स्मृति शेष – शमशेर बहादुर सिंह

आज हिन्दी साहित्य के प्रगतिशील कवि शमशेर बहादुर सिंह का जन्मदिन है। शमशेर बहादुर सिंह का शैशव काल से ही पारिवारिक वातावरण साहित्यिक व कलाप्रिय होने के कारण कविता में परम्परावादिता कुछ अधिक और स्वयं की स्पष्टवादिता कम है.  इक़बाल, रविन्द्रनाथ टैगोर, शैली के साथ-साथ महादेवी, पंत का प्रभाव व आगे चलकर दूसरी बार साहित्य में क़दम रखने यानि कवि बनने पर बच्चन से प्रभावित शमशेर जी से यह आशा करना समीचीन है कि साहित्य में दो वर्गों के मध्य विभाजित रेखा नही खीची जा सकती। यह सब स्पष्ट होता है उनकी रचनाओं से।  उनकी कविताओं में से एक है कवियित्री सुभद्राकुमारी चौहान के निधन पर लिखी रचना, शीर्षक भी उसी दिन का दिया है  –  वसंत पंचमी की शाम  ( 1948 )  –
” डूब जाती है, कहीं
जीवन में, वह
सरल शक्ति
( म्यान सूनी है
आज )  …. क्यों
मृत्यु बन आई
आसक्ति आज ”
म्यान सूनी कह कर कवि ने उनकी सुप्रसिद्ध रचना ” झांसी की रानी की ओर इंगित किया है. रचनाओं में प्रकृति से लिए गए प्रतीक भी देखे जा सकते है जो छायावादी प्रभाव स्पष्ट करते है –
” हे वसन्तवती,
द्वार के नभ पर तुम्हारे
झुका जो हेमंत का शिर-भार,
लूट लो उसको ”
वहां वसन्तवती नायिका है, हेमंत नायक है, लूट लो उसको का अर्थ है समर्पण प्राप्त कर लो.  इसी क्रम में प्रकृति का मानवीकरण देखिए –
” संध्या की पलकें झुकी
फैली अलके भारी ”
यह शाम के समाप्त होने और अंधकार फैलने का चित्र है. और सपाट शब्दों में ढली पंक्तियाँ देखिए –
” चुका भी हूँ मैं नही
कहाँ किया मैंने प्रेम
अभी ”
शमशेर बहादुर सिंह जी की रचनाओं पर कुछ और चर्चा फिर कभी …..
गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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