स्मृति शेष – रामधारी सिंह दिनकर

आज ख्यात हिन्दी साहित्यकार रामधारी सिंह दिनकर की पुण्यतिथि है

बिहार के बेगुसराय में जन्मे दिनकर जी को वर्ष 1972 में भारत सरकार से साहित्य का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ, इसके दो वर्ष बाद 24 अप्रैल 1974 को उनका निधन हुआ। हिन्दी साहित्य में राष्ट्रीय भावनाओं की कविताओं के लिए दिनकर जी प्रसिद्ध हैं जिससे वो राष्ट्र कवि के नाम से लोकप्रिय हैं। साथ ही उनकी कविताओं में जीवन की कई छोटी-बड़ी बातों के साथ दार्शनिकता भी हैं। बच्चों के लिए भी उन्होंने कविताएँ लिखी हैं। दिनकर जी से मैं भी बचपन में ही परिचित हुई, जब मैं पांचवी कक्षा में पढ़ती थी तब पहली बार मैंने दिनकर जी की कविता पढी थी – पढ़क्कू की सूझ

एक पढ़क्कू बड़े तेज़ थे, तर्क शास्त्र पढ़ते थे, जहाँ न कोई बात, वहां भी नए  बात गढ़ते थे l
एक रोज़ वे पड़े फिक्र में समझ  नही कुछ पाए “बैल घूमता हैं कोल्हू में कैसे बिना चलाए ?”
कई दिनों तक रहे सोचते, मालिक बड़ा गज़ब हैं ? सिखा बैल को रक्खा इसने, निश्चय कोई ढब हैं l
आखिर एक रोज़ मालिक से पूछा उसने ऐसे “अजी, बिना देखे, लेते तुम जान भेद यह कैसे ?
कोल्हू का यह बैल तुम्हारा चलता या अड़ता हैं ? रहता हैं घूमता, खडा हो या पागुर करता हैं ?”
मालिक ने कहा, “अजी, इसमे क्या बात बड़ी हैं ? नहीं देखते क्या, गर्दन में घंटी एक पड़ी हैं ?
जब तक यह बजती रहती हैं, मैं न फिक्र करता हूँ, हाँ, जब बजती नही, दौड़कर तनिक पूंछ धरता हूँ”
कहा पढ़क्कू ने सुनकर “तुम रहे सदा के कोरे ! बेवकूफ !  मंतिख की बातें समझ सकोगे थोड़ी !
अगर किसी दिन बैल तुम्हारा सोच-समझ अड़ जाए, चले नहीं, बस, खडा-खडा गर्दन को खूब हिलाएl
घंटी टून – टून खूब बजेगी, तुम न पास आओगे मगर बूँद भर तेल सांझ तक भी क्या तुम पाओगे ?
मालिक थोड़ा हंसा और बोला पढ़क्कू जाओ, सीखा हैं यह ज्ञान जहाँ पर, वहीं इसे फैलाओ l
यहाँ सभी कुछ ठीक – ठाक हैं, यह केवल माया हैं, बैल हमारा नही अभी तक मंतिख पढ़ पाया हैं l

उस समय केवल इतना ही होता था कि हमें कविता याद करनी होती थी और उसमे से दो-तीन प्रश्नोत्तर भी याद करने होते थे। यह कविता हमारी कक्षा मे सबको इतनी अच्छी लगी कि बाद में भी कई दिनों तक हमें यह याद रही। मुझे हमेशा ही इसकी कुछ – कुछ पंक्तियाँ याद रही।

पहले तो कविता पढ कर मज़ा आता था और केवल शाब्दिक अर्थ ही समझते थे लेकिन जैसे -जैसे बडे होते गए इस रचना के अन्य अर्थ भी समझ में आने लगे। सबसे पहले समझ में आया मंतिख शब्द का अर्थ जो वही है जिसे कवि ने पहली पंक्ति में लिखा – तर्क शास्र

वैसे बचपन में न शब्द का अर्थ पता था न पता करने की आवश्यकता थी केवल तोते की तरह रट लिया था।

फिर एक और बात समझ में आई कि समाज में कुछ लोग दूसरो से मेहनत करवा कर खुद आराम से रहना चाहते हैं इसीलिए समाज में जानबूझ कर एक वर्ग के लोगों को अशिक्षित और अज्ञानी बना कर रखा हैं ताकि वे केवल मेहनत करते रहे। यदि सभी शिक्षित हो जाएगे तो तर्क – वितर्क करने लगेगे, बाते समझने लगेगे। तभी तो कोल्हू के बैल का मालिक पढ़क्कू से कहता है कि तुम अपना ज्ञान यहाँ मत फैलाओ, यहाँ सब ठीक है क्योंकि हमारे बैल ने अभी तक तर्क शास्त्र नहीं पढा हैं।

यहाँ एक और बात कवि ने कही है – यह केवल माया है

यानि मायाजाल में लोग उलझे हैं और जीवन जैसा हैं उसी तरह गुज़ार रहे हैं उन्हें ज्ञान का प्रकाश न दो।

आज आश्चर्य होता है कि इतनी बड़ी बात कहती रचना को बाल साहित्य में क्यों रखा गया ?

खैर … दिनकर जी की कुछ और रचनाओं पर चर्चा फिर कभी …..

हिंदी के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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