हरिवंश राय बच्चन – स्मृति शेष

दीनता ले असंख्य अवतार
पेट खुला, हाथ पसार, पाँच उँगलियाँ बाँध, मुँह दिखला
भीतर घुसी हुई आँखों से आँसू ढार
मानव होने का सारा सम्मान बिसार
घूमती गाँव-गाँव, घूमती नगर-नगर, बाज़ारों-हाटों में, दर-दर, द्वार-द्वार !

अरे, यह भूख हुई साकार, दीर्घाकार !
तृप्त कर सकता इसको कौन ? पेट भर सकता इसका कौन ?
भूख ही होती, लो, भोजन ! मृत्यु अपना मुख शत-योजन
खोलती, खाती और चबाती, मोद मनाती,
मग्न हो मृत्यु नृत्य करती !
नग्न हो मृत्यु नृत्य करती !

यह  ” बंगाल का काल ”  कविता का अंश है जिसके रचनाकार है –  हरिवंश राय बच्चन …. जिनका आज जन्मदिवस है  ……

गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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