धर्मवीर भारती – स्मृति शेष

आज हिन्दी जगत के सुविख्यात साहित्यकार और सम्पादक धर्मवीर भारती का जन्मदिवस है।

आज चर्चा करते है भारती जी के लोकप्रिय उपन्यास गुनाहों का देवता की।

यह देवता यानि नायक है – चंदर जो अपना  घर लगभग छोड चुका है और  दूर क़ॉलेज में पढाई कर रहा है और अपने प्रोफ़ेसर डाक्टर शुक्ला के घर अधिक आता-जाता है और उनकी लडकी सुधा से स्नेह रखता है। सुधा बचपन में अपनी माँ को खोकर कुछ वर्ष गाँव के स्कूल में पढाई कर शहर आई है जिससे सबकी  अधिक दुलारी है।  सुधा के भोलेपन और चंदर के प्रति स्नेह के बारे में भारती जी लिखते है –

” सब लोग जितनी चंदर की तारीफ़ करते वह उतना अच्छा उसे नहीं समझती थी। आदमी की परख तब होती है जब दिन – रात बरते। चंदर उसका ऊन कभी नहीं लाकर देता था, बादामी रंग का रेशन मंगाओ तो केसरिया रंग का ला देता था।”

डॉ शुक्ला ने दोनों के स्नेह भाव को पारस्परिक स्नेह से अधिक नहीं समझा,   चंदर से कहते है –

” तुम तो थीसिस में व्यस्त रहोगे,  मैं जाकर लडका देख आऊंगा। फिर मई के बाद जुलाई तक सुधा का ब्याह कर देंगे। तुम्हे डाक्टरेट मिल जाए और यूनिवर्सिटी में जगह मिल जाए। बस हम तो लडका – लडकी दोनों से फारिग।”

लेकिन चंदर के मन में सुधा के लिए विशुद्ध स्नेह नहीं था, शायद स्नेह कुछ अलग रूप ले रहा था,  देखिए ये पंक्तियाँ –

” चंदर को याद आ गया। अभी बुआ ने बात की थी सुधा के ब्याह की। तब उसे कैसा लगा था ? उसका दिमाग घूम गया था। लगा जैसे एक असहनीय दर्द था या क्या था जो उसकी नस – नस को तोड गया।”

चंदर के प्रति सुधा अपनी भावना समझ नहीं पा रही। लेकिन वह किसी से शादी भी  नहीं करना चाहती।  स्थिति को समझते हुए चंदर ने कहा –

” मैं तुम्हारे मन को समझता हूँ सुधा,  तुम्हारे मन ने जो तुमसे नही कहा वह मुझसे कह  दिया लेकिन सुधा हम दोनों एक –  दूसरे की ज़िन्दगी में क्या इसीलिए आए कि एक दूसरे को कमजोर बना दे या कि उसे अपने ब्याह की शहनाई में बदल दे ?  एक बात सोचो हम पर कुछ विश्वास करके ही उन्होंने कहा है कि मैं तुमसे फ़ोटो पसंद कराऊँ,  अगर तुम इंकार कर देती हो तो एक तरफ पापा को तुमसे धक्का पहुंचेगा दूसरी ओर मेरे प्रति उनके विश्वास  को कितनी चोट लगेगी।”

वाकई, भारती जी ने प्रेम की भावना को कितनी ऊंचाई पर यहाँ रखा है जो सांसारिकता से, भौतिकता से कोसो दूर है। सुधा को यह अहसास भी नही कि उसके मन में स्नेह की भावना कब प्रेम में बदल गई पर पम्मी इसे खूब समझती है क्योंकि वह व्यावहारिक है। पम्मी  डाक्टर शुक्ला के लेखो की टाइपिंग  करती है। पम्मी स्वच्छंद विचारों की आधुनिक लड़की है, पति से अलग रहती है, परिपक्व भी है। वह चंदर के प्रति आकर्षित है।  चंदर के बारे में  सुधा से कहती है –

” चंदर वह आदमी है जिसके हाथ में मेरे दिल के सभी राज़ सुरक्षित रहेगे। वह खेल नहीं करेगा और प्यार भी नहीं करेगा। ज़िन्दगी में आकर भी ज़िन्दगी से दूर और सपनो में बंध कर भी सपनों से अलग है।”

