राम की शक्ति पूजा – निराला

आज हम चर्चा करते है सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी की एक काव्य रचना की – राम की शक्ति पूजा

रचनाकाल के समय भारत राजनीतिक क्षेत्र में विश्व की सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी शक्ति ब्रिटेन को ललकार रहा था। इस स्थिति में निराला जी ने अपनी संस्कृति से गौरवान्वित चरित्रों के माध्यम से शक्ति के संचय की बात कहने राम कथा का सहारा लिया। इन प्रसंगों का चित्रण किया –

राम और रावण के बीच युद्ध छिङ गया, राम स्मरण करते है जनक वाटिका में सीता के साथ प्रथम मिलन का दृश्य और इसी के साथ युद्ध में विजय प्राप्त करने का निश्चय करते है जिसमें आत्मविश्वास दृढ़ करने के लिए ताङका, सुबाहु आदि राक्षसों का स्मरण करते है जिनका वध पहले ही कर चुके है। रचना की अंतिम पंक्तियों में निराला जी ने राम की विजय के संकेत दिए है।

यह हम सब जानते है कि साहित्यकार अपने युगीन परिवेश और संस्कृति से प्रभावित रहता है जिसकी छाया सीधे या परोक्ष रूप से साहित्य में दिखाई देती है। इस रचना में बंगला संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट है। इस संस्कृति में राम को महाशक्ति दुर्गा का अनन्य भक्त माना गया है। दशहरा त्यौहार जो राम की विजय और रावण की पराजय का प्रतीक है बंगाल में दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। इस प्रभाव को आरंभ में ही रावण की विजय के लक्षणों से स्पष्ट किया है कि रावण महाशक्ति का भक्त है, इसीसे रणभूमि में अपने बाणों को व्यर्थ होते देख राम चिन्तित है –

कल लङने को हो रहा विकल वह बार – बार
असमर्थ मानता मन उद्वन्त हो हार-हार

सेनापति जाम्बवन्त ने राम को भक्ति का उत्तर भक्ति से देने की सलाह दी। राम ने महाशक्ति दुर्गा की आराधना की। अंत में माँ दुर्गा ने राम की परीक्षा भी ली, अंतिम कमल पुष्प को विलीन कर दिया तब राम फूल के स्थान पर अपने नैन अर्पित करने को तैयार हो गए, तब माँ ने प्रसन्न होकर आशिर्वाद दिया –

होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन
कह महाशक्ति राम के बदन में हुई लीन

इसमें वाल्मिकी रचित रामायण से प्रसंग लिए गए जो इस प्रकार है – अरण्यकाण्ड के 19 वें और 20 वें सर्ग में राम द्वारा राक्षसों का वध वर्णित है –

निपाती तान् प्रेष्य रणे तु राक्षसान् प्रधाविता शूर्पणखा पुन स्ततः
वर्ध च तेषां निखिलेन रक्षसां शीस सर्व भोगनी खरस्य सा ।।

इसी काण्ड से युद्ध का वर्णन आरंभ होता है जो आगे सुन्दरकाण्ड आदि में भी वर्णित है। राम की विजय का वर्णन युद्ध काण्ड में है –

ततो विनेदुः सुदृष्टा वानरा जितकाशिनः ।
वदन्तो राघव जयं रावणस्य च तद्वधम् ।।

बंगीय संस्कृति से प्रभावित निराला जी ने राष्ट्रीय भाव को प्रकट किया कि इन परिस्थितियों से जूझने के लिए भारत में नैतिक शक्ति का अब भी चयन होता है। विभिन्न राक्षसों के वध द्वारा उत्पन्न वीर भाव जन मानस के आत्मविश्वास को दृढ़ करने में सहायक है कि भारत में विभिन्न युद्धों में वीरों ने अपना शौर्य प्रदर्शित किया तब वह ब्रिटिश साम्राज्य से भी टक्कर ले सकते है।

 

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