रूक्मिणी मंदिर

द्वारिका शहर की सीमा पर है – रूक्मिणी मंदिर

पुराना कलात्मक मंदिर है जिसमे रुक्मिणी जी की प्रतिमा है –

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पौराणिक कथा के अनुसार कृष्ण जी ने ऋषि दुर्वासा को अपनी बसाई नगरी द्वारिका आने के लिए आमंत्रित किया, ऋषि ने आमंत्रण स्वीकार किया और साथ ही यह शर्त रखी कि द्वारिका तक उनके रथ को स्वयं कृष्ण जी और रूक्मिणी खींचेंगे. दोनों रथ खींचने लगे कुछ समय बाद रूक्मिणी थक गई और उन्हें प्यास लगी. कृष्ण जी ढूंढते हुए बहुत दूर से उनके लिए पानी ले आए और दोनों ने पानी पिया इस पर ऋषि क्रोधित हुए, उन्हें पहले पानी न देकर ऋषि का अपमान किया गया और दुर्वासा ने श्राप दे दिया फिर कृष्ण के आग्रह करने पर ऋषि कुछ नरम हुए फिर भी कहते है श्राप से इस स्थान का पानी पीने योग्य नही है और श्राप के कारण ही रूक्मिणी और कृष्ण जी को अलग रहना पड़ा. इसीसे द्वारिकाधीश का मंदिर भीतर शहर ( गाँव ) में है और रूक्मिणी जी का मंदिर शहर ( गाँव ) की सीमा पर है और इसीसे रूक्मिणी मंदिर रथ की आकृति में बनाया गया है –

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इसी कथा के अनुसार यहां आज भी पानी के लिए श्रृद्धालु मंदिर में पैसे देते है यूं भी हिन्दू धर्म के अनुसार पूर्वजों को पानी दिया जाता है और यह पैसे उसी के माने जाते है.

वैसे पूरी द्वारिका और आस-पास के क्षेत्र में पीने योग्य पानी अब भी नही है और पानी मीलों दूर से मंगाया जाता है.

इसके बाद हमने देखा प्रमुख मंदिर – द्वारकाधीश का मंदिर जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …

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