स्मृति शेष – वृन्दावनलाल वर्मा

” हम लोग तालाब के बंध पर चढ़े। उसमें पानी बिलकुल न था; पर पेडों की छाया में बारहसिंगों का बड़ा भारी झुंड बैठा था। उस जंगल में बंदूक न चलने के कारण और मनुष्यों के अल्प विचरण के कारण जानवर निर्बाध रहते तथा घूमते हैं। हम लोग तालाब के बंध पर कई क्षण खड़े रहे, परंतु बारहसिंगे विचलित नहीं हुए। हम लोगों ने आपस में बातचीत शुरू की तब वे दो-दो, चार-चार करके खड़े हुए। मैंने उनको गिनने की चेष्टा की – एक सौ अठ्ठारह से अधिक थे। अब यह जानवर अन्य जंगलों में बहुत कम हो गया है। होशंगाबदा के बाहर इटारसी सड़क पर एक पहाड़ी है। इसकी भीमकाय चट्टानों के भीतरी भाग पर कुछ प्राचीन चित्र हैं। उनमें एक जाति के जानवर का भी अंकन है, जो बारहसिंगा से कहीं बड़ा, परंतु मिलता-जुलता है। अब यह जानवर भारतवर्ष भर में कहीं भी नहीं है।”

दबे पाँव – पुस्तक का अंश है यह जिसके लेखक है वृन्दावनलाल वर्मा जिनकी आज पुण्यतिथि है।

झांसी की रानी जैसी ऐतिहासिक रचनाओं के अलावा वर्मा जी ने सामाजिक उपन्यास भी लिखे। ऐतिहासिक उपन्यास मृगनयनी पर दूरदर्शन से धारावाहिक भी प्रसारित हो चुका है।

लेखक होने के साथ वर्मा जी शिकारी भी रहे। यह उस दौर की बात है जब शिकारी होना गर्व की बात थी और शिकार के लिए लाइसेंस भी जारी किए जाते थे।

दबे पाँव पुस्तक में वर्मा जी ने अपने शिकारी जीवन के संस्मरण लिखे है। झांसी स्थित बेतवा नदी और देवगढ़ के जंगल पर केन्द्रित इस पुस्तक से वन्यजीवन की कई जानकारियाँ मिलती है जैसे जंगली कुत्ते को सुना कुत्ता कहते है, ये झुण्डों में रहते है और झुण्डों में शेर पर आक्रमण कर उसे घायल भी कर देते है। ऐसा ही एक जल का जन्तु है जलमानुष, ये भी झुण्डों में रहते है और झुण्डों में मगरमच्छ पर आक्रमण कर उसे घायल भी कर देते है। कुछ ऐसे जंगली प्राणियों की भी चर्चा है जिनके नाम भी कई लोग नहीं जानते। एक किस्सा यह भी है कि एक भेङिया नवजात को उठा ले गया। कुछ वर्ष जंगल में ही पला-बढ़ा, बाद में जंगल से लाया गया। वह बच्चा केवल आवाज़े निकालता पर बात नहीं कर पाता था और न ही कपङे पहनता था। उसे बात करना सिखाने और कपङे पहनने की आदत करने में कई दिन लगे। कुल मिलाकर बहुत रोचक है यह पुस्तक …..

गौरवशाली लेखक को सादर नमन !

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