जन्मदिन मुबारक मालती जोशी जी !

आज हिन्दी साहित्य जगत की ख्यात कथाकार मालती जोशी का जन्मदिन है।  

मालती जोशी जी की रचनाओं में आज के समाज के दोनों ही वर्गों की महिलाएं नज़र आती है – परम्परावादी और आधुनिक विचारों वाली। इनके इर्द-गिर्द सीधी सच्ची रचनाओं को बुना है मालती जी ने। रचनाएं पढ कर लगता है जैसे हम साहित्य नही पढ रहे बल्कि अपने आस-पास के किसी परिवार को देख रहे हैं। 

उपन्यास –  पिया पीर न जानी में सास पुरानी विचार धारा की है और बहू आधुनिक विचारों की, लेकिन यही पर लेखिका ने यह आभास भी दिया है कि उसकी सास की उम्र की महिलाएं भी आधुनिक विचार रखती है जैसे उसकी माँ है। कुछ पंक्तियाँ देखिए जो दूसरी बेटी के जन्म के समय की है  –

” तुम तो ऐसा जश्न कर रही हो जैसे लडका हुआ है। उन्होंने कसैले स्वर में कहा तो मैं चली आई। मेरे बाहर पाँव देते ही इनसे बोली इसीलिए मैं इस रिश्ते के लिए मना कर रही थी। पर उस समय तो तुम कुछ सुनने की स्थिति में नही थे न। इसकी माँ के भी तीन लड़कियां है। पता नहीं अब हमारे यहाँ भी लडका होगा या नहीं। नही तो पितर प्यासे ही रह जाएगे। ..ये और किसी कारण से मुझे मना करती तो मैं जिद न पकड़ती पर इनकी आखिरी बात ने मेरा खून खौला दिया। हाँ, हम तीन बहने ही थी पर हमारे माता-पिता ने हमें कभी यह अहसास नहीं होने दिया कि हम अनचाही संतान है। मैं भी अपनी बेटियों को यह अहसास कभी नही होने दूंगी। ”

लेकिन हम आज भी कितने ही आधुनिक बन जाए पर जीवन शैली को पारंपरिक ही रखना चाहते है। लडकियो को पढाएगे, नौकरी से आत्म निर्भर भी बनाएगे पर उसका अकेला रहना मंज़ूर नही करेगे। लड़कियों की शादी को आज भी अनिवार्य माना जाता है। कहाँ, कैसे, किससे शादी हो रही है, यह मायने नही रखता, बस .. एक ही बात सही लगती है कि विवाह हो गया यानि उसे अपना घर मिल गया, अब चाहे उसे पति छोड कर चला जाए तब भी उसे अकेला नही माना जाता। गोया कुँवारी अकेली समाज में ग्राह्य नही पर ब्याहता अकेली चलती है. कहानी – बहुरि अकेला इसी विषय पर है.

महिलाओं के सम्बन्ध में एक और कड़वी सच्चाई को भी मालती जी ने उजागर किया है कि जिस नौकरी से महिलाएं आत्म निर्भर बनती है उसी नौकरी पर परिवार के अन्य सदस्य भी निर्भर हो जाते है जिससे यह आत्मनिर्भरता कही अभिशाप तो कही कोल्हू का बैल भी बना देती है। यह अपनों द्वारा शोषण का एक रूप है।  कहानी – सन्नाटा की स्थिति देखिए  –

” एक समय था जब वह घंटो आईने के सामने बैठ कर निहारा कराती थी। उन दिनों कॉलेज भर में उसके रूप के चर्चे थे। इसी रूप जाल ने तो गिरीश को बांधा था इसी के बल पर तो वह बिना किसी दान-दहेज़ के इतने बडे घर में आ गई थी। बडा घर याद आते ही उसका मन कसैला हो उठा। ….  नौकरी भी अब उसके लिए शौकिया नहीं रही थी। वह जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बन गई थी। बडा घर मात्र एक छलावा था। सारे सब्ज़ बाग़ दूर के ढोल निकले। वकालत की एक तख्ती ज़रूर टंग रही थी दरवाज़े पर ताकि कोई यह न कहे कि निठ्ठले है बीवी की कमाई खाते है।”

समाज के ऐसे कई चित्र है, न केवल महिलाओं से सम्बंधित बल्कि अन्य क्षेत्रो के भी जो मालती जी के साहित्य में बिखरे पडे है जिन पर चर्चा फिर कभी …..

मालती जोशी जी को जन्मदिन की अनेकों शुभकामनाएं !  
हम उनके अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करते है

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