Archive for गुजरात

सांदीपनी आश्रम

पोरबंदर में नवनिर्मित है सांदीपनी आश्रम –

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भव्य कलात्मक इमारत है जिसमे शिवलिंग और विभिन्न देवी-देवताओं की भव्य मूर्तियां है – शिव-पार्वती, लक्ष्मी नारायण, जानकी वल्लभ, दुर्गा-गणेश. पीछे एक विज्ञान कक्ष है जिसमे ज्ञान विज्ञान संबंधी विभिन्न तस्वीरें है.

इस आश्रम के निकट है पोरबंदर समुद्र तट जो बहुत गन्दा है जहां खड़े रहने में भी कठिनाई होती है –

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पूरा पोरबंदर न अधिक साफ़-सुथरा है और न ही अधिक विकसित। गांधी जी की प्रतिमा केवल कीर्ति मंदिर –

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उनके पैतृक निवास स्थान पर ही नज़र आई और बापू के तीन बन्दर कही नज़र नही आए.

इसके बाद हम हैदराबाद लौट आए और सबसे पहले जी भर कर और पेट भर पानी पिया … गुजरात का पानी … उफ्फ्फ्फ़ ! कड़वा !! ठंडा हो या सामान्य या मिनरल … दो बूँद पीना कठिन रहा …. शायद इसीलिए वहां के भोजन में गुड का प्रयोग अधिक होता है …. खैर .. इस कड़वाहट के बावजूद भी हमारा ट्रिप अच्छा रहा.

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सुदामा पुरी

पोरबंदर में भारत मंदिर देखने के बाद हम पहुंचे सुदामा पुरी –

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यह सुदामा का मंदिर है. गर्भगृह में बीच में सुदामा, एक ओर राधाकृष्ण और दूसरी ओर सुशीला जी की मूर्तियां है –

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सबसे आकर्षक है मंदिर के प्रांगण में 84 करोड़ परिक्रमा –

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इसमें चलना बहुत कठिन है, इसका पूरा रास्ता पार करना सचमुच 84 योनियों को पार करने जैसा ही कठिन है.

इसके बाद हम गए सांदीपनी आश्रम जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

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भारत मंदिर और नेहरू तारामंडल

पोरबंदर में भारत मंदिर और नेहरू तारामंडल आमने-सामने है –

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नेहरू तारामंडल कुछ ख़ास नही है, शो दिखाए जाते है पर उच्च आधुनिक तकनीक नही है.

भारत मंदिर में हरा-भरा अहाता पर करने के बाद मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर चार-चार स्वतंत्रता सेनानियों की मूर्तियां लगी है –

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भीतर बड़े कक्ष में बीचों-बीच भारत का नक्शा है और पूरे कक्ष में स्तम्भों की चारों दीवारों पर विभिन्न हस्तियों की तस्वीरें है जिनमे आर्यभट्ट, नागार्जुन से लेकर शबरी, महारानी पद्मिनी, और राम आदि चरित्र भी है –

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दीवारों पर ताजमहल जैसे स्थानों के चित्र है –

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हर चित्र के स्थान पर एक सूक्ति लिखी है. कुल मिलाकर भारतीय संस्कृति की लगभग सभी हस्तियां और स्थान यहां देखे जा सकते है. जिन्हे देखना अच्छा लगा.

इसके बाद हम गए सुदामा पुरी जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

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कीर्ति मंदिर

गांधी जी के निवास स्थान गुजरात, पोरबंदर में सबसे पहले हमने देखा – कीर्ति मंदिर … जो गांधी जी का पैतृक निवास है –

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तीन मंज़िला पुरानी इमारत को थोड़ा विस्तार दिया गया है जिससे पुरानी इमारत संभली हुई है. इसे संग्रहालय बना दिया गया है –

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बीच में है बापू बा की तस्वीरें –

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पूरे गलियारे और कक्षों में बापू द्वारा पढ़ी जाने वाली पुस्तकें, स्वाधीनता संग्राम के दौर की तस्वीरें रखी है –

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कीर्ति मंदिर के बाई ओर छोटा सा मैदान है जहां बापू की प्रतिमा है और यहीं एक्का-दुक्का पुराने घर है जो उस दौर की याद दिलाते है.

