राजकुमार कुंभज – जन्मदिन मुबारक !

आज आधुनिक हिन्दी साहित्य के जाने-माने कवि राजकुमार कुंभज का जन्मदिन है।

न केवल साहित्य जगत में अपितु जीवन में भी राजकुमार कुंभज आधुनिक ही रहे। जीवन के प्रति विचार इतने आधुनिक है कि 1977 में पारम्परिक मान्यताओं एवं पारम्परिक रूढ़ियों को तोङते हुए स्वतंत्रता पूर्वक प्रेमविवाह किया। साहित्य के क्षेत्र में कवि को स्वयं यह स्मरण नहीं कि पहली रचना कब की। सामयिक विषयों पर निरन्तर उनकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और संकलनों में प्रकाशित होती रही।  यहां 1979 में प्रकाशित चौथा सप्तक में संकलित एक काव्य रचना की चर्चा करते है – पानी नहीं मिलेगा

जल के अभाव में जीवन दुष्कर है। जीवन की स्थूल आवश्यकताएं भी जल की ही भांति महत्वपूर्ण है। आधुनिक समाज में जीवन की स्थूल आवश्यकताओं की व्यवस्था कठिन हो जाती है –

”  पानी नहीं मिलेगा
तो तुम क्या कर लोगे ? तुम्हारी ये ताक़त नहीं रही
जब कि पाताल तक पहुँच सको नींद पर
हरकत करो कोई और जाग पङो  “अंतिम दो पंक्तियां मानव की निष्क्रियता की ओर संकेत है कि जागरूक न होने का अर्थ है कि अब वह चुस्त नहीं रहा कि अपनी आवश्यकताओं के लिए सदैव सक्रिय रह सकें। किन्तु यह सक्रियता उसके लिए आवश्यक है क्योंकि -” अंगारे नहीं खा सकोगे  ”

अर्थात् कठिन समय को नहीं झेल पाओगे जिसमें –

” नहीं बन सकोगे कबूतर तक भी
हो जाओगे शायद मछली
और कि तङपोगे  ”

कबूतर से तात्पर्य स्वच्छन्दता से है जो तभी मिलती है जब जीवन की स्थूल आवश्यकताएं पूर्ण हो जाए अन्यथा उसकी दशा वही हो जाएगी जो जल के अभाव में मछली की होती है। आगे इसकी व्याख्या इस तरह की है –

” पानी नहीं मिलेगा
तो भविष्य का वृक्ष नहीं होगा
वर्तमान का दुःख नहीं होगा
नहीं होगा भूत का अँधेरा
दरअसल कि सब क़यावद में
और खामोश  ”

यह चुप्पी आधुनिक मानव की उस दशा की ओर इंगित करती है जहां उसका जीवन के प्रति लगाव नहीं रह गया। न अब वह अतीत से कोई प्रेरणा ग्रहण करता है और न ही भविष्य के लिए कोई योजना बनाता है। उसकी निष्क्रियता यहां तक बढ़ गई है कि वह वर्तमान दुःख भी अनुभव नहीं कर पा रहा है। किन्तु जीवन के लिए आरंभिक सुविधाएं उसके लिए अत्यंत ही आवश्यक है अन्यथा उसका जीवन बोझ बन जाएगा और उस बोझ को ढ़ोते हुए वह भीतर से खोखला हो जाएगा और उसे इसका अनुभव भी नहीं होगा –

” पानी नहीं मिलेगा
तो यह रास्ता पीठ पर चढ़ेगा
तुम हो जाओगे खाली
आकाश धरती
जादू की गिरफ्त में
और बेखबर दिन ”

यह जटिल परिस्थितियां इन्द्र बनी जल के अभाव में और जून की धूप में आधुनिक मानव को मृत्यु की प्रतीक्षा में रत देखना चाहती है –

” कतई नहीं मिलेगा पानी
आदेश है इन्द्र का तुम्हारे लिए
कि कुछ दिन ऐसे ही रह कर दिखाओ
पत्थर और जून की धूप नापो
लगभग मौत आने तक  ”

इन्द्र जटिल परिस्थितियों का प्रतीक है और पत्थर व जून की धूप जीवन के अभावों का प्रतीक है और यही आधुनिक मानव का यथार्थ चित्रण है।

यहां चौथा सप्तक में संकलित एक और काव्य रचना की चर्चा करते है – शब्द। …. इसमें प्रकृति के क्रियाकलापों की चर्चा देखिए

कवि कहता है कि यदि वायु का प्रवाह धीरे-धीरे भी हो तब भी पेङों की डाली पर बैठे पक्षी कांपने लगते है। सूर्य भी हवा के झोंकों से कभी डाली के पीछे छिपता है कभी दृष्टिगोचर होता है अर्थात् वह भी कांपता हुआ प्रतीत होता है –

”  हवा की मुस्कुराहट पर कांपते है पक्षी
पेङों पर सूर्य  ”

इस समय जंगल में इकट्ठा होती है मृत मछलियां जो स्मृतियों का प्रतीक है और जंगल मन का –

”  और जंगल में इकट्ठा होती है
स्मृतियों की मृतक मछलियां  “सूर्य की उपस्थिति में जब बयार का वेग हो तो लगता है प्रत्येक वस्तु की बनने वाली छाया उसकी गिरफ्त में है। अभिप्राय की हृटय में स्मृतियां अनुभूति की लहर उद्वेलित होने पर एकत्रित होती है जिनसे भावनाएं कांपने लगती है यानि हृदय से बाहर निकलने का प्रयास करती है किन्तु यह सभी परछाइयों के रूप में हृदय में ही गिरफ्तार है जबकि शब्द मुक्त हो मुखरित हो जाते है। लाख शब्दों से मन की बात कहते जाए फिर भी मन कभी खाली नहीं हो पाता है, सारी अनुभूतियां ज्यों की त्यों संजोई रह जाती है, मन की गिरफ्त से बाहर नहीं आ पाती ……राजकुमार कुम्भज की कुछ और रचनाओं पर चर्चा फिर कभी ….

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: