Archive for आंध्र प्रदेश

मंत्रालयम

आन्ध्र प्रदेश के कुर्नूल ज़िले में हम मंत्रालयम पहुँचे।  यहाँ का मुख्य आकर्षण है तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित – राघवेन्द्र स्वामी मंदिर –
20150621-0001
20150620-0012
20150620-0021
माना जाता है कि स्वामी राघवेन्द्र ने 12 वर्षों तक तपस्या की जिससे प्रसन्न हो हनुमान जी ने उन्हें पंचमुखी रूप में दर्शन दिए।
राघवेन्द्र स्वामी मंदिर में बीच के स्थान से दर्शन किए जाते है एक ओर स्थित पंचमुखी हनुमान और उनके ठीक सामने दूसरी ओर स्थित राघवेन्द्र स्वामी की मूर्ति के। इसके अलावा एक ओर माता के भी दर्शन किए जाते है।
राघवेन्द्र स्वामी की चांदी की मूर्ति है। काले पत्थर पर पंचमुखी हनुमान चाँदी से बने है। एक काले पत्थर पर ही ऊपरी ओर सोने की पत्तियों से माता के नैन-नक्श बने है जिसके नीचे स्वामी जी का सुनहरा मुख है।
इस मुख्य गर्भ गृह के एक किनारे एक और गर्भगृह में माता की मूर्ति है। दूसरी ओर एक विशाल अहाते में क्रम से विभिन्न तपस्वियों की मूर्तियाँ है।
तुगभद्रा नदी का किनारा बहुत गन्दा है, मंदिर का परिसर तो बङा है ही मन्दिर के सामने मार्ग के छोर पर मंदिर की कमान के अलावा चौराहे पर भी ये मूर्तियाँ सजी है –
20150620-0032
यहाँ बाज़ार भी सजा है और विभिन्न स्थानों से आए श्रृद्धालुओं के लिए ठहरने की भी उत्तम व्यवस्था है।
इस दिन अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस था, मंदिर के प्रांगण में भी योग कार्यक्रम आयोजित किया गया –
20150621-0004
यहाँ से 20 किलोमीटर दूर कर्नाटक जाने के रायचूर मार्ग में स्थित है पंचमुखी हनुमान मंदिर –
20150620-0027
20150620-0024
गुफा के भीतर काले पत्थर पर चाँदी से पंचमुख बने है।
इसके बाद हम हैदराबाद लौट आए।

टिप्पणी करे

राजा कृष्ण देव राय का महल

विजयवाड़ा से 16 किलोमीटर की दूरी पर कोंडापल्ली गाँव में हैं राजा कृष्ण देव राय का महल.

विजय नगर साम्राज्य के राजा कृष्ण देव राय का 500 वर्ष पूर्व राज्याभिषेक हुआ था. इस समय आंध्र प्रदेश में राज्याभिषेक के 500 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में समारोह भी आयोजित किए जा रहे हैं. 5.7.2010 को राष्ट्रपति महोदया भी इस अवसर पर पधारी थी.

कोंडापल्ली गाँव प्राचीन समय से ही लकड़ी के खिलौनौ के लिए प्रसिद्ध हैं. वैसे आज यहाँ बड़े पॉलीटेक्नीक कॉलेज तक बन गए हैं. इसी कॉलेज परिसर के सामने से महल का रास्ता हैं.

7 किलोमीटर की चढ़ाई हैं. केवल चढाई का ही रास्ता हैं आसपास कुछ भी नहीं हैं.

यह हैं महल -

पीछे दाहिनी ओर कांच से बंद खिड़कियाँ नजर आ रही हैं, इसके भीतर हैं दरबार हॉल जो बंद कर दिया गया हैं -

इसी हॉल में राजा कृष्ण देव राय का दरबार लगता था. दरबार में विदूषक थे तेनालीराम. उसी तरह से जिस तरह अकबर के दरबार में बीरबल विदूषक थे. बीरबल की ही तरह तेनालीराम के भी कई किस्से मशहूर हैं. कुछ किस्से कुछ ब्लोगरो ने अपने हिन्दी ब्लोगों में दिए. तेनाली वास्तव में एक छोटा सा गाँव हैं और उनका नाम राम हैं, इसीसे उनका नाम तेनालीराम पडा यानि तेनाली गाँव का राम.

