आधुनिक कवियित्रियों में उभरा पहला नाम – शकुन्तला माथुर

आज हिन्दी जगत की ख्यात कवियित्री शकुन्तला माथुर का जन्मदिवस है। आज ही के दिन वर्ष 1922 में दिल्ली में जन्मी शकुन्तला माथुर जी का नाम कहीं शकुन्तल माथुर और कहीं शकुन्त माथुर देखा गया।

शकुन्तला जी के काव्य जगत पर चर्चा से पहले बेहतर होगा कि हम उस समय की स्थितियों पर एक दृष्टि डाले। स्वतंत्रता मिलने के बाद भी हम भारतीयों के जीवन में अनेक तरह की समस्याएं थी। जब जीवन समस्याओं से घिरा हो तब अपनी भावगत गगरी संभालना कठिन हो जाता है जिससे वह छलकने लगती है। इस छलकते जल को बांधा कैसे जा सकता है  ?  यानि यहां कविता स्वाभाविक शैली में फूट पङी। इसी से कवि और कविता बङी मात्रा में उभर कर आए लेकिन प्रसिद्ध साहित्यकार आलोचक अज्ञेय ने कहा है कि अच्छा काव्य अनुपात की दृष्टि से थोङा ही रहता है।

सातवें दशक में चौथा सप्तक की पृष्ठभूमि में कही गई यह बात  1943  में तार सप्तक शीर्षक से प्रकाशित पहले सप्तक के प्रकाशन समय से ही अनुभव की जा रही थी।  इसमें छायावाद के बाद नई कविता के चुने हुए सात कवियों की रचनाओं को संपादित किया गया जिनमें एक भी कवियित्री नहीं थी। इसका अर्थ यह हुआ कि महादेवी वर्मा के बाद काव्य जगत में कोई महिला उभर कर नहीं आ पाई थी मगर इस क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति दर्ज थी। यह प्रमाणित हुआ 1951  में दूसरा सप्तक के प्रकाशन से जिसमें अज्ञेय जी नें एक कवियित्री को चुना – शकुन्तला माथुर

जिनकी कविताएं पढ़ कर लगा कि वातावरण से प्रभावित मन अपनी व्याकुलता छिपा नहीं सकता। यह प्रभाव मन के घन तिमिर में विद्युत की भांति विद्यमान रहता है और समय पा कर आलोकित होता है। आरंभिक रचनाएं तो लगता है किसी उद्येश्य की पूर्ति हेतु अथवा किसी प्रयोजन हेतु नहीं रची गई। दूसरा सप्तक के वक्तव्य में कवियित्री ने इन शब्दों में स्वीकार किया है –

” काव्य रचना मैंनें अपने ही आप को संतुष्ट करने के लिए की थी – एकदम स्वान्तः सुखाय। किन्तु अपने जीवन में स्वाधीनता की लङाई को निकट से देखने से जो आग मन में थी वही आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रही। यही कारण है कि स्वान्तः सुखाय रचनाएं बाद में सामाजिक प्रक्रिया के रूप में मुखरित हो उठी।”

इसका एक काऱण शायद शकुन्तला जी का निजि जीवन भी हो सकता है,  पति गिरिजा कुमार माथुर साहित्य और संगीत से जुङे है, आकाशवाणी में उच्च पद को भी सुशोभित किया। इसका प्रभाव भी शकुन्तला जी की रचनाओं पर हो सकता है।

कविताओं में जीवन की सच्चाइयों को प्रमुख विषय बनाया। डर लगता है – कविता में मृत्यु से भी भय है और जीवन के प्रति निराशा भी है –
इस धरणी की प्यासी आंखें

लगी इसी की ओर एकटक
आई जग में सुधा कहां से
जल का भी तो काल पङा है
कवियित्री को लगता है निराशा से भरे इस जीवन में जहां किसी तरह जीवन व्यतीत करना दूभर है वहां जीवन के प्रति इतना मोह कैसे हो सकता है  ?  ठीक उसी तरह जैसे जल के अभाव में सुधा के अस्तित्व का भान ही आश्चर्य चकित करता है क्योंकि इस स्थिति में धरणी स्वयं तृप्ति नहीं हो पा रही अर्थात् वह स्वयं संतुष्ट नहीं है।

इसी युग में कविता में जीवन के लिए बोझ शब्द का प्रयोग होने लगा। बोझ का वास्तविक तात्पर्य उत्तरदायित्व से है जो आधुनिक जीवन में मात्र औपचारिकता बन गया है। इसी भावना के रहते शकुन्तला जी ने साहित्य पर व्यंग्य किया है कि साहित्यकार भी समाज के प्रति उत्तरदायी नहीं रहे। प्रस्तुत है रचना ज़िन्दगी का बोझ की कुछ पंक्तियां –
चला जा रहा है हिन्दी साहित्य रेल में बैठ

दौङती कहानी, क्यारियां सी, घिसटे लेख भी
पंगु से, कोनी फटी, टुकङे बिखर गए।
आलोचनाएं सो रही, हो बेफिकर, परवाह नहीं
है सीट तो रिज़र्व।
कविताओं में प्रकृति चित्रण भी मिलता है। इतनी रात गए – कविता में सुबह और संध्या के शब्द चित्र देखिए –
पीला पङ कर सूरज नीचे उतर रहा है

या सहमा सा चाँद उतर कर

उलझ गया है फूलों के झुरमुट में

यह स्वतंत्रता आंदोलन को पास से देखने का ही प्रभाव रहा कि ग्रामीण परिवेश को न केवल भली-भाँति समझा बल्कि वहां की स्थिति को कविताओं में ढ़ाल कर शहरों तक पहुँचाया। पचास के दशक की कविता का अंश प्रस्तुत है जिसमें विकास में पीछे रहे गाँवों का चित्र है –

कभी एक ग्रामीण धरे कन्धे पर लाठी

सुख-दुःख की मोटी सी गठरी

लिए पीठ पर, भारी जूते फटे हुए

जिनमें से थी झांक रही गांवों की आत्मा

ज़िन्दा रहने के कठिन जतन में

पाँव बढ़ाए आगे जाता।

इस समय गांवों के विकास के लिए कई योजनाएं तो बनी थी लेकिन व्यावहारिक रूप नहीं ले पा रही थी। इस तरह बौद्धिक स्तर के सोच-विचार को रचनाओं में स्थान देने का अर्थ यह नहीं है कि शकुन्तला जी सांस्कृतिक परिवेश से दूर है। केसर रंग रंगे  आँगन में होली की झलक –

धूम मचाती होली आई

सखि डाले कलसी भर जल की

धार बहाए सिर से कटि तक

अपनी इन रचनाओं के लिए शकुन्तला जी ने अपने शब्द जगत से तत्सम, उर्दू, अँग्रेज़ी और देशज शब्द लिए तथा अवसर के अनुसार शब्दों का नादात्मक प्रयोग भी किया – नुपूर, बेफिकर, लीडर, हौले-हौले …  रचना संसार में कला पक्ष का निर्वाह नहीं किया गया लेकिन भावों की अभिव्यक्ति में अनायास ही कलात्मकता कहीं-कहीं उभर कर आ गई।

शकुन्तला जी की कुछ और रचनाओं पर चर्चा फिर कभी …

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: