स्मृति शेष – श्री लाल शुक्ल

श्री लाल शुक्ल – हिन्दी साहित्य में व्यंग्य लेखन में एक लोकप्रिय नाम हैं। आज शुक्ल जी की पुण्यतिथि है।

जीवन और समाज के विभिन्न पहलुओं पर बारीकी से नज़र रख कर अपनी लेखनी चलाई है। जीवन में कई बार हम सबका कई उलझन भरी स्थितियों से सामना होता है पर उन पर कलम चलाने का काम श्री लाल शुक्ल जी जैसे व्यंगकार ही कर सके जैसे अक्सर यूं होता है कि हम किसी बात की प्रतीक्षा करते है और समय काटने के लिए कुछ और काम या कुछ बातचीत करने लगते है। बातचीत समाप्त हो जाती है, काम भी सामाप्त हो जाता है पर जिस की प्रतीक्षा है वह काम ही नहीं हो पाता। ऎसी ही स्थिति श्री लाल शुक्ल जी ने बताई है अपने व्यंग लेख अंगद का पाँव में –

” प्लेटफ़ार्म पर रेल गाडी अंगद के पाँव की तरह खडी है, लगता है जैसे जमी हुई है, हिल ही नहीं रही, आगे ही नहीं बढ रही। अपने मित्र को छोडने आए है। सभी औपचारिक बाते पूरी हो गई। जाने वाले मित्र महोदय सबसे व्यक्तिगत रूप से बात कर चुके फिर भी गाडी समय होने और सिगनल मिलने के बावजूद भी आगे नहीं बढ रही। ऐसे में आपस में कुछ और बाते होने लगी जैसे मित्र को पहनाई गई माला को लेकर फूलो पर चर्चा, किसी ने कहा, अंगेजों ने गुलाब की कई किस्मे विकसित कर ली है और हम अब भी देसी फूलो की बात करते है तो किसी ने उन पर व्यंग्य किया कि अंग्रेज़ चले गए औलाद छोड गए। कुछ झडप होने के बाद मामला शांत हो गया पर गाडी अब भी नही चली। एक प्रोफ़ेसर साहब ने जीवन दर्शन बताना शुरू किया कि जीवन है क्या, गाडी फिर भी आगे नही बढी। बहुत थक-हारने के बाद गाडी चल पड़ती है। ”

ऎसी स्थितियां हम सबके जीवन में आती है और हम झुंझलाते है पर श्री लाल शुक्ल जी जैसे मनीषी बिना झुंझलाए उसे कलमबद्ध कर उसका आनंद लेते है और साथ में सम्बंधित को सबक भी सिखा देते है। इतनी पैनी दृष्टि रखने वाला लेखक व्यवस्था पर न लिखे, यह हो ही नहीं सकता। व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर लेखनी चलाई जिसमे से एक पहलू है साहब का रौब। साहब का बाबा लेख में बताया कि कैसे साहब का परिवार दफ्तर को घर समझता है और बाबा यानि मुन्ना बद्तमिजी की हद तक शरारत करता है। व्यवस्था पर चलने वाली यह कलम बडे पैमाने पर चली और बडी-बडी व्यवस्थाओं पर भी चोट की जो कहानियों और उपन्यासों में अधिक उभर कर आई जिसका सशक्त उदाहरण है उपन्यास राग दरबारी … लेकिन इसकी और अन्य रचनाओं की चर्चा फिर कभी ……

हिन्दी जगत के गौरवशाली व्यंग्यकार को सादर नमन !

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