स्मृति शेष – इलाचन्द्र जोशी

आज ख्यात हिन्दी साहित्यकार इलाचन्द्र जोशी का जन्म दिवस है

जोशी जी का हिन्दी साहित्य जगत में विशिष्ट स्थान है, हिन्दी साहित्य जगत में किसानो के माध्यम से न सिर्फ ग्रामीण जीवन बल्कि समाज में निम्न और मध्यम वर्ग की स्थिति को चित्रित करते प्रेमचन्द ने समाज में आदर्श और यथार्थ दोनों ही स्थितियों को सामने रखा पर इसी समय से धीरे-धीरे समाज में परिवर्तन आते जा रहे थे जो आज़ादी के बाद साफ़ नज़र आने लगे थे जिनमे मुख्य बात रही कि समाज में व्यक्ति अधिक महत्वपूर्ण होने लगा था। अब सामाजिक परिस्थितियों से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति की अपनी परिस्थितियाँ हो गई थी। व्यक्ति अपनी समस्याओं पर अधिक सोचने लगा था और अपनी उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहने लगा था। ऐसे में साहित्यकार भी सामाजिक परिस्थितियों की बजाय मन की स्थितियों को अपना विषय बनाने लगे और शुरूवात हुई मनोवैज्ञानिक कहानियों और उपन्यासों की और ऐसे साहित्य के शुरूवाती रचनाकारो में से एक है – इलाचंद्र जोशी

अल्मोडा में जन्मे जोशी जी की साहित्यिक यात्रा ज़ाहिर है अपनी शीतल जन्मभूमि के आकर्षण में बंध कर कविता से ही हुई पर बाद में कथा साहित्य में ही उन्हें प्रसिद्धि मिली। उनका महत्वपूर्ण उपन्यास हैं –   ज़हाज़ का पंछी …..  आत्म कथात्मक शैली में लिखे गए इस उपन्यास में व्यक्ति के मन की ग्रंथियों को जोशी जी ने शब्दों से कुछ इस तरह से खोला हैं कि पाठक पात्र की स्थिति को बहुत अच्छी तरह से समझ पाते हैं। इस उपन्यास में छोटे शहरों से महानगरों की ओर बेहतर जीवन की तलाश में आने वालो द्वारा झेली जाने वाली तकलीफों को शब्द दिए गए हैं। एक झलक देखिए –

“कई दिनों पार्को और फ़ुटपाथो पर काल को काटता या धोखा देता रहा। सुबह से लेकर आधी रात तक का समय अधिकांशतः किसी पार्क में बिता देता और आधी रात के बाद जब पार्क का चौकीदार मुझे धक्का देकर जगाता तब बाहर निकलकर या तो किले के मैदान का आश्रय पकड़ता या किसी फुटपाथ की शरण जाता। जो दो रूपए किसी जुगत से मैंने बचा रखे थे वे भी जब दो-चार दिन तक दो जून चना चिउड़ा चबाने में समाप्त हो गए, तब पेट की ओर से भी बड़ी तीखी और मार्मिक शिकायतें मन के तारों के ज़रिए मेरे मस्तिष्क में पहुँचने लगी। दृढ इच्छा शक्ति से उनका प्रतिरोध या अवज्ञा करने का प्रयत्न करता हुआ मैं निरंतर इस चेष्टा में रहा कि किसी प्रकार की कोई नौकरी मिल जाए”

महानगर में आकर एक नई जीवन शैली से परिचय होता हैं जहां किसी के सुख-दुःख से किसी को विशेष सरोकार नही, सब अपने में मगन हैं। ऐसे में अकेलापन और बढ जाता हैं क्योंकि सामने वाला आपकी ओर नहीं बढ रहा तब उसकी ओर पहल करना भी कठिन हो जाता हैं, नतीजा अपने कष्ट साझा नही हो पाते हैं और जीवन संघर्ष बढ जाता हैं। इसे लेखक ने नायक के मन के द्वंद्व से कुछ यूं बताया हैं –

“प्रत्येक बार मैं सोचता कि अगले व्यक्ति के आगे अपनी व्यथा की करूण कथा अवश्य प्रकट करूंगा पर हर बार ज़बान पर जैसे ताला लग जाता। मेरे मुंह से जो बात निकल नहीं पाती थी उसका एक कारण तो स्पष्ट ही मेरे भीतर युगों-युगों से अवरूद्ध सांस्कृतिक संस्कार था।”

बेहतर जीवन की तलाश में जीवन स्तर और कम ही होता लगता हैं। नायक को काम नही मिलता जिससे हर ओर से अभाव आ घेरते हैं तिस पर न रहने की जगह और न कोई संगी साथी का होना, ऐसे में वह भटकता रहता हैं। यहाँ तक की लोग उसे चोर और गुण्डा भी समझने लगते हैं। ऐसे में उसका मानसिक द्वंद्व और बढ जाता हैं, वह सोचने लगता हैं –

“मेरे बचपन के उन सुनहले स्वप्नों के पूर्णतया कुचले जाने और घनिष्ठ से घनिष्ठ व्यक्तियों से भी असहानुभूति धोखा और विशवासघात पाने पर भी मैं न तो कभी अपनी स्वभावगत ईमानदारी के लिए पछताया और न मनुष्य पर से मेरा विश्वास कभी हटा।”

इस तरह एक बार अपनी जडो से कट कर वह भटकता ही रह जाता है, पर कब तक, बिलकुल ज़हाज़ के उस पंछी की तरह जो भटकने के बाद उसी ज़हाज़ पर आ टिकता हैं। एक व्यक्ति के संघर्ष में सामाजिक समस्याओं के बजाए खुद उसके मन के द्वंद्व को जानना अधिक रूचिकर लगा। हालांकि कोई समाधान नही फिर भी मन का विश्लेशण शब्दों में बांधना सबके बस की बात नही …

इलाचंद्र जोशी की अन्य रचनाओं पर चर्चा फिर कभी ….

हिन्दी के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

 

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