Archive for ऊटी

बोटोनिकल गार्डन मे ग्लास हाउज़

ऊटी के बोटोनिकल गार्डन के ग्लास हाउज़ मे भी संग्रह बहुत बढ़िया हैं।

यहाँ क्रोटन अधिक हैं। हर संग्रह के साथ विवरण लिखा हैं जिससे पौधे से सम्बन्धी वैज्ञानिक जानकारी मिलती हैं।

इस गार्डन का लॉन भी बहुत सुन्दर हैं जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में...

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ऊटी का बोटानिकल गार्डन

बोटानिकल गार्डन बहुत अच्छी तरह से तैयार किया गया हैं। पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं। हालांकि बहुत बड़ा नहीं हैं लेकिन संग्रह अच्छा हैं। बोटोनिकल गार्डन होने से हर संग्रह के साथ विवरण भी हैं।

फूलो का संग्रह बहुत सुन्दर हैं -

ग्लास हाउज़ की चर्चा अगले चिट्ठे में....

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ऊटकमंडलम ऊटकमंड ऊटी

अंग्रेजो से हुए युद्ध में टीपू सुल्तान के निधन के बाद उनके क्षेत्र के गाँवों के आदिवासी वहां से भाग कर अंग्रेजों के भय से पहाडी क्षेत्रों में छिप गए। कुछ समय बाद इन पहाड़ियों में ही जीवन यापन शुरू किया।

आदिवासियों की चार जातियां रही, इन्ही जातियों के नाम पर इस क्षेत्र का नाम ऊटकमंडलम पडा जो बाद में ऊटकमंड कहलाया। बाद में अंगेजो ने जंगल में से पहाडी क्षेत्र तक रास्ता बनाया और इस पहाडी क्षेत्र को विकसित किया। यह वही रास्ता हैं जिसकी हमने पिछले चिट्ठे में चर्चा की। इसीसे इस संकरे रास्ते से गुजरना जंगल में से गुजरने के समान हैं। यहाँ के नाम का उच्चारण उन्हें कठिन लगा इसीसे से वे ऊटी कहने लगे। अब यह चारो जातियों के लोग लगभग 30 छोटे-छोटे गाँवों में रह रहे हैं। इन गाँवों का चित्र देखिए -

इस तरह यही गाँव वासी यहाँ के मूल निवासी हैं। बाद में यहाँ के मौसम से प्रभावित होकर देश के विभिन्न भागो के लोग यहाँ आकर बसे। पूरे शहर में सड़के संकरी और ऊंची-नीची हैं जिससे गाड़ियों के आवागमन और घर से बाहर चौपहिए वाहन निकालने में कठिनाइयां बहुत जगह देखी गई। यहाँ छोटे मकान भी कम हैं और फ़्लैट संस्कृति भी कम ही हैं। बड़े बंगले बहुत हैं। घरों के बाहर सुन्दर रंग-बिरंगे फूलो के बगीचे भी हैं।

गाँव के ये लोग सब्जियों और मसालों की खेती करते हैं। यहाँ आम तौर पर शाकाहार देखा गया, यहाँ तक कि रेस्तरांओं में भी मांसाहार शायद ही था। एक ख़ास चीज देखी, गाजर यहाँ बहुत होते हैं और खेतों से निकाले गए ताजा गाजर पौधे के साथ जगह-जगह बिकते नजर आए -

रेस्तरां में भी गाजर का सूप आम रहा। सभी तरह के मसालों की यहाँ खेती होती हैं - इलाइची, दालचीनी, धनिया, भोजपत्ता, खशखश, तिल, काली मिर्च, लौंग आदि। खेती यहीं होने से सभी मसाले यहाँ ताजा और बिना मिलावट के मिलते हैं क्योंकि यहाँ छोटे पैमाने पर तैयार किए जाते हैं, यहाँ से बाहर ले जाकर मिलावट की जाती हैं।

यहाँ से हम बोटानिकल गार्डन देखने गए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में.....

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नीलगिरी की पहाड़ियां

मैसूर से ऊटी की ओर बढ़ते हुए जंगल पार करने के बाद आया पहाडी क्षेत्र।

जंगल के आखिरी छोर पर हैं नीलगिरी के पेड़ो का जंगल और यहीं से सड़क की चढ़ाई भी बढ़ती जाती हैं। यहाँ से लेकर पूरी ऊटी में और कुन्नूर में भी इन पेड़ो की संख्या बहुत हैं इसीलिए इस पहाड़ी क्षेत्र को नीलगिरी की पहाड़ियां कहते हैं।

संकरी सड़क के दोनों ओर ऊंचे नीलगिरी के पेड़ो का जंगल हैं। पेड़ की ऊंचाई 100 मीटर तक होती हैं जिससे पत्ते नीचे अधिक नही रहते और तने ही अधिक दिखते हैं और नीचे तनो का जाल सा दिखता हैं।

