Archive for नासिक

पंचवटी

नासिक शहर में ही हैं पंचवटी।

देख कर लगा तमाम कोशिशों के बावजूद पंचवटी में वन का माहौल नही बन सका हैं, शहर हावी हैं। कहीं-कहीं सड़क के दोनों किनारे घने पेड़ और विचरते पशु वन का आभास कराते हैं।

सबसे पहले हम पहुंचे पंचवटी के अंतिम छोर पर जहां गौतमी और गोदावरी नदियों का संगम हैं -

यहाँ किनारे पर हैं गौतम ऋषि का आश्रम, यही से गौतमी नदी का उद्गम हैं -

यहाँ आश्रम का रूप देने एक झोपड़ी जैसी बनाई गई हैं जहां एक-दो लोग तैनात हैं जो इस स्थान के बारे में बताते हैं -

सीता सवेरे यही आश्रम में स्नान कर सूर्य उपासना किया करती थीं। यहाँ सीता की मूर्ति भी हैं। बाद के समय में यहाँ लव-कुश और सीता की मूर्ति भी स्थापित की गई -

बताया गया कि वास्तव में इसी स्थान पर लक्ष्मण ने सूर्पनखा के नाक और कान काटे थे और कटी नाक को दूर फ़ेंक दिया था। जितनी दूरी तय करती हुई नाक गिरी वह पूरा क्षेत्र नासिक कहलाया। यह स्थान नदी का किनारा होने से वर्षा के मौसम में यहाँ कठिनाई होती हैं इसीलिए कुछ दूरी पर एक लक्ष्मण मंदिर बनवाया गया और उसी को शूर्पनखा का स्थान भी बताया जाता हैं।

नदी का किनारा होने से बड़े-बड़े पत्थर हैं। घाट साफ़-सुथरा नही हैं -

कुछ ही दूरी पर हैं लक्ष्मण मंदिर। यहाँ तस्वीर हैं लक्ष्मण जी की, सूर्पनखा की नाक काटते हुए -

यह देश का एकमात्र लक्ष्मण मंदिर हैं।

यहाँ से निकल कर हम सीता गुफा देखने आगे बढे। रास्ते में लक्ष्मी नारायणा का मंदिर, और भी छोटे बड़े मंदिर हैं जिनमे राम लक्ष्मण सीता हनुमान की मूर्तियाँ हैं।

हम पहुंचे सीता गुफा। यही से रावण ने साधु के भेष में सीता का हरण किया था। बाहर पेड़ की छाँह हैं, अहाता हैं जहां श्रद्धालुओ की कतार थी। गर्भ गृह निचले तल में हैं। छोटा सा द्वार हैं जिसमे से एक ही व्यक्ति जा सकते हैं। सीढिया उतर कर नीचे जाना हैं, छत भी नीची हैं इसीलिए बैठे-बैठे सीढिया उतरना हैं।

यहाँ सीताजी की मूर्ति हैं। पूजा के लिए पंडितजी भी हैं। यहाँ खड़े हो सकते हैं। सीताजी के दर्शन के बाद बाई ओर के कक्ष में जाना हैं जहां ताम्बेल (जंतु) की मूर्ति हैं जिस पर रोशनी होने से यह सजीव लग रहा था। माना जाता हैं कि जब रावण भिक्षा मांगने आया तब छाया (माया) सीता भिक्षा लेकर बाहर आईं थी और असली सीता गुफा में ही थी जिनकी रक्षा ताम्बेल कर रहे थे।

ताम्बेल के दर्शन के बाद द्वार से बाहर निकलने पर एक और गुफा में प्रवेश करते हैं यहाँ शिवलिंग हैं जिनकी सीता पूजा किया करती थी। शिवलिंग के दर्शन के बाद बैठे-बैठे सीढियां चढ़ते हुए गुफा से बाहर निकले हम। सीढियां 5-6 ही हैं।

यहाँ से निकल हम कुछ ही दूर स्थित राम कुंड पहुंचे। यहाँ रामजी स्नान, ध्यान किया करते थे। बड़ा और साफ़-सुथरा लगा कुंड।

पंचवटी देखने के बाद हम हैदराबाद लौट आए।

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त्रियम्बकेश्वर मंदिर और कुशावर्त तीर्थ

नासिक में सबसे पहले हम त्रियम्बकेश्वर मंदिर देखने गए।

मंदिर का परिसर विशाल हैं जिसमे अंतिम छोर पर हैं कुशावर्त तीर्थ। परिसर के प्रवेश पर ही कैमरे की मनाही से एक भी चित्र नही ले सके।

मंदिर का गोपुरम कुछ इस तरह से बना हैं कि यह रूद्राक्ष के मनको से बना दिखाई देता हैं। मंदिर के प्रांगण में त्रिमूर्ति - ब्रह्मा, विष्णु, महेश के विग्रह हैं, इसी से यह त्रियम्बकेश्वर मंदिर कहलाया। श्रद्धालुओ की बहुत भीड़ थी। हर दिन होती हैं, इसीलिए लम्बी कतारों में हर कतार के अंत में पीने के पानी की व्यवस्था भी हैं।

यहाँ गणेश, कार्तिकेय, पार्वती के अलग-अलग मंदिर बने हुए हैं। सबसे बड़ा आकर्षण हैं नंदी। विशाल नंदी की मूर्ति जीवंत लगती हैं। पूजा की सामग्री और मन्नत की सामग्री नंदी पर ही चढाने का प्रावधान हैं। यहाँ पुरोहित भी हैं। माना जाता हैं कि नंदी वाहन हैं इसीलिए श्रद्धालुओ की मनोकामना प्रभु तक यहीं से पहुंचती हैं।

सभी के दर्शन करते हुए अंत में गर्भगृह पहुंचते हैं जहां सामान्य से कुछ बड़े आकार का शिवलिंग हैं। दर्शन कर जब लौटते हैं तब लिंग के ठीक ऊपर बने दर्पण में से दूर तक दर्शन किए जा सकते हैं। गर्भगृह से निकलते ही पुरोहित एक नारियल देते हैं जिसे घर जाकर फोड़ा जाता हैं। बाहर निकलने के बाद प्रांगण में दूसरी ओर कतार में 108 शिवलिंग हैं।

यहाँ से निकल कर हम कुशावर्त तीर्थ गए।

छोटा सा तालाब जैसा हैं जिसमे बहुत साफ़-सुथरा पानी हैं। श्रद्धालु किनारे पर सजी दुकानों से आस्था के दीप लेकर अन्य सामग्री के साथ पत्ते पर रखकर पानी में छोड़ रहे थे। स्नान करने वालो का तांता लगा था।

पूरे परिसर में पूजापा के साथ-साथ खाने-पीने की चीजो और मूर्तियाँ आदि चीजो की कई दुकाने सजी थी। यहाँ कुछ गौऊएं भी थी जिनके पास खड़े लोग बड़े हरे विशेष तरह के पत्तो के छोटे-छोटे बण्डल बेच रहे थे जिन्हें खरीद कर गौ को खिलाया जा रहा था।

यहाँ से निकल कर हम पहुंचे पंचवटी जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में...

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