Archive for तेलंगाना

बोनालू उत्सव

दो दिन के बोनालू उत्सव में सोमवार को जुलूस निकलता हैं।

दिन भर जुलूस की तैयारी की जाती हैं। माता का ऊंचा झूला तैयार किया जाता हैं। वैसे कारीगर दो सप्ताह पहले से ही झूला तैयार करने में जुट जाते हैं। रंग-बिरंगे कागजों से बेत का झूला तैयार किया जाता हैं –

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इस जुलूस का अर्थ हैं माता को उनके ससुराल खुशी-खुशी विदा करना। जाहिर हैं विदा करने उनका भाई ही जाएगा। भाई का नाम हैं पोतराजू जिसे पोतराज भी कहते हैं। पोतराज न सिर्फ भाई हैं बल्कि माँ का अंगरक्षक भी हैं।

मोहल्ले के किसी बलिष्ठ व्यक्ति को पोतराजू बनाया जाता हैं। आमतौर पर माता के किसी एक सेवक को ही मंदिर की कमेटी हर साल पोतराजू बनाती हैं पर अक्सर अन्य व्यक्तियों को भी पोतराजू बनने का अवसर मिलता हैं। पोतराज केवल अधोवस्त्र धारण करता हैं। हाथ में कोड़ा होता हैं। मुंह में दोनों ओर नीम्बू होने से मुंह सूजा लगता हैं।

दोपहर बाद शाम शुरू होते ही चार – साढे चार  बजे  जुलूस मंदिर से निकलता हैं। जुलूस निकलने से पहले एक ख़ास कार्यक्रम होता हैं। माना जाता हैं कि माँ मैसम्मा की जिस महिला पर कृपा होती हैं उसके शरीर में माँ प्रवेश करती हैं। एकत्रित भक्त महिलाओं में से किसी एक पर यह कृपा होती हैं। कुछ देर के लिए उस महिला को माँ का अवतार मान लिया जाता हैं और उससे कुछ प्रश्न पूछे जाते हैं। ये प्रश्न शहर और राज्य से जुड़े होते हैं जैसे इस बार बारिश अच्छी होगी क्या, अनाज पैदावार कैसी रहेगी, राज्य में शान्ति रहेगी, क्या कोई तनाव पूर्ण स्थिति बनेगी आदि। सभी प्रश्नों का वह जवाब देती जाती हैं और उसे देवी माँ का उत्तर माना जाता हैं। कुछ देर बाद महिला शांत हो जाती हैं तो माना जाता हैं देवी माँ प्रस्थान कर गई। अगर इन बातों में से अधिकतर बाते सच निकले तो यह माना जाता हैं कि माँ मैसम्मा की उस महिला पर अधिक कृपा दृष्टि रही और अगर अधिक बाते सच न हुई तो यह माना जाता हैं कि उस महिला पर माँ की कृपा दृष्टि अधिक नही हैं। यह सवाल जवाब मंदिर में माइक्रोफोन पर होते हैं ताकि लाउडस्पीकर से बाहर ज्यादा लोंग सुन सके।

इसके बाद जुलूस निकलता हैं। जुलूस में झूला होता हैं जिसे सेवक उठा कर चलते हैं –

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जुलूस में बल्लम गल्ला भी साथ ले चलते हैं। पोतराज जुलूस में मस्ती में विचरता हैं। उसे खुशी हैं कि सब स्वस्थ प्रसन्न हैं और अब वह अपनी बहन को सुरक्षित ससुराल छोड़ने जा रहा हैं। बीच-बीच में वह सड़क पर कोड़े मारता हैं ताकि कोई अनिष्ट पास न फटके।

नाचते-गाते जुलूस  नदी तक संध्या होने पर छह बजे तक पहुँचता है।  नदी किनारे झूला रख दिया जाता हैं। नदी में दीपक छोड़े जाते हैं ताकि आगे की राह में बहन यानि मैसम्मा को आगे जाने में दिक्कत न हो।

