स्वर्ण मन्दिर

गुरू रामदास के जन्मोत्सव के अगले दिन भीङ कम थी और दिन के उजाले में स्वर्ण मन्दिर की अलग ही छटा रही –

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यहाँ भी और सभी गुरूद्वारों में भीतर जाने से पहले पैर धोने की अच्छी व्यवस्था है। द्वार पर लम्बे संकरे भाग में लगातार पानी बहता रहता है जिसमें पैर रख कर आगे बढ़ा जाता है। इससे पहले एक खास बात, सिर ढकना बहुत ज़रूरी, पुरूषों के लिए केसरी रंग का बङा दस्तीनुमा कपङा दिया जाता है और महिलाएं अपने दुपट्टे या साङी के पल्लू से सिर ढ़कती है जो पूरी तरह से बाहर निकलने तक ढका रहना है।
सरोवर में है स्वर्ण मन्दिर जिसकी ओर जाने के लिए सरोवर में प्लेटफार्म बना है –

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सरोवर में बहुत कम संख्या में मछलियाँ भी है। किनारों को पार करते समय रास्ते में धर्म गुरूओं की समाधियाँ भी है जहाँ मत्था टेका जाता है।

भीतर समाधि के दर्शन से पहले –

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दर्शन कर बाहर निकल कर फिर उन्हीं किनारों से गुजरना है जहाँ प्रसाद के रूप में गरम स्वादिष्ट हलवा मिलता है। आगे दो-तीन स्थानों पर तीर्थ के रूप में कटोरों में पानी दिया जाता है –

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पीछे लंगर है जहाँ हमने भी खाना खाया –

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पक्ति में बैठना है और दोनों हथेलियाँ मिलाकर ऊपर फैलानी है जिस पर दूर से रोटी छोङी जाती है, यही विशेषता है लंगर की कि रोटी माँग कर खानी है। साथ में था हलुवा, राजमा और ज़ीरा चावल और कटोरे में पानी, बहुत स्वादिष्ट।
थाली में खाना छोङना नहीं है। फिर अपनी थाली कटोरा खुद उठा कर ले जाना है, पीछे कमेटी के सदस्यों को सौंपना है जो बर्तन साफ करते है –

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खाने बनाने की तैयारी –

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यहाँ से आती बर्तनों की आवाज़ से दूर तक लंगर होने का पता चलता है।
इसके बाद हम बाहर आए और देखने गए पास ही स्थित जलियांवाला बाग़ जिसकी चर्चा अगले चिट्ठे में …..

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