बहुत से लोग इस बात को जानते हैं कि नीलगिरी का तेल औषधि के रूप में बहुत महत्वपूर्ण हैं। पत्तों से तेल निकाला जाता हैं। सिरदर्द, जोड़ों के दर्द और सभी तरह के दर्द इस तेल को शरीर पर लगाने से ख़त्म हो जाते हैं।

पहाडी क्षेत्र होने से यहाँ धूप आँख मिचौली खेलती हैं और ज्यादातर बादल घिरे रहते हैं। ऐसे में ऊंचे पेड़ आसमान से जुड़े हुए लगे। जब यह पेड़ दिखने शुरू हो जाए तो इसका अर्थ हैं अब ऊटी आ गया हैं। आगे रिहायशी इलाका शुरू हुआ। यहाँ सिर्फ एक किलोमीटर के दायरे में एक गाँव हैं। इस गाँव की खासियत यह हैं कि यहाँ तीन संस्कृतियों का संगम हैं - कर्नाटक, तमिलनाडू और केरल। इस गाँव को पार कर हम ऊटी पहुंचे।

ऊटी में प्रवेश करते ही सैनिक छावनी हैं जो पुरानी और ख़ास हैं। टीपू सुलतान से युद्ध के बाद ब्रिटिश सेना ने इस क्षेत्र में सैनिक छावनी बनाई थी क्योंकि यह क्षेत्र उस समय आबादी से कोसों दूर था। ख़ास बात यह कि यहीं पर गोला-बारूद बनाने का कारखाना बनाया। यह कारखाना आज भी चालू हैं। स्वतंत्रता के बाद इस कारखाने को बंद नही किया गया। यह सेना के अधीन हैं। अब भी भारी मात्रा में यहाँ गोला-बारूद बनता हैं।

इसके अलावा सैनिक छावनी अन्य शहरों की छावनियों की तरह ही हैं, विशाल क्षेत्र घेरे हुए जिनमे घुड दौड़ मैदान, गोल्फ कोर्ट, अस्पताल वगैरह हैं।

ऊटी की चर्चा अगले चिट्ठे में....

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असली ऊटी की सैर

मैसूर की सीमा पर गुन्डल गाँव से निकल कर हम आगे बढ़ते गए और गाँव तथा रिहायशी इलाके को पार किया। फिर आया जंगल का रास्ता।

दोनों ओर जंगल होने से बहुत सुहावना था यहाँ का मौसम। यह जंगल का रास्ता ही असली ऊटी की सैर हैं। प्रकृति का असली आनंद इस रास्ते पर ही मिला। दोनों ओर घने जंगल और बीच में संकरी सड़क। इस सड़क पर दोनों ओर से लगातार चार पहिए के छोटे बड़े वाहनों की आवाजाही बनी रही जो ऊटी आए पर्यटकों की संख्या बताती रही। संख्या बढ़ना उचित भी रहा क्योंकि देश के कई शहरों में भीषण गर्मी और यहाँ का ठंडा माहौल।

इस पांच घंटे के रास्ते को सभी जानते हैं पर अलग कारण से। यह रास्ता भय और आतंक का रहा। इतना डर कि पर्यटकों ने यहाँ का आनंद लेना ही छोड़ दिया था और तमिलनाडू से ही ऊटी चले जाया करते थे। यात्री बसों को लूटना तो आम बात थी, महत्वपूर्ण हस्तियों के अपहरण भी हुए, जी हाँ, आपने ठीक समझा यह कुख्यात चन्दन तस्कर वीरप्पन का इलाका हैं।

इस इलाके में चार जंगल हैं जिनमे से मधुमलई का जंगल प्रसिद्ध हैं। यही गढ़ था वीरप्पन का। यहीं हैं चन्दन का पेड़। जब अखबारों आदि में पढ़ा सुना करते थे तब जाना था कि एक बड़ा पेड़ हैं जिसे काट-काट कर ख़त्म सा कर दिया गया था और वहीं कुछ छोटे पेड़ भी हैं... पर खेद हैं वहां तक हम आम नागरिक जा नही सकते, वैसे सड़क से बहुत ज्यादा नही, थोड़ा ही भीतर हैं, लेकिन सड़क के किनारे से ही घने पेड़ो का जंगल हैं।

दाहिनी ओर यह पेड़ हैं और बाई ओर हैं माया नदी। चन्दन की लकड़ी काट कर संकरी सड़क पार कर इसी नदी से नाव की सहायता से भेजी जाती थी। बाई ओर देखने पर पेड़ो के पीछे नदी नजर आती हैं। नदी का बहाव अधिक नही हैं।

