पथ के दावेदार

शरद चन्द्र ने केवल सामाजिक स्थितियों पर ही कलम नही चलाई बल्कि देश में हो रही उथल-पुथल से भी पूरी तरह परिचित रहे। इतना ही नही विदेशो की स्थितियां और वहां के इतिहास की भी उन्हें बखूबी जानकारी थी। जब देश में अंग्रेजों का राज था तब उन्हें लगता था कि स्वाधीनता के संघर्ष के लिए सबसे पहले मज़दूरों को एकत्र होना हैं। इसका परिचय हमें मिलता हैं उनके उपन्यास पथ के दावेदार में।

इस उपन्यास में लेखक ने बताया है कि   1763 में मुम्बई में सबसे पहले रूई का कारखाना खुला था। यूरोप आदि देशो की तरह यहाँ भी  मज़दूरों को संगठित होने की आवश्यकता हैं। मज़दूर क्रान्ति पर विश्व की स्थिति भी स्पष्ट हुई हैं। इस उपन्यास का एक पात्र है – रामदास जो कहता हैं –

” मैं देश के कल-कारखानों और कुली मज़दूरों के बीच ही जीवन बिताता रहा हूँ, वास्तव में इन लोगो को देखे बिना देश की वास्तविक स्थिति का ज्ञान हो ही नहीं सकता। ”

और इसी उद्येश्य से एक संस्था बनी – पथ के दावेदार … इस संस्था के प्रमुख कार्यकर्ता हैं –  सव्यसाची जो गिरीश महापात्रा और डॉक्टर के नाम से भी जाने जाते है जिनका वास्तविक नाम शैल हैं। इस संघर्ष में सव्यसाची के साथियों को फांसी भी हो चुकी है इसीसे वह भेष बदल कर घूमते हैं।

अशिक्षित मज़दूरों में जाग्रति लाने वाली  नेता सुमित्रा देवी इस संस्था की अध्यक्ष हैं जिनके बारे में लोगो का कहना हैं कि एक बंगाली महिला विश्व भ्रमण करती हुई बर्मा आई हैं, वो जितनी रूपमयी है उतनी ही शक्तिशाली भी।

लेखक का यह मानना है कि मज़दूर संगठित नही हैं तभी कोई भी उन पर आसानी से शासन करता हैं जिसका व्यापक असर समाज पर पडता हैं। समाज की जागरूकता के लिए शिक्षा के साथ-साथ मज़दूरों का संगठन भी आवश्यक हैं। नेता सुमित्रा देवी स्वयं भी मानती थी और दूसरो से भी कहती थी कि महिलाओं के लिए भी घर – परिवार, रिश्तेनातों से ऊपर देश होना चाहिए।

इन सारी गतिविधियों का स्थान बर्मा हैं। सुमित्रा नाम सव्यसाची का ही दिया हुआ है जो सुमात्रा द्वीप में तस्करी करती हुई पकड़ी गई थी, पुलिस से छुडवाने के बाद इसी द्वीप के नाम पर रखा, वास्तविक नाम रोज़ है जिससे एक गिरोह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अफीम की तस्करी करवाना चाहता था जिसे छोड कर सुमित्रा ने सव्यसाची के साथ काम करना पसंद किया।

उपन्यास में उस समय का कथानक है जब विश्व के विभिन्न देशों में अराजकता थी। भारत अंग्रेजों द्वारा शासित था।  भारत  की इस समय की स्थिति के बारे में सव्यसाची कहते हैं –

“स्वाधीनता का दावा करना, उसके लिए चेष्टा करना तो दूर की बात हैं, उसकी कामना करना, कल्पना करना भी अंग्रेजों के कानून में राजद्रोह माना गया हैं। मैं उसी अपराध का अपराधी हूँ।”

उपन्यास की एक मुख्य पात्र  भारती बंगाली माँ और अंग्रेज़ पिता की संतान होने से ईसाई माहौल में पली-बढी हैं पर दोनों की मृत्यु के बाद अनाथ होने से काम की तलाश में सुमित्रा से मिलती हैं और जुडती है इस संस्था से जिससे समाज की विकट स्थिति पर सव्यसाची  कहते हैं –

“शिल्प गया, व्यापर गया, धर्म गया, ज्ञान गया, नदियों की छाती सूख कर मरूस्थल बनती जा रही हैं। किसान को भर पेट खाने को अन्न नहीं मिलता, शिल्पकार विदेशियों के द्वार पर मज़दूरी करता हैं।  बंगाल के दस लाख नर नारी प्रति वर्ष मलेरिया से मर जाते हैं। एक युद्धपोत का मूल्य कितना होता हैं जानती हो, उनमे से केवल एक के ही खर्च से दस लाख माताओं के आसूं पोछे जा सकते हैं।”

भारती ने कहा –  ” योरोपियन सभ्यता ने क्या तुम लोगो की भलाई नहीं की ? सती दाह की प्रथा, गंगा सागर में संतान विसर्जन। ”

इस पर डॉक्टर का स्पष्टीकरण – ” तुच्छ बातो को विराट बना कर देश के प्रति देशवासियों के मन को विमुख कर दिया। ”

इस स्पष्टीकरण से लेखक ने गुलामी की जड़ों की ओर इंगित किया है और उस समय जाति के भेद भाव और छुवाछूत से खण्डो में बंटे समाज की आलोचना लेखक ने भारती  के मुख से की –

“मनुष्यता  पर मनुष्य के अत्याचार आँखे खोल कर देखने चलिए। केवल छुवाछूत फैला कर, अपने आप साधु बन कर सोचते है कि पुण्य संचय करके एक दिन स्वर्ग जांएगे, ऐसा सोचिएगा भी नहीं।”

इन विकट स्थितियों में डॉक्टर का कहना हैं – ” भारत की स्वाधीनता ही मेरा एकमात्र लक्ष्य हैं, मेरा एकमात्र साधन हैं … इसके अतिरिक्त मेरे जीवन में मेरे लिए कही भी कुछ भी नही हैं। ”

अपूर्व इस उपन्यास का एक और प्रमुख पात्र हैं जो इन सारी विसंगतियों से दूर नौकरी कर शान्ति से जीवन यापन करना चाहता हैं।  भारती अपूर्व से पथ के दावेदार संस्था का सदस्य बनने के लिए कहती हैं।  इस संस्था की गतिविधियों के बारे में भारती अपूर्व से कहती हैं –

“हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेल कर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएगे, वे बाधाओं से बच कर चल सकें। यही हमारी प्रतिज्ञा हैं।”

उपन्यास में एक बात स्पष्ट हुई है कि स्वाधीनता के संघर्ष में पहली लडाई मज़दूरों की है, मज़दूरों को संगठित होना हैं. यह  पूंजीपतियों के विरूद्ध गरीबो की आत्मरक्षा की लडाई हैं जो स्वाधीनता के संघर्ष का आधार हैं। …. सव्यसाची से कहे गए भारती के इस संवाद से लेखक ने एक बहुत बडा प्रश्न उठाया है  कि क्या  इतनी बड़ी क्रान्ति बिना रक्त बहाए संभव हैं, भारती कहती है –

” मैं भारत की मुक्ति चाहती हूँ, निष्कपट भाव से … लेकिन विश्व मानव की एकांत सदबुद्धि की धारा क्या इस प्रकार समाप्त हो गई कि इस रक्त रेखा के अतिरिक्त किसी भी मार्ग का चिन्ह भी अब दिखाई न देगा ? ”

 

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