मीरा

होली और जन्माष्टमी के अवसर पर बरबस मीरा की याद हो आती है। वास्तव में जब भी कृष्ण का नाम आता है, राधा और मीरा के नाम साथ ही आते है। इस तरह बचपन से ही मीरा से परिचय हो जता है।

स्कूल के पाठ्यक्रम में भी मीरा की रचनाएं शामिल होती रही। मैंने पांचवी कक्षा में पहली बार मीरा को पढा –

मन रे परसि हरि के चरण।

छठी कक्षा से संगीत की शिक्षा आरम्भ हुई और मीरा के कई भजन सीखने का अवसर मिला। साथ ही पाठ्यक्रम में भी कुछ पद पढे। एम ए में भक्ति साहित्य का अध्ययन करते हुए विभिन्न चर्चाओं, व्याख्यानों द्वारा मीरा के बारे में अधिक जानने का अवसर मिला। एक चर्चा यह भी रही कि मूल रूप से मीरा कृष्ण की भक्तिन है और उनके पद उनकी भक्ति को व्यक्त करते है अर्थात उनकी भावनाएं शब्द बन कर निकल पड़ती है, इस तरह मीरा साहित्य की कवियित्री कैसे हुई, वो तो भक्तिन ही है।

कृष्ण प्रेम में पगी मीराबाई ने कृष्ण के प्रति जो कुछ भी अनुभव किया उसे शब्दों में ढाला जिससे उन रचनाओं में स्वाभाविकता रही। भक्ति रस में डूबी होने से एकतारा लेकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करती रही जिससे उनकी रचनाएं लयबद्ध हो गई। संतो के साथ मंदिर-मंदिर घूमती मीराबाई के ये पद दूसरे भी गाने लगे। अपने व्यक्तिगत जीवन की त्रासदी से मीरा को वैसे भी लोग जानने लगे थे। उदयपुर के राजघराने की बहू मीरा गृहस्थ्य धर्म न निभा पाने के कारण घर छोड चुकी थी। इस तरह राजघराना छोडना और मंदिरों में भक्ति गीत गाना मीराबाई की लोकप्रियता को बढाता गया। उनके रचे पद भी दूर – दूर तक गाए जाने लगे, पदों की संख्या भी बढती गई, ऐसे में स्वाभाविक है कि ये पद काव्य संसार का अंग बन साहित्य जगत में शामिल होते।

चूंकि मीरा की बोली बृज रही जिससे ये पद भी बृज बोली में ही रचे गए। साहित्य में स्थान पा कर इन पदों की बोली बृज भी भाषा का महत्त्व पाने लगी। यहाँ हम एक बात बता दे कृष्ण भक्त सूरदास की बोली भी बृज ही रही और उनके पदों की लोकप्रियता और विपुलता बङा कारण रही बृज को बोली से भाषा का स्थान दिलाने में।

एक चर्चा मीरा की भक्ति भावना पर भी होती रही। भक्ति जगत में कबीर की तरह निर्गुण निराकार के विपरीत मीरा ने सगुण भक्ति की और कृष्ण की आराधना की। कृष्ण को अपना पति माना और इस रूप में भक्ति करना कठिन है। साधारणतः भक्त अपने आपको अपने आराध्य के सेवक मानते है और प्रभु का गुणगान करते है लेकिन प्रभु को पति के रूप में मानना और विरह के पद गाना कठिन है। वास्तव में बहुत कठिन रही मीरा की भक्ति।

यूं तो मीरा का अध्ययन बाद में किया पर हमेशा से ही हम रेडियो से मीरा भजन सुनते रहे, कुछ फ़िल्मी गीतों के और कुछ भक्ति गीतों के कार्यक्रम में। मीरा भजन सबसे अधिक पसंद किए गए सुविख्यात गायिका जुतिका राय के स्वर में। मीरा पर सबसे पहले फिल्म बनी तमिल भाषा में जिसका नाम भी मीरा ही रहां। दोनों ही भाषाओं की फिल्मो में कर्नाटक शास्त्रीय संगीत जगत की सुविख्यात गायिका एम एस सुब्बालक्ष्मी ने मीरा का अभिनय किया और मीरा भजन गाए – हिंदी और तमिल दोनों ही भाषाओं में जिसके लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला और मीरा की कहानी भी जन साधारण तक पहुंची। बाद के समय में हेमामालिनी को लेकर गुलज़ार ने भी फिल्म बनाई – मीरा। यह फिल्म भी पसंद की गई। इस समय मीरा भजनों के लिए एक और गायिका उभर कर आई – वाणी जयराम जिनके मधुर कंठ ने मीरा के भजनों को नई पीढ़ी में भी लोकप्रिय बनाया। इस दौरान कई फिल्मो में भक्ति गीत की तरह मीरा भजन रखे गए और ऐसे कई भजनों को लता मंगेशकर ने अपना स्वर दिया। भक्ति गीत के साथ कुछ फिल्मो में सामाजिक परिस्थितियों को उभारने के लिए भी मीरा भजन का सुन्दर प्रयोग किया गया।
हिन्दी साहित्य जगत की गौरवशाली भक्त कवियित्री को सादर नमन !

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