स्मृति शेष – कुँअर नारायण

आज हिन्दी के ख्यात साहित्यकार कुँअर नारायण जी की पुण्यतिथि है ….  

वर्ष 1927 में 19 सितम्बर को जन्में कुँअर नारायण जी पचास के दशक से हिन्दी काव्य साहित्य में उभरे। यह वो समय था जब अज्ञेय जी सप्तकों की परम्परा आगे बढ़ाते हुए तीसरा सप्तक के लिए सात कवियों का चुनाव कर रहे थे। सात में से एक है – कुँअर नारायण जी  …. यह निश्चित हो जाता है कि तब तक कवि के रूप में पहचान बन चुकी थी।

कुँअर नारायण जी को अँग्रेज़ी साहित्य से लगाव रहा, अँग्रेजी साहित्य का अध्ययन भी किया लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारतीय संस्कृति से दूर रहे। एक ऐसे पौराणिक आख्यान को अपनी कविता का विषय बनाया जिसका उल्लेख साहित्य में कम हुआ है। राम कथा के जटायु को बहुतों ने विषय बनाया लेकिन कुँअर नारायण जी ने जटायु के भाई सम्पाती को केन्द्र में रख कर आधुनिक जीवन शैली और उसके संघर्ष से निपटने की राह दिखाई। इस कथा में सम्पाती अपने भाई जटायु के साथ सूरज से होङ लगाता है। दोनों भाई सूरज की ओर तेज़ी से दौङते है और जैसे-जैसे सूरज की ओर बढ़ते जाते है ताप बढ़ता जाता है और पंख झुलसने लगते है। कवि इस कविता में यही कह रहा है कि जीवन का लक्ष्य सूरज की तरह है जिसकी ओर तेज़ी से दौङते हुए हम जीवन की कई बातों को अनदेखा कर रहे है। इस तरह लक्ष्य प्राप्ति में लग कर हम जीवन की कई दूसरी छोटी-बङी खुशियों से दूर होते जा रहे है, इसीसे सलाह दी कि लक्ष्य के प्रति ध्यान को थोङा कम कर दे जिसके लिए कहा है –

धीमा कर दो प्रकाश !
मोम की दीवारें
गल न जाए
सपनों के लाक्षागृह
जल न जाए
प्यार के पैमाने
द्रवित नेत्र
छल न जाए


छायावादी प्रभाव भी कुछ रचनाओं में मिलता है। छायावादी शैली में प्रकृति चित्रण लिए कविता है – जाङों की एक सुबह –

रात के कम्बल में दुबकी उजियाली ने
धीमे से मुँह खोला
नीङों में कुलबुल कर अलसाया अलसाया
पहला पंछी बोला

जो अँग्रेज़ी कवि वर्ड्स वर्थ से भी प्रभावित है। प्रेम की अभिव्यक्ति भी प्रकृति के माध्यम से की, कविता – वसन्त की एक लहर

वही जो कुछ सुन रहा हूँ वसन्त  के कोकिलों में
वही जो कुछ हो रहा तय कोपलों में
वही जो कुछ ढूँढते हम सब दिलों में
वही जो कुछ बीत जाता है पलों में
बोल दो यदि  ….

छायावादी प्रवृत्ति स्वानुभूति कुँअर नारायण जी की रचनाओं में एक कदम आगे बढ़ कर वैयक्तिकता के रूप में है। यह वैयक्तिकता व्यक्ति को अकेला कर रही है। अकेलेपन की भयावहता बताती है रचना खामोशी :  हलचल –

लगता है बैठा हूँ भूतों के डेरे में
सजे हुए सीलबन्द एक बङे कमरे में
सदियों से दूर किसी अन्धे उजियाले में
अपनों से दूर एक पिरामिडी घेरे में
एकटक घूर रही मुझ को बस दीवारें
जी करता उन पर जा यह मत्था दे मारे
चिल्ला कर गूँजों से पत्थर को थर्रा दे
घेरी खामोशी की दीवारे बिखरा दे
अन्दर से बाहर आ सदियों की कुण्ठाएं
बहुत बङे जीवन की हलचल से मिल जाए

और इन सबके साथ जीवन की यह सच्चाई भी स्वीकारी कि कल हम नहीं रहेगे लेकिन संसार अपनी गति से चलता रहेगा – कविता  …. घर रहेंगें …. की कुछ पंक्तियाँ –

घर रहेंगे, हमीं उनमें रह न पाएंगें
समय होगा, हम अचानक बीत जाएंगे
अनर्गल ज़िन्दगी ढोते किसी दिन हम
एक आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जाएंगे

विविध रंगों से अपने रचना संसार को सजाने वाले कुँअर नारायण जी को सादर नमन!

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