Archive for आंध्र प्रदेश

बोईकुण्डा गंगम्मा मंदिर

चित्तूर ज़िले के मादन्नापल्ली शहर की सीमा पर है बोईकुण्डा गंगम्मा मंदिर –

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महाकाली के मंदिर में प्रवेश की सीढियों पर दोनों ओर कतार में माता की मूर्तियां बनी है –

 

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मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर भस्मासुर वध की मूर्तियाँ है –

 

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भीतर एक अलग चीज़ देखी, मन्नत के धागों के स्थान पर चूङियाँ बँधी देखी –

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गर्भगृह में माँ काली के दर्शन होते है।
इसके बाद हम हैदराबाद लौट आए।

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हॉर्सलि हिल्स – 4

हॉर्सलि हिल्स में दो किलोमीटर के दायरे में एक सूखी झील है – गंगोत्री झील –

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जिसके पीछे जंगल है –

 

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नीचे है हरी-भरी ऋषि घाटी –

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प्रकृति का आनन्द लेने के बाद हम शहरी भाग में यानि मादन्नापल्ली आए जहाँ सीमा पर देखा बोईकुण्डा गंगम्मा मंदिर जिसकी चर्रा अगले चिट्ठे में  ….

 

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हॉर्सलि हिल्स – 3

हॉर्सलि हिल्स में सामने के भाग में वन विहार है यानि ज़ू जिसमें विभिन्न जीव-जन्तु है –

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यहाँ का विशेष आकर्षण है 150 साव पुराना नीलगिरि का पेङ जिसका व़क्षारोपण जॉर्ज  हार्सलि ने किया था जो अब भी हरा-भरा है –

 

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आगे का विवरण अगली पोस्ट में जारी

 

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हॉर्सलि हिल्स – 2

हॉर्सलि हिल्स में बच्चो के लिए झूले और अन्य खेल तो है ही साथ ही छोटे-बङे बच्चों और युवा वर्ग के लिए ट्रैकिंग की सुविधा भी है। निरीक्षकों की देख रेख में इस वर्ग ने ट्रैकिंग का आनन्द लिया –

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प्रकृति की गोद में प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र भी है। विभिन्न रोगों के लिए प्राकृतिक, आयुर्वेदिक चिकित्सा, मालिश आदि की व्यवस्था है साथ ही एक विशेष इलाज भी है। टब मे पानी में छोटी-छोटी मछलियाँ होती है इसमें पैर रख कर बैठने पर मछलियाँ पैरों पर खास कर एङियों सहित पूरे निचले भाग में आ जाती है और त्वचा की मृत कोशिकाएं ( डेड स्किन सेल ) खाने लगती है –

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जिसके बाद नई त्वचा आती है जिससे पैरों में कांति आती है। यह भी कहा जाता है कि इससे तनाव भी दूर होता है।

यहाँ पर मल्लम्मा मंदिर भी है –

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माना जाता है कि पहले इस घने जंगल में हाथी अधिक थे और मल्लम्मा नामक आदिवासी लङकी कुछ हाथियों को नियमित चारा खिलाया करती थी जिसकी स्मृति में माता का मंदिर बनवाया गया है।

आगे का विवरण अगली पोस्ट में जारी  ……

 

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हॉर्सलि हिल्स

हॉर्सलि हिल्स दक्षिण का हिल स्टेशन हौ जो आन्ध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले में है।  ब्रिटिश शासन काल में यहाँ एक कलेक्टर थे – जॉर्ज  हॉर्सलि –

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जिन्होने इस स्थान की पहचान की और इसे हिल स्टेशन के रूप में विकसित किया। यहाँ दो व्यू प्वाइंट है जहाँ से खूबसूरत प्राकृतिक नज़ारा दिखता है –

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एक ओर है – गाली बंडा  …. हवा को तेलुगु में गाली कहते है और पत्थर को बंडा कहते है. बहुत बढ़िया स्थान है यह। खुले आसमान के नीचे दूर तक फैला हुआ पथरीला भाग है जहाँ सरसराती हवा का आनन्द लिया जाता है –

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आगे का विवरण अगली पोस्ट में जारी  ….

 

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गुत्ती क़िला – धर्मावरम

अनन्तपुर का गुत्ती क़िला शंख के आकार का है। सामने शासकों की समाधियां बनी है –

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दाहिनी ओर से ऊपर जाने के लिए पथरीला रास्ता है। ऊँचाई पर बने इस क़िले में पानी की समुचित व्यवस्था के लिए रिज़रवायर भी है।

इसके बाद  नरसिंहा स्वामी मन्दिर में दर्शन करने के बाद हम आलूर पहुँचे जो पहाङी भाग है और जलप्रपात है जो खास आकर्षक नही लगा।

यहां से निकल कर हम गए  धर्मावरम जो सिल्क की साङियों के लिए प्रसिद्ध है। धर्मावरम के पूरे क्षेत्र में गलियां है –

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इन गलियों में कई घर है और वहीं से साङियों का व्यापार होता है। साङियां वाकई बहुत अच्छी है।

इसके बाद हम हैदराबाद लौट आए।

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विश्व का सबसे बङा और पुराना बरगद

विश्व का सबसे बङा और सबसे पुराना, साढ़े छह सौ साल पुराना बरगद का पेङ अनन्तपुर में है। यह साढ़े पांच एकङ भूमि घेरे हुए है –

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यह है पेङ का आधार मुख्य तना –

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इसकी शाखाएं दोनों ओर फैली है। दोनं ओर जाली लगा दी गई है। शाखाएं प्रशाखाएं फैली है –

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दोनों ओर से ऊपर की ओर डालियाँ मिलती है। पत्ते हरे ताज़े है –

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सूखे पत्ते नीचे बिखरे है जो जाली के पीछे ही है और जो पेङ के लिए खाद का काम करते है।

एक पत्ता भी ले जाने की अनुमति नहीं है।  पेङ हरा-भरा स्वस्थ है। इस स्थान का नाम तिमम्मा के नाम पर तिमम्मा मारिमानू है, कहते है तिमम्मा ने अपनी भक्ति से यहां अपने पति की जान बचाई थी।

इसके बाद हमने देखा गुत्ती फोर्ट जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में ….

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