अन्धेरा होने पर जुलूस की वापसी होती हैं। वापसी में बल्लम गल्ला सड़क पर उछाला जाता हैं और साथ ही जोर से हो – हुव्वा आवाजे की जाती हैं। यह माना जाता हैं कि अँधेरे में इन आवाजों को सुनकर प्रेतात्माएं आएगी और बल्लम गल्ला यानि भोजन उठा ले जाएगी। भोजन पाकर प्रेतात्माएं तृप्त हो जाएगी और कोई अनिष्ट न करेगी। इस दृश्य को आम नागरिक को देखने की मनाही हैं। कहा जाता हैं कि पहले जुलूस जाने के बाद अन्धेरा होते ही लोंग घरों में दरवाजे खिड़कियाँ बंद कर लेते थे।

आजकल जुलूस की इस तरह से वापसी नही होती। नदी किनारे से ही लोंग बिखर कर लौट आते हैं और बल्लम गल्ला भी नही उछाला जाता। केवल जुलूस वापसी को छोड़ कर पूरा उत्सव आज भी पहले की तरह ही हैं।

तेलंगाना में कुल दो लोकपर्व मनाए जाते हैं, आषाढ़ मास में बोनालू और दशहरा के समय बतकम्मा जिसकी चर्चा फिर कभी….

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तेलंगाना का लोकपर्व – बोनालु

तेलंगाना क्षेत्र यानि हैदराबाद और उसके आस-पास के जिलों का लोकपर्व हैं - बोनालु बोनालु को हैदराबादी भाषा में बोनाल या ज्यादातर भोनाल कहते हैं। इसे आषाढ़ और श्रावण मास में मनाया जाता है – आषाढ़ मास आधा बीतने के बाद यह पर्व शुरू होता है और एक महीने तक यानि श्रावण मास आधा बीतने पर समाप्त होता हैं। माना जाता हैं कि लगभग डेढ़ सौ साल पहले तेलंगाना में बारिश का मौसम शुरू होते ही आषाढ़ मास में महामारी फैल गई थी। इसकी चपेट में आ कर कई लोगों की जान गई, पशु पक्षी मवेशियों की तो बात ही क्या। बहुत तबाही आयी। कोई दवा काम न आई। आखिर वही हुआ जो आमतौर पर ऐसे हालात में होता हैं, सभी ईश्वर से प्रार्थना करने लगे। क्या राजा और क्या प्रजा सभी के हाथ दुआ में ऊपर उठ गए और शुरू हुआ पूजा-पाठ का दौर। बाद में धीरे-धीरे सब ठीक हुआ पर सदमे से लोंग उबर न पाए। इसीसे  सिलसिला चला पूजा-पाठ का और शुरू हुआ पर्व – बोनालु बोनालु शब्द बोनम से बना हैं। बोनम भोजनम शब्द का बिगड़ा रूप हैं। भोजनालु से बोनालु शब्द बना। पर्व  में  चारो दिशाओं में पूजा करने के उद्येश्य से  मास के चार सप्ताह एक के बाद एक चारो दिशाओं के चार प्रमुख स्थानों पर बड़े पैमाने पर पूजा होती हैं – गोलकुंडा, सिकंदराबाद, लाल दरवाजा, पुराना शहर। पहले सप्ताह गोलकुंडा में पूजा होती हैं। गोलकुंडा किले में इस स्थिति के बाद काली माता का मंदिर बनवाया गया, यहीं पर शासकों द्वारा पहली पूजा होती थी। यह क्रम आज भी बना हैं और यही से उत्सव की शुरूवात होती हैं। इसके बाद सिकंदराबाद के मंदिर में उत्सव मनाया जाता हैं फिर हैदराबाद के पुराने शहर में दो अलग-अलग मंदिरों में लाल दरवाजा और पुराने शहर के मंदिर में बोनालु मनाया जाता हैं। हालांकि लाल दरवाजा भी पुराने शहर का ही हिस्सा हैं। इस तरह चार सप्ताह चार मंदिरों में उत्सव होता हैं साथ ही गाँवों जिलों में भी बोनालु मनाया जाता हैं। उत्सव मुख्य रूप से दो दिन मनाया जाता हैं लेकिन पूजा तीन दिन पहले गुरूवार से शुरू होती है । रविवार को मंदिर में काली माता की बडी समापन  पूजा होती हैं। यहाँ काली माँ को मैसम्मा के रूप में पूजा जाता हैं। दिन भर पूजा होती हैं। सोमवार को शाम में जुलूस निकलता हैं जिसे जत्रा या जात्रा भी कहते है। रविवार को दिन भर पूजा होती हैं। भक्तों का मंदिर में तांता लगा रहता हैं। पूजा की सामग्री घर से तैयार कर लाई जाती हैं। सामग्री में पके चावल होते हैं जिसमे नमक और काली मिर्च के दाने होते हैं। चावल को एक कलश में रखा जाता हैं। पहले कलश पीतल के होते थे आजकल स्टील के होते हैं जिसे हल्दी कुमकुम से सजाया जाता है । चावल के ऊपर नीम के पत्ते और हल्दी की गाठियाँ होती हैं और ऊपर दीपक जलता है । हम यहाँ बता दे कि  चावल और नमक मुख्य आहार है और शेष  चीजों में औषधि गुण हैं – Photo0330 महिलाएं नई साड़ी पहन कर, पांवों में हल्दी लगाकर इस कलश को सिर पर रख कर मंदिर आती हैं – Photo0327 इस कलश को बोनम कहते हैं। इस बोनम से आधे चावल महिलाओं को प्रसाद के रूप में दे दिए जाते हैं,  आधे चावल मंदिर में रखे जाते हैं और इस तरह चावल का ढेर लग जाता हैं जिसे बल्लम गल्ला कहते हैं। भक्तों द्वारा लाए गए नीम के पत्तों को मंदिर के द्वार पर रखा जाता हैं। माता की मूर्ति के श्रृंगार में विशेष रूप से निम्बुओं की माला पहनाई जाती हैं। सोमवार को जुलूस निकलता हैं जिसके बारे में अगले चिट्ठे में बताएंगे….

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शिव मंदिर, पाप कुण्ड और जजीरे पर भोजन

भद्राचलम के पेरेंटपल्ली गाँव में पहाडी पर स्थित हैं राम कृष्ण परमहंस मठ द्वारा स्थापित छोटा सा शिव मंदिर.

इस मंदिर को देखने हम नदी के रास्ते बोट से गए. बोट से दो घंटे की यात्रा पूरी करने के बाद हम नदी के तट पर बने इस गाँव में पहुंचे. तट से पचास सीढियां चढ़ कर हम पहाडी पर पहुंचे. रास्ते भर गाँव के लोंग लकड़ी के बने कलात्मक फूल और फूलदान बेचते मिले. गाँव वालों द्वारा की गई बहुत सुन्दर कारीगरी हैं.

ऊपर छोटा सा जल प्रपात देखा –

यहीं हैं छोटा सा शिव मंदिर –

एक गर्भ गृह में शिव लिंग हैं और दूसरे गर्भ गृह में राम कृष्ण परमहंस की मूर्ति.

यहाँ से हमने बोट से और आगे एक घंटे की यात्रा की और पहुंचे कुल्लूर गाँव. हम गाँव तक नही गए. नदी में ही जजीरे पर भोजन किया. यहाँ अच्छा लगा. चारो ओर बहती नदी और बीच के स्थान पर भोजन करना अच्छा लगा. यह स्थान तेलंगाना की सीमा हैं, यहाँ से आंध्रा शुरू होता हैं.

यहाँ से नदी में दूसरी दिशा से लौटते हमने देखा पाप कुण्ड. यहाँ नदी में पानी बहुत गहरा हैं और किनारे पर पहाड़ सीधा हैं. कही-कही हरा-भरा पहाड़ है और कही मूल रूप में पर कही भी ऐसा बिंदु नही हैं जहां ठहराव हैं –

इसीलिए इसे पाप कुण्ड कहा गया. नदी में सावधानी से बोट में से पाप कुण्ड का हमने चक्कर लगाया.

फिर लगभग चार घंटे की बोट से यात्रा कर हम सांझ ढले भद्राचलम लौट आए. इसके बाद हम वापस हैदराबाद लौट आए.

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सीता स्थल

पर्णशाला से लगभग तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर हैं सीता स्थल.

