स्मृति शेष – केदारनाथ सिंह

आज हिन्दी साहित्य जगत के ख़्यात कवि केदारनाथ सिंह का जन्मदिवस है।
साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से वर्ष 2013  में सम्मानित कवि  केदारनाथ सिंह जी हिन्दी काव्य जगत में पचास के दशक में उभरने वाले प्रमुख कवियों में से एक नाम है जिन्हें पाठकों का विशाल समूह दिया अज्ञेय जी ने अपने महत्वपूर्ण संकलन  ” तीसरा सप्तक ” द्वारा। इसके सात महत्वपूर्ण कवियों में केदारनाथ सिंह जी को भी सम्मिलित किया गया जिससे उनका नाम साहित्य में भी  रेखांकित हुआ।
साहित्य में ” तीसरा सप्तक ”  एक चुनौतीपूर्ण प्रयोग था क्योंकि सप्तकों की श्रृंखला में पिछले दो सप्तकों – तार सप्तक और दूसरा सप्तक ने आधार लगभग निश्चित से कर दिए थे। इस स्थिति में भी 1959 में प्रकाशित ” तीसरा सप्तक ” के 1961 में दूसरे और 1967 में तीसरे संस्करण का प्रकाशन हर्ष का विषय है। इसे स्वयं अज्ञेय ने भी स्वीकारा है –
” तार सप्तक ” एक नई ( काव्य ) प्रवृत्ति का पैरवीकार मांगता था, इससे अधिक विशेष कुछ नहीं। ” तीसरा सप्तक ” तक पहुँचते – पहुँचते प्रवृत्ति की पैरवी अनावश्यक हो गई और कवियों की पैरवी का तो सवाल ही क्या है ?  …
भूमिका में यह कह अज्ञेय ने सातों कवियों की महत्ता सिद्ध कर दी।  इस तरह कवि केदारनाथ सिंह जी पचास के दशक में साहित्य पटल से अनेकों पाठकों तक पहुँचे। आपके पिता राजनीति में सक्रिय थे। इसी से प्रभावित प्रथम रचना का विषय  ” सुभाष की मृत्यु ” था। अज्ञेय ने केदारनाथ सिंह जी की रचनाओं के बारे में लिखा –
” सभी रचनाएं नई कविता की प्रवृत्तियों के अंतर्गत रखी जाती है तथापि आपके विचार में नई कविता दोषयुक्त है कारण यहाँ बिम्बों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त नहीं हुआ है जिसके प्रयोग पर आप बार-बार बल देते है। “
इससे स्पष्ट हो जाता है कि कवि केदारनाथ सिंह जी यथार्थ का चित्रण करते-करते स्पष्टवादी भी हो गए थे, तभी तो साहित्य के अन्य पूर्व कवियों की भांति अपने-अपने कवि कर्म अथवा युग की कविता की पैरवी नहीं की, उसे पूरे गुण-दोषों के साथ आत्मसात किया।
उनकी रचनाओं में प्रेम की अभिव्यक्ति का अपना अनोखा ढ़ंग भी है। कोमलता के विपरीत शब्दों का चयन कर भावों का कुछ इस रूप में चित्रण हुआ है  –
”  ठाठें मारता है एक नया भाव
मेरी धमनियों में
हाँ, हड्डी – हड्डी को
पसली-पसली को
नदी के अरार की तरह टूटने दो
……
अगर नहीं है मेरे स्वरों में तुम्हारे स्वर  “
यदि प्रेयसी के प्रति मन में प्रेम भाव का अंकुर न हुआ हो तो उसे जीवन व्यर्थ लगता है, किन्तु  इस प्रेम का प्रेयसी को भी स्वीकार्य होना अनिवार्य है –
” अगर बन्द है मेरी मुट्ठी में तुम्हारी नदियाँ
अगर कैद है मेरी छाती में तुम्हारे तान
तो ओ रे भाई
मुझे ज़ंग लगे लोहे की तरह टूटने दो  “
काव्य की परम्परागत प्रवृत्ति को भी बनाए रखते हुए भावों की अभिव्यक्ति में प्रकृति को भी आधार बनाया। साथ ही स्पष्ट न कह कर परोक्ष कहने की प्रवृत्ति भी निभाई। इन पंक्तियों में व्यंजकता देखिए जिसमें कहा जा रहा कि क्या नूतन वर्ष भी पिछले वर्ष की भांति समस्याओं से परिपूर्ण होगा अथवा इस वर्ष कुछ समाधान भी होंगें –
 ” चोट खाए बादलों की टूक टूक जिजीविषा
या फिर
भवन में स्वरों का चढ़ता हुआ आलाप  “
भविष्य में कुछ कर दिखाने की आकांक्षा है किन्तु वह है क्या  ?  यह कुछ निश्चित नहीं है –
 ”  एक नन्हा बीज मैं नव युग का
आह, कितना कुछ – सभी कुछ – न जाने क्या-क्या
समूचा विश्व होना चाहता हूँ
भोर से पहले तुम्हारे द्वार
तुम मुझे देखो न देखो “
अपनी रचनाओं के लिए विविधता लिए अपार शब्द भंडार जुटाया है – तत्सम शब्द है – तरू, क्षत-विक्षत, संकल्प, देशज शब्दों का भी प्रयोग किया – ठाठें मारना, उमरिया, भींज गया, पछाङ खाना, उर्दू अल्फाज़ भी लिए – मदरसों, क़िस्सों, मनहूस और टेबुल, कैफ़े जैसे अंग्रेज़ी शब्द भी है तथा चिङचिङी, वर-वर जैसे नादात्मक शब्द भी है साथ ही हरा-भरा के लिए नया शब्द भी गढ़ा है – हहरा ….  यह थी एक झलक केदारनाथ सिंह जी के काव्य की …
हिन्दी साहित्य जगत के गौरवशाली कवि को सादर नमन !

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