स्मृति शेष – जयशंकर प्रसाद

आज ख्यात हिंदी साहित्यकार जयशंकर प्रसाद की पुण्यतिथि है। आज हम चर्चा करते है प्रसाद जी के महाकाव्य कामायनी की।

यह महाकाव्य एक ऐसी कथा पर आधारित है जो सभी संस्कृतियों में है – प्रथम मानव की कहानी जिसे मनु श्रृद्धा की कहानी कहे, आदम हव्वा की या एडम ईव की। मूल कथा वही है कि प्रलय से चारों ओर पानी के अतिरिक्त कुछ नहीं था। केवल एक व्यक्ति बचा था। आगे एक महिला से भेंट हुई और बना परिवार, इस तरह आरंभ हुई सृष्टि। इन्हीं के जीवन के उतार-चढ़ाव से जीवन को जगत को समझा जाता है।

प्रसाद जी ने पौराणिक कथा ली और जीवन दर्शन बताया अद्वैतवाद से जो शैव दर्शन पर आधारित है। जब भी कामायनी पर चर्चा हुई, इन दो मुद्दों पर ही चर्चा हुई इन के अतिरिक्त इस महाकाव्य का तीसरा आधार भी महत्वपूर्ण है – यह है मनोवैज्ञानिक आधार जिस पर चर्चा बहुत ही कम हुई। आज हम इस महाकाव्य के केवल मनोवैज्ञानिक आधार की चर्चा करेंगें।

इस पौराणिक कथा को प्रसाद जी ने 15 सर्गों में कहा है। हर सर्ग का एक शीर्षक है। इन शीर्षकों का क्रम ही मनोवैज्ञानिक आधार है। आरंभ प्रलय से है। चारों ओर केवल पानी है। केवल मनु जीवित है और चिंतित है जीवन के लिए। इस पहले सर्ग का शीर्षक है – चिंता .. यहाँ स्पष्ट है कि जब अभाव होता है तभी चिंता होती है, जिस वस्तु की कमी है उसी की हम चिंता करते है तभी तो प्रसाद जी ने चिंता को अभाव की बालिका कहा –

“हे अभाव की चपल बालिके, री ललाट की खलखेला
हरी-भरी-सी दौड़-धूप, ओ जल-माया की चल-रेखा।”

बहुत चिंतन-मनन से आशा की एक किरण दिखाई देती है। दूसरे सर्ग का शीर्षक है – आशा … जिसकी आरंभिक पंक्तियाँ है –

“ऊषा सुनहले तीर बरसती, जयलक्ष्मी-सी उदित हुई,
उधर पराजित काल रात्रि भी, जल में अतंर्निहित हुई।”

सुबह हुई और आशान्वित हो मनु जीवन का आधार खोजने लगे, तभी भेंट हुई श्रृद्धा से। तीसरा सर्ग है – श्रृद्धा .. श्रृद्धा मानव मन की एक ऐसी भावना है जिसमें प्रेम, भक्ति और विश्वास है। स्वाभाविक है कि अकेले भटकते मनु को जब सामने एक महिला दिखाई दी तब मन में प्रेम और भक्ति की भावना उमङ आती और साथ ही जीवन के लिए विश्वास जगता है। श्रृद्धा ने भी मनु को प्रोत्साहन दिया, कहा –

“बनो संसृति के मूल रहस्य, तुम्हीं से फैलेगी वह बेल,
विश्व-भर सौरभ से भर जाय, सुमन के खेलो सुंदर खेल।”

श्रृद्धा का सम्बल पा कर मनु के मन में प्रेम की भावना उग्र हो उठती है। अगला सर्ग है – काम .. मनु काम भावना के वशीभूत होने लगते है –

“मधुमय वसंत जीवन-वन के, बह अंतरिक्ष की लहरों में,
कब आये थे तुम चुपके से रजनी के पिछले पहरों में?”

काम भावना के वश में मनु के भीतर वासना का जगना स्वाभाविक है। अगला सर्ग – वासना .. वासना वास्तव में इच्छा है। मनु को जीवन के प्रति इच्छा जागृत होती है –

“कौन हो तुम खींचते यों, मुझे अपनी ओर,
ओर ललचाते स्वयं, हटते उधर की ओर”

यहाँ सामान्य जीवन में क्रम से स्वाभाविक रूप में आने वाली भावनाएं दिखाई देती है, इसी क्रम में श्रृद्धा के लिए लज्जा की भावना। सर्ग –  लज्जा में कवि ने बहुत कोमल भावनाओं का चित्रण किया है –

“मैं रति की प्रतिकृति लज्जा हूँ, मैं शालीनता सिखाती हूँ,
मतवाली सुंदरता पग में, नूपुर सी लिपट मनाती हूँ,”

अब मनु जीवन के लिए व्यावहारिक हो उठते है और कर्म की ओर बढ़ते है। अगला सर्ग – कर्म .. जिसमें मनु यज्ञ भी करते है –

“कर्मसूत्र-संकेत सदृश थी, सोम लता तब मनु को,
चढ़ी शिज़नी सी, खींचा फिर, उसने जीवन धनु को।”

दोनों का जीवन व्यावहारिक रूप लेने लगता है। माँ बनने वाली श्रृद्धा आगन्तुक के स्वागत की तैयारी में हमेशा मगन रहती है। यहां मनु को लगता है कि अब श्रृद्धा अपना पूरा ध्यान उनकी ओर नहीं दे पा रही और मन में उठने लगती है ईर्ष्या। यह मानव मन की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है कि जिस पर पूरा अधिकार है वहां अधिकार का बंटना सहन नहीं। इसे प्रसाद जी ने चित्रित किया अगले सर्ग ईर्ष्या में –

“बीजों का संग्रह और इधर, चलती है तकली भरी गीत,
सब कुछ लेकर बैठी है वह, मेरा अस्तित्व हुआ अतीत”

और मनु श्रृद्धा को छोङ जाते है। आगे उन्हे मिलती है – ईङा .. सर्ग है – ईङा … यह पंक्तियाँ देखिए-

वह बोली-” मैं हूँ इड़ा, कहो तुम कौन यहाँ पर रहे डोल”
नासिका नुकीली के पतले पुट, फरक रहे कर स्मित अमोल
“मनु मेरा नाम सुनो बाले, मैं विश्व पथिक स रहा क्लेश।”
स्वागत पर देख रहे हो तुम यह उजड़ा सारस्वत प्रदेश
भौति हलचल से यह, चंचल हो उठा देश ही था मेरा
इसमें अब तक हूँ पड़ी इस आशा से आये दिन मेरा।”

ईङा चाहती है कि मनु उसका उजङा प्रदेश बसा दे। प्रसाद जी ने ईङा को बुद्धि का प्रतीक माना है। श्रृद्धा हृदय का और ईङा मस्तिष्क का प्रतीक है। मानव मन यानि मनु हृदय से चोट खाकर अपना मन किसी काम में लगाना चाहते है और ऐसे में मस्तिष्क से ही काम लिया जाता है। मनु ईङा के साथ मिल कर सारस्वत प्रदेश बसाते है और प्रजापति बन कर असीम अधिकार चाहते है जिससे प्रजा विरोध कर उठती है। प्रजा नहीं चाहती उनकी रानी ईङा पर मनु का अधिकार हो। परिणाम मनु और प्रजा के बीच संघर्ष होता है। यह सब श्रृद्धा स्वप्न में देखती है। यहां मानवीय चेतना को बखूबी उभारा है प्रसाद जी ने। हृदय का प्रतीक श्रृद्धा मनु की हर गति से परिचित होती जाती है। कहते है कि हृदय को सब आभास होता है। कवि ने भी सर्ग का शार्षक स्वप्न ही दिया –

“द्वार बंद कर दो इनको तो, अब न यहाँ आने देना,
प्रकृति आज उत्पाद कर रही, मुझको बस सोने देना”
कह कर यों मनु प्रकट क्रोध में, किंतु डरे-से थे मन में,
शयन-कक्ष में चले सोचते, जीवन का लेना-देना।,
श्रद्धा काँप उठी सपने में, सहसा उसकी आँख खुली,
यह क्या देखा मैंने? कैसे, वह इतना हो गया छली?

आगे संघर्ष सर्ग में मनु का दंभ और प्रजा से संधर्ष का चित्रण है –

“आह प्रजापति यह, न हुआ है, कभी न होगा,
निर्वाधित अधिकार,आज तक किसने भोगा ? ”

संधर्ष के बाद मनु के मन में विरक्ति हो जाती है जो मन की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है जिसका चित्रण निर्वेद सर्ग में है –

“मनु चुप सब अभिशाप पिये- सोच रहे थे,
“जीवन सुख है?  ना, यह विकट पहेली है,
भाग अरे मनु इंद्रजाल से, कितनी व्यथा न झेली है?

और जब संसार से विरक्ति होती है तब मानव ईश्वर के दर्शन को लालायित हो उठत है। दर्शन सर्ग में मनु की भी यही स्थिति है –

“देखा मनु ने नर्त्तित नटेश, हत चेत पुकार उठे विशेष-
“यह क्या श्रद्धे बस तू ले चल, उन चरणों तक, दे निज संबल”

यहां मनु को श्रृद्धा जीवन का रहस्य बताती है। मनोविज्ञान भी यही कहता है जब मन में प्रेम, विश्वास और भक्ति की भावना हो तभी ईश्वर को, जीवन के रहस्य को जान पाते है, इन्हीं तीनों भावों का एकरूप है – श्रृद्धा … अगले सर्ग – रहस्य की ये पंक्तियां देखिए –

“त्रिदिक विश्व, आलोक बिंदु भी, तीन दिखाई पडे अलग व,
त्रिभुवन के प्रतिनिधि थे मानो वे, अनमिल थे किंतु सजग थे।
मनु ने पूछा, “कौन नये, ग्रह ये हैं श्रद्धे मुझे बताओ?
मैं किस लोक बीच पहुँचा, इस इंद्रजाल से मुझे बचाओ”
इस त्रिकोण के मध्य बिंदु, तुम शक्ति विपुल क्षमता वाले ये,
एक-एक को स्थिर हो देखो, इच्छा ज्ञान, क्रिया वाले ये।”

जी हाँ, प्रसाद जी ने यही रहस्य बताया है जीवन के आनन्द का – इच्छा, ज्ञान और क्रिया .. इन तीनों को अपने जीवन में एक के बाद एक स्थिर करों और जीवन का आनन्द लो। अंतिम सर्ग है – आनन्द … मनोविज्ञान भी यही कहता है कि इच्छा, ज्ञान और क्रिया का समन्वय ही चेतना है और इसीसे ही मिलता है जीवन का लक्ष्य .. इस महाकाव्य के अंत में प्रसाद जी ने चेतना से आनन्द प्राप्ति की बात कही, समापन पद प्रस्तुत है –

“समरस थे जड‌़ या चेतन, सुन्दर साकार बना था,
चेतनता एक विलसती, आनंद अखंड घना था।”

यहां क्रम से सभी सर्गों के शीर्षक देखिए जिसमें जीवन के उत्थान के मानसिक स्तर का क्रम नज़र आएगा – चिंता, आशा,  श्रृद्धा,  काम,  वासना,  लज्जा,  कर्म,  ईर्ष्या,  ईङा,  स्वप्न,  संघर्ष,  निर्वेद,  दर्शन,  रहस्य,  आनंद

पौराणिक आख्यान, जीवन दर्शन, मनोवैज्ञानिक आधार के अलावा प्रसाद जी के साहित्य का एक और महत्वपूर्ण आधार है – भारत का गौरवशाली इतिहास … जिस पर चर्चा फिर कभी

हिन्दी जगत के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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