माना जाता हैं कि वनवास का कुछ समय यहाँ बिताया गया. गोदावरी नदी में किनारे से थोड़ा भीतर एक छोटी पहाडी हैं, इसे ही सीता स्थल कहा जाता हैं. इस पहाडी पर पहुँचने के लिए छोटा लकड़ी का पुल हैं -

पहाडी के दोनों किनारों पर और बीच में गोल घेरे में पूजा की सामग्री रखी जाती हैं. कहते हैं इस पहाडी पर सीताजी अपनी साड़ी सुखाया करते थे. यहाँ पुरोहित भी होते हैं -

किनारे वापस आने पर वही से दाहिनी ओर नदी के किनारे रेत के थैलों से बनाए गए रास्ते पर धीरे-धीरे थोड़ा आगे बढ़ने पर एक पत्थर से नदी का पानी बहता हैं जिसे पवित्र जल मान कर सिर पर छिड़का जाता हैं -

थोड़ा आगे बढ़ने पर सीताजी की मूर्ति हैं जिसके दर्शन करने के बाद झाड़ियों में से हम बाहर निकल आए.

थोड़ा आगे बढ़ने पर एक और स्थल हैं. माना जाता हैं कि यहीं पर लक्ष्मण जी पर शूर्पणखा मोहित हुई थी. इस स्थल को निंदनीय स्थल माना जाता हैं और यहाँ कंकर मारे जाते हैं.

इसके बाद हम पहाडी पर राम कृष्ण परमहंस मठ द्वारा बनाए गए शिव मंदिर गए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में...

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भद्राचलम में पर्णशाला

भद्राचलम में रामालय से लगभग एक घंटे की दूरी पर हैं पर्णशाला जिसे पनशाला या पनसाला भी कहते हैं.

गोदावरी नदी के किनारे बसा पर्णशाला ही यहाँ का मुख्य स्थल हैं. प्रमुख जगह भूमि का यह छोटा सा टुकड़ा -

कुछ लोंग इसी को सीता हरण का मुख्य स्थल मानते हैं. रावण ने हरण कुटिया के बाहर से ही किया था पर वह सीताजी को जमीन पर घसीटते हुए ले आए थे लेकिन इस स्थल से रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बिठाया था यानि सीताजी ने धरती यहाँ छोडी थी इसीसे वास्तविक हरण का स्थल यह माना जाता है.

ज़मीन का यह टुकड़ा पूरी तरह से बंजर हैं. हालांकि आस-पास हरे भरे पेड़ हैं पर इस टुकडे में कुछ घास उग आती हैं और तुरंत सूख जाती हैं. इस भूमि को उपजाऊ करने के लिए कोई तरकीब कोई तकनीक काम न आई.

इस टुकडे के पास में बनवाया गया हैं मंदिर जिसमे राम सीता लक्ष्मण की पारंपरिक मुद्रा में मूर्तियाँ हैं -

मंदिर के पीछे शिवमंदिर हैं

मंदिर के पिछवाड़े परिसर में एक कुटिया बनाई गई हैं. यहाँ सीता हरण के प्रसंगों को मूर्तियों से दर्शाया गया हैं, स्वर्ण मृग की ओर इंगित करना, लक्ष्मण रेखा खीचना, भिक्षा देती सीता, रावण का असली रूप देख कर बेहोश हो गिर पड़ी सीता आदि -

यहाँ काम जारी हैं शायद कुछ समय बाद यह परिसर और अच्छा बन जाए.

यहाँ से हम सीता स्थल देखने गए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में...

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भद्राचलम के रामालय की भीतरी झलक

भद्राचलम में गोदावरी नदी के तट पर तीन सौ सीढियां चढ़ने पर यह हैं पुराना मूल रामालय -

गहरे भूरे पत्थरो से बना हैं. यह हैं मंदिर का प्रवेश द्वार -

भीतर जाने पर सामने हैं स्तम्भ -

यहाँ दीप जलाया जाता हैं. यही पर पुजारी श्रद्धालुओं से नारियल लेकर फोड़ते हैं. एक पुजारी सलाई से हर श्रद्धालु के मस्तक पर पारंपरिक टीका करते हैं. टीके का यह चलन सभी मंदिरों में नही होता हैं. आगे गर्भगृह हैं जिसके सामने हनुमानजी का मंदिर हैं जैसा कि परम्परा हैं हनुमानजी का मुख रामजी के गर्भगृह की ओर होता हैं.

मंदिर चूंकि बहुत पुराना हैं इसीसे भीतर संकरा रास्ता हैं और अधिक रोशनी नही हैं. सामने ऊंची पारंपरिक मुद्रा में तीन मूर्तियाँ हैं राम लक्ष्मण और बीच में सीता जी की.

