अज्ञेय – स्मृति शेष

and as a literary force, at any rate, Nirala is already dead …..

सुविधा के लिए हम इस बात को हिन्दी में बता रहे है –

निराला की साहित्यिक क्षमता कमज़ोर हो चुकी है …..

यह बात अज्ञेय जी ने कही …… गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के शान्ति निकेतन से प्रकाशित पत्रिका – विश्व भारती क्वाटर्ली  – के वर्ष 1937-38 के एक अंक में छपे लेख द्वारा

पूरी बात इस तरह है – हिंदी काव्य में 1915 के आसपास कुछ अलग तरह की कविताएं लिखी जाने लगी थी जिनमें व्यक्ति की सूक्ष्म भावनाओं को स्थान मिला था। प्रेम, सौन्दर्य और प्रकृति की चर्चा कविता में होने लगी थी, यह सब पहली बार हुआ था कि कवि की आत्मानुभूति कविता में छलकने लगी थी। इस तरह कवि अपनी मानवीय भावनाओं की छाया प्रकृति में देखने लगे थे जिससे इस दौर का काव्य छायावाद कहलाया, जिसमें आदर्श भी स्थापित किए गए थे, सुखद कल्पनाओँ द्वारा उच्च जीवन शैली भी बताई गई थी।

लेकिन 1935 के आस-पास से समाज में परिस्थितियां जटिल होने लगी जिससे प्रेम और सौंदर्य की कोमल भावनाओं के स्थान पर जीवन का कठोर सत्य सामने आने लगा और कवि यही कठोरता काव्य में ढालने लगे. अब साहित्य में वही लिखा जाने लगा है जो हम परिवेश के अनुसार भोग रहे थे यानि जीवन के, समाज के कठोर यथार्थ को जैसा का तैसा लिखना ही साहित्य कहलाया। इसीसे कहा गया कि साहित्यिक शक्ति कमज़ोर हो चुकी है।

यहां साहित्यिक शक्ति का अर्थ है कल्पना से अनुभूतियों का साहित्य रचना। ब्रिटिश हुकूमत से जूझते समाज में ऐसी कल्पनाएं न के बराबर थी और जीवन की कठोरता से रूबरू होते कवि यथार्थवादी कविताएं लिखने लगे थे ….. ऐसी कविताएं प्रगतिवादी कविताएं कहलाई और इस तरह की रचनाओं का साहित्य प्रगतिवाद कहलाया …. यह शुरूवात सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी से मानी जाती है, उनकी – वह तोङती पत्थर – कविता से  …….

आज पुण्यतिथि पर गौरवशाली साहित्यकार अज्ञेय जी को सादर नमन !

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