Archive for आंध्र प्रदेश

गुत्ती क़िला – धर्मावरम

अनन्तपुर का गुत्ती क़िला शंख के आकार का है। सामने शासकों की समाधियां बनी है –

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दाहिनी ओर से ऊपर जाने के लिए पथरीला रास्ता है। ऊँचाई पर बने इस क़िले में पानी की समुचित व्यवस्था के लिए रिज़रवायर भी है।

इसके बाद  नरसिंहा स्वामी मन्दिर में दर्शन करने के बाद हम आलूर पहुँचे जो पहाङी भाग है और जलप्रपात है जो खास आकर्षक नही लगा।

यहां से निकल कर हम गए  धर्मावरम जो सिल्क की साङियों के लिए प्रसिद्ध है। धर्मावरम के पूरे क्षेत्र में गलियां है –

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इन गलियों में कई घर है और वहीं से साङियों का व्यापार होता है। साङियां वाकई बहुत अच्छी है।

इसके बाद हम हैदराबाद लौट आए।

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विश्व का सबसे बङा और पुराना बरगद

विश्व का सबसे बङा और सबसे पुराना, साढ़े छह सौ साल पुराना बरगद का पेङ अनन्तपुर में है। यह साढ़े पांच एकङ भूमि घेरे हुए है –

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यह है पेङ का आधार मुख्य तना –

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इसकी शाखाएं दोनों ओर फैली है। दोनं ओर जाली लगा दी गई है। शाखाएं प्रशाखाएं फैली है –

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दोनों ओर से ऊपर की ओर डालियाँ मिलती है। पत्ते हरे ताज़े है –

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सूखे पत्ते नीचे बिखरे है जो जाली के पीछे ही है और जो पेङ के लिए खाद का काम करते है।

एक पत्ता भी ले जाने की अनुमति नहीं है।  पेङ हरा-भरा स्वस्थ है। इस स्थान का नाम तिमम्मा के नाम पर तिमम्मा मारिमानू है, कहते है तिमम्मा ने अपनी भक्ति से यहां अपने पति की जान बचाई थी।

इसके बाद हमने देखा गुत्ती फोर्ट जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में ….

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ताङपत्री

अनन्तपुर में प्राचीन मन्दिर है – ताङपत्री

काले पत्थरों से बना है। प्रवेश द्वार पर रथ का आकार है –

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आगे कक्ष में विभिन्न स्तम्भ है। सभी पर शिल्पकारी है –

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दूसरी ओर गर्भगृह में विष्णु जी की मूर्ति है। द्वादशी और तृयोदशी के दिन सामने छत पर बने छिद्रों से सूरज की पहली किरणें विष्णु जी की मूर्ति के चरणों पर आकर गिरती है –

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इस तरह बहुत सुन्दर शिल्पकारी और स्थापत्य है। विभिन्न छोटे मन्दिर है जिनमें भी स्तम्भ बने है –

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इसके बाद हमने देखा विश्व प्रसिद्ध बरगद का पेङ जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में ….

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कुंभकरण पार्क

अनन्तपुर स्थित कुंभकरण पार्क शायद देश में ऐसा अकेला स्थान है।

यहां कुंभकरण की मूर्ति राम कथा के उस प्रसंग के अनुसार है जहां युद्ध में आवश्यकता के अनुसार सोए कुंभकरण को समय से पहले जबरन जगाया जा रहा है।  दुर से ही कुंभकरण की सोई हुई विशाल मूर्ति नज़र आती है –

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मूर्ति में देख सकते है कुंभकरण सीधे सोए हुए है और सभी उन्हें जगाने का प्रयास कर रहे है। सिर के पास मूषक उनकी चुटिया खींच रहा है, कान के पास नगाङा बजाया जा रहा है, पेट पर सीढ़ी लगा कर चढ़ा जा रहा है आदि –

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मूर्ति के भीतर जाने के दो रास्ते है। एक रास्ता  पैरों के बीच से है –

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और दूसरा पेट से –

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भीतर खुला कक्ष सा है –

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इस मूर्ति के अलावा प्रांगण में विभिन्न गोलाकार चबूतरे बने है जिस पर विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियां है –

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इसके बाद हमने देखा ताङपत्री जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में ….

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लेपाक्षी मन्दिर

आन्ध्र प्रदेश के ज़िले अनन्तपुर में सबसे पहले हमने देखा लेपाक्षी मन्दिर –

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लेपाक्षी तेलुगु शब्द है – ले का अर्थ है उठो और पाक्षी कहते है पक्षी को, इस तरह लेपाक्षी का अर्थ हुआ – उठो पक्षी …

इसका संबंध राम कथा के उस प्रसंग से है जिसमें जटायु रावण को सीता को हर ले जाते हुए देखते है। बचाने के प्रयास में घायल होते है और सीता को ढूँढ़ते हुए राम के वहां आने पर घायल अवस्था में यह सूचना देते है। राम उनसे उठने का आग्रह करते है लेकिन जटायु प्राण त्याग देते है।

यह मन्दिर विजयनगर शैली के शिल्प से बना है। गर्भगृह में शिव जी की वीरभद्र स्वामी के रूप में मूर्ति है  –

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गर्भगृह के सामने नाट्य कक्ष में सौ स्तम्भ है। सभी स्तम्भों पर नृत्य की मुद्रा में विभिनन देवी देवता उकेरे गए है। इन स्तम्भों के बीच में से गुज़रते हुए नृत्य किया जाता है –

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सभी स्तम्भ और मूर्ति काले पत्थरों से बने है। मन्दिर से कुछ दूर पहले विशाल नन्दी भी है। इसके बाद हमने देखा कुंभकरण पार्क जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में ….

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मंत्रालयम

आन्ध्र प्रदेश के कुर्नूल ज़िले में हम मंत्रालयम पहुँचे।  यहाँ का मुख्य आकर्षण है तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित – राघवेन्द्र स्वामी मंदिर –
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माना जाता है कि स्वामी राघवेन्द्र ने 12 वर्षों तक तपस्या की जिससे प्रसन्न हो हनुमान जी ने उन्हें पंचमुखी रूप में दर्शन दिए।
राघवेन्द्र स्वामी मंदिर में बीच के स्थान से दर्शन किए जाते है एक ओर स्थित पंचमुखी हनुमान और उनके ठीक सामने दूसरी ओर स्थित राघवेन्द्र स्वामी की मूर्ति के। इसके अलावा एक ओर माता के भी दर्शन किए जाते है।
राघवेन्द्र स्वामी की चांदी की मूर्ति है। काले पत्थर पर पंचमुखी हनुमान चाँदी से बने है। एक काले पत्थर पर ही ऊपरी ओर सोने की पत्तियों से माता के नैन-नक्श बने है जिसके नीचे स्वामी जी का सुनहरा मुख है।
इस मुख्य गर्भ गृह के एक किनारे एक और गर्भगृह में माता की मूर्ति है। दूसरी ओर एक विशाल अहाते में क्रम से विभिन्न तपस्वियों की मूर्तियाँ है।
तुगभद्रा नदी का किनारा बहुत गन्दा है, मंदिर का परिसर तो बङा है ही मन्दिर के सामने मार्ग के छोर पर मंदिर की कमान के अलावा चौराहे पर भी ये मूर्तियाँ सजी है –
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यहाँ बाज़ार भी सजा है और विभिन्न स्थानों से आए श्रृद्धालुओं के लिए ठहरने की भी उत्तम व्यवस्था है।
इस दिन अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस था, मंदिर के प्रांगण में भी योग कार्यक्रम आयोजित किया गया –
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यहाँ से 20 किलोमीटर दूर कर्नाटक जाने के रायचूर मार्ग में स्थित है पंचमुखी हनुमान मंदिर –
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गुफा के भीतर काले पत्थर पर चाँदी से पंचमुख बने है।
इसके बाद हम हैदराबाद लौट आए।

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राजा कृष्ण देव राय का महल

विजयवाड़ा से 16 किलोमीटर की दूरी पर कोंडापल्ली गाँव में हैं राजा कृष्ण देव राय का महल.

विजय नगर साम्राज्य के राजा कृष्ण देव राय का 500 वर्ष पूर्व राज्याभिषेक हुआ था. इस समय आंध्र प्रदेश में राज्याभिषेक के 500 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में समारोह भी आयोजित किए जा रहे हैं. 5.7.2010 को राष्ट्रपति महोदया भी इस अवसर पर पधारी थी.

कोंडापल्ली गाँव प्राचीन समय से ही लकड़ी के खिलौनौ के लिए प्रसिद्ध हैं. वैसे आज यहाँ बड़े पॉलीटेक्नीक कॉलेज तक बन गए हैं. इसी कॉलेज परिसर के सामने से महल का रास्ता हैं.

7 किलोमीटर की चढ़ाई हैं. केवल चढाई का ही रास्ता हैं आसपास कुछ भी नहीं हैं.

यह हैं महल -

पीछे दाहिनी ओर कांच से बंद खिड़कियाँ नजर आ रही हैं, इसके भीतर हैं दरबार हॉल जो बंद कर दिया गया हैं -

इसी हॉल में राजा कृष्ण देव राय का दरबार लगता था. दरबार में विदूषक थे तेनालीराम. उसी तरह से जिस तरह अकबर के दरबार में बीरबल विदूषक थे. बीरबल की ही तरह तेनालीराम के भी कई किस्से मशहूर हैं. कुछ किस्से कुछ ब्लोगरो ने अपने हिन्दी ब्लोगों में दिए. तेनाली वास्तव में एक छोटा सा गाँव हैं और उनका नाम राम हैं, इसीसे उनका नाम तेनालीराम पडा यानि तेनाली गाँव का राम.

यहाँ से कुछ सीढियां ऊपर चढ़ कर जाने पर मुख्य महल हैं जो खुला हुआ हैं, छत अब नही रही.

यह हैं नृत्यशाला -

यह हैं रानी का महल -

यह हैं दरबार-ऐ-आम -

इसी तरह दरबार-ऐ-ख़ास भी हैं। कुछ भाग बंद कर दिए हैं. महल देखने के बाद हम हैदराबाद लौट आए.

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