शुभ जन्मदिन – स्वदेश भारती जी

आज कवि और रूपाम्भरा पत्रिका के संपादक – स्वदेश भारती का जन्मदिन है।  

स्वदेश भारती जी की काव्य रचनाओं को अज्ञेय जी ने 1979 में प्रकाशित चौथा सप्तक में संपादित किया। 1959 में तीसरा सप्तक के प्रकाशन के बीस वर्षों बाद चौथा सप्तक का प्रकाशन हुआ। इन बीस वर्षों यानि साठ और सत्तर के दशक के प्रमुख सात कवियों को इसमें स्थान मिला जिनमें से एक है – स्वदेश भारती

आपने अपनी शिक्षा पूरी नहीं की जिसका कारण देश प्रेम की तरंगे है जो उन्हें विनोबा भावे के पास ले गई। साहित्यिक जीवन के ठोस होने का कारण रमेश बक्षी, सुनील गंगोपाध्याय जैसे मित्र है। आधुनिक कवियों में से एक होते हुए भी आप कविता को आत्मा के सौन्दर्य की सच्चाई मानते है साथ ही यह भी माना है कि कविता को अपने समय का दर्पण होना चाहिए। यह स्वयं स्वदेश भारती जी ने चौथा सप्तक के वक्तव्य में कहा। आगे कहते है –

” मैं आधुनिक हिन्दी कविता को नए धरातल पर, ताज़ा मौलिक परिवेश में सम्मान के साथ प्रस्थापित करना चाहता हूँ। यह मेरी प्रारंभिक यात्रा है। ”  

इसमें  स्वदेश भारती जी की विभिन्न प्रवृत्तियों की रचनाएं सम्मिलित है – आधुनिक जीवन की निराशा, भविष्य के प्रति आशा, प्रेम की अभिव्यक्ति और प्रकृति चित्रण। आज हम केवल एक ही रचना की चर्चा करेंगे – अँधेरा

यह आधुनिक जीवन का अँधेरा है। स्वदेश भारती जी को लगता है कि आधुनिक समाज में मनुष्य को प्रति क्षण मृत्यु का बोध होता है फिर भी वह जीवित है क्योंकि जीवित रहने के लिए विवश है। इस परिप्रेक्ष्य में निराश होना स्वाभाविक है –

” वर्तमान में व्याप्त
अँधेरा
मिटने वाला नहीं है
और मैं काले समय के चक्रव्यूह को
तोङ कर
युद्ध करने में असमर्थ हूँ  ”

मानव समाज में इतनी सामर्थ्य भी नहीं रही कि वे परिस्थितियों से जूझते हुए काले समय के इस चक्रव्यूह को तोङे और स्वयं को स्वतंत्र करें। इस स्वच्छन्द जीवन के उसने स्वप्न अवश्य देखें है जिससे उत्पन्न आशा की किरणों ने उसे प्रेरित किया –

” पलकों में खामोश रातों के
सपने जाग रहे है और
रोशनी की रक्तात्र ऊँगलियाँ
कितनी ही बार मेरे बंद दरवाज़े पर
दस्तक दे कर लौट गई है ”

किन्तु सभी असफल रहे। उसके कानों में निरन्तर यही स्वर गूँजता है – ”  उठो युद्ध करों ”

और उससे प्रेरित हो मनुष्य अपने अस्तित्व के आहत होने पर भी युद्ध के लिए तत्पर हो जाता है। किन्तु आज संघर्ष झेलना औसत मानव की नियति बन गई है और वही उससे अनुनय करती है –

” … सुनो
युद्ध पर मत जाओ  ”

यहाँ नियति का भीगी पलकों से अनुनय करना इस बात का साक्षी है कि संभव है युद्ध से जीवन और भी अधिक उलझ जाए। यह सत्य भी है कि आधुनिक परिवेश में यह स्वच्छन्दता नहीं रह गई कि अपनी स्वतंत्रता हेतु कुछ कह सकें। आगे कविश्री ने और भी सुन्दर अभिव्यक्ति दी है कि यदि उसे युद्ध करना भी है तो –

” कौन सा लक्ष्य बेधने के लिए ”

अभिप्राय कि वह किस-किस से युद्ध करेगा क्योंकि किसी एक विशेष से संघर्ष नहीं अपितु अशान्ति तो चारों ओर व्याप्त है। इस अशान्ति का परिवर्तन शान्ति में करने के लिए मुख्य युद्ध किससे हो यह –

” न जान पाने की असमर्थता ने
मेरी आस्थाओं को
मौन की थपकी देकर सुला दिया है  ”

इसी कारण आज वह चुप है। इस चुप्पी का कारण कोई नहीं जानता, सभी अपने अनुसार ही इसका कारण बताते है – मित्र गर्विला कहते है, आत्मीय सनकी कहते है और समाज उसकी इस स्थिति पर व्यंग्य करता है जिससे उसे लगता है कि वह परास्त हो गया है –

”  सभी तरफ से सभी युद्धों से
बिना युद्ध किए ही  ”

इस निराशा से और साथ ही मशीनी दिनचर्या से धीरे-धीरे उसके मन में घृणा का बीज अंकुरित हो रहा है। उसे यूँ लग रहा है कि ” घर ” जो जीवन का आश्रय स्थल है वह भी उसे निराश ही कर रहा है तभी तो वह कहता है –

” आश्रय तो कहीं भी मिल सकता है
इतना बङा आकाश है
और धरती का विस्तार है
अब मैं अपने अँधेरे कमरे का
दुर्भाग्य नहीं सह सकता ”

अर्थात् जीवन में शान्ति का इतना अभाव हो गया है कि वह उसे अपने ही घर में नहीं मिल सकती – कारण ढ़ेर सारी समस्याएं है। इसी से मानव इतना एकाकी हो गया है कि वह आत्मीय के मध्य रहे अथवा निर्बन्ध कोई अन्तर नहीं।  …

यह थी एक रचना चौथा सप्तक से … कुछ और रचनाओं पर कुछ और चर्चा फिर कभी …

स्वदेश भारती जी को जन्मदिन की शुभकामनाएं !

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