सुधा के विवाह के बाद  पम्मी की परिपक्व बातो को सुन कर,  उसकी संगत में रह कर चंदर को लगने लगा कि सुधा भी अब व्यावहारिक होकर वैवाहिक जीवन में रम गई होगी और वह भी पम्मी की ओर आकर्षित होने लगा।  इस तरह चंदर के जीवन से जुडी दूसरी लडकी है पम्मी और उन्ही दिनों उसकी मुलाक़ात होती है सुधा की कॉलेज की सहेली गेसू से।  भारती जी ने प्रेम का एक और स्वरूप गेसू के माध्यम से चित्रित किया है। गेसू बचपन से अख्तर से प्रेम करती है लेकिन अख्तर के परिवार वाले अख्तर के ब्याह के लिए गेसू की छोटी बहन फूल को पसंद करते है और परिवार की बात मान  कर अख्तर फूल से विवाह कर लेते है। यह बताते हुए गेसू चंदर से कहती है –

” मैंने कस्द कर लिया है कि मैं शादी ताउम्र नही करूंगी। मेटर्निटी सेण्टर में काम सीख रही थी। किसी अस्पताल में काम करुँगी। मैंने अम्मीजान को इस बात के लिए राजी कर लिया है। क़यामत के रोज़ तक मेरी मय्यत उन्ही का आसरा देखेगी। अगर मैंने उनको अपना माना है तो वह मिलकर ही रहेगे। आज न सही क़यामत के बाद सही। मुहब्बत की दुनिया में जैसे एक दिन उनके बिना कट जाता है वैसे एक ज़िंदगी उनके बिना कट जाएगी।”

और इसके बाद गेसू  सुधा की पुरानी बाते याद करती है जिसका प्रभाव चंदर पर पडता है और वह फिर से सुधा के बारे में सोचने लगता है, अपनी ओर इस बेरूखी को पम्मी ताड लेती है और अपने पति के पास लौटने का निर्णय लेती है, व्यावहारिक जो ठहरी।

सुधा का सांसारिकता से ऊपर उठा पवित्र प्रेम, पम्मी की व्यावहारिकता और गेसू का अपने प्यार को न पाने पर क़यामत तक उसकी प्रतीक्षा करने का प्रण,  इन सबसे परे है बिनती जो सुधा की बुआ की बेटी है। गाँव के परिवेश में पली – बढी कम पढी-लिखी,  माँ के कटु व्यवहार से तंग सीधा-सादा जीवन चाहती है, यहाँ तक कि यह भी नही जानना चाहती कि उसका ब्याह किससे तय हुआ है। यही बिनती अपने ब्याह के टूटने की बात चंदर से कहती है कि उसके ससुराल वालो का लालच देख कर मामा जी ( डाक्टर शुक्ला ) ने तीन भांवरो के बाद ही उसे मंडप से उठा लिया और तभी मुझमे स्वाभिमान जागा। इसके बाद बिनती ने अपनी माँ के कटु व्यवहार पर भी पलट कर जवाब दे दिया। इसी  बिनती को अंत में चंदर ने सुधा के निधन पर उसकी अंतिम इच्छा का मान रखते हुए अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।  वैसे सुधा के विवाह के बाद चंदर ने अनुभव किया था कि बिनती उसके प्रति आकर्षित है लेकिन चंदर ने उसे अनदेखा ही किया था, वह कभी बिनती के प्रति आकर्षित भी नहीं हो पाया था। जिस बिनती की ओर कभी आकर्षित भी नहीं हो पाया अंत में चंदर ने उसी के साथ अपना जीवन निभाया जबकि जिस सुधा से उसने प्रेम किया,  उसे प्रेम की ऊंचाइयों के कारण सांसारिकता के धरातल पर लाकर अपनाने का साहस नहीं कर पाया और पम्मी के आकर्षण में बंध कर भी इतना व्यावहारिक नही हो पाया कि उसके प्रेम बंधन में बंधे तभी तो उसकी अंतरात्मा की आवाज़ ने उससे कहा –

” तू गेसू से भी गया बीता है … गेसू ने जिससे प्रेम किया उसी के साथ संसार बसाना चाहा पर अपना प्यार न पाने पर न सिर्फ इस जीवन में बल्कि जीवन के बाद भी संभावित समय तक अपने प्रेम के साथ ही रहने का प्रण किया,  न किसी की ओर आकर्षित हुई न किसी के बारे में सोचा ”

भारती जी  के  इस उपन्यास पर एक था चंदर एक थी सुधा नाम से फिल्म बनी लेकिन रिलीज़ न हो सकी जिसमे चंदर और सुधा की भूमिकाओं में है – अमिताभ बच्चन और जया ( भादुड़ी ) बच्चन और पम्मी की भूमिका में है – रेखा

हिन्दी जगत के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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1 टिप्पणी »

  1. prasun latant said

    Good

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