स्मृति शेष – जगदीश चन्द्र माथुर

उमा – ( हल्की लेकिन मज़बूत आवाज़ में ) – क्या जवाब दूँ, बाबू जी ! जब कुर्सी-मेज़ बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज़ से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीददार को दिखला देता है। पसन्द आ गई तो अच्छा है, वरना ..

रामस्वरूप – ( चौंककर खङे हो जाते है ) उमा, उमा ! 

उमा – अब मुझे कह लेने दीजिए, बाबूजी !  … ये जो महाशय मेरे खरीददार बनकर आए है, इनसे ज़रा पूछिए कि क्या लङकियों के दिल नहीं होता ? क्या उनके चोट नहींं लगती ? क्या वे बेबस भेङ-बकरियाँ है, जिन्हें कसाई अच्छी तरह देखभाल कर खरीदते है ?

गोपालप्रसाद – यह तो हमारी बेइज़्ज़ती ..

उमा – ( ताव में आकर ) जी हां, हमारी बेइज़्ज़ती नहीं होती जो आप इतनी देर से नाप-तौल कर रहे है ? और ज़रा अपने इस साहबज़ादे से पूछिए कि अभी पिछली फरवरी में ये लङकियों के होस्टल के ईर्द-गिर्द क्यों घूम रहे थे और वहाँ से क्यों भगाए गए थे ! 

शंकर – बाबूजी, चलिए !

गोपालप्रसाद – लङकियों के होस्टल में ? क्या तुम कॉलेज में पढ़ी हो ? 

( रामस्वरूप चुप ) 

उमा – जी हाँ, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ। मैंनें बी ए पास किया है, कोई चोरी नहीं की, और न आपके पुत्र की तरह ताक-झाँक कर कायरता दिखाई है। मुझे अपनी इज़्ज़त – अपने मान का ख्याल तो है। लेकिन इनसे पूछिए कि ये किस तरह नौकरानी के पैरों पङ कर अपना मुँह छिपाकर भागे थे ! 

रामस्वरूप – उमा ! उमा ! 

गोपालप्रसाद – (खङे होकर गुस्से में ) बस, हो चुका। बाबू रामस्वरूप, आपने मेरे साथ दग़ा की। आपकी लङकी बी ए पास है और आपने मुझसे कहा था कि सिर्फ मैट्रिक तक पढ़ी है। लाइए मेरी छङी कहाँ है। मैं चलता हूँ (छङी ढ़ूँढ़ कर उठाते हुए ) बी ए पास ? ओफ्फोह ! ग़ज़ब हो जाता है ! झूठ का भी कुछ ठिकाना है ! आओ बेटे, चलो ..

( दरवाज़े की ओर बढ़ते है) 

उमा – जी हाँ, जाइए, ज़रूर चले जाइए ! लेकिन घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाङले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं – यानि बैकबोन, बैकबोन

रीढ़ की हड्डी – नाटक का सीन है यह और नाटककार है – जगदीश चन्द्र माथुर …. जिनका आज जन्मदिन है 

यह नाटक अपने विषय के कारण बहुत लोकप्रिय रहा, विशेषकर मंच पर प्रस्तुति में। इसमें समाज का लङकियों के प्रति दृष्टिकोण और जागरूक होती लङकियों का चित्रण है।

उमा उस दौर की एक आदर्श लङकी बनी जो शादी-ब्याह के जुङने वाले संबंधों को चुपचाप स्वीकार न कर आवाज़ उठाती है, जो उस समय की मांग थी। इस विषय के कारण ही इस नाटक को कुछ शिक्षण संस्थानों ने बी ए के पाठ्यक्रम में शामिल किया था। स्कूल-कॉलेज के सांस्कृतिक समारोहों के अलावा विभिन्न नाट्य स्पर्धाओं में भी इस नाटक का सफलतापूर्वक मंचन किया गया। विभिन्न नाट्य समूहों ने भी इसे मंचित किया।  इस नाटक को कई बार प्रतियोगिताओं में विषय के ही कारण विशेष पुरस्कार मिला, इस तरह पुरस्कार की गारंटी बन कर भी यह नाटक बहुत लोकप्रिय रहा।

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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