीठे पानी का झरना फूट पड़ा था।

सीता झरने से आगे एक स्थल है जहाँ भी पवित्र स्नान किया जाता है। इस स्थल में पानी में गणेशजी की मूर्ति है, शिवलिंग है और नवग्रह की मूर्तियाँ है। सभी मूर्तियाँ पानी में है पर ऊपर से दिखाई देती है। यहीं प्लेटफार्म जैसा है जहाँ स्नान किया जाता है। हो सकता है यह पहले मन्दिर रहा हो और बाद में जलस्तर बढने से पानी में चला गया हो।

इसी के साथ यहाँ के पुण्य स्थलों की यात्रा समाप्त हुई। इस तरह रामेश्वरम एक ऐसा पवित्र शहर है जहाँ से राम ने लंका पर चढाई की और सीता को साथ लेकर लंका विजय के बाद अपनी धरती पर पहला पग यहीं रखा। उसके बाद कुछ समय तक राम सबके साथ यहाँ रहे यानि रामकथा का महत्वपूर्ण भाग है रामेश्वरम।

लेकिन रामेश्वरम में देखने योग्य अन्य स्थल और दृश्य भी है, एक ऐसा ही मनोरम दृश्य है समुद्र के किनारे सूर्योदय का जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में…

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रामसेतु के तैरते पत्थर और समुद्र की मछलियों का कुंड में पालन

रामेश्वरम में रामसेतु का स्थान देखने के बाद हम उत्सुक हो गए रामसेतु के तैरते पत्थर देखने के लिए जो रखे है रामतीर्थम में।

रामतीर्थम यहाँ की एक पुण्य स्थली है जिसके पास ही है लक्ष्मण तीर्थम और इनके सामने है सीता तीर्थम। इन स्थानों को राम पर्वत, लक्ष्मण पर्वत और सीता पर्वत भी कहते है तथा राम कुंड, लक्ष्मण कुंड और सीता कुंड भी कहते है। मुझे कुंड कहा जाना ही सही लगा क्योंकि वास्तव में यहाँ कुंड है जो इनके लिए बनवाए गए थे।

सीता कुंड पूरी तरह से सूख चुका है। कुंड के आस-पास ख़ाली ज़मीन है, मन्दिर जैसा कुछ नहीं है। केवल एक बोर्ड पर तमिल, अंग्रेज़ी और हिन्दी में लिखा है सीता तीर्थम।

सीता कुंड के सामने है लक्ष्मण कुंड। द्वार पर ही एक-एक रूपए के मछलियों के बिस्कुट के पैकेट बिक रहे थे जिसे ख़रीद कर हम भीतर पहुँचे। पत्थरों से बना है एक बड़ा कक्ष है। सामने अंतिम छोर पर गर्भ गृह है जिसमें लक्ष्मण जी की मूर्ति है जिसके दर्शन हमने किए। दाहिनी ओर कुंड है जो आकार में कुछ बड़ा ही है और पानी से भरा है। बीच में एक चबूतरा सा है।

कुंड में बहुत सारी बड़ी मछलियाँ है। कुंड के किनारे सीढियों पर बैठ कर पैकेट से निकाल कर बिस्कुट इन मछ्लियों के लिए पानी में फेकने पर सभी मछलियाँ किनारे पर आ कर जमा हो गई और मुँह उठा कर बिस्कुट लपकने लगी -

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यहाँ से निकल कर हम पास ही स्थित रामकुंड देखने गए। यहाँ मन्दिर में राम लक्ष्मण और सीता के साथ हनुमान की पारम्परिक मुद्रा में मूर्तियाँ है। मन्दिर के अहाते में एक किनारे छोटा सा पानी से भरा सिमेंट का टैंक है जिसके ऊपर लोहे की जाली लगी है। पानी में बड़ा सा पत्थर तैर रहा है। मन्दिर के लोगों के कहने पर हमने जाली में से हाथ डालकर पत्थर को नीचे किया पर हाथ हटते ही पत्थर फिर तैर कर ऊपर आ गया -

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पास के ही चबूतरे पर एक ऐसा ही बड़ा सा पत्थर रखा है जो हल्का होने से हम आसानी से उठा सकें। यही है रामसेतु के हल्के पत्थर जो पानी में तैरते है जिनसे पुल यानि रामसेतु बना। यहीं पर एक चित्र भी लगा है जो कलाकार द्वारा तैयार करवाया गया है जिसमें भारत और श्रीलंका के बीच पुल को दर्शाया गया है। यह है उस चित्र की तस्वीर -

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मन्दिर के पिछवाड़े है रामकुंड जो लक्ष्मण कुंड की ही तरह है। यहाँ छोटी मछलियाँ है और इनके लिए मूँगफली के पैकेटों को सिंगदाना कह कर बेचा जा रहा था। लक्ष्मण कुंड की तरह ही यहाँ भी दाने फेंकने पर सभी मछलियाँ किनारे पर आकर जमा हो जाती है जिससे किनारे का पानी काला और हलचल भरा लगता है -

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जिस समुद्र में से रास्ता बना कर, उस पर से चलते हुए लंका तक पहुँच कर सीता को साथ में लेकर उसी रास्ते लौटना, स्वाभाविक है कि इस समुद्र के जीवों पर राम की कृपा होती और उन्होनें कुंड बनवा कर इन छोटे जीवों के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी ली। इसीलिए बहुत छोटी मछलियाँ रामकुंड में है क्योंकि उन्हें संरक्षण की अधिक आवश्यकता होती है और कुछ बड़ी मछलियाँ लक्ष्मण कुंड में है।

दोनों कुंडों में साफ पानी है और किनारे की सीढियाँ भी साफ-सुथरी है। यह सब देखने के बाद हम पहुँचे पादुका मन्दिर देखने जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में होगी और साथ ही चर्चा में रहेंगे गन्धमादन पर्वत और शबरी के बेर…

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रामसेतु और विभीषण मन्दिर

छोटा सा शहर रामेश्वरम, पूरा का पूरा एक पुण्य स्थली है।

यहाँ के विभिन्न पुण्य स्थानों पर घूमने के लिए मुख्य मन्दिर रामालय के पास से ही आटो मिल जाते है। आटो के अलावा एकाध जीप और दो-चार ताँगे भी है। इनके चालक सभी पुण्य स्थलों के बारे में जानते है इसीलिए गाइड की आवश्यकता नहीं पड़ती और यहाँ कोई गाइड नज़र भी नहीं आए। ताँगे और आटो वाले 10-12 किलोमीटर तक घुमाने के लिए प्रति व्यक्ति 10 रूपए लेते है। एक चक्कर में सभी स्थान नहीं देख सकते है क्योंकि यह विभिन्न दिशाओं में है। जीप में प्रति व्यक्ति 150 रूपए लेकर पूरे स्थान एक साथ दिखाते है। लेकिन जीप बहुत कम है, हमें भी नहीं मिली इसीलिए हमने भी आटो से ही सैर की।

सबसे पहला स्थान हमनें देखा रामसेतु। यह वही सेतु है जिस पर चलकर राम ने अपनी सेना के साथ लंका पर चढाई की थी। सेतु तो अब दिखाई नही देता है। बताया गया कि वर्ष 1964 में रामेश्वरम में भयंकर तूफ़ान आया था जिससे सेतु टूट गया है और समुद्र में समा गया है। यह है सेतु तक पहुँचने का रास्ता -

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यह पक्की सड़क है। इसके दोनों ओर समुद्र लहरा रहा है। दाहिनी ओर का समुद्र श्रीलंका की ओर है और बाईं ओर का तमिलनाड़ु का।

और यहाँ दोनों समुद्र मिलते है। यहीं से सेतु बनाया गया। कहते है सेतु के इस आरंभिक बिन्दु पर यानि समुद्र के किनारे समुद्र के कुछ भीतर एक मन्दिर भी था जहाँ सीढियों से उतर कर जाते थे। ये भी तूफ़ान में जलमग्न हो गया -

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यहीं किनारे पर दाहिनी ओर यानि श्रीलंका जाते समुद्र की ओर है विभीषण मन्दिर। माना जाता है कि यहीं पर जहाँ दोनों समुद्र मिलते है वहाँ के पानी से राम ने विभीषण का अभिषेक किया था। छोटा सा मन्दिर है -

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इसमें सामने पत्थर का कलश जैसा दिखाई दे रहा है जिसके पीछे दीवार दिखाई दे रही है, इसीके पीछे राम सीता लक्ष्मण और हनुमान की पारम्परिक मुद्रा में मूर्तियाँ है और हनुमान के पास हाथ जोड़े विभीषण खड़े है। शायद हमारे देश में मन्दिर में विभीषण की मूर्ति इसके अलावा कहीं और नहीं है।

यहाँ से कुछ ही दूरी पर एक खंडहर सा स्थान है। यह एक गाँव था। बताया गया कि यहाँ के लोगों से अंग्रेज़ बँधुआ मज़दूरी करवाते थे। बाद में गाँव उजड़ गया और पत्थरों से बनी इमारतें रह गई थी फिर तूफ़ान में सब नष्ट हो गया और रह गया खंडहर। इस पूरे स्थान को धनुषकोटि कहते है, इस नाम के पीछे पौराणिक कथा है -

राम समुद्र के किनारे बैठे लंका तक पहुँचने के लिए विचार कर रहे थे। समय बीत रहा था और समुद्र देवता उन्हें रास्ता नहीं दे रहे थे। तब राम ने समुद्र को चीरने के लिए धनुष पर बाण चढाया तब घबराए समुद्र देवता प्रकट हुए। तब तक बाण धनुष पर चढ चुका था और बाण छोड़ना अनिवार्य था क्योंकि प्रत्यंचा पर चढने के बाद बाण उतारा नहीं जा सकता था। ऐसे में समुद्र देवता ने कहा कि सामने की चट्टान पर बाण छोड़ने से चट्टान टुकड़े-टुकड़े हो जाएगी और इन्हीं पत्थरों से सेतु बन सकेगा। वही किया गया। इन पत्थरों पर राम नाम लिखा गया जिससे यह पत्थर या शिलाएँ पानी में तैरने लगी और नल और नील के मार्गदर्शन में पुल बनाया गया।

बताया जाता है कि आगे भी रामेश्वरम के धनुषकोटी से श्रीलंका तक बने पुल पर पैदल भी यात्री जाया करते थे। यह दूरी 20 किलोमीटर की मानी जाती थी।

इन शिलाओं की जानकारी और साथ में राम सीता लक्ष्मण हनुमान कुंड की जानकारी अगले चिट्ठे में…

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रामालय – एक नज़र में

आइए, रामेश्वरम के रामालय या रामनाथ स्वामी के मन्दिर को एक नज़र देखें।

यह पत्थरों से बना बहुत बड़ा मन्दिर है। इसमें लम्बे-लम्बे गलियारे है -

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इन गलियारों में दोनों ओर कतार में स्तम्भ है। लगभग 1800 स्तम्भ है। जितने सुन्दर स्तम्भ है उतने ही सुन्दर कलात्मक है छ्ज्जे -

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सभी स्तम्भ कलात्मक है। कुछ स्तम्भों पर पौराणिक काल की आकृतियाँ है -

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कहीं-कहीं पौराणिक चरित्र भी है। शिवजी की बारात में जिन चरित्रों के बारे में बताया जाता है, उन चरित्रों की कलाकृतियाँ भी है -

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बहुत सुन्दर शिल्पकारी है -

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कहीं-कहीं यह कलाकृतियाँ टूट भी रही है जैसे यह गणेश जी की कृति -

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इसी तरह दो चार स्तम्भ भी टूटे हुए नज़र आए जिसे ऊपर से तीसरे चित्र में नीचे दाहिनी ओर देखा जा सकता है। इन टूटे स्तम्भों को किनारे रख दिया गया -

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बताया गया कि इन टूटे स्तम्भों को हटा कर नए स्तम्भ लगाए गए है। बहुत विशाल, पत्थरों से बना होने तथा जगह-जगह कुंड होने से ठण्डा वातावरण लिए शिल्पकारी का बेजोड़ नमूना है यह मन्दिर।

मन्दिर के आस-पास के अन्य पवित्र स्थानों की जानकारी अगले चिट्ठे में…

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रामेश्वरम में रामनाथ स्वामी के दर्शन

आज अक्षय तॄतीया (अक्खा तीज) के दिन दक्षिण के सबसे बडे तीर्थ रामेश्वरम में मुख्य दर्शन के बारे में लिखना अच्छा लग रहा है.