पुराना मूल मंदिर इतना ही हैं पर मंदिर का महत्त्व बढ़ने के साथ परिसर का भी विस्तार किया गया. पीछे के रास्ते से जहां गाड़ियों से मंदिर पहुंचते हैं, वहां का प्रवेश द्वार हैं -

यहाँ से अहाता पार कर मुख्य मंदिर तक पहुंचा जाता हैं. अहाते में मुख्य मंदिर के ठीक सामने छोटे छोटे दो पहाड़ के टुकडे हैं -

कहा जाता हैं कि इन पहाडो से कान लगा कर सुनने पर राम नाम का जाप सुनाई देता हैं पर श्रृद्धालु कान लगाते रहे और कुछ न सुनाई देने पर मस्तक नवा कर जाते रहे.

अहाते में एक ओर मंडपम (खुला सभा गृह) हैं जहां हवन आदि होते हैं. अहाते की चारो दीवारों में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर माता के विभिन्न रूपों की मूर्तियाँ हैं जिनके दर्शन जाली के बंद दरवाजे के पीछे से ही किए जा सकते हैं.

यहाँ के प्रसाद का लड्डू आकार में बहुत बड़ा हैं जिसे कल्याण लड्डू कहते हैं.

दोनों नवरात्रियों में यहाँ उत्सव का आयोजन होता हैं. इस मंदिर का सबसे बड़ा उत्सव श्री रामनवमी के दिन होता हैं. यहाँ राम सीता का ब्याह रचाया जाता हैं जिसे सीता राम कल्याणम कहते हैं. तेलुगु भाषा में शादी को कल्याणम कहते हैं. इस सबसे बड़ी पूजा के लिए सबसे बड़ा चढ़ावा प्रदेश के मुख्यमंत्री की ओर से आता हैं. इस उत्सव में प्रदेश के गण्यमान्य ब्यक्ति भाग लेते हैं.

मंदिर में दर्शन के बाद हम पर्णशाला देखने गए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में...

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भद्राचलम का राम मंदिर

आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले का शहर हैं भद्राचलम जो तेलंगाना क्षेत्र में हैं.

भद्राचलम राम कथा का महत्वपूर्ण स्थान हैं. राम कथा से जुड़े होने से ही यहाँ राम मंदिर बनवाया गया हैं जिसे रामालय कहते हैं.

शहर के बस अड्डे से एक किलोमीटर के भीतर हैं रामालय जो गोदावरी नदी के तट पर बसा हैं. गोदावरी नदी का एक छोर महाराष्ट्र में नासिक में हैं जहां पंचवटी हैं, यही से कथा भी भद्राचलम तक जुड़ी हैं.

यह हैं गोदावरी नदी पर बना पुल -

नीचे देख सकते हैं नदी का किनारा जहां श्रद्धालु मंदिर में जाने से पहले पवित्र स्नान करते हैं. संकरे पुल के दूसरी ओर नीचे मंदिर की ओर जाने के लिए जगह-जगह सीढिया बनी हैं और बीच के स्थान में रामायण के प्रसंग मूर्तियों से बताए गए हैं. हलके पीले रंग के पत्थर से बढ़िया शिल्पकारी हैं.

लम्बे पुल के नीचे क्रम से इन प्रसंगों से रामकथा कही गई हैं जैसे केवट का प्रसंग, हिरण की ओर इंगित करती सीता और अंत में रावण वध, राम का राज्याभिषेक और समापन राजा राम की मूरत से. हर प्रसंग के लिए आवश्यकता के अनुसार चार-पांच मूर्तियाँ भी बनाई गई हैं. ऊपर ये शिल्पकारी और नीचे तक ढलान में उद्यान सजा हैं -

नीचे बड़ा बाजार सजा हैं जहां पूजापा और खाने-पीने की दुकाने सजी हैं. यहाँ से रास्ता हैं ऊपर मंदिर की ओर जाने का. तीन सौ सीढिया हैं. अगर सीढियों से न जाना चाहे तो ऊपर तक गाड़ी से जाने के लिए पक्की सड़क हैं जो पुल के लगभग आधा किलोमीटर पहले ही हैं. इस तरह गाड़ी से जाने पर पुल का सौन्दर्य नही देख सकते. इसीलिए पुल का सौन्दर्य देख कर फिर गाड़ी से पिछले रास्ते से जा सकते हैं.

मंदिर की चर्चा अगले चिट्ठे में...

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