स्मृति शेष – भारत भूषण अग्रवाल

आज हिन्दी काव्य जगत के ख्यात कवि भारत भूषण अग्रवाल का जन्म दिन है। भारत भूषण जी प्रयोगवादी कवि है। हिन्दी काव्य के क्षेत्र में तीस के दशक के मध्य में छायावादी शैली की लोकप्रियता चरम पर आने के बाद से ही कविता में अन्य प्रयोग शुरू हो गए थे. चालीस के दशक तक आते-आते कई प्रयोगवादी कवियों की रचनाएं दिखाई देने लगी थी और चालीस के दशक में एक काव्य संग्रह की योजना बनी जिसका भार लिया अज्ञेय जी ने और सामने आया सात कवियों की रचनाओं का संग्रह – तार सप्तक  …. जिसकी भूमिका में अज्ञेय जी ने स्पष्ट किया कि इस संग्रह का

” एक सिद्धांत यह था कि संग्रहित कवि सभी ऐसे होंगे जो कविता को प्रयोग का विषय मानते है. ”

और इन सात कवियों में तीसरे कवि है – भारत भूषण अग्रवाल  … जिससे भारत भूषण जी का प्रयोगवादी कवि होना प्रमाणित हो गया…

लेकिन छायावादी परम्परा की शैली पूरी तरह से छूटी नही. छायावाद का आकर्षण रहा प्रकृति द्वारा मानवीय भावों को समझना, भारत भूषण जी की यह पंक्तियाँ देखिए –

” सघन बर्फ की कडी पर्त सी

एक एक कर अमित रूढ़ियाँ
सदियों से जमती जाती है
 तह पर तह
मानव जीवन पर “
रचना ” अपने कवि से ” पढ़ कर भी यूं लगता है जैसे काव्य की सृजनात्मकता में परम्परा अब भी विद्यमान है –
” देवता बदल गए, बदली न मूर्ति ” कह कर कवि ने यही प्रमाणित किया है –
” कितनी संकुचित जीर्ण, वृद्धा हो गई आज कवि की भाषा
कितने प्रत्यावर्तन जीवन में चंचल लहरों के समान
आए, बह गए ; काल बुदबुदा सा उठा, मिटा, पर परम्परा
अभियुक्त अभी परिवर्तित हुई न परिभाषा “
किन्तु कवि को यह स्वीकार्य नही कि इस नितांत आधुनिकता की अभिव्यक्ति पारम्परिक शैली में हो –
”  हमको न ज़रुरत आज देववाणी की, हम खुद झोकेंगे
जीवन की भट्टी में भाषा, जी चाहा रूप बना लेंगे “
जब जीवन को ही मानव स्वयं गति दे रहा है, वह अपनी दिशा का स्वयं निर्माता है तब उनकी यह मान्यता उचित भी है. तभी तो कहा है –
” निज दिव्य दृष्टि से ! रे ! तेरी यह भाषा तो है मात्र मुकुर
उस दर्शन का जिसने देखा आसमान धोया नीला
नश्वरता से डर कर जिसने देखी न प्रकृति चिर गतिशील  “
स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत जब सभी सुनहरे भविष्य के स्वप्न देखते यथार्थ से दूर थे तब भी कवि वर्तमान को देखते हुए भविष्य की भयावहता को पहचान रहा था. इस स्थिति की इन काव्य पंक्तियों में लाक्षणिक अभिव्यक्ति देखिए –
” वे आँखे बंद किए सपनो में डूबे थे,
और मैं जिसका स्वर सदा दर्द से गीला रहा,
जिसके भर्राए गले से कुछ चीखे ही निकल सकी
मैं हारा बल लगाकर
आँखे खोले
यथार्थ को देख रहा था “
इस तरह भारत भूषण जी परम्परा से जुड़े प्रयोगवादी कवि है। भारत भूषण जी की रचनाओं पर कुछ और चर्चा फिर कभी …..
हिन्दी साहित्य जगत के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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