स्मृति शेष – देवकी नंदन खत्री

जन जन तक हिंदी को पहुंचाने वाले हिंदी कथा जगत के प्रथम लेखक देवकी नंदन खत्री के निधन को सौ वर्ष हो चुके है। आज ही के दिन वर्ष 1913 में उनका निधन हुआ था।

समस्तीपुर बिहार में जन्मे देवकी नंदन खत्री जी पहली बार व्यापक स्तर पर कथा साहित्य ले आए और इससे जनता जुडे इसीसे इसे बहुत रोचक बनाया तिलस्म और ऐयारी के किस्सों से जो आजकल की फिल्मो के सस्पेंस और थ्रिल से कम नही है।

उनकी लोकप्रिय रचना चन्द्रकान्ता पर नब्बे के दशक में दूरदर्शन से धारावाहिक प्रसारित हो चुका हैं। यह उपन्यास तब लिखा गया जब हिंदी गद्य की शुरूवात हुई थी और इस उपन्यास की विशेषता यह है कि इसे पढने के लिए बहुतो ने हिंदी सीखी। बहुत ही सरल भाषा में लिखे इस उपन्यास के चार भाग है। इसकी सफलता के बाद चन्द्रकान्ता सन्तति की रचना की जिसके चौबीस भाग है। सभी रोचक होने से इतने पृष्ठ पढने के लिए भी ऊब नही होती।

इस उपन्यास में विजयगढ़ की राजकुमारी चन्द्रकान्ता और नौगढ़ के राजकुमार वीरेन्द्र सिंह की प्रेम कहानी है। क्रूर सिंह उमके प्रेम में बाधा है।  क्रूर सिंह चुनार के राजा शिवदत्त को चन्द्रकान्ता को पाने के लिए उकसाता है, कहता है  –

” लश्कर का इन्तेजाम आजकल बहुत खराब हैं, अगर आप चाहे तो इस समय विजयगढ़ को फतह कर लेना कोई मुश्किल बात नहीं। चन्द्रकान्ता महाराज जयसिंह की लड़की भी जो खूबसूरती में अपना सानी नही रखती आप ही के हाथ लगेगी।”

रमल और ऐय्यारी जैसे कार्यों से आम जनता को खत्री जी ने ही परिचित करवाया। रमल ऎसी ज्योतिष विद्या है जिसके सहारे किसी व्यक्ति को ढूंढा जा सकता है। लेकिन इसका तोड भी है, एक तंत्र को तावीज़ बना कर गले में पहनने से रमल लागू नहीं होता यानि तावीज़ के कारण उसका पता नहीं लगाया जा सकता। इसीसे चन्द्रकान्ता का पता रमल से नहीं लगाया जा सका ऐय्यारी की विद्या से किसी का भी रूप बनाया जा सकता है। पूरे उपन्यास में ऐय्यारी भरी पडी है, पुरूष पात्र हो या नारी पात्र, एक झलक देखिए –

” चपला ने चालाकी से बेहोशी की बुकनी कान में रखकर नकली चंपा को सुंघा दी जिसके सूंघते ही चंपा बेहोश हो कर गिर पड़ी। चपला चंपा को पीठ पर लाद कर  फौव्वारे के पास ले गई और चन्द्रकान्ता से बोली – तुम फौव्वारे से चुल्लू भर – भर पानी इसके मुंह पर डालो, मैं धोती हूँ। चन्द्रकान्ता ने ऐसा ही किया और चपला खूब रगड – रगड कर उसका मुंह धोने लगी। थोड़ी देर में चंपा की सूरत बदल गई और साफ़ नाजिम की सूरत निकल आई।”

चपला कोई साधारण औरत न थी। खूबसूरती और नजाकत के अलावा उसमे ताक़त भी थी। दो – चार आदमियों से लड जाना या उनको गिरफ्तार कर लेना उसके लिए एक अदना सा काम था। शस्त्र विद्या को पूरे तौर पर जानती थी। ऐयारी के फन के अलावा और भी कई गुण उसमे थे। ऐय्यारी के साथ अन्य बातों का भी इसमे उल्लेख है जैसे  –

” इस मसाले में यह गुण था कि जिस ज़मीन पर उसका लेप किया जाए सूख जाने पर अगर किसी का पैर उस ज़मीन पर पडे तो जोर से पटाखे की आवाज़ आवे मगर देखने से यह न मालूम हो कि इस ज़मीन पर कुछ लेप किया हैं।”

…. ” तेजसिंह ने अपनी कमर से खंजर निकालकर चपला की लाश की टांग काट ली और महाराज को दिखला कर बोले – देखिए इसमे कही हड्डी हैं। महाराज ने गौर से देखकर कहा ठीक है बनावटी लाश है। इसके पीछे चन्द्रकान्ता की लाश को भी इसी तरह देखा, उसमे भी हड्डी नहीं पाई गई। अब सबो को मालूम हो गया कि ऐयारी की गई हैं।”

शिवदत्त के साथ युद्ध भूमि का दृश्य देखिए  – ” देवीसिंह ने बहुत से आदमियों को महताब जलाने के लिए बांटी। यह महताब तेजसिंह ने अपनी तरकीब से बनाई थी। इसके जलाते ही उजाला हो गया और दिन की तरह मालूम होने लगा। ”

इन कुछ उदाहरणों से ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उपन्यास कितना रोचक है और विशेषकर उस दौर में जब मनोरंजन के साधन कम ही थे।

देवकी नंदन खत्री जी के साहित्य पर कुछ और चर्चा फिर कभी ….

हिन्दी जगत के गौरवशाली साहित्यकार को सादर नमन !

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