गुलशन नन्दा की फिल्में –  अजनबी 

फिल्म और उपन्यास का एक ही नाम –  अजनबी 

फिल्म का अन्त पूरी तरह से बदल दिया गया जिससे शीर्षक अजनबी से कहानी का संबंध  ही नही रहा लेकिन संबंध बनाए रखने के लिए अजनबी लडकी के रूप मे नायिका ( ज़ीनत अमान ) से मुलाक़ात बता दिया गया जो फ़िल्म मे ठीक ही रहा लेकिन उपन्यास के पाठको को नही जंचा।

उपन्यास में जो अजनबी लडकी है उसकी छोटी सी लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका है जो फ़िल्म मे योगिता बाली ने की है पर कहानी के बदलाव से उसकी मह्त्वपूर्ण भूमिका अतिथि भूमिका मे बदल गई. अपने सौतेले भाइयों से बचती यह अजनबी लडकी पिता की अन्तिम इच्छा से सारे ज़ेवर, नगदी बैग मे भर कर शहर छोड कर जा रही है पर रेल छूट जाती है. छोटे स्टेशन पर रात में अन्य सुविधा न होने पर नायक स्टेशन मास्टर ( राजेश खन्ना ) के घर में रूकती है. रात में ही नायिका आती है और बताती है कि कैसे उसके पिता ने नायक पति से उसे अलग किया और अपने प्यार के लिए वह पति के पास भाग आई है. उधर नायक नायिका को वापस लाने उसके पिता के अनुसार पैसे नही जुटा पाता है और पैसे के लिए ही वह इस अजनबी लडकी की सोते मे  हत्या कर देता है इस बात से बेखबर कि वह नायिका ही है और सरप्राइज़ देने के लिए उस अजनबी लडकी ने उसे अपने स्थान पर सुला दिया था. अंतिम दृश्य में अजनबी लङकी नायक को कसम देती है कि भीतर मौजूद नायिका से हमेशा प्यार से रहे और नायक आवाक् …. कितना सही शीर्षक रहा उपन्यास का …  

उपन्यास मे सब बहुत अच्छा लगा पर नायक के चरित्र को बहुत साफ़-सुथरा बताने के लिए फिल्म में बदलाव किया जिसमें अन्त मे सौतेले भाइयोँ से अजनबी लङकी को नायक ने सुरक्षित किया और नायिका भी मिल गई

 लेकिन उपन्यास के पाठकों को फ़िल्म कमज़ोर लगी  … बावजूद इसके फ़िल्म लोकप्रिय हुई

अगले चिट्ठे में एक और फिल्म की चर्चा  …..

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