इसके बाद हम गए भारत मंदिर और नेहरू तारामंडल जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

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द्वारकाधीश का मंदिर- पश्चिमाम्नाय शारदा पीठम

हम पहुंचे द्वारिका जहां देखा वहां का प्रमुख मंदिर – द्वारकाधीश का मंदिर … जिसका वास्तविक नाम है – पश्चिमाम्नाय शारदा पीठम

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परिसर में विष्णु के विभिन्न रूप और सत्यनारायण की विभिन्न कक्षों में मूर्तियां है. दर्शन के गलियारे में एक छोर पर देवकी माँ की मूर्ति है और गलियारे के दूसरे छोर पर गर्भगृह में कृष्ण जी की श्याम मूर्ति है.

पीछे बाई ओर पटरानियों का मंदिर है जिसमे विशाल कक्ष में क्रम से – जांबवंती, ललिता, सत्यभामा, रूक्मिणी आदि की मूर्तियां है.

दूसरी ओर कुछः ऊंचाई पर चंद्रमौलेश्वर का दरबार सजा है. बीच के कक्ष में असली रूद्राक्ष, चन्दन आदि की मालाएं और अन्य पूजा उपयोगी कीमती वस्तुएं बिक्री के लिए रखी है.

चार मंज़िला इमारत बहुत ही सुन्दर शिल्पकारी से बनी है. इसकी ऊपरी तीनों मंज़िले खाली है.

ऊपर धार्मिक झंडा लहराता है जो विशिष्ट शुभ दिन पर किसी भक्त समूह द्वारा बदला जाता है, जिस दिन हम गए उस समय भक्तों का एक समूह आया और भजन-कीर्तन के जोर-शोर के साथ झंडा बदल कर नया झंडा फहरा गया.

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इसके बाद हम गए गांधी जी की जन्म स्थली पोरबंदर जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

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रूक्मिणी मंदिर

द्वारिका शहर की सीमा पर है – रूक्मिणी मंदिर

पुराना कलात्मक मंदिर है जिसमे रुक्मिणी जी की प्रतिमा है –

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पौराणिक कथा के अनुसार कृष्ण जी ने ऋषि दुर्वासा को अपनी बसाई नगरी द्वारिका आने के लिए आमंत्रित किया, ऋषि ने आमंत्रण स्वीकार किया और साथ ही यह शर्त रखी कि द्वारिका तक उनके रथ को स्वयं कृष्ण जी और रूक्मिणी खींचेंगे. दोनों रथ खींचने लगे कुछ समय बाद रूक्मिणी थक गई और उन्हें प्यास लगी. कृष्ण जी ढूंढते हुए बहुत दूर से उनके लिए पानी ले आए और दोनों ने पानी पिया इस पर ऋषि क्रोधित हुए, उन्हें पहले पानी न देकर ऋषि का अपमान किया गया और दुर्वासा ने श्राप दे दिया फिर कृष्ण के आग्रह करने पर ऋषि कुछ नरम हुए फिर भी कहते है श्राप से इस स्थान का पानी पीने योग्य नही है और श्राप के कारण ही रूक्मिणी और कृष्ण जी को अलग रहना पड़ा. इसीसे द्वारिकाधीश का मंदिर भीतर शहर ( गाँव ) में है और रूक्मिणी जी का मंदिर शहर ( गाँव ) की सीमा पर है और इसीसे रूक्मिणी मंदिर रथ की आकृति में बनाया गया है –

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इसी कथा के अनुसार यहां आज भी पानी के लिए श्रृद्धालु मंदिर में पैसे देते है यूं भी हिन्दू धर्म के अनुसार पूर्वजों को पानी दिया जाता है और यह पैसे उसी के माने जाते है.

वैसे पूरी द्वारिका और आस-पास के क्षेत्र में पीने योग्य पानी अब भी नही है और पानी मीलों दूर से मंगाया जाता है.

इसके बाद हमने देखा प्रमुख मंदिर – द्वारकाधीश का मंदिर जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

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इस्कॉन स्वामी नारायण मंदिर

राजकोट से द्वारिका मार्ग पर सौ कि.मी. की दूरी पर है इस्कॉन स्वामी नारायण मंदिर –

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अन्य एस्कॉन मंदिरों की तरह भव्य और कलात्मक इमारत है –

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गर्भगृह में कृष्ण जी की भव्य मूर्ति है साथ ही गणेश जी और शिव जी की भी मूर्तियां है.

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इसके बाद हमने देखा रुक्मिणी मंदिर जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

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