उषा प्रियंवदा जी – जन्मदिन मुबारक !

‘ कृष्णा मौसी को सुषमा से बड़ा प्यार था। वह कानपुर आई तो सुषमा की गरमी की छुट्टियाँ थीं। मौसी हर रोज़ एक नई सुंदर साड़ी निकालकर पहनतीं। सुषमा आई तो वह झट बोलीं—

‘‘वायल दे दो तो कढ़वा दूँगी। ऐसी बढ़िया कढ़ेगी कि तुम्हारी सहेलियाँ भी देखती रह जाएँगी।’’

अम्माँ ने अपनी राय दी, ‘‘एक नीरू के लिए भी कढ़वा देना। साल-छः महीने में उसकी शादी होगी तो काम आएगी।’’

कृष्णा मौसी ने आश्चर्य से कहा, ‘‘तो क्या दीदी, सुषमा को कुँवारी रखोगी ? इसका ब्याह नहीं करोगी जो अभी से नीरू के लिए दहेज जोड़ने लगीं।’’

अम्माँ ने बड़े मजे से उत्तर दिया, ‘‘तुम जानों कृष्णा, सुषमा की शादी तो अब हमारे बस की बात रही नहीं। इतना पढ़-लिख गई, अच्छी नौकरी है और अब तो, क्या कहने हैं, होस्टल में वार्डन भी बनने वाली है। बँगला और चपरासी अलग से मिलेगा, बताओ, इसके जोड़ का लड़का मिलना तो मुश्किल ही है। तुम्हारे जीजा तो कहते हैं कि लड़की सयानी है, जिससे मन मिले, उसी से कर ले। हम खुशी-खुशी शादी में शामिल हो जाएँगे।’’

‘‘अरे जाओ दीदी, जब लड़की की उम्र थी तब तो आज़ादी दी नहीं। अब वह कहाँ ढूँढने जाएगी। लड़कियाँ सभी की होती हैं, शादियाँ भी सभी करते हैं। तुम्हारी तरह हाथ-पर-हाथ रखकर बैठने वाला कोई नहीं देखा।’’

छोटी बहन से फटकार सुन अम्मा अप्रतिभ हो आईं। उनसे कोई उत्तर न बन पड़ा। सुषमा को उनका सूखा-सा चेहरा देख बड़ी दया लगी, वह बात बदलती हुई बोली,

‘‘मौसी शाम को चलकर वायल ले आएँगे, दो मैं ले लूँगी, एक साड़ी नीरू के लिए बनवा देंगे।’’

पचपन खम्बे लाल दीवारें – उपन्यास का अंश है यह जिसकी लेखिका है – उषा प्रियंवदा – जिनका आज जन्मदिन है।

यह रचना पढ़ कर ऐसा नही लगता कि कोई किताब पढ़ रहे है बल्कि ऐसा लगता है जैसे हम अपने आस-पास के किसी घर परिवार के बारे में जान रहे है।  नौकरी पेशा लड़कियां अपने परिवार की ज़िम्मेदारी भी संभालती है और खुद अपनी ज़िंदगी के फैसले भी ले लेती है। एक तरह से इसे हम लड़कियों का शोषण मान सकते है तो दूसरी ओर हमें यह रचना लड़का और लड़की में वास्तविक समानता का बोध कराती है.

इस उपन्यास पर धारावाहिक बना कर दूरदर्शन से प्रसारित भी किया गया था।  

हम उषा प्रियंवदा जी के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करते है।

जन्मदिन की अनेको शुभकामनाएं !

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