स्मृति शेष – विजय देव नारायण साही

आज  हिन्दी साहित्य के  सुविख्यात कवि  विजय देव नारायण साही की पुण्यतिथि है।

पीएचडी करते समय हिन्दी साहित्य का अध्ययन करते हुए मेरा परिचय विजय देव नारायण साही की रचनाओं से तीसरा सप्तक के माध्यम से हुआ।  अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के सात कवियों में एक कवि है साही जी  जिसका प्रकाशन  1943 में प्रकाशित तार सप्तक और 1951 में प्रकाशित दूसरा सप्तक की अगली कडी के रूप में 1959 में हुआ।

हिन्दी साहित्य में तीस के दशक के अंत से कविता मे छायावाद युग लगभग समाप्त हो रहा था.  इस समय स्वतंत्रता आंदोलन उग्र हो रहा था  और  साहित्य में गति मंथर हो चली थी.  नए ढंग  से  कुछ रचनाएं लिखी जा रही थी किन्तु बिखरी हुई सी यहां-वहां दिखाई देती थी. ऐसे में अज्ञेय जी ने अपनी कुछ काव्य रचनाओं के साथ और छह कवियों को चुना और सात कवियों की चुनिंदा रचनाओं के संकलन को तार सप्तक के नाम से प्रकाशित करवाया जिसकी श्रृंखला अस्सी के दशक तक चली और अंतिम कङी रही चौथा सप्तक।

हम चर्चा कर रहे है तीसरा सप्तक की ….. 1959 का समय… जब भारतीयों को यह अनुभव होने लगा था कि पहले विदेशी हमारा शोषण करते थे किन्तु अब अपनो द्वारा ही शोषण हो रहा हैं। इस अनुभव का आधार विभिन्न क्षेत्रो में नज़र आया। 1950 में   जनतंत्र  के उदय के बाद विभिन्न योजनाओं का निर्माण हुआ था, कार्यक्रमों की रूपरेखाएँ बन रही थी और युवा शहरों की ओर दौड रहे थे। जीवन स्तर वैज्ञानिक रूप ले रहा था,  पाश्चात्य  संस्कृति प्रभावी हो रही थी। जीवन दिन-पर-दिन कठिन होता जा रहा था। यह सभी बाते उस समय के काव्य में नज़र आ रही थी।  साही जी भी जीवन के  कडुवे यथार्थ से बालपन से ही प्राभावित नज़र आए क्योंकि निम्न मध्यम वर्ग परिवार से होने के कारण आर्थिक विषमता बराबर बनी रही।  उन्हें लगा कि इन विषमताओं के बीच मानव टूटता जा रहा हैं, उनकी इन काव्य पंक्तियों पर नज़र डालिए –

बाहर आओ सब साथ मिल कर रोओ, आंसू टकरा कर अंगारे बन जाते है
फट पडते हैं युग युग के ज्वालामुखी सुप्त, शायद धरती पर पडी दरारे मुंद  जाए

समाज में प्रेम के क्षेत्र में भी नए अनुभव हो रहे थे,  केवल सामाजिक कुरीतियां,  मर्यादाएं ही नहीं अपितु जीवन के अभाव भी प्रेम  की भावना को प्रभावित कर रहे थे जिससे विरह के साथ  निराशा की भावना भी इस क्षेत्र में दिखाई दे रही थी.  लेकिन अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए अब  भी कवि पुराने कवियों की तरह  प्रकृति का  सहारा भी  ले रहे थे. साही जी की यह पंक्तियां देखिए  –

मैं कभी देखता किसी कुसुम को चूम रही तितली
रो रो उठता सुनसान ह्रदय बिसरे मधुमासो का
साही जी की रचनाओं में केवल  सीधी सपाट अभिव्यक्ति ही नही रही बल्कि एक सीमा तक काव्य सौष्ठव भी दिखाई दिया।  सीधे-सादे शब्दों के अतिरिक्त काव्य की परोक्ष रूप से भावों को अभिव्यक्त करने की  शैली को भी अपनाया.  समाज मे फैले  एकाकीपन की अभिव्यक्ति के लिए लाक्षणिकता  देखिए  –
हर शाम यहाँ मानव लहरों से भर जाती सडके
हर बूँद अकेली किन्तु अकेला सबका रंग महल
शब्द वैकल्पिक प्रयोग भी किए साही जी ने  –
क्या हूँ मैं, आज
कौन सा, यह तरंगित विपुल माया लोक
चारों ओर मेरे, घिरा चारों ओर, चारों ओ …… ?
अपने चारो ओर फैली निराशा को देख कर सहसा उसे निराशा की अधिकता का विश्वास नही हो पाता जिसे कवि ने प्रश्न चिन्ह में अभिव्यक्त किया हैं।
साही जी के काव्य में  रूपक अलंकार का सुन्दर प्रयोग देखिए –
जो चाँद खिला फैला जादू का जाल स्थल
छन रहा धरा की थाली में  पारद  झलमल
धुंधली – धुंधली,  उजली – उजली,  कोमल – कोमल
रात में डूब गया चूका विस्तार मध्य
यह छोटी सी झलक रही  साही जी की  उन रचनाओं की जो तीसरा सप्तक में सम्मिलित हैं। कुछ और रचनाओं पर कुछ और चर्चा फिर कभी …..
हिन्दी साहित्य के गौरवशाली सहित्यकार को सादर नमन !
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