शुभ जन्मदिन ! मन्नू भंडारी जी

आज हिन्दी जगत की सुविख्यात कथाकार मन्नू भंडारी का जन्मदिन हैं।

आज चर्चा करते है उनकी बहुचर्चित कहानी – यही सच है .. की जिस पर बनी फिल्म रजनीगन्धा बहुत लोकप्रिय रही। वास्तव में यह कहानी, कहानी नही लगती, किसी भी लड़की के जीवन की झलक लगती है। हमारे समाज में ऎसी बहुत सी दीपाएं मिल जाएगी। नायिका दीपा को कॉलेज के दिनों में निशीथ से प्यार हो जाता है। कुछ ऐसा होता है कि सम्बन्ध टूटा सा लगता है। आगे दीपा को संजय से प्यार हो जाता है। एक इंटरव्यू के सिलसिले में दीपा दूसरे शहर आती है जहां निशीथ से मिलती हैं और वही उसे पूरा सहयोग देता है और दीपा की नियुक्ति हो जाती है। निशीथ के साथ इन पलो में दीपा का पुराना प्यार जाग उठता है जिसे बढावा मिलता है यह अनुभव कर कि शायद निशीथ इसी प्यार से अब भी बंधा है पर निशीथ की ओर से कोई सीधी प्रतिक्रया नही मिलती। दीपा निशीथ की ओर खिंचने लगती है और निशीथ और संजय की तुलना भी करने लगती है  कि निशीथ समय का पाबन्द है, उसका बहुत ख्याल रखता है जबकि संजय उससे घंटो इंतज़ार करवाता है, उससे बातचीत से अधिक ऑफिस की राजनीति पर बात करता है। इस दुविधा को लेखिका ने इस तरह कलम से उतारा –

” मन में प्रचंड तूफान !  पर फिर भी निर्विकार भाव से मैं टैक्सी में आकर बैठती हूँ फ़िर वही मौन, वही दूरी। पर जाने क्या है कि मुझे लगता है कि निशीथ मेरे बहुत निकट आ गया है, बहुत ही निकट !  बार-बार मेरा मन करता है कि क्यों नहीं निशीथ मेरा हाथ पकड़ लेता, क्यों नहीं मेरे कन्धे पर हाथ रख देता ?  मैं ज़रा भी बुरा नहीं मानूँगी, ज़रा भी नहीं !  पर वह कुछ भी नहीं करता। सोते समय रोज़ की तरह मैं आज भी संजय का ध्यान करते हुए ही सोना चाहती हूँ, पर निशीथ है कि बार-बार संजय की आकृति को हटाकर स्वयं आ खड़ा होता है।”

अपने शहर लौटने के बाद भी दीपा अपने आपको निशीथ की ओर ही आकर्षित पाती है,  मन ही मन में कहती है  –

” मुझे क्षमा कर दो संजय और लौट जाओ। तुम्हें मुझ जैसी अनेक दीपाएँ मिल जाएँगी, जो सचमुच ही तुम्हें प्रियतम की तरह प्यार करेंगी। आज एक बात अच्छी तरह जान गई हूँ कि प्रथम प्रेम ही सच्चा प्रेम होता है, बाद में किया हुआ प्रेम तो अपने को भूलने का, भरमाने का प्रयास-मात्र होता है।”

लेकिन  संजय से मिलकर दीपा को लगता है कि  उसे वास्तव में संजय से ही प्यार है। इस सच्चाई को लेखिका ने इन शब्दों में व्यक्त किया है –

अठारह वर्ष की आयु में किया हुआ प्यार भी कोई प्यार होता है भला ! निरा बचपन होता है, महज पागलपन ! उसमें आवेश रहता है पर स्थायित्व नहीं, गति रहती है पर गहराई नहीं। जिस वेग से वह आरम्भ होता है, ज़रा-सा झटका लगने पर उसी वेग से टूट भी जाता है। और उसके बाद आहों, आँसुओं और सिसकियों का एक दौर, सारी दुनिया की निस्सारता और आत्महत्या करने के अनेकानेक संकल्प और फिर एक तीखी घृणा। जैसे ही जीवन को दूसरा आधार मिल जाता है, उन सबको भूलने में एक दिन भी नहीं लगता। फिर तो वह सब ऐसी बेवकूफी लगती है, जिस पर बैठकर घंटों हँसने की तबीयत होती है। तब एकाएक ही इस बात का अहसास होता है कि ये सारे आँसू, ये सारी आहें उस प्रेमी के लिए नहीं थीं, वरन् जीवन की उस रिक्तता और शून्यता के लिए थीं, जिसने जीवन को नीरस बनाकर बोझिल कर दिया था।”

तभी तो मन्नू भण्डारी जी ने शीर्षक दिया – यही सच है … लेकिन ऐसे शीर्षक फिल्मो के लिए नही चलते और बासु चटर्जी ने लेखिका की ही इन पंक्तियों से शीर्षक लिया – रजनीगन्धा

एक बार मैंने यों ही कह दिया था कि मुझे रजनीगन्धा के फूल बड़े पसन्द हैं, तो उसने नियम ही बना लिया कि हर चौथे दिन ढेर-सारे फूल लाकर मेरे कमरे में लगा देता है। और अब तो मुझे भी ऐसी आदत हो गई है कि एक दिन भी कमरे में फूल न रहें तो न पढ़ने में मन लगता है, न सोने में। ये फूल जैसे संजय की उपस्थिति का आभास देते रहते हैं।”

मन्नू भंडारी जी को जन्मदिन की अनेको शुभकामनाएं !  हम उनके अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घ आयु की कामना करते है !

 

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