गुरूदेव की गीतांजलि

आज गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर का जन्मदिवस हैं।

9 मई 1861 को जन्मे गुरूदेव के जन्म को 150 वर्ष हो चुके हैं और गुरूदेव की कृति गीतांजलि को नोबुल पुरस्कार मिले 100 वर्ष हो चुके है.

विश्व स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिए जाने वाले प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है – नोबुल पुरस्कार. वर्ष 1901 से साहित्य जगत के लिए भी यह पुरस्कार दिया जाने लगा और बारह वर्ष के बाद 1913 में पहली बार एक भारतीय को इस पुरस्कार के लिए चुना गया।

गीतांजलि मूल रूप से बंगला भाषा में लिखी गई और इसके अंग्रेज़ी संस्करण को नोबुल पुरस्कार के लिए चुना गया.  अंग्रेज़ी,  जो पाश्चात्य देशों के साहित्य की भाषा है और उस समय भारत में अंग्रेज़ी शासन के विरूद्ध संधर्ष चल रहा था. ऐसे में इस पुरस्कार को राजनीतिक चाल भी माना गया पर भारतीय अपनी बात उन तक पहुँचाने के लिए उन्हीं की भाषा अंग्रेज़ी का प्रयोग भी करते थे.

गीतांजलि कविताओं का संग्रह है. कविताएं न तो बहुत बङी है और न ही बहुत छोटी लेकिन एक-एक कविता गागर में सागर है. प्रत्येक कविता एक संदेश देती है. इसका रचनाकाल एक ऐसा समय है जब विश्व स्तर पर शान्ति का आह्वान किया जा रहा था. विश्व युद्ध के बाद सभी देशों में भय व्याप्त था. भारत में तो स्वाधीनता का संघर्ष छिङ गया था. ऐसे में भारतीय साहित्यकार चाहते थे कि अपने स्वर्णिम अतीत को खंगाल कर ऐसे रत्न निकाले जिससे सद् भावना का आलोक फैले. इसी क्रम में साहित्य जगत में एक ओर तो पौराणिक चरित्रों और गौरवशाली इतिहास के पन्नों से सामग्री लेकर साहित्य रचा जा रहा था तो दूसरी ओर भारतीय संस्कृति और आध्यात्म से प्रेरणा लेकर शान्ति के प्रयास किए जा रहे थे और इसी श्रेणी में रची गई गीतांजलि. …. पहली ही कविता में अखण्ड विश्व के लिए कवि ने प्रभु से प्रार्थना की –

जहाँ विश्व न टूटे खण्डों में संकरी घरेलु दीवारों से

जहां मन में भय न हो तथा विचार और क्रिया में समन्वय रहे, प्रभु मेरा देश उस स्वर्ग में जागे. तात्पर्य कि अभी हमारा देश गहरी नींद में सोया है या कहे कि अभी हम जागृत नहीं है, सक्रिय नहीं है, बन्दी है. बन्दी शार्षक रचना में कवि ने कैदी से पूछा –

किसने तुम्हें कैद किया ?  उसने कहा, मेरे मालिक ने.

मालिक है शक्ति और ऐश्वर्य. इस तरह चारों ओर मनुष्य ने एक दीवार सी बना ली है जिससे प्रकाश भीतर आ ही नहीं पा रहा. इस कारागार में भी वह स्वतंत्र बैठा नहीं है अपितु बेङियों में जकङा है. बेङियाँ खुद मानव है. मानव जब अपने आप का अधिक ध्यान रखता जाता है तो इसका अर्थ होता है कि बेङियां उतनी ही दृढ़ होती जा रही है जिससे वह कारागार से मुक्त नहीं हो पाता और प्रकाश से भी उतना ही दूर हो जाता है. इससे अंधकार ही साथी बन गया है. जब वह द्वार खोलता है तो कुछ नहीं देख पाता है. वह हैरान है कि रास्ते कहाँ खो गए ?  रास्ते तलाशने के लिए कहाँ है प्रकाश ?  इसका उत्तर कवि ने प्रेम का दिया कविता में दिया कि दिया तो है पर जोत नहीं. दिये को इच्छा की जोत से जलाओ. परन्तु कभी – कभी इच्छा होने पर भी हम आगे नहीं बढ़ पाते है –

मैं अकेला निकल आया अपने पथ पर आगे बढ़ने
पर यह कौन है जो सुनसान अँधेरे में मेरा पीछा कर रहा है
मैं किनारे हटा उसे अनदेखा करने पर उससे बच न पाया

वह धूल उङाता चलता है. मेरे कहे गए शब्दों को ज़ोर से दुहराता है. इस तरह मैं उसके साथ प्रभु के दरबार में नहीं जा पाऊँगा. यह पीछा करने वाला समाज है जो उसे मार्ग से विचलित कर रहा है और जिसके साथ वह प्रभु के पास भी नहीं जा सकता. घर तक यात्रा में गुरूदेव ने यही तो कहा है कि हम अपनी जीवन यात्रा में प्रभु से बहुत दूर निकल आए है. यात्री को हर द्वार पर दस्तक देनी होती है और अंत तक पहुँचने के लिए कई पङावों से गुज़रना होता है. मन बार – बार कहता है – कहाँ है प्रभु ?  और आश्वस्ति का स्वर सुनाई देता है – मैं हूँ !  हर समय प्रत्येक स्थान पर प्रभु होते है. खामोश क़दम कविता में यही तो पूछा गया –

क्या तुमने उसके खामोश क़दम नहीं सुने
वो आते, आते है, हमेशा आते है
हर पल और हर युग
हर दिन और हर रात
वो आते, आते है, हमेशा आते है