रामेश्वरम के मन्दिर रामालय में कुंड स्नान के बाद रामनाथ स्वामी यानि शिवजी के दर्शन किए जाते है।

सभी कुंड देखने के बाद हम भी मुख्य मन्दिर में दर्शन के लिए कतार में खड़े हो गए। भीड़ अधिक नहीं थी और आधे घण्टे के भीतर हमारी बारी आ गई।

गर्भगृह में एक के पीछे एक कुछ अधिक ही दूरी पर तीन दीपमालाएँ लगी हुई थी। बीच की दीपमाला के दीपकों के प्रकाश में काले पत्थर से बना शिवलिंग दमक रहा था। शिवलिंग के पीछे रक्षा करते फन फैलाए थे नागराज जिसके पीछे शिवजी की मूर्ति भी है। दर्शन कर हम बाहर आए। चारों ओर दीवारों से सटे शिवलिंग के विभिन्न रूप है जिनमें सभी लिंगार्चन भी है। इस मन्दिर की बाईं ओर है पार्वती मन्दिर।

पार्वती मन्दिर में प्रवेश करते ही दाहिनी ओर अष्टलक्ष्मी के दर्शन होते है। क्रम से लगी है आठ मूर्तियाँ। अच्छा लगा पार्वती जी के आठों रूपों को देखना - धन लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, वर लक्ष्मी, सन्तान लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी, वैभव लक्ष्मी और ऐश्वर्य लक्ष्मी

भीतर गर्भगृह में भी उसी तरह से दीपमालाएँ लगी थी जैसे शिव मन्दिर में है। बीच में पार्वतीजी की विशाल मूर्ति है।

पार्वतीजी के दर्शन कर हम बाहर निकले। पीछे दाहिनी ओर छोटा सा मन्दिर है जहाँ शेष शैय्या पर विश्राम कर रहे है विष्णु जी और पैरों के पास विराजमान है लक्ष्मीजी।

शिव मन्दिर के बाई ओर पार्वती मन्दिर है तो दाहिनी ओर छोटे-छोटे हवन कुंड बने है। यहाँ कुछ लोग हवन भी कर रहे थे। यहीं पर प्रसाद मिलता है। 50 रूपए में प्रसाद का एक सेट मिलता है जिसमें एक पैकेट में विशेष दक्षिण भारतीय शैली में बना हलवा होता है और साथ में भभूत और कुंकुम के पैकेट होते है। इसके अलावा एक सीलबन्द बोतल भी है जिसमें 21 कुंडों का पानी होता है। इसके अलावा पाँच लड्डुओं का एक पैकेट 10 रूपए का मिलता है। इसी तरह पंचामृत का छोटा डिब्बा भी ख़रीदा जा सकता है।

माना जाता है कि कुंड के पानी की बोतल का प्रयोग कई दिनों तक किया जा सकता है, रोज़ स्नान के पानी में कुछ बूँदें इस बोतल के पानी की डाल कर स्नान करना शुभ माना जाता है। इस तरह एक बोतल का उपयोग महीने भर तक किया जा सकता है। इस तरह अच्छा लगता है कि यात्रा के बाद भी कुछ दिनों तक इस माहौल से जुड़े रह सकते है। ख़ैर… हम बात कर रहे थे मन्दिर की…

मन्दिरों की परम्परा के अनुसार इस मन्दिर में भी नवग्रह का मन्दिर है। यहाँ कढाई में तेल गरम होता रहता है। इस तेल को दीपक में लेकर चढाया जाता है जिसमें यहाँ बैठे पुजारी मदद करते है।

मुख्य मन्दिर के आस-पास एक हाथी सज-धजा खड़ा होता है इसके साथ महावत भी पुजारी की वेशभूषा में होते है -

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आरंभिक चिट्ठे में हमनें जटाशंकर के मन्दिर के बारे में बताया था वही है एक स्थान जहाँ दो हाथी है। बारी-बारी से एक-एक हाथी को नहला कर सजाया जाता है और मन्दिर में खड़ा किया जाता है।

इस तरह दक्षिण के महत्वपूर्ण तीर्थस्थल में हमनें दर्शन किए। मन्दिर की सामान्य जानकारी अगले चिट्ठे में…

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