जयशंकर प्रसाद – स्मृति शेष

गुरू नानक जयन्ति के अवसर पर आज हम चर्चा करते है जयशंकर प्रसाद जी की एक काव्य रचना की – शेरसिंह का शस्त्र समर्पण …. हालांकि इस रचना का सीधा संबंध गुरूनानक जी से नहीं है

जयशंकर प्रसाद जी छायावादी युग के प्रमुख कवि है जिनका रचनाकाल तीस के दशक में अपने चरम पर रहा। इसी समय देश में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष चल रहा था।  इस स्थिति से प्रसाद जी का कवि ह्रदय अछूता नही था। उन्हें लग रहा था कि हमारे देश में वीरता और स्वाभिमान के साथ जो द्वेष भावना निहित है वही आपसी फूट के रूप में उभर कर विदेशियों को शासन करने का खुला निमंत्रण देती है। इसी पर आधारित है ” लहर ” में संग्रहित रचना – शेरसिंह का शस्त्र समर्पण

इसमें सन् 1843 के पंजाब का वर्णन है। केवल एक ही ऐतिहासिक घटना से तत्कालीन पंजाब की राजनीतिक स्थिति को आंका जा सकता है। यह घटना सेनापति लाल सिंह के षडयंत्र पर आधारित है जिसमें शेरसिंह के शस्त्र समर्पण और मृत्यु का उल्लेख है। इसी घटना को आधार बना कर कवि ने सिक्खों को –

” आज के पराजित जो विजयी थे कल ही ” 

कहकर राजा रणजीत सिंह की प्रशंसा की। 1839 में स्वर्ग सिधारे राजा रणजीत सिंह का उल्लेख शेर के रूप में करते हुए इतिहास कहता है कि अंग्रेज़ों द्वारा सिंध को आधीन करने के बाद पंजाब का वह भाग शेष रह गया था जिसकी शक्ति का निर्माण पंजाब के शेर राजा रणजीत सिंह ने किया था। राजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद उनका ज्येष्ठ पुत्र खड्गसिंह गद्दी पर बैठा लेकिन एक वर्ष बाद ही परलोक सिधार गया। इसके तुरन्त बाद एक दुर्घटना में इनके पुत्र नौनिहाल सिंह की भी मृत्यु हो गई। तब नौनिहाल सिंह की माता चाँद कौर राजकाज देखने लगी। महिला के हाथों शासन की बागडोर देखकर स्वयं राजा के मंत्री ध्यानसिंह और उसके नायब शेरसिंह ने, जिसे इतिहासकारों नें राजा रणजीत सिंह का दत्तक बताया है, आँखें फेर ली। अधिक से अधिक सैनिकों को अपने पक्ष में कर विधवा रानी के स्थान पर शेरसिंह 1841 में सिंहासन पर बैठा। चाँद कौर जागीर लेकर अलग हो गई जिसके संबंध में प्रसाद जी ने लिखा है – 

” एक पुत्र वत्सला दुराशामयी विधवा, 
प्रकट पुकार उठी प्राण भरी पीड़ा से ” 

इस आपसी फूट के प्रति त्रस्त मुख से निकल पङा –

” आह विजयी हो तुम 
और है पराजित हम, 
तुम तो कहोगे, इतिहास भी कहेगा यही, 
किन्तु यह विजय प्रशंसा भरी मन की, 
एक छलना है ” 

जन्मभूमि का यह अपमान अंग्रेज़ों के लिए सुनहरा अवसर था। अपने कुचक्र द्वारा षडयंत्र रचाकर 1843 में शेरसिंह, उसके पुत्र और वज़ीर ध्यानसिंह को मौत के घाट उतारा गया। उसके पश्चात रणजीत सिंह जी की छोटी रानी जिन्दा के पांच वर्षीय पुत्र दिलीप सिंह का राजतिलक हुआ तथा ध्यानसिंह का पुत्र हरिसिंह वज़ीर बना जिसे 1844 में रानी के भाई जवाहर सिंह ने गोली मार दी और लाल सिंह से मिलकर शासक बन गया। प्रसाद जी ने भी इसी को आधार बना लाल सिंह के सम्मुख सिंक्खों के शस्त्र समर्पण को चित्रित किया है – 

” लालसिंह ! जीवित कलुष पंचनद का, 
देख दिए देता है, 
सिंहों का समूह नख दन्त आज अपना ” 

अंग्रेज़ों के कुचक्र और लाल सिंह के सम्मुख शस्त्र समर्पण की जानकारी नन्द कुमार देव शर्मा की पुस्तक सिक्खों का उत्थान और पतन में भी मिलती है –

” अनुपम वीरता, अलौकिक साहस, अद् भुत धैर्य का परिचय देकर शेरसिंह ने सोलह हज़ार सिक्खों के साथ आत्म समर्पण कर दिया ”  

इसके बाद प्रसाद जी ने सतलज तट के उस युद्ध का भी वर्णन किया है जिसके फलस्वरूप पंजाब पर अंग्रेज़ों का आधिपत्य हो गया। इस प्रभुता का कारण आपसी मतभेद है – 

” छल में विलीन बल
बल में निषाद था
विकल – विलास का । 
भवन के हाथों से स्वतंत्रता को छीनकर, 
खेलता था यौवन विलासी मत पंचनद ” 

आपसी छल में ही स्वतंत्रता प्राप्ति का बल विलीन हो जाता है जिसमें शासकों की विलासप्रियता विष के रूप में निहित होती है। किन्तु फिर भी स्वाभिमानी सिक्ख प्रसाद जी के काव्य शब्दों में – 

” स्वत्व रक्षा में प्रबुद्ध थे, जीना जानते थे ” 

और जब तक वे जीवित रहे वीरता से ओत-प्रोत रहे तथा स्वतंत्रता को प्राप्त करने का हर संभव प्रयास करते रहे। इस प्रकार यह रचना भीषण स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि के रूप में गौरवान्वित है। 

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन ! 

गुरूनानक जयन्ति की शुभकामनाएं !

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