हरिवंश राय बच्चन – स्मृति शेष

आज हिन्दी जगत के ख्यात साहित्यकार हरिवंश राय बच्चन  का जन्म दिवस है …..

बच्चन जी पहले ऐसे व्यक्ति रहे जिन्हें स्वतंत्रता मिलने के बाद सरकारी काम में अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी लाने की ज़िम्मेदारी दी गई। लेकिन कवि हृदय और साहित्यसृजक बच्चन जी के लिए यह काम सरल नहीं था ….

उन्ही दिनों की एक घटना है जब देश में प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू और राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन थे तब संसद के बजट अधिवेशन के समय राष्ट्रपति द्वारा मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार भाषण अनुवाद के लिए डॉ हरिवंश राय बच्चन के पास भेजा गया। डॉ राधाकृष्णन अंग्रेजी के विद्वान थे। उनके द्वारा प्रयुक्त अंग्रेजी शब्दों और वाक्य संयोजन के अनुसार ही हिंदी के शब्दों का चयन कर वाक्य संयोजन करते हुए डॉ बच्चन ने हिंदी में अनुवाद किया। संसद की परम्परा के अनुसार राष्ट्रपति का भाषण यदि अंग्रेजी में हो तो उसका हिंदी अनुवाद उप राष्ट्रपति पढते है। इस तरह डॉ बच्चन द्वारा किए गए हिंदी अनुवाद को उपराष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन द्वारा पढा जाना था। नेहरू जी ने हिंदी अनुवाद देख कर कहा कि भाषण के अनेक शब्दों का उ च्चारण करने में डॉ जाकिर हुसैन को दिक्कत होगी साथ ही सभी के लिए इस भाषण को समझना कठिन होगा। तब यह निर्णय लिया गया कि सरकारी काम में सरल हिंदी का प्रयोग किया जाए।

यहाँ से भाषा के धरातल पर बच्चन जी दो रास्तो पर चलते रहे – एक रास्ता सरकारी काम का रहा जहां सबका ध्यान रखते हुए सरल हिन्दी का प्रयोग करते रहे और दूसरा रास्ता साहित्य सृजन का रहा जहां साहित्यिक हिन्दी का प्रयोग करने लगे। बच्चन जी ने विभिन्न विषयो पर कविताएं लिखी, प्रेम गीत, प्रेम में विरह के गीत, देश भक्ति और जीवन के विभिन्न अनुभवों के साथ जीवन दर्शन की भी चर्चा की। हालांकि ऐसे गीतों की संख्या कम नही जिनका उपयोग फिल्मो में किया जा सकता था फिर भी वास्तव में उनकी एक ही रचना का प्रयोग किया गया है, गीत – कोई गाता मैं सो जाता, फिल्म आलाप में ….. इसी फिल्म में सरस्वती वंदना भी है जो वन्दना ही है जिसमे अन्य काव्य रचनाओं की तरह बच्चन जी के भाव या विचार नही है। इसके अतिरिक्त फिल्म सिलसिला के लिए एक लोक गीत को हिन्दी शब्द दिए जिससे यह लोकप्रिय होली गीत बन कर उभरा – रंग बरसे  …  अपने इस छोटे से फ़िल्मी सफ़र की अंतिम रचना है – अग्निपथ जिसे कविता के ही रूप में अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म अग्निपथ में रखा गया है जिसके लिए स्वर भी अमिताभ जी ने ही दिया है। इस फिल्म को जब दुबारा बनाया गया तब भी यह रचना रखी गई…… यहाँ यही रचना ….

वृक्ष हों भले खड़े, हों घने हों बड़े,
एक पत्र छांह भी, मांग मत, मांग मत, मांग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

तू न थकेगा कभी, तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी, कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

यह महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत रक्त से, लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

बच्चन जी पर कुछ और चर्चा फिर कभी …. हिन्दी जगत के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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