स्मृति शेष – भगवतीचरण वर्मा

“इक्‍कीस दिन के पाठ के इक्‍कीस रुपए और इक्‍कीस दिन तक दोनों बखत पाँच-पाँच ब्राह्मणों को भोजन करवाना पड़ेगा,”

कुछ रुककर पंडित परमसुख ने कहा – “सो इसकी चिंता न करो, मैं अकेले दोनों समय भोजन कर लूँगा और मेरे अकेले भोजन करने से पाँच ब्राह्मण के भोजन का फल मिल जाएगा।”

यह तो पंडितजी ठीक कहते हैं, पंडितजी की तोंद तो देखो!” मिसरानी ने मुस्‍कुराते हुए पंडितजी पर व्‍यंग्‍य किया।

“अच्‍छा तो फिर प्रायश्चित का प्रबंध करवाओ, रामू की माँ ग्‍यारह तोला सोना निकालो, मैं उसकी बिल्‍ली बनवा लाऊँ – दो घंटे में मैं बनवाकर लौटूँगा, तब तक सब पूजा का प्रबंध कर रखो – और देखो पूजा के लिए…”

पंडितजी की बात खतम भी न हुई थी कि महरी हाँफती हुई कमरे में घुस आई और सब लोग चौंक उठे। रामू की माँ ने घबराकर कहा –

“अरी क्‍या हुआ री?” महरी ने लड़खड़ाते स्‍वर में कहा – “माँजी, बिल्‍ली तो उठकर भाग गई!”

प्रायश्चित – कहानी का अंश है यह जिसके रचनाकार है भगवतीचरण वर्मा  जिनकी आज पुण्यतिथि है।

यह रचना धर्मभीरू समाज और धर्म की आङ में श्रद्धालुओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का अंदाज़ा लगा कर उन्हें लूटने वाले पंडो पर व्यंग्य करती है। भगवती बाबू ने इतनी रोचक शैली में लिखा है कि हम मुस्कुराए बिना नहीं रह सकते।

अन्य गंभीर रचनाओं के साथ यह हास्य-व्यंग्य रचना  भगवती बाबू को समाज की नब्ज़ पहचानने वाले सशक्त लेखक के रूप में उभारती है।  इस रचना को कुछ शिक्षण संस्थानों ने स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल किया है।

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

 

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1 टिप्पणी »

  1. बिल्ली गयी भाग, अब जुगाडू पंडत दूसरे जुगाड में लगेगा।

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