Archive for दिल्ली

पराठे वाली गली

दिल्ली की पराठे वाली गली में पराठों का आनन्द लिया। यहाँ पराठे सिके नही तले जाते है –

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एक नज़र मूल्य सूची पर –

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फिर आगे बढ़े और देखी जामा मस्जिद –

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जिसके दामन में है मीना बाज़ार –

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मॉल संस्कृति में भी मीना बाज़ार खङा है, यह बहुत बङी बात है।

इसके बाद हम हैदराबाद लौट आए।

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दिल्ली का एक चक्कर

दिल्ली में ऐतिहासिक लाल क़िले के सामने हमने देखा एक साथ जैन मन्दिर –
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गुरूद्वारा –
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और गौरी शंकर का मन्दिर –
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ये देखने के बाद हम आगे बढ़े और उस क्षेत्र का चक्कर लगाया जिससे दिल्ली की पहचान है – चॉदनी चौक, वहाँ की मार्किट घूमते हुए पहुँचे लोकप्रिय स्थल पराठे वाली गली में जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में ….

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अक्षरधाम मंदिर

जम्मू से हम दिल्ली लौट आए. दिल्ली में हमने देखा अक्षरधाम मंदिर.

बहुत बड़ा परिसर हैं -

बड़ा मैदानी भाग पार करने के बाद भीतरी परिसर में जा सकते हैं -

जिसके पहले अपना सामान रखवाना पड़ता हैं, केवल छोटे मनी पर्स और पारदर्शी पानी की बोतले ही भीतर ले जाई जा सकती हैं. इसके बाद सुरक्षा जांच के बाद भीतरी परिसर में जा सकते हैं.

बाहर से दूर दिखाई देता मंदिर का कलश -

बहुत भव्य और कलात्मक ईमारत हैं. लेकिन कैमरे में कैद करने की मनाही हैं. हाँ.. दो-तीन मुख्य बिन्दुओं पर प्रोफेशनल फोटोग्राफरों से तस्वीरे खिंचवा सकते हैं.

पानी के कुण्ड बहुत सुन्दर लगे जिसके एक किनारे थोड़ी-थोड़ी दूरी पर हाथी और एक किनारे हंसों की मूर्तियाँ हैं जिनसे पानी कुण्ड में गिर रहा था.

यह धर्म गुरू स्वामी नारायण का मंदिर हैं. एक बड़े कक्ष में उनकी मूर्ति रखी हैं जिस का श्र्द्धालु अभिषेक भी कर सकते हैं. कुछ पैसे जमा करने हैं जिसके बाद एक छोटे कलश में पानी दिया जाता हैं अभिषेक के लिए.

गर्भ गृह बहुत आकर्षक हैं. बीचो-बीच स्वामी नारायण की विशाल मूर्ति हैं. गुम्बद बेहद कलात्मक और रत्न जटित हैं. चारो ओर पौराणिक युगल चरित्रों की मूर्तियाँ हैं - राम-सीता, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती

एक लॉन बहुत ही सुन्दर हैं जिसे ह्रदय कमल कहा जाता हैं. कमल की बड़ी आकृति हैं. हर पंखडी में सीढियां हैं जो नीचे बीच के भाग में मिलती हैं. इसके आगे अल्पाहार गृह हैं जहां अंतर्राष्ट्रीय स्तर को बनाए रखने के लिए देशी-विदेशी व्यंजन हैं. एक कक्ष में धार्मिक और आयुर्वेदिक चीजों का बाज़ार भी सजा हैं.

यह देखने के बाद हम दिल्ली से हैदराबाद लौट आए....

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लाल किले की भीतरी झलक

लाल किले में दीवान-ए-आम के आगे हैं हयात बक्श बाग़ -

इसमे दो परिसर हैं – सावन परिसर जो खुला हैं –

और पीछे हैं भादों परिसर जिसमे पीछे कुछ भाग में छज्जा हैं –

आज भी इस हरे-भरे बाग़ को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता हैं कि शासन काल में यह कितना बढ़िया रहा होगा.

इस पूरे परिसर के बाई ओर फैला हैं सैनिक महल जो पहले सैनिको का स्थान था और आज बंद हैं –

दाहिनी ओर हैं ज़फर महल यहाँ नहर-ए-बहिश्त हैं यहाँ नहर का पानी खींच कर पूरे किले में जल की आपूर्ति की जाती थी. इसके आगे हैं रंगमहल –

जिसकी दीवारों आदि पर कारीगरी बहुत ख़ूबसूरत हैं –

इसके आगे का भाग हैं दीवान-ए-ख़ास.  दाहिनी ओर है मोती मस्जिद. सामने नज़र आता हैं मुमताज़ महल जिसमे बादशाह और बेगम साहिबा की कुछ ख़ास चीजों का संग्रह हैं जिनमे उनके लिबास भी हैं. सबसे ज़्यादा आकर्षित करता हैं वो स्थान जहां दोनों ओर दोनों की तस्वीरे हैं और बीच में हैं चौसर.

यह इतिहास का गवाह बना मज़बूत और ख़ूबसूरत लाल किला देखने के बाद हम रवाना हुए जम्मू के लिए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में…

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लाल किला

दिल्ली में सबसे पहले हमने देखा लाल किला.

व्यस्त सड़क पर विशाल लाल किले में सामने नज़र आया तिरंगा -

यही मैदान हैं जहां दोनों महत्वपूर्ण दिन जनता बैठ कर सामने शीर्ष नेता को ध्वजारोहण करते देखती हैं. बाई ओर टिकट घर हैं जहां से टिकट लेकर हम भीतर पहुंचे. वैसे तो किले में प्रवेश के लिए चारों दिशाओं में चार द्वार हैं पर प्रवेश के लिए खुला यह एक ही द्वार हैं जिसका नाम लाहौरी द्वार हैं -

भीतर जाने पर दाहिनी ओर सीढियां और दोनों ओर से प्लेटफार्म की ओर जाने वाला रास्ता नज़र आया जहां से हमारे शीर्ष नेता झण्डा फहराते हैं -

बाई ओर से यानी इन सीढियों के सामने से शुरू होता हैं बाज़ार. दोनों ओर दुकाने सजी हैं -

जब लाल किला बनवाया गया तभी से इस हिस्से में बाज़ार हैं जिसका नाम छत्ता चौक हैं. शासन काल में दोनों ओर दुतल्ली दुकाने थी जहां की दुकानों में किले में रहने वाली शाही महिलाओं के शौक़ की चीज़े बिका करती थी. आज भी इस बाज़ार में इसी तरह की चीज़े बिक रही थी.

बाज़ार ख़त्म होने के बाद नौबतखाना हैं. यहाँ से पहले डंका पीट कर शाही फरमान सुनाए जाते थे. इसके बाद के भाग में संग्रहालय तैयार किया गया हैं जहां उस दौर की वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं जिसमे बर्तन, सिक्के, फ़ौजी पोशाक अस्त्र-शस्त्र आदि हैं. सबसे ज़्यादा आकर्षक हैं उस दौर के दिशा बताने वाले और तापमान मापने वाले यंत्र.

आगे हैं दीवान-ए-आम -

यहाँ बादशाह विराजते थे और अवाम की समस्याएँ सुनते थे.

आगे की जानकारी अगले चिट्ठे में....

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