सिद्धार्थ – अनूप शर्मा

बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर आज हम चर्चा करते है अनूप शर्मा जी के महाकाव्य सिद्धार्थ पर

बुद्ध के संपूर्ण जीवन चरित्र पर महाकाव्य   ” सिद्धार्थ ”  की रचना की अनूप शर्मा जी ने। साहित्य जगत में कुछ ऐसे कवि भी हुए है जिनकी रचनाएं प्रकाश में नहीं आ पाई। छायावादी युग के एक ऐसे ही कवि है – अनूप शर्मा

पूरी कथा विभिन्न सर्गों में इस तरह है – सिद्धार्थ की जन्म स्थली कपिलवस्तु को पहले सर्ग शुभ स्वप्न में हिमालय के पास स्थित बताया –

” गिरि हिमालय के उपकूल में कपिलवस्तु पुरी अति रम्य थी। ”

यहीं राजा शुद्धोदन व माया के पुत्र सिद्धार्थ हुए जिनके जन्म का वर्णन भाग्योदय सर्ग में इस तरह से –

” धन्यामही में शक राजधानी माया स – शुद्धोदन धन्य धन्या ”

तीसरे सर्ग उन्मेष में बाल चरित्र वर्णन तथा यज्ञोपवीत उत्सव पश्चात गुरू गृह प्रवेश का चित्रण है। शस्त्र क्रिया का शिक्षण तथा सिद्धार्थ की निपुणता को दर्शाया है। इन तीन सर्गों की तरह अनुकम्पा सर्ग इतिहास सम्मत नहीं है। इस में बताया कि इस तरह आराम से जीवन व्यतीत करते हुए कुमार एक बार वन की ओर गए जहां घायल हंस को देखा –

” कुमार दौङे सुन हंस की व्यथा
उगा दया भाव दया निधान के
निकल निराच तुरन्त पक्ष से
लगा गले से पुचकारने लगे

यहीं से सिद्धार्थ के शान्त जीवन में चिन्ता रूपी लहरें हिलोरे लेने लगी। तभी उन्होने देखा –

” किसान प्रस्वेद प्रपूर्ण देह था ”

फिर तुरन्त ही –

” विहंग जो सम्मुख कीट खा रहा
कभी बनेगा वह भक्ष्य श्भेन का
रहस्य कैसा विधि का विचित्र है
द्वितीय का जीवन मृत्यु एक की ”

इतिहासकारों ने विवाह पूर्व सिद्धार्थ के जीवन को सुखी बताया है जबकि कवि अनूप शर्मा जी ने इस यात्रा को जीवन में मोङ देने वाली बताया। अगले सर्ग अवरोध में चिन्ता देख पिता शुद्धोदन ने वसन्तोत्सव की योजना की और यशोधरा पर कुमार की आसक्ति दर्शायी लेकिन ऐसा संकेत भी इतिहास में नहीं है। अगले सर्ग संयोग में शस्त्र स्पर्धा में सिद्धार्थ का विजयी होना तथा यशोधरा से विवाह इतिहास सम्मत है –

” योद्धाओं में अमर सुत या नागदत्तादिकों में
चापों में या निश्चित असिमें या ध्यारूढ़ता में
एकाकी है सुभट गण में श्रेष्ठ सिद्धार्थ योद्धा
ब्याहा जाना उचित इनका सुप्राबुद्धात्मजा से ”

विद्या के साथ सिद्धार्थ अन्य कलाओं में भी निपुण थे तथा पांच सौ शाक्यों को प्रतियोगिता में पराजित करने के बाद ही यशोधरा से परिणय सूत्र में बँध पाए थे। इसके बाद सर्ग राग में नव दम्पत्ति के ऐश्वर्यपूर्ण जीवन का चित्रण है –

” शक महीपति राजकुमार के
सदृश और न आज कुमार है
सुखद सब विवाहित मौलिपें
विलसति लसति सुकुमारता ”

इसी वैभवपूर्ण जीवन में सिद्धार्थ को ग्राम विहार की इच्छा हुई जिसका उल्लेख अभिज्ञान सर्ग में है जिसके आगे चिन्तना सर्ग में कुमार के स्वागत में सुसज्जित ग्राम और यात्रा का वर्णन है। राह में वृद्ध को देखकर कुमार ने सारथी से पूछा –

” मनुज सी कर आकृति सारथे
विकट जीव खङा यह कौन है
विकृत दीन मलिन अधीन जो
समय दीर्ण विलास विशीर्ण है ”

कुछ समय पश्चात सिद्धार्थ ने पुनः ग्राम देखने की इच्छा व्यक्त की।  सर्ग भावी में राजा शुद्धोदन का स्वप्न है जो सिद्धार्थ के सन्यासी जीवन की ओर इंगित करता है जिसका स्पष्ट उल्लेख इतिहास में नहीं है।

सर्ग अभिनिवेदन में कुमार की पुनः ग्राम यात्रा है। वृद्ध, रोगी तथा मृतक को देख उन्होनें सारथी से मनुष्य के जन्म मरण की कथा सुनी और कुमार ने मन में निश्चय किया –

” आया हूँ मैं विपत्ति हरने विश्व का ताप खोने
देखूँ कैसे विफल बनती प्रार्थना प्रार्थियों की
शर्वाणी जो जगत सुखदा मंगलमोदिनी है
कल्याणी हे अमर जननि है न कैसे सुनेगी ”

महाभिनिष्क्रमण सर्ग में सिद्धार्थ के इस निश्चय को जब राजा ने सारथी से सुना तब उन्हें बन्दी रूप में रखना ही उचित समझा। तभी यशोधरा ने तीन स्वप्न देखे जिसका विवरण सिद्धार्थ को अपने निश्चय की ओर इंगित करता पाया और सिद्धार्थ ने निश्चय किया –

” तजूँगा मैं सोते अति सुखद गर्भस्थ शिशु को ”

और निद्रा में लीन यशोधरा को गर्भावस्था में ही छोङ कर सिद्धार्थ सत्य की खोज में निकल पङे। जबकि इतिहास कहता है कि जिस समय गौतम घर छोङने का निश्चय कर चुके थे उसी समय उन्हें पुत्र जन्म की सूचना मिली और गौतम के मुख से निकला राहुल ( बंधन ) जो बालक का नाम पङ गया। संभव है महाकाव्यकार ने यशोधरा की विरहावस्था को प्रदीप्त करने के लिए कल्पना प्रसून खिलाया। आगे व्यथा सर्ग में कुमार के गृहत्याग से यशोधरा, राजा, प्रजा की दुःखावस्था का वर्णन है। आगे यशोधरा सर्ग छोङ कर अन्य सर्गों में वर्णन ठीक वैसे ही है जैसे इतिहास में बताया गया है। संबोध सर्ग में भिक्षु रूप में यात्रा जिसके बाद घोर तपस्या फिर बोधि द्रुम की ओर प्रयाण,  संदेश सर्ग में काशी की ओर प्रयाण कर धर्म प्रचार करना तथा राजा बिम्बिसार को उपदेश देना,  यशोधरा सर्ग में यशोधरा की विरह अवस्था का चित्रण है। यह महाकाव्य की परम्परा के अनुसार अपेक्षित है। यहाँ कवि की कल्पना है। दर्शन सर्ग में जन्मस्थली कपिलवस्तु में बुद्ध का आवागमन चित्रित किया है। अंतिम सर्ग निर्वाण में कपिलवस्तु में उपदेश देने के उपरान्त विदा लेकर पैंतीस वर्षों का पर्यटन तथा कुशिग्राम में प्रवेश कर अंतिम उपदेश के बाद महानिर्वाण दर्याशा गया है। अतएव इतिहास पर आधारित यह महाकाव्य अपने उपवन में कुछ कल्पना प्रसून भी समेटे हुए है जो निःसंदेह एक महाकाव्य के लिए आवश्यक है।

अनूप शर्मा जी की केवल इस एक ही रचना से मैं परिचित हूँ …. कौई और रचना मिलने पर यहाँ प्रस्तुत करूँगी ….

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