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गुरूदेव की गीतांजलि

आज गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर का जन्मदिवस हैं।

9 मई 1861 को जन्मे गुरूदेव के जन्म को 150 वर्ष हो चुके हैं और गुरूदेव की कृति गीतांजलि को नोबुल पुरस्कार मिले 100 वर्ष हो चुके है.

विश्व स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिए जाने वाले प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है – नोबुल पुरस्कार. वर्ष 1901 से साहित्य जगत के लिए भी यह पुरस्कार दिया जाने लगा और बारह वर्ष के बाद 1913 में पहली बार एक भारतीय को इस पुरस्कार के लिए चुना गया।

गीतांजलि मूल रूप से बंगला भाषा में लिखी गई और इसके अंग्रेज़ी संस्करण को नोबुल पुरस्कार के लिए चुना गया.  अंग्रेज़ी,  जो पाश्चात्य देशों के साहित्य की भाषा है और उस समय भारत में अंग्रेज़ी शासन के विरूद्ध संधर्ष चल रहा था. ऐसे में इस पुरस्कार को राजनीतिक चाल भी माना गया पर भारतीय अपनी बात उन तक पहुँचाने के लिए उन्हीं की भाषा अंग्रेज़ी का प्रयोग भी करते थे.

गीतांजलि कविताओं का संग्रह है. कविताएं न तो बहुत बङी है और न ही बहुत छोटी लेकिन एक-एक कविता गागर में सागर है. प्रत्येक कविता एक संदेश देती है. इसका रचनाकाल एक ऐसा समय है जब विश्व स्तर पर शान्ति का आह्वान किया जा रहा था. विश्व युद्ध के बाद सभी देशों में भय व्याप्त था. भारत में तो स्वाधीनता का संघर्ष छिङ गया था. ऐसे में भारतीय साहित्यकार चाहते थे कि अपने स्वर्णिम अतीत को खंगाल कर ऐसे रत्न निकाले जिससे सद् भावना का आलोक फैले. इसी क्रम में साहित्य जगत में एक ओर तो पौराणिक चरित्रों और गौरवशाली इतिहास के पन्नों से सामग्री लेकर साहित्य रचा जा रहा था तो दूसरी ओर भारतीय संस्कृति और आध्यात्म से प्रेरणा लेकर शान्ति के प्रयास किए जा रहे थे और इसी श्रेणी में रची गई गीतांजलि. …. पहली ही कविता में अखण्ड विश्व के लिए कवि ने प्रभु से प्रार्थना की –

जहाँ विश्व न टूटे खण्डों में संकरी घरेलु दीवारों से

जहां मन में भय न हो तथा विचार और क्रिया में समन्वय रहे, प्रभु मेरा देश उस स्वर्ग में जागे. तात्पर्य कि अभी हमारा देश गहरी नींद में सोया है या कहे कि अभी हम जागृत नहीं है, सक्रिय नहीं है, बन्दी है. बन्दी शार्षक रचना में कवि ने कैदी से पूछा –

किसने तुम्हें कैद किया ?  उसने कहा, मेरे मालिक ने.

मालिक है शक्ति और ऐश्वर्य. इस तरह चारों ओर मनुष्य ने एक दीवार सी बना ली है जिससे प्रकाश भीतर आ ही नहीं पा रहा. इस कारागार में भी वह स्वतंत्र बैठा नहीं है अपितु बेङियों में जकङा है. बेङियाँ खुद मानव है. मानव जब अपने आप का अधिक ध्यान रखता जाता है तो इसका अर्थ होता है कि बेङियां उतनी ही दृढ़ होती जा रही है जिससे वह कारागार से मुक्त नहीं हो पाता और प्रकाश से भी उतना ही दूर हो जाता है. इससे अंधकार ही साथी बन गया है. जब वह द्वार खोलता है तो कुछ नहीं देख पाता है. वह हैरान है कि रास्ते कहाँ खो गए ?  रास्ते तलाशने के लिए कहाँ है प्रकाश ?  इसका उत्तर कवि ने प्रेम का दिया कविता में दिया कि दिया तो है पर जोत नहीं. दिये को इच्छा की जोत से जलाओ. परन्तु कभी – कभी इच्छा होने पर भी हम आगे नहीं बढ़ पाते है –

मैं अकेला निकल आया अपने पथ पर आगे बढ़ने
पर यह कौन है जो सुनसान अँधेरे में मेरा पीछा कर रहा है
मैं किनारे हटा उसे अनदेखा करने पर उससे बच न पाया

वह धूल उङाता चलता है. मेरे कहे गए शब्दों को ज़ोर से दुहराता है. इस तरह मैं उसके साथ प्रभु के दरबार में नहीं जा पाऊँगा. यह पीछा करने वाला समाज है जो उसे मार्ग से विचलित कर रहा है और जिसके साथ वह प्रभु के पास भी नहीं जा सकता. घर तक यात्रा में गुरूदेव ने यही तो कहा है कि हम अपनी जीवन यात्रा में प्रभु से बहुत दूर निकल आए है. यात्री को हर द्वार पर दस्तक देनी होती है और अंत तक पहुँचने के लिए कई पङावों से गुज़रना होता है. मन बार – बार कहता है – कहाँ है प्रभु ?  और आश्वस्ति का स्वर सुनाई देता है – मैं हूँ !  हर समय प्रत्येक स्थान पर प्रभु होते है. खामोश क़दम कविता में यही तो पूछा गया –

क्या तुमने उसके खामोश क़दम नहीं सुने
वो आते, आते है, हमेशा आते है
हर पल और हर युग
हर दिन और हर रात
वो आते, आते है, हमेशा आते है

प्रभु की उपस्थिति को अंकित करने के लिए कवि ने प्रकृतिक प्रतिमानों का भी प्रयोग किया है. गुज़रती हवा कविता की पंक्तियाँ प्रस्तुत है –

पत्तियों पर नाचता सुनहरा प्रकाश
सुस्त पङे बादलों का आकाश में विचरना
यह गुज़रती हवा मेरे माथे पर ठंडक छोङती है
सुबह के प्रकाश ने भीगो दी मेरी आँखें – वही मेरे मन के लिए उसका संदेश है

कण – कण में व्याप्त है प्रभु –

वह वहाँ है जहाँ कठोर धरती खोदी जा रही है
वह वहाँ है जहाँ रास्ता बनाने वाले पत्थर तोङ रहे है
वह उनके साथ है जो धूप और बारिश में है

प्रभु का हाथ सदैव हम पर बना है इसीलिए अपने शरीर को हमेशा शुद्ध रखो. शुद्धता रचना में गुरूदेव ने माना है कि वह सत् की रोशनी को मन में बिखेरने की प्रभु की कला को जानते है इसीलिए असत् विचारों को मन से दूर रखो और फूलों को मन में बसाओ जिससे कुछ करने की इच्छा होती है और कार्यों द्वारा सुगन्ध फैलती है.  इस सत् कार्य के लिए कवि बार – बार जन्म लेना चाहता है. नन्ही बाँसुरी कविता में उसने प्रभु से प्रर्थना की है – प्रभु मुझे अंतहीन बना दो ताकि हर बार नए जीवन में छोटी सी बाँसुरी थामे मैं अमर गीतों की तान छेङ दूँ क्योंकि कोई तो चाहिए जो सबको प्रभु तक जाने का मार्ग बताए.  कवि ने अपने आपको आवारा बादल माना है –

निरूद्येश्य आकाश में घूम रहा हूँ, ओ मेरे सूरज !  सदा चमकने वाले
उसके स्पर्श से अभी मैं पिघला नहीं हूँ

यानि अभी तो हमें जीवन के खेल में रमना है फिर प्रभु की इच्छा से –

एक दिन मैं पिघलूँगा और अंधकार में विलीन हो जाऊँगा

हम सभी को चाहिए कि हमेशा प्रभु को अपने पास अनुभव करें. कमल शीर्षक कविता में –

उस दिन जब कमल खिला, आह !  मेरा मन भटक गया था
और मैं अजान रहा मेरी टोकरी खाली रही

मैनें सुगन्ध अनुभव की पर पता नहीं कि यह मेरे इतने पास मेरे मन में ही है. यह रहस्यवादी भाव बरबस कबीर की इन पंक्तियों की याद दिलाते है – कस्तूरी कुण्डल बसे मृग ढ़ूंढ़े वन माही

तभी तो कवि कहता है कि प्रभु अनुकंपा की हर वस्तु समेट लो. इस छोटे से फूल को तुरन्त तोङ लो देर होने पर यह मिट्टी में बिखर जाएगें क्योंकि हम तो प्रभु के गले का हार नहीं बन पाएगें पर इन फूलों पर तो ईश्वर का स्पर्श है. समय रहते इसे तोङ कर प्रभु चरणों में अर्पित कर दो. हमारे पास जो भी है प्रभु की देन है इसीलिए तेरा तुझको अर्पण के भाव से जियो.

मूर्ख शीर्षक रचना में कहा कि अपनी कमज़ोरियों के साथ प्रभु के द्वार पर जाओ वही तुम्हारी कमज़ोरियाँ हर लेंगे. हम जीवन की नौका में बैठे हैं जबकि हमें इससे उतरना चाहिए. वसन्त आकर बीत जाता है. पत्ते पीले होकर झङने लगते है. हम नौका में बैठे रह जाते है और दूसरी ओर से आती आवाज़ सुन नहीं पाते. मौन गीत रचना में यही स्थिति बताई है कि जो गीत हम गाने आए है वो बिन गाए रह गए. समय वाद्यों के सुर मिलाने में चला जा रहा है, शब्द जम नहीं रहे, प्रभु मिलन की इच्छा में प्रतीक्षा करते समय बीत रहा है. फिर भी हमें धैर्य नहीं छोङना है.

धैर्य शीर्षक रचना में कहा कि रात बीतेगी और पक्षियों के कलरव में प्रभु की वाणी सुनाई देगी. इसीलिए अगर रात हो भी जाए तो प्रभु पर विश्वास कर चैन से सोना चाहिए जिससे अगली सुबह तरोताज़ा होकर जागे. तात्पर्य कठिनाई में भी प्रभु पर विश्वास बना रहे. जिस तरह दिन बीत जाता है उसी तरह कठिनाई का दौर भी समाप्त हो जाता है. कठिनाई के समय की उपमा कवि ने दिवस से दी है. जिस तरह दिन भर शोरगुल रहता है उसी तरह इस दौर में भी कोलाहल रहता है. जब दिन समाप्त होता है तब हवा थक जाती है, पक्षियों के कलरव बन्द हो जाते है. नींद की चादर सबको ढ़क लेती है तब पथिक का झोला भी खाली होने लगता है उसके धूल से सने कपङे फटने लगते है तब प्रभु की छाया में उसे एक फूल की तरह जीवनदान मिलता है. जीवन पाकर उसे सफल बनाने के लिए हमें शक्ति भी मांगनी चाहिए.

मुझे शक्ति दो कविता में शक्ति पाने की याचना है जिससे हम अपनी खुशी और दुःख दोनों झेल सकें. शक्तिहीन की सेवा कर सकें और अंत में उसी को समर्पित कर सकें जिससे शक्ति पाई हैं. ….

यह एक छोटा सा प्रयास था गीतांजलि के संदेश को आप तक पहुँचाने का ….

गुरूदेव को सादर नमन !

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राम की शक्ति पूजा – निराला

आज हम चर्चा करते है सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी की एक काव्य रचना की – राम की शक्ति पूजा

रचनाकाल के समय भारत राजनीतिक क्षेत्र में विश्व की सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी शक्ति ब्रिटेन को ललकार रहा था। इस स्थिति में निराला जी ने अपनी संस्कृति से गौरवान्वित चरित्रों के माध्यम से शक्ति के संचय की बात कहने राम कथा का सहारा लिया। इन प्रसंगों का चित्रण किया –

राम और रावण के बीच युद्ध छिङ गया, राम स्मरण करते है जनक वाटिका में सीता के साथ प्रथम मिलन का दृश्य और इसी के साथ युद्ध में विजय प्राप्त करने का निश्चय करते है जिसमें आत्मविश्वास दृढ़ करने के लिए ताङका, सुबाहु आदि राक्षसों का स्मरण करते है जिनका वध पहले ही कर चुके है। रचना की अंतिम पंक्तियों में निराला जी ने राम की विजय के संकेत दिए है।

यह हम सब जानते है कि साहित्यकार अपने युगीन परिवेश और संस्कृति से प्रभावित रहता है जिसकी छाया सीधे या परोक्ष रूप से साहित्य में दिखाई देती है। इस रचना में बंगला संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट है। इस संस्कृति में राम को महाशक्ति दुर्गा का अनन्य भक्त माना गया है। दशहरा त्यौहार जो राम की विजय और रावण की पराजय का प्रतीक है बंगाल में दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। इस प्रभाव को आरंभ में ही रावण की विजय के लक्षणों से स्पष्ट किया है कि रावण महाशक्ति का भक्त है, इसीसे रणभूमि में अपने बाणों को व्यर्थ होते देख राम चिन्तित है –

कल लङने को हो रहा विकल वह बार – बार
असमर्थ मानता मन उद्वन्त हो हार-हार

सेनापति जाम्बवन्त ने राम को भक्ति का उत्तर भक्ति से देने की सलाह दी। राम ने महाशक्ति दुर्गा की आराधना की। अंत में माँ दुर्गा ने राम की परीक्षा भी ली, अंतिम कमल पुष्प को विलीन कर दिया तब राम फूल के स्थान पर अपने नैन अर्पित करने को तैयार हो गए, तब माँ ने प्रसन्न होकर आशिर्वाद दिया –

होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन
कह महाशक्ति राम के बदन में हुई लीन

इसमें वाल्मिकी रचित रामायण से प्रसंग लिए गए जो इस प्रकार है – अरण्यकाण्ड के 19 वें और 20 वें सर्ग में राम द्वारा राक्षसों का वध वर्णित है –

निपाती तान् प्रेष्य रणे तु राक्षसान् प्रधाविता शूर्पणखा पुन स्ततः
वर्ध च तेषां निखिलेन रक्षसां शीस सर्व भोगनी खरस्य सा ।।

इसी काण्ड से युद्ध का वर्णन आरंभ होता है जो आगे सुन्दरकाण्ड आदि में भी वर्णित है। राम की विजय का वर्णन युद्ध काण्ड में है –

ततो विनेदुः सुदृष्टा वानरा जितकाशिनः ।
वदन्तो राघव जयं रावणस्य च तद्वधम् ।।

बंगीय संस्कृति से प्रभावित निराला जी ने राष्ट्रीय भाव को प्रकट किया कि इन परिस्थितियों से जूझने के लिए भारत में नैतिक शक्ति का अब भी चयन होता है। विभिन्न राक्षसों के वध द्वारा उत्पन्न वीर भाव जन मानस के आत्मविश्वास को दृढ़ करने में सहायक है कि भारत में विभिन्न युद्धों में वीरों ने अपना शौर्य प्रदर्शित किया तब वह ब्रिटिश साम्राज्य से भी टक्कर ले सकते है।

 

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पथ के दावेदार

शरद चन्द्र ने केवल सामाजिक स्थितियों पर ही कलम नही चलाई बल्कि देश में हो रही उथल-पुथल से भी पूरी तरह परिचित रहे। इतना ही नही विदेशो की स्थितियां और वहां के इतिहास की भी उन्हें बखूबी जानकारी थी। जब देश में अंग्रेजों का राज था तब उन्हें लगता था कि स्वाधीनता के संघर्ष के लिए सबसे पहले मज़दूरों को एकत्र होना हैं। इसका परिचय हमें मिलता हैं उनके उपन्यास पथ के दावेदार में।

इस उपन्यास में लेखक ने बताया है कि   1763 में मुम्बई में सबसे पहले रूई का कारखाना खुला था। यूरोप आदि देशो की तरह यहाँ भी  मज़दूरों को संगठित होने की आवश्यकता हैं। मज़दूर क्रान्ति पर विश्व की स्थिति भी स्पष्ट हुई हैं। इस उपन्यास का एक पात्र है – रामदास जो कहता हैं –

” मैं देश के कल-कारखानों और कुली मज़दूरों के बीच ही जीवन बिताता रहा हूँ, वास्तव में इन लोगो को देखे बिना देश की वास्तविक स्थिति का ज्ञान हो ही नहीं सकता। ”

और इसी उद्येश्य से एक संस्था बनी – पथ के दावेदार … इस संस्था के प्रमुख कार्यकर्ता हैं –  सव्यसाची जो गिरीश महापात्रा और डॉक्टर के नाम से भी जाने जाते है जिनका वास्तविक नाम शैल हैं। इस संघर्ष में सव्यसाची के साथियों को फांसी भी हो चुकी है इसीसे वह भेष बदल कर घूमते हैं।

अशिक्षित मज़दूरों में जाग्रति लाने वाली  नेता सुमित्रा देवी इस संस्था की अध्यक्ष हैं जिनके बारे में लोगो का कहना हैं कि एक बंगाली महिला विश्व भ्रमण करती हुई बर्मा आई हैं, वो जितनी रूपमयी है उतनी ही शक्तिशाली भी।

लेखक का यह मानना है कि मज़दूर संगठित नही हैं तभी कोई भी उन पर आसानी से शासन करता हैं जिसका व्यापक असर समाज पर पडता हैं। समाज की जागरूकता के लिए शिक्षा के साथ-साथ मज़दूरों का संगठन भी आवश्यक हैं। नेता सुमित्रा देवी स्वयं भी मानती थी और दूसरो से भी कहती थी कि महिलाओं के लिए भी घर – परिवार, रिश्तेनातों से ऊपर देश होना चाहिए।

इन सारी गतिविधियों का स्थान बर्मा हैं। सुमित्रा नाम सव्यसाची का ही दिया हुआ है जो सुमात्रा द्वीप में तस्करी करती हुई पकड़ी गई थी, पुलिस से छुडवाने के बाद इसी द्वीप के नाम पर रखा, वास्तविक नाम रोज़ है जिससे एक गिरोह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अफीम की तस्करी करवाना चाहता था जिसे छोड कर सुमित्रा ने सव्यसाची के साथ काम करना पसंद किया।

उपन्यास में उस समय का कथानक है जब विश्व के विभिन्न देशों में अराजकता थी। भारत अंग्रेजों द्वारा शासित था।  भारत  की इस समय की स्थिति के बारे में सव्यसाची कहते हैं –

“स्वाधीनता का दावा करना, उसके लिए चेष्टा करना तो दूर की बात हैं, उसकी कामना करना, कल्पना करना भी अंग्रेजों के कानून में राजद्रोह माना गया हैं। मैं उसी अपराध का अपराधी हूँ।”

उपन्यास की एक मुख्य पात्र  भारती बंगाली माँ और अंग्रेज़ पिता की संतान होने से ईसाई माहौल में पली-बढी हैं पर दोनों की मृत्यु के बाद अनाथ होने से काम की तलाश में सुमित्रा से मिलती हैं और जुडती है इस संस्था से जिससे समाज की विकट स्थिति पर सव्यसाची  कहते हैं –

“शिल्प गया, व्यापर गया, धर्म गया, ज्ञान गया, नदियों की छाती सूख कर मरूस्थल बनती जा रही हैं। किसान को भर पेट खाने को अन्न नहीं मिलता, शिल्पकार विदेशियों के द्वार पर मज़दूरी करता हैं।  बंगाल के दस लाख नर नारी प्रति वर्ष मलेरिया से मर जाते हैं। एक युद्धपोत का मूल्य कितना होता हैं जानती हो, उनमे से केवल एक के ही खर्च से दस लाख माताओं के आसूं पोछे जा सकते हैं।”

भारती ने कहा –  ” योरोपियन सभ्यता ने क्या तुम लोगो की भलाई नहीं की ? सती दाह की प्रथा, गंगा सागर में संतान विसर्जन। ”

इस पर डॉक्टर का स्पष्टीकरण – ” तुच्छ बातो को विराट बना कर देश के प्रति देशवासियों के मन को विमुख कर दिया। ”

इस स्पष्टीकरण से लेखक ने गुलामी की जड़ों की ओर इंगित किया है और उस समय जाति के भेद भाव और छुवाछूत से खण्डो में बंटे समाज की आलोचना लेखक ने भारती  के मुख से की –

“मनुष्यता  पर मनुष्य के अत्याचार आँखे खोल कर देखने चलिए। केवल छुवाछूत फैला कर, अपने आप साधु बन कर सोचते है कि पुण्य संचय करके एक दिन स्वर्ग जांएगे, ऐसा सोचिएगा भी नहीं।”

इन विकट स्थितियों में डॉक्टर का कहना हैं – ” भारत की स्वाधीनता ही मेरा एकमात्र लक्ष्य हैं, मेरा एकमात्र साधन हैं … इसके अतिरिक्त मेरे जीवन में मेरे लिए कही भी कुछ भी नही हैं। ”

अपूर्व इस उपन्यास का एक और प्रमुख पात्र हैं जो इन सारी विसंगतियों से दूर नौकरी कर शान्ति से जीवन यापन करना चाहता हैं।  भारती अपूर्व से पथ के दावेदार संस्था का सदस्य बनने के लिए कहती हैं।  इस संस्था की गतिविधियों के बारे में भारती अपूर्व से कहती हैं –

“हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेल कर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएगे, वे बाधाओं से बच कर चल सकें। यही हमारी प्रतिज्ञा हैं।”

उपन्यास में एक बात स्पष्ट हुई है कि स्वाधीनता के संघर्ष में पहली लडाई मज़दूरों की है, मज़दूरों को संगठित होना हैं. यह  पूंजीपतियों के विरूद्ध गरीबो की आत्मरक्षा की लडाई हैं जो स्वाधीनता के संघर्ष का आधार हैं। …. सव्यसाची से कहे गए भारती के इस संवाद से लेखक ने एक बहुत बडा प्रश्न उठाया है  कि क्या  इतनी बड़ी क्रान्ति बिना रक्त बहाए संभव हैं, भारती कहती है –

” मैं भारत की मुक्ति चाहती हूँ, निष्कपट भाव से … लेकिन विश्व मानव की एकांत सदबुद्धि की धारा क्या इस प्रकार समाप्त हो गई कि इस रक्त रेखा के अतिरिक्त किसी भी मार्ग का चिन्ह भी अब दिखाई न देगा ? ”

 

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सिद्धार्थ – अनूप शर्मा

बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर आज हम चर्चा करते है अनूप शर्मा जी के महाकाव्य सिद्धार्थ पर

बुद्ध के संपूर्ण जीवन चरित्र पर महाकाव्य   ” सिद्धार्थ ”  की रचना की अनूप शर्मा जी ने। साहित्य जगत में कुछ ऐसे कवि भी हुए है जिनकी रचनाएं प्रकाश में नहीं आ पाई। छायावादी युग के एक ऐसे ही कवि है – अनूप शर्मा

पूरी कथा विभिन्न सर्गों में इस तरह है – सिद्धार्थ की जन्म स्थली कपिलवस्तु को पहले सर्ग शुभ स्वप्न में हिमालय के पास स्थित बताया –

” गिरि हिमालय के उपकूल में कपिलवस्तु पुरी अति रम्य थी। ”

यहीं राजा शुद्धोदन व माया के पुत्र सिद्धार्थ हुए जिनके जन्म का वर्णन भाग्योदय सर्ग में इस तरह से –

” धन्यामही में शक राजधानी माया स – शुद्धोदन धन्य धन्या ”

तीसरे सर्ग उन्मेष में बाल चरित्र वर्णन तथा यज्ञोपवीत उत्सव पश्चात गुरू गृह प्रवेश का चित्रण है। शस्त्र क्रिया का शिक्षण तथा सिद्धार्थ की निपुणता को दर्शाया है। इन तीन सर्गों की तरह अनुकम्पा सर्ग इतिहास सम्मत नहीं है। इस में बताया कि इस तरह आराम से जीवन व्यतीत करते हुए कुमार एक बार वन की ओर गए जहां घायल हंस को देखा –

” कुमार दौङे सुन हंस की व्यथा
उगा दया भाव दया निधान के
निकल निराच तुरन्त पक्ष से
लगा गले से पुचकारने लगे

यहीं से सिद्धार्थ के शान्त जीवन में चिन्ता रूपी लहरें हिलोरे लेने लगी। तभी उन्होने देखा –

” किसान प्रस्वेद प्रपूर्ण देह था ”

फिर तुरन्त ही –

” विहंग जो सम्मुख कीट खा रहा
कभी बनेगा वह भक्ष्य श्भेन का
रहस्य कैसा विधि का विचित्र है
द्वितीय का जीवन मृत्यु एक की ”

इतिहासकारों ने विवाह पूर्व सिद्धार्थ के जीवन को सुखी बताया है जबकि कवि अनूप शर्मा जी ने इस यात्रा को जीवन में मोङ देने वाली बताया। अगले सर्ग अवरोध में चिन्ता देख पिता शुद्धोदन ने वसन्तोत्सव की योजना की और यशोधरा पर कुमार की आसक्ति दर्शायी लेकिन ऐसा संकेत भी इतिहास में नहीं है। अगले सर्ग संयोग में शस्त्र स्पर्धा में सिद्धार्थ का विजयी होना तथा यशोधरा से विवाह इतिहास सम्मत है –

” योद्धाओं में अमर सुत या नागदत्तादिकों में
चापों में या निश्चित असिमें या ध्यारूढ़ता में
एकाकी है सुभट गण में श्रेष्ठ सिद्धार्थ योद्धा
ब्याहा जाना उचित इनका सुप्राबुद्धात्मजा से ”

विद्या के साथ सिद्धार्थ अन्य कलाओं में भी निपुण थे तथा पांच सौ शाक्यों को प्रतियोगिता में पराजित करने के बाद ही यशोधरा से परिणय सूत्र में बँध पाए थे। इसके बाद सर्ग राग में नव दम्पत्ति के ऐश्वर्यपूर्ण जीवन का चित्रण है –

” शक महीपति राजकुमार के
सदृश और न आज कुमार है
सुखद सब विवाहित मौलिपें
विलसति लसति सुकुमारता ”

इसी वैभवपूर्ण जीवन में सिद्धार्थ को ग्राम विहार की इच्छा हुई जिसका उल्लेख अभिज्ञान सर्ग में है जिसके आगे चिन्तना सर्ग में कुमार के स्वागत में सुसज्जित ग्राम और यात्रा का वर्णन है। राह में वृद्ध को देखकर कुमार ने सारथी से पूछा –

” मनुज सी कर आकृति सारथे
विकट जीव खङा यह कौन है
विकृत दीन मलिन अधीन जो
समय दीर्ण विलास विशीर्ण है ”

कुछ समय पश्चात सिद्धार्थ ने पुनः ग्राम देखने की इच्छा व्यक्त की।  सर्ग भावी में राजा शुद्धोदन का स्वप्न है जो सिद्धार्थ के सन्यासी जीवन की ओर इंगित करता है जिसका स्पष्ट उल्लेख इतिहास में नहीं है।

सर्ग अभिनिवेदन में कुमार की पुनः ग्राम यात्रा है। वृद्ध, रोगी तथा मृतक को देख उन्होनें सारथी से मनुष्य के जन्म मरण की कथा सुनी और कुमार ने मन में निश्चय किया –

” आया हूँ मैं विपत्ति हरने विश्व का ताप खोने
देखूँ कैसे विफल बनती प्रार्थना प्रार्थियों की
शर्वाणी जो जगत सुखदा मंगलमोदिनी है
कल्याणी हे अमर जननि है न कैसे सुनेगी ”

महाभिनिष्क्रमण सर्ग में सिद्धार्थ के इस निश्चय को जब राजा ने सारथी से सुना तब उन्हें बन्दी रूप में रखना ही उचित समझा। तभी यशोधरा ने तीन स्वप्न देखे जिसका विवरण सिद्धार्थ को अपने निश्चय की ओर इंगित करता पाया और सिद्धार्थ ने निश्चय किया –

” तजूँगा मैं सोते अति सुखद गर्भस्थ शिशु को ”

और निद्रा में लीन यशोधरा को गर्भावस्था में ही छोङ कर सिद्धार्थ सत्य की खोज में निकल पङे। जबकि इतिहास कहता है कि जिस समय गौतम घर छोङने का निश्चय कर चुके थे उसी समय उन्हें पुत्र जन्म की सूचना मिली और गौतम के मुख से निकला राहुल ( बंधन ) जो बालक का नाम पङ गया। संभव है महाकाव्यकार ने यशोधरा की विरहावस्था को प्रदीप्त करने के लिए कल्पना प्रसून खिलाया। आगे व्यथा सर्ग में कुमार के गृहत्याग से यशोधरा, राजा, प्रजा की दुःखावस्था का वर्णन है। आगे यशोधरा सर्ग छोङ कर अन्य सर्गों में वर्णन ठीक वैसे ही है जैसे इतिहास में बताया गया है। संबोध सर्ग में भिक्षु रूप में यात्रा जिसके बाद घोर तपस्या फिर बोधि द्रुम की ओर प्रयाण,  संदेश सर्ग में काशी की ओर प्रयाण कर धर्म प्रचार करना तथा राजा बिम्बिसार को उपदेश देना,  यशोधरा सर्ग में यशोधरा की विरह अवस्था का चित्रण है। यह महाकाव्य की परम्परा के अनुसार अपेक्षित है। यहाँ कवि की कल्पना है। दर्शन सर्ग में जन्मस्थली कपिलवस्तु में बुद्ध का आवागमन चित्रित किया है। अंतिम सर्ग निर्वाण में कपिलवस्तु में उपदेश देने के उपरान्त विदा लेकर पैंतीस वर्षों का पर्यटन तथा कुशिग्राम में प्रवेश कर अंतिम उपदेश के बाद महानिर्वाण दर्याशा गया है। अतएव इतिहास पर आधारित यह महाकाव्य अपने उपवन में कुछ कल्पना प्रसून भी समेटे हुए है जो निःसंदेह एक महाकाव्य के लिए आवश्यक है।

अनूप शर्मा जी की केवल इस एक ही रचना से मैं परिचित हूँ …. कौई और रचना मिलने पर यहाँ प्रस्तुत करूँगी ….

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महिला सशक्तिकरण – सामाजिक एवं वैधानिक आरक्षण – चुनौतियाँ

महिला दिवस के अवसर पर एक पुस्तक पढ़ने का अवसर मिला – महिला सशक्तिकरण – सामाजिक एवं वैधानिक आरक्षण – चुनौतियाँ

यह पुस्तक इस विषय पर विभिन्न लेखों का संकलन एवं संपादन है। संपादक डॉ. हरिश्चन्द्र विद्यार्थी है। पढ़ कर लगा कि यह पुस्तक महिला सशक्तिकरण का केवल ढ़िंढ़ोरा नहीं पीट रही अपितु इस विषय की गहराई में जाते हुए सभी पहलुओं को देखती है। विशेष बात यह है कि कुल 42 लेखों और 5 कविताओं में से 15 के रचयिता पुरूष है। सभी ने इस विषय पर न केवल अपना मत रखा बल्कि तथ्य भी सामने रखे और महिला शक्ति के उदाहरण भी प्रस्तुत किए।

पूरी तरह से समझने के लिए इन लेखों को हम विभिन्न वर्गों में रख कर देखते है, लेकिन उससे पहले चर्चा करते है सम्पादकीय की जिसमें आंकणों के तथ्य दिए गए कि इस समय विश्व में महिलाओं की संख्या 2.6 अरब है और पिछले एक दशक में संख्या में आई एक करोङ सैंतीस लाख की कमी पर चिंता जताते हुए महिलाओं को अधिकार देने की वकालत की।

अब लेखों को देखते है विभिन्न वर्गों में। पहले चर्चा ङन लेखों की जो नारी को सांस्कृतिक धरातल पर देखना चाहते है। यहां नारी को भोग्या नहीं योग्य बनने की सलाह दी।

दूसरे वर्ग में दो लेख ऐसे है जो वैदिक काल की नारी की स्थिति को उत्तम बताते है। वेदों से दिए गए उदाहरणों से स्पष्ट हुआ कि कन्या का अर्थ है जिसकी कामना की जाती है लेकिन आगे समाज में विवाह संस्कार में परम्पराओं के नाम पर दहेज़ की आङ में धन को प्रमुखता दिए जाने से समाज में अब कन्या की परिभाषा ही समाप्त हो गई और कन्या अवांछित हो गई।

तीसरे वर्ग में ऐसे लेख है जिनमें इतिहास से महान महिलाओं और उनके सत् कार्यों का उल्लेख किया गया है  – अवन्ति बाई, अहिल्या बाई होल्कर, दुर्गावती और स्वामी विवेकानन्द की नारी भावना का भी चित्रण है कि उन्हें महिलाओं के प्रति तिरस्कारपूर्ण व्यवहार को लेकर चिन्ता थी। उन्होनें हमेशा महिलाओं को निर्भीक होकर काम करने का संदेश दिया।

गौरवशाली नारी की परम्परा को जारी रखते हुए आगे के दौर की ऐसी ही महिलाओं के जीवन और काम का उल्लेख करते लेख चौथे वर्ग में है जिनमें चर्चा है – महिला सशक्तिकरण का साक्षात उदाहरण सावित्री बाई फूले, आज़ादी की दीवानी मीरा बेन, महिला चित्रकार अमृता शेरगिल, सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर, नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटेकर और दो ऐसी महिलाएं जिन्होने लीक से हटकर पुरूषों के माने जाने वाले क्षेत्र में काम किया – मिसाइल वूमेन डॉ. टेसी थॉमस जिनकी अग्नि 5 मिसाइल योजना में महत्वपूर्ण भूमिका है और दूर-दराज के गॉव में चरवाहे का काम करने वाली मल्लेश्वरी जो मीडिया की सफल कैमरामैन बनी। एक लेख में महादेवी वर्मा का संस्मरण है। इसके अतिरिक्त पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल का लखनऊ आईटी में छात्राओं को किया गया संबोधन भी शामिल है जिसमें महिलाओं को सशक्त बनने के लिए आह्वान किया गया है।

इस पुस्तक की विशेष बात यह रही कि इसमें पूरी ईमानदारी बरतते हुए महिलाओं के नकारात्मक आचरण को भी सामने लाया गया है जिसमें चर्चा है भ्रष्टाचारी महिलाओं की, शीर्षक भी ज़ोरदार दिया है – भ्रष्टाचार में महिलाओं ने भी बनाए है कीर्तिमान …. महिताओं के लिए काम में जुटी उच्च पदासीन महिला द्वारा महिलाओं के लिए की गई अभद्र टिप्पणी को भी चर्चा में स्थान दिया है।

पांचवें वर्ग में विचारोत्तेजक लेख सम्मिलिति है जिसमें बङे षडयंत्रों का शिकार बनी रूपम पाठक, मधुमिता शुक्ला, भंवरी देवी के मामले उठाए गए तो वहीं एक लेख में राजनीतिक क्षेत्र में विभिन्न छोटे-बङे स्तरों से महिलाओं को मिलने वाले सेवा के अवसर की भी चर्चा है।

महिलाओं की सुरक्षा, साक्षरता पर भी कलम चली है। छोटी लङकियों की समाज में दुर्दशा की चर्चा विभिन्न शहरों में घटी घटनाओं के माध्यम से की गई है। और भी कई छोटे-बङे विषयों पर लेख है जैसे कामकाजी महिलाओं का बिगङता स्वास्थ्य, महिलाओं को सम्पत्ति का अधिकार, माँ को प्रथम गार्जियन बनाने की वकालत। समाज में महिलाओं के बदलते स्वरूप पर भी चर्चा हुई और महिलाओं को भविष्य की ऊर्जा भी बताया है, नारी के अलौकिक गुणों की व्याख्या के साथ जन्मदात्री के रूप में मातृत्व यज्ञ की मार्मिक और सार्थक चर्चा हुई। कहना न होगा कि कन्या भ्रूण हत्या तो चर्चा में रहा ही। विभिन्न सर्वेक्षणों की रिपोर्टें भी प्रस्तुत की गई है जिनमें लिंग अनुपात, विश्व में महिलाओं के पिछङेपन के आंकङे है।

एक विशेष आकर्षण है, संपादन प्रबन्ध करते हुए जितेन्द्र प्रकाश जी द्वारा कुछ जानकारियाँ देना जैसे सोनोग्राफी की मशीनों का बढ़ना, सर्वेक्षण रिपोर्ट से जानकारी कि माँ की ओर झुके बेटे रिश्ते निभाने में कुशल, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की माँ का प्रेरक प्रसंग, लङकियों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण, उपग्रह केन्द्र के रिसेट 1 की महिला परियोजना निदेशक, पटना में लङकियों में शिक्षा की अलख जगाने वाली साइकिल दीदी, अरविन्द की शिष्या मीरा अल्फ़ाज़ा के साथ राष्ट्र सेविका समिति, राष्ट्रीय महिला मोर्चा से संबंधित जानकारी भी है।

कुल मिलाकर यह पुस्तक महिलाओं से संबंधित हर संभावित क्षेत्र को छूती है और बिना किसी पूर्वाग्रह के अच्छे-बुरे दोनों पक्षों को उभारते हुए आवश्यकता के अनुसार सलाह भी देती है।

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