स्मृति शेष – जयशंकर प्रसाद

आज हिन्दी जगत के सुविख्यात साहित्यकार जयशंकर प्रसाद की जयंति है। आज ही के दिन  1889 में वाराणसी में प्रसाद जी का जन्म हुआ था।
प्रसाद जी जितने सशक्त कवि है उतने ही सशक्त नाटककार है, यह विषय अक्सर साहित्यिक चर्चाओं में बना रहा कि प्रसाद जी को नाटककार माने या कवि
लेकिन प्रसाद जी की पहली कृति न संपूर्ण काव्य है न नाटक, यह चम्पू काव्य है। चम्पू काव्य उसे कहते है जिसमें गद्य और काव्य दोनों हो। यह रचना है – उर्वशी चम्पू
यह पहली रचना 1906 के आसपास की है।  1918 में  ”  चित्राधार ”  का प्रकाशन हुआ जिसमें यह पहली रचना भी संग्रहित है लेकिन तब तक प्रसाद जी ने उर्वशी चम्पू में कई परिवर्तन कर दिए थे। यह कालिदास की रचना  ”  विक्रमोर्वशीय ”  पर आधारित है। इसमें पौराणिक कथा नहीं है। पौराणिक कथा महाभारत के आदिपर्व में है,  जिसमें पुरूवंश का वर्णन है, पौरवंशावली इस तरह बताई गई –
राजा दक्ष की पुत्री अदिति, अदिति से विवस्वान, विवस्वान से मनु, मनु से इला,  इला का पुत्र पुरूरवा। उर्वशी को पुरूरवा बलात् ले आया। उर्वशी और पुरूरवा के छह पुत्र हुए जिनमें से आयु नामक पुत्र को प्रसिद्धि मिली।
प्रसाद जी ने अपनी इस पहली रचना में कथा में परिवर्तन किया,  अपनी कुछ कल्पनाएं इसमें जोङी। परिवर्तन से बनी नवीन  कथा इस प्रकार है –
अत्यन्त रमणीय वनस्थली में संध्या का आनन्द लेते हुए एक तरूण युवक को नारी के कोमल कण्ठ ने आकृष्ट किया। तरूण की दृष्टि झरने के किनारे एक सुन्दरी पर पङी –
” धरि कोमल कर कमल मुख पर जल बीच ललाभ, थल जल कमल इकत्र करि बैठि शोभा धाम
सरर चन्द की चाँदनी सौरभ और सुहाग, मेलि बनायो अंग को नव अरविन्द पराग “
शीघ्र ही दोनों में परिचय हुआ जो मधुर स्मृति में बदला। उर्वशी उसके बंधन में बंध गई और पुरूरवा ने कुंजो, फूलों, वर्षा, शरद और वसन्त में उसका श्रृंगार करते हुए अनेक वर्ष बिताए। एक दिन अचानक एक गंधर्व युवक आया और एक सुन्दर वनमाला उर्वशी को पहना दी जिससे पुरूरवा को क्रोध आया और दोनों में घोर युद्ध हुआ। घात-प्रतिघात होने लगे –
” भरे क्रोध जल जलद युग धिरत करत आघात, विष्षुलता सी असि युगल लपटि छुटि जात ”
पुरूरवा से गन्धर्व युवक पराजित हो गया और उर्वशी पराजित घायल गन्धर्व युवक की सेवा करने लगी जिससे विरक्त हो पुरूरवा वहां से चले गए। कई दिनों के बाद पुरूरवा शान्त होकर लौट आए। गन्धर्व युवक केवरूक स्वस्थ होने के बाद उर्वशी के संकेत पर चला गया किन्तु उर्वशी के प्रिय मृगशावकों को अपने साथ लेता गया जिससे उर्वशी क्रोधित हो गई और पुरूरवा के मना करने पर भी उसे ढूँढ़ने निकल गई और पुरूरवा अकेले रह गए … और देखने लगे उदित होते भुवन भास्कर को जो एक नए दिन का, जीवन के नए अध्याय के आरंभ का संकेत देता है …  
प्रसाद जी की कुछ और रचनाओं पर चर्चा फिर कभी ….
हिन्दी जगत के गौरवशाली साहित्यकार और मेरे सबसे प्रिय कवि को सादर नमन !
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