यहाँ से कुछ सीढियां ऊपर चढ़ कर जाने पर मुख्य महल हैं जो खुला हुआ हैं, छत अब नही रही.

यह हैं नृत्यशाला -

यह हैं रानी का महल -

यह हैं दरबार-ऐ-आम -

इसी तरह दरबार-ऐ-ख़ास भी हैं। कुछ भाग बंद कर दिए हैं. महल देखने के बाद हम हैदराबाद लौट आए.

Comments (5)

राजीव गांधी पार्क

विजयवाड़ा में म्यूजियम से निकलकर हम राजीव गांधी पार्क देखने गए. यह भी कुछ अच्छा नही लगा. क्षेत्र बड़ा ही हैं पर देखभाल ठीक नही हैं -

लकड़ी के हाथी घोड़े जैसी संरचनाएं खडी की गई हैं -

पेड़-पौधों का भी विशेष संग्रह नही हैं -

एक किनारे पर रेल रखी देखी जो अब चलती नही हैं.

इसी पार्क में चिड़ियाघर भी हैं जिनमे ज्यादातर घरेलु पशु-पक्षी हैं. पिजरो में सफाई भी नही हैं. गंदे पानी में ही सारस नजर आए -

यहाँ से निकलकर हम राजा कृष्णदेव राय का महल देखने गए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में...

टिप्पणी करे

म्यूजियम

विजयवाड़ा में गांधी स्तूप देखने के बाद हमने म्यूजियम देखा.

म्यूजियम बहुत ही छोटा सा हैं. दूसरी तीसरी शताब्दी की कुछ मूर्तियाँ, सिक्के, शस्त्र वगैरह हैं. कुछ मूर्तियाँ बाहर उद्यान में भी रखी गई हैं -

कोई विशेष संग्रह नही हैं.

म्यूजियम देखने के बाद हम राजीव गांधी पार्क देखने गए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में...

Comments (1)

गांधी स्तूप

विजयवाड़ा में कनक दुर्गा मंदिर से कुछ ही दूरी पर हैं गांधी स्तूप.

लगभग दो किलोमीटर की चढ़ाई हैं. सीढियां भी हैं और गाड़ी से जाने के लिए सड़क भी हैं. ऊपर पहुँचने पर सबसे पहले हैं संग्रहालय जिसे गांधी म्यूजियम कहा जाता हैं. यह वास्तव में फोटो म्यूजियम हैं.

यह खुला भी हैं और बंद भी. दरवाजो पर ताला लगा हैं और खिड़कियाँ खुली हैं. खिड़कियो से भीतर देखा जा सकता हैं. केवल यह एक बड़ा कक्ष ही हैं जिसमे गांधी जी की तस्वीरे लगी हैं. आजादी की लड़ाई के समय की विभिन्न तस्वीरे दीवारों पर इस तरह से लगाई गई हैं कि हर तस्वीर बाहर से आसानी से देखी जा सकती हैं.

बाई ओर स्थित इस म्यूजियम को देखने के बाद हम सीधे आगे बढे. यहाँ पहाडी पर रेल की सैर का आनंद लिया. 6-7 छोटे-छोटे डिब्बों की ट्रेन हैं -

पहाड़ पर गोलाकार एक चक्कर लगाती हैं रेल. अच्छा लगा. रेल से नीचे माचिस के डिब्बो की तरह दिखती शहर की इमारते -

रेल का यह गोल चक्कर गांधी स्तूप के चारो ओर हैं. एक जगह ऊपर कुछ ऐसा शेड डाला गया हैं कि अंधी गुफा में से गुजरती हैं रेल. गोल बिछी पटरियां अच्छी लगी.

यहाँ से सौ सीढियां हैं ऊपर गांधी स्तूप के लिए. सीढियां ही चढ़ना हैं गाड़ी के लिए रास्ते की इस पहाडी पर गुंजाइश ही नही हैं. ऊपर चढ़ कर स्तूप देखा -

गुलाबी-भूरे रंग के ऊंचे स्तूप पर हाथ में लाठी लिए एक क़दम आगे बढाए गांधी जी के पारंपरिक मुद्रा में दर्शन होते हैं -

स्तूप के चारो ओर गोलाकार में उनके अहिंसावादी सिद्धांत लिखे हैं -

शिल्प कला से उनकी मनु के साथ प्रार्थना के लिए जाते हुए तथा कुछ अन्य चित्र भी उकेरे गए हैं.

यह देखने के बाद हम म्यूजियम और राजीव गांधी पार्क देखने गए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में...

टिप्पणी करे

मोगल राजपुरम गुफाएं

हम पहले ही बता चुके हैं विजयवाड़ा एक ओर से इन्द्रकेलाद्री पहाड़ियों से घिरा हैं.

पहाडी और शहर का संगम हमें बहुत अच्छा लगा खासकर मोगल राजपुरम गुफाएं देखना. यह गुफाएं दूसरी और तीसरी शताब्दी की हैं. कुल तीन गुफाएं हैं. तीनो ही व्यस्त सड़क पर हैं -

यह देखना भी अनूठा अनुभव हैं, व्यस्त सड़क पर लगातार बना हैं यातायात, आधुनिक गाड़ियों की चहल-पहल हैं और किनारे हैं पुराने जीवन शैली की गुफाएं.

यह हैं पहली गुफा -

गुफा भीतर खाली हैं. सपाट दीवारे हैं. बाहर भित्तियों पर कुछ अस्पष्ट कलाकारी हैं.

यहाँ से हम थोड़ा आगे बढे. सिगनल पार करने के बाद शेष दोनों गुफाएं एक साथ हैं, सीढियों पार करने पर बाई ओर छोटी गुफा नजर आ रही हैं -

यहाँ भीतर गुफा में जाना भी कठिन हैं. दाहिनी ओर पहाडी के पास कुछ जगह साफ़ कर फूलो के पौधे लगाए गए हैं, हरियाली भी हैं. दाहिनी ओर हैं तीसरी गुफा -

यहाँ भी भीतर जाना कठिन हैं.

गुफाएं सड़क पर ही हैं, सिर्फ जाली लगाकर सड़क से अलग रखा हैं -

दीवार न होना इस जगह को आकर्षित बनाता हैं.

यह गुफाएं देखने के बाद हमने देखा गांधी स्तूप और पहाडी पर किया रेल का सफ़र जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में...

Comments (1)

त्रिशक्ति पीठम, गायत्री मंदिर और राजेश्वरी मंदिर

विजयवाड़ा में अन्य मंदिर भी महत्वपूर्ण हैं.

कनक दुर्गा मंदिर के पास ही हैं गायत्री मंदिर. छोटा सा मंदिर हैं जिसमे गायत्री माँ की पंचमुखी विशाल मूर्ति हैं, पहले माले पर स्थित हैं यह मंदिर. आमतौर पर गायत्री मंदिर कम ही हैं इसीसे यह मंदिर महत्वपूर्ण लगा.

एक और महत्वपूर्ण मंदिर हैं - त्रिशक्ति पीठम -

माना जाता हैं कि यहाँ सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती तीनो ने एक साथ तपस्या की थी. इस स्थान पर इस मंदिर का नवनिर्माण किया गया हैं. तीनो की विशाल पारंपरिक मुद्राओं में मूर्तियाँ अलग-अलग गर्भ गृह में हैं. बीच में लक्ष्मी जी, दाहिनी ओर सरस्वती जी और बाई ओर हैं पार्वती जी.

यह सभी मंदिर पास-पास हैं पर राजेश्वरी मंदिर दूरी पर हैं. नया बना यह चमचमाता मंदिर हैं. निर्माण में लगा बहुत मंहगी सामग्री का प्रयोग किया गया. फर्श तक खूब चमकदार हैं. गणपति की मूर्ति हैं. माँ दुर्गा की विशाल मूर्ति हैं. सबसे आकर्षक हैं शिवलिंग जो हिमलिंग सा हैं. सफ़ेद चमचमाते पत्थर से बना हैं यह शिवलिंग.

सभी मंदिरों में दर्शन के बाद हम मोगल राजपुरम गुफाएं देखने गए जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में...

टिप्पणी करे

Older Posts »