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फिलोमेना चर्च

टीपू सुल्तान के महल से निकल कर हम पहुँचे फिलोमेना चर्च जो मैसूर के पुराने चर्चों में से एक है और शायद सबसे पुराना चर्च है।

व्यस्त सड़क पर बड़े परिसर में स्थित है यह चर्च। भव्य इमारत है चर्च की जिसकी मीनार भी बहुत ऊँची है जो हमारे कैमरे में समा न सकी -

बाहर अधखिले लाल गुलाब और छोटी पतली रंग-बिरंगी मोमबत्तियाँ बिक रही थी। मोमबत्ती और गुलाब सभी का दाम एक-एक रूपया।

हमने भी गुलाब और मोमबत्तियाँ खरीदी और चल पड़े चर्च के भीतर। बड़ा हाँल जिसमें नीम अँधेरा पहरा था और वातावरण बहुत शान्त था। बीच में बिछी सारी बेंचें लगभग खाली थी। इक्का-दुक्का लोग बैठे प्रार्थना कर रहे थे।

हम बाईं ओर बढे जहाँ यीशू को गोद में लिए मदर मैरी की प्रतिमा थी। हमने मदर के चरणों में गुलाब रखें। मोमबत्तियाँ जलाई और प्रार्थना की।

आगे यीशू के जन्म और बाल्यकाल की कहानी कहते सुन्दर चित्र क्रम से सजे थे जिन्हें देखते हुए हम आगे बढते गए और आ गए बीचों-बीच जहाँ प्रभु यीशु की विशाल प्रतिमा थी जिसके आगे हमने शीश झुकाया और दाहिनी ओर आ गए।

दाहिनी ओर ईसा-मसीह के बलिदान की कहानी कहते चित्र क्रम से लगे थे। हर चित्र के आगे लिखा था विवरण - शरीर पर पड़ते कोड़े, पहली बार बेहोश होना, अपना सलीब उठा कर चलना, शरीर पर लगने वाली पहली कील, फिर दूसरी, तीसरी… और सलीब पर ईसा…

फिर हम बीच में रखी बेंचों पर कुछ देर बैठे रहे। दुबारा बीचों-बीच लगी प्रभु यीशू की प्रतिमा के पास आए। यहाँ से कुछ सीढियाँ नीचे जा रही थी।

नीचे सीढियाँ उतरते ही देखा सामने फिलोमेना की बड़ी प्रतिमा जो काँच के आवरण में थी। दाहिनी करवट लेटी फिलोमेना के सामने एक शिशु था। बहुत सुन्दर गुलाबी मूरत जिसे हम कुछ पल निहारते रह गए।

फिर दाहिनी ओर गलियारे में चल पड़े जहाँ नीम अँधेरा था। गलियारे में बोर्ड पर कई-कई नाम थे जो उनके थे जिन्होनें समय-समय पर इस चर्च को किसी न किसी रूप में योगदान दिया था। गलियारा पार कर कुछ सीढियाँ चढ हम बाहर परिसर में आ गए। कुछ देर परिसर के शान्त वातावरण में रूकने के बाद हम बाहर निकल आए।

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