रात में तो क्या दिन में भी तस्करी होती और लूटपाट अलग। लेकिन अब भय से मुक्त इस राह पर रोमांचक यात्रा का आनंद लिया जाता हैं। गाँव पार कर जब इस रास्ते पर आगे बढे तब आगे कुछ झुग्गी-झोपड़ियां भी नजर आई बाद में सिर्फ जंगल ही था। सड़क के दोनों ओर बन्दर देखे -

सड़क के दोनों ओर के पेड़ो पर उछलकूद करते लंगूर पूरी यात्रा में नजर आए। सड़क के किनारे बैठे छोटे-छोटे लंगूर बहुत प्यारे लगे। कभी-कभार एक-दो सड़क के बीचो-बीच भी आकर बैठ गए।

लंगूर की ही तरह हाथी भी पूरे जंगल में हैं और पूरे रास्ते नजर आए। अपनी मस्त चाल से जंगल से सड़क के किनारे तक फिर यहाँ से भीतर जंगल में टहलते हुए देखे गए। एक स्थान पर हमने देखा एक झोपड़ी की ओर एक छोटी सी लड़की सिर पर पानी का घडा लिए जा रही थी उससे कुछ ही दूरी पर हाथी आराम से जंगल की ओर जा रहा था, ठीक वैसे ही जैसे हम लोग सड़क पर चलते हैं। लगा लड़की और हाथी दोनों को ऎसी आदत सी हैं। शायद बहुत से लोग यह बात जानते होंगे, उन दिनों यह भी सुनने में आया था कि वीरप्पन ने तस्करी में हाथियों का भी इस्तेमाल किया। हाथियों पर चन्दन की लड़की के गट्ठर रख कर सड़क के दूसरी ओर माया नदी तक ले जाता था। उसने हाथियों से जैसे दोस्ती कर रखी थी, उनके नाम भी रखे थे, एक हाथी का नाम गणेश रखा था। यह सारी बाते उस समय हम सुनते थे लेकिन इस यात्रा के दौरान लगा कि वह सारी बाते शायद सच ही थी।

हाथी और लंगूर के अलावा यहाँ हिरणों के झुण्ड भी बहुत देखे -

पेड़ो के आस-पास कुलांचे भरते हुए लगभग सड़क के पास के पेड़ो तक नजर आए। इनके अलावा मोर भी देखे लेकिन कम और दूरी पर दिखाई दिए लेकिन पंख खुले नही थे, हमने सोचा खुले पंखो का दृश्य कितना मनोरम होता होगा। इस तरह लग रहा था जैसे हम जंगल में ही घूम रहे हैं। वास्तव में जंगल के बीच में से ही यह सड़क बनाई गई हैं जिसकी चर्चा हम बाद में करेंगे।

यह यात्रा दिन के समय रही, लौटते समय यह यात्रा रात में की जो और अधिक रोमांचक रही जिसकी चर्चा बाद में करेंगे।

प्रकृति का पूरा आनंद, जंगल, जंगली जानवर और पहाड़ का आनंद हमें रास्ते में ही मिल गया। जंगल समाप्त होते ही पहाडी क्षेत्र शुरू हुआ जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में....

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ऊटी की सैर

ऊटी जाने के लिए दो रास्ते हैं एक तमिलनाडू से दूसरा मैसूर से।

तमिलनाडू से कुन्नूर होते हुए ऊटी जाते हैं और यह रास्ता छोटा हैं, लगभग 150 कि.मी. की दूरी हैं। मैसूर से दूरी दुगनी हैं, लगभग 300 कि.मी. हैं, यहाँ से ऊटी जिसके बाद कुन्नूर जाते हैं। वैसे ऊटी से कुन्नूर की दूरी 15 कि.मी. हैं।

हमने मैसूर से ऊटी और कुनूर तक यात्रा की, यात्रा लम्बी हैं पर रोमांचक हैं। इस यात्रा में प्रकृति का पूरा आनंद मिला। न सिर्फ सुहावना मौसम बल्कि प्रकृति के मनोरम दृश्य देखे और जंगल की सड़क से यात्रा करते हुए पास से जंगल के दुलारे और महारथी भी देखे।

इतना ही नही, हमारी प्रिय अभिनेत्री, बीते समय की, साठ सत्तर के दशक की लोकप्रिय अभिनेत्री मुमताज़ के चाय बागानों की न सिर्फ सैर की बल्कि बहुत कुछ साथ भी ले आए। आजकल हम सुबह-शाम मुमताज़ की चाय पी रहे हैं।

और भी बहुत कुछ हैं। मनोरम दृश्यों को हमने कैमरे में क़ैद करने की कोशिश भी की।

इस रोमांचक यात्रा के लिए सबसे पहले हम हैदराबाद से बैंगलूर पहुंचे। आगे की दास्तान अगले चिट्ठे में....

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