प्रभु की उपस्थिति को अंकित करने के लिए कवि ने प्रकृतिक प्रतिमानों का भी प्रयोग किया है. गुज़रती हवा कविता की पंक्तियाँ प्रस्तुत है –

पत्तियों पर नाचता सुनहरा प्रकाश
सुस्त पङे बादलों का आकाश में विचरना
यह गुज़रती हवा मेरे माथे पर ठंडक छोङती है
सुबह के प्रकाश ने भीगो दी मेरी आँखें – वही मेरे मन के लिए उसका संदेश है

कण – कण में व्याप्त है प्रभु –

वह वहाँ है जहाँ कठोर धरती खोदी जा रही है
वह वहाँ है जहाँ रास्ता बनाने वाले पत्थर तोङ रहे है
वह उनके साथ है जो धूप और बारिश में है

प्रभु का हाथ सदैव हम पर बना है इसीलिए अपने शरीर को हमेशा शुद्ध रखो. शुद्धता रचना में गुरूदेव ने माना है कि वह सत् की रोशनी को मन में बिखेरने की प्रभु की कला को जानते है इसीलिए असत् विचारों को मन से दूर रखो और फूलों को मन में बसाओ जिससे कुछ करने की इच्छा होती है और कार्यों द्वारा सुगन्ध फैलती है.  इस सत् कार्य के लिए कवि बार – बार जन्म लेना चाहता है. नन्ही बाँसुरी कविता में उसने प्रभु से प्रर्थना की है – प्रभु मुझे अंतहीन बना दो ताकि हर बार नए जीवन में छोटी सी बाँसुरी थामे मैं अमर गीतों की तान छेङ दूँ क्योंकि कोई तो चाहिए जो सबको प्रभु तक जाने का मार्ग बताए.  कवि ने अपने आपको आवारा बादल माना है –

निरूद्येश्य आकाश में घूम रहा हूँ, ओ मेरे सूरज !  सदा चमकने वाले
उसके स्पर्श से अभी मैं पिघला नहीं हूँ

यानि अभी तो हमें जीवन के खेल में रमना है फिर प्रभु की इच्छा से –

एक दिन मैं पिघलूँगा और अंधकार में विलीन हो जाऊँगा

हम सभी को चाहिए कि हमेशा प्रभु को अपने पास अनुभव करें. कमल शीर्षक कविता में –

उस दिन जब कमल खिला, आह !  मेरा मन भटक गया था
और मैं अजान रहा मेरी टोकरी खाली रही

मैनें सुगन्ध अनुभव की पर पता नहीं कि यह मेरे इतने पास मेरे मन में ही है. यह रहस्यवादी भाव बरबस कबीर की इन पंक्तियों की याद दिलाते है – कस्तूरी कुण्डल बसे मृग ढ़ूंढ़े वन माही

तभी तो कवि कहता है कि प्रभु अनुकंपा की हर वस्तु समेट लो. इस छोटे से फूल को तुरन्त तोङ लो देर होने पर यह मिट्टी में बिखर जाएगें क्योंकि हम तो प्रभु के गले का हार नहीं बन पाएगें पर इन फूलों पर तो ईश्वर का स्पर्श है. समय रहते इसे तोङ कर प्रभु चरणों में अर्पित कर दो. हमारे पास जो भी है प्रभु की देन है इसीलिए तेरा तुझको अर्पण के भाव से जियो.

मूर्ख शीर्षक रचना में कहा कि अपनी कमज़ोरियों के साथ प्रभु के द्वार पर जाओ वही तुम्हारी कमज़ोरियाँ हर लेंगे. हम जीवन की नौका में बैठे हैं जबकि हमें इससे उतरना चाहिए. वसन्त आकर बीत जाता है. पत्ते पीले होकर झङने लगते है. हम नौका में बैठे रह जाते है और दूसरी ओर से आती आवाज़ सुन नहीं पाते. मौन गीत रचना में यही स्थिति बताई है कि जो गीत हम गाने आए है वो बिन गाए रह गए. समय वाद्यों के सुर मिलाने में चला जा रहा है, शब्द जम नहीं रहे, प्रभु मिलन की इच्छा में प्रतीक्षा करते समय बीत रहा है. फिर भी हमें धैर्य नहीं छोङना है.

धैर्य शीर्षक रचना में कहा कि रात बीतेगी और पक्षियों के कलरव में प्रभु की वाणी सुनाई देगी. इसीलिए अगर रात हो भी जाए तो प्रभु पर विश्वास कर चैन से सोना चाहिए जिससे अगली सुबह तरोताज़ा होकर जागे. तात्पर्य कठिनाई में भी प्रभु पर विश्वास बना रहे. जिस तरह दिन बीत जाता है उसी तरह कठिनाई का दौर भी समाप्त हो जाता है. कठिनाई के समय की उपमा कवि ने दिवस से दी है. जिस तरह दिन भर शोरगुल रहता है उसी तरह इस दौर में भी कोलाहल रहता है. जब दिन समाप्त होता है तब हवा थक जाती है, पक्षियों के कलरव बन्द हो जाते है. नींद की चादर सबको ढ़क लेती है तब पथिक का झोला भी खाली होने लगता है उसके धूल से सने कपङे फटने लगते है तब प्रभु की छाया में उसे एक फूल की तरह जीवनदान मिलता है. जीवन पाकर उसे सफल बनाने के लिए हमें शक्ति भी मांगनी चाहिए.

मुझे शक्ति दो कविता में शक्ति पाने की याचना है जिससे हम अपनी खुशी और दुःख दोनों झेल सकें. शक्तिहीन की सेवा कर सकें और अंत में उसी को समर्पित कर सकें जिससे शक्ति पाई हैं. ….

यह एक छोटा सा प्रयास था गीतांजलि के संदेश को आप तक पहुँचाने का ….

गुरूदेव को सादर नमन !

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