Archive for औरंगाबाद

घ्रशणेश्वर और अन्य मंदिर

औरंगाबाद का प्रसिद्ध मंदिर हैं - घ्रशणेश्वर मंदिर -

यह शिव मंदिर हैं। मंदिर अन्य मंदिरों जैसा ही हैं पर यहाँ की विधा निराली हैं।

भीतर गर्भ गृह में शिव लिंग हैं जो आकार-प्रकार में सामान्य हैं। यहाँ पूजा के लिए कोई पुजारी नही हैं। श्रद्धालु बाहर सजी दुकानों से अभिषेक की सारी सामग्री खरीद लाते हैं। यह पूजापा श्रृद्धालु स्वयं शिवलिंग पर चढ़ा कर पूजा करते हैं लेकिन यह पूजा महिलाएं नही कर सकती केवल पुरूष ही करते हैं। पुरूषों को अपने ऊपरी वस्त्र निकाल कर गर्भगृह के बाहर ही रखने होते हैं।

पुरूष स्वयं पूजा करते हैं, महिलाएं वहां पूजा में शामिल होती हैं और शिवलिंग को छूकर, वहां के जल का तीर्थ भी ले सकती हैं। इस तरह यहाँ स्वयं पूजा करने का आत्मिक संतोष मिलता हैं।

घ्रशणेश्वर मंदिर देखने के बाद हम हनुमान मंदिर गए -

यहाँ हनुमानजी विश्राम मुद्रा में हैं। हनुमानजी की लेटी हुई मूर्ति हैं। गर्भ गृह भी बड़ा हॉल जैसा हैं जिसके बीच में मूर्ति हैं और चारो ओर रेलिंग हैं। पीपल के पत्तो से बने हारो में सजी मूर्ति मोहक हैं। शनिवार होने से उस दिन भीड़ भी बहुत थी।

हनुमान मंदिर के बाद हम बालाजी मंदिर गए। ऊंचाई पर हैं यह मंदिर। आंध्र प्रदेश में स्थित तिरूपति बालाजी मंदिर की तरह ही हैं -

इसके बाद हम औरंगाबाद से निकले और पहुंचे नासिक जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में...

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पैन्ठन की रेशमी साड़ियाँ

हर शहर की अपनी कुछ विशेषता होती हैं। कुछ ख़ास चीजे तैयार होती हैं।

औरंगाबाद में दो ख़ास चीजो के बारे में बताया गया - चांदी के वर्क और पैन्ठन की साड़ियाँ

चांदी के वर्क हैदराबाद के भी ख़ास होते हैं इसीलिए हम पैन्ठन गए। पैन्ठन एक स्थान हैं जो एक तरह की कलाकारी के लिए प्रसिद्ध हैं। यहाँ कोई शौपिंग सेंटर या शौपिंग मॉल नही हैं। बुनकरों के केंद्र हैं और एकाध दुकाने हैं।

बुनकर केन्द्रों से साड़ियाँ तैयार हो कर इन एक्का-दुक्का दुकानों पर आती हैं। दो तरह की साड़ियाँ हैं - एक सिंथेटिक जिसका दाम 1500-1700 हैं और दूसरी रेशमी (प्यूर सिल्क) की साड़ियाँ जिनका दाम 5000 से शुरू हैं। दोनों में बुनाई एक जैसी हैं, कपडे में अंतर से दाम में अंतर हैं।

यह बुनाई ही यहाँ की विशेषता हैं। यह 2000 साल पुरानी कला हैं। बार्डर और पल्लू पर अलग रंग के रेशमी धागों से बुना जाता हैं। पल्लू पर पारंपरिक चित्र जैसी बुनाई हैं जैसे आकार में नारियल या कलश जैसा हैं। बार्डर की चौडाई और पल्लू में बुनाई जैसे-जैसे बढ़ती जाती हैं दाम भी बढ़ता जाता हैं। यह शुद्ध भारतीय पारंपरिक साड़ियाँ हैं। बताया गया कि पहले चांदी और सोने के तारो से बुनाई हुआ करती थी।

अगले चिट्ठे में औरंगाबाद के मंदिरों की चर्चा...

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खुलदाबाद

औरंगाबाद में बीबी का मकबरा देखने के बाद हम खुलदाबाद पहुंचे।

औरंगजेब अपने अंतिम दिनों में यहीं रहा करते थे। वे इन दिनों में जीवन के ऐशो आराम से भी दूर रहे थे।

उनकी तीव्र इच्छा पर उनके पुत्रो ने उन्हें उनके गुरू की समाधि के पास सुपुर्दे ख़ाक किया। उनकी और उनके गुरू की समाधियाँ पास-पास हैं और इस पूरे क्षेत्र में सादगी हैं -

केवल बाहर एक-दो फूल की दुकाने हैं जहां से लेकर श्रृद्धा के फूल चढ़ाए जाते हैं। बताया गया की उर्स के समय यहाँ बहुत श्रृद्धालु आते हैं।

खुलदाबाद से निकल कर हम पैन्ठन गए रेशमी साड़ियो के